बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ज्याण पाणी मैं

ज्याण पाणी मैं
अपणै एक कहावत सै अक ‘जल जीवन सै’। फेर यो इबै बेरा पाट्या अक यू जल राजनीति बी सै। जल जीवन खातर जितना जरूरी सै, राजनीति खातर बी रोजाना उतना ए जरूरी होन्ता जावण लागर्या सै। दो पड़ौसी देसां मैं इतनी तकरार नहीं देखण मैं आन्ती जितनी आड़ै दो प्रदेशां बिचालै रोज देखण मैं आवै सै। कितै कर्नाटक अर तामिल नाडू मैं लाठा बाजरया सै, कितै पंजाब अर हरियाणा लठ ठायें हांडैं सैं। जिब इसे विवाद हो सैं तो राजनीति बी गर्मा ज्या सै अर जिब राजनीति गर्माज्या सै तो उसपै नेतावां के स्वार्थ की रोटी बी सही सिकैं सैं। नेता आपणी जनता का हितैषी दिखण का कोए मौका हाथ तै नहीं जावण देना चाहन्ते। दोनों कान्ही बंद करे जावैंगे, आन्दोलन चलाया जागा अर जनता नै अपणे पक्ष में खड़या करकै चुनाव जीत जावैंगे।
जै चुनाव तै पहलम कोए पानी का झगड़ा उठ ज्यावै तै यो बहोतै घणा फायदेमन्द हो सै ज्यूकर एक बख्त मैं ताऊ देबीलाल की खातर यू साबित हुया था। फेर ईबकै एक कमाल यू हुया अक कर्नाटक अर तामिल नाडू के बीच का पानी का झगड़ा ना तै चुनाव तै पहलम उठया अर ना चुनाव के बीच मैं किसे नै ठाया। ठीक उल्टा हुया। जिब इन दोनूआं के लैक्शन हो लिए, जिब जय ललिता नैं हाथ फैंक फैंक के गाने गा लिये, जिब जाकै यो विवाद हटकै खड़या हुया सै। सारे लक्शन हो लिए, जिब सुषमा स्वराज कन्नड़ बोल के उत्तर कान्ही कोए दूसरी भाषा बोलण नै आली अर जिब हेगड़े जी इसपै अपणा गुस्सा जाहिर कर चुके अक किसेनै उसका साथ नहीं दिया। जिब जाकै यो विवाद हटकै खड़या हुया सै। सारे लैक्सनां मैं या उपलब्धि दोहराई गई अक कावेरी विवाद सुलझा दिया फेर लागै सै यो और घणा उलझ ग्या सै।
न्योंए हरियाणा पंजाब का मसला सै। ईब तै पंजाब मैं बादल अर बी जे पी की सरकार, हरियाणा मैं चौटाला साहब अर बी जे पी की सरकार अर दिल्ली मैं भी बी जे पी की सरकार तो फेर यू पाणी का फैंसला अधर मैं क्यूं लटक्या आवै सै ईब ताहिं? कीड़ी का घाट कड़ै सी अक नीम तलै। या किसी दोस्ती बादल अर देबीलाल की जो जनता के हितां तै ऊपर अपणे हितां नै राखै। कई माणस गामां मैं पाज्यांगे न्यों कैहन्ते अक देवीलाल मरण तै पहलम जै पाणी और दिवा दे तै चौटाला नै सांस आज्यागा ना तै इस लैक्शन मैं चारों खाने चित्त जागा।
ईब लोगां नै कूण समझावै अक हाथी के दान्त खावण के और हों सैं अर दिखावण के और होंसै। बिना पाणी खेती सूनी अर बिना खेती किसान सूना अर किसान सूना तै जहान सूना अर जहान सूना तो दिल का अरमान सूना, फेर घर परिवार सूना अर सूने पन नै तोड़ण खात्तर फेर दारू का सहारा कै स्मैक का लारा। फांसी खा कै मरज्या तै कहवैं आत्महत्या करग्या बिचारा, किस्मत का मारया। जिब तांहि या सोच रहवैगी जिन्दगी के बारे मैं तो काम कोनी चालै। जिन्दगी नै देखण का नजरिया बदलना पड़ैगा। मिल बैठकै पाणी का लफड़ा सुलझाणा पड़ैगा। बड्डे भाइयां ताहिं समझाणा पड़ैगा अक छोटे भाई का हक नहीं मार्या करते। इतना लाम्बा लटक लिया यू पाणी का अर एस वाई एल के खोदण का मामला। माणसां नै आस छोड़ दी पर फेर बी मां बीच कै मसकोड़ा सा मारैं सैं वोट गेरदे सै, अर सोज्यां सैं। दूध की रूखाली बिलाई बिठा राखी अर फेर पाणी की बाट देखां तो म्हारे तै बड्डा आडू. कूण हो सकै सै?
एक बात जरूर सै अक ईसा निपटारा तो करवाइयो मतना जिसा कावेरी के पाणी का करवाया था। अक फैंसला हो भी गया, अर बात उड़ै। इसतै आच्छा तो फैसला नाए होवै। ईब न्यों तो तसल्ली सै अक फैंसला कोण्या हुया सै कदे तो फैंसला होवैएगा। अर एक दूसरी बात और बी सै अक या नहर खोदे पाछै बी म्हारी जरूरत पूरी कोण्या होन्ती। म्हारी जरूरत सै 400 यूनिट की अर नहर खोदे पाछे बी हमनै 200 यूनिट तै फालतू पाणी नहीं मिलता (कुल मिलाकै - एस वाई एल तै तो 200 यूनिट मिलैंगी) यो बाकी का पाणी 200 यूनिट बचग्या इसका जिकरा कोए नहीं करता। अर म्हारे बुद्धिजीवी भी बेरा ना के जमाल घोटा सा पीरे सैं अक उननै इसी बातां पै सोचण की फुरसतै कोण्या। आज सोचां अर कै काल सोचां इन बातां पै सोचना तो पडै़एगा।

रलदू बनाम बीरमती

रलदू बनाम बीरमती
रलदू के घरां बी लैक्शनां की चर्चा थी अक कूण जीत्या अर कूण हारया? रलदू की घर आली बीरमती नै बात बातां मैं कहया अक बंगाल मैं कामरेडां नै झंडे गाड़ दिये। छटी बरियां फेर जीतगे। रलदू कै तो तेल किसे छींटे लागगे। कसूता छोह मैं आकै बोल्या अक तेरे तै कई बै कैहली सै तूं इन कामरेडां का नाम मतना लिया कर। एक बर तो बीरमती डर सी गई फेर वा भी पाला पकड़गी। बोली के बात? के कमी सै इन कामरेडां मैं? हवाला कांड मैं इनका नाम था के? रलदू बोल्या - ये तो धोरे कै बी कोण्या गये हवाला कांड कै। इनका के ब्यौंत था। घणे डरपोक सैं ना ये तै। बीरमती - फेर इनका नाम तहलका काण्ड मैं आरया सै के? रलदू ना तहलका काण्ड मैं भी कोण्या आरया। कोए बी ना दीख्या इन मां तैं तो। बीरमती किसे बी काण्ड मैं इनका नाम आया हो? रलदू नै खूबै सिर खुजाया फेर किसे बी काण्ड मैं किसे बी कामरेड का नाम कोणी पाया उसनै। बीरमती नै होंसला करके बूझया। ये कामरेड घड़ी चोर सैं के? रमलू बोल्या ना। बीरमती थोड़ी सी और होंसले मैं आई अर बोली - किसे और केस मैं इनपै भ्रष्टाचार के मुकदमे चालरे सैं कै? रलदू - ना भ्रष्टाचार के मुकदमें बी कोण्या चाल रे। बीरमती - ये कामरेड झूठे सैं के? रलदू खीज सी कै बोल्या - ना झूठे बी कोण्या। बीरमती की आवाज ऊंची होती गई अर बोली - ये देश तै गद्दारी करण आले सैं के? रलदू - ना ये तै देश पै ज्यान कुर्बान करणियां सैं। बीरमती पै रहया नहीं गया अर वा जोश मैं आकै बूझण लाग्गी झूठ ये बोलैं ना, चोरी ये करते ना, भ्रष्टाचारी ये ना, किसे बी काण्ड मैं इनका नाम कोण्या, तो फेर तेरै तेल किसे छींटे क्यूं लागैं सैं? रलदू चुप होग्या। दिमाग पै बहोत जोर दिया अक कोए तै खोट ढूंढै कामरेडां मै। लिकड़े की गेल्यां धरती नै कुरदें गया। फेर एकदम बोल्या - गांधी कै गोली इन कामरेडां नै मारी थी। बीरमती हंस पड़ी अर बोली - तनै इतना बी न बेरा अक गांधी कै गोली किसनै मारी थी। नाथू राम गोडसे का नाम सुण्या सै ना, उसनै गोली मारी थी गांधी कै अर यो गोडसे आर.एस.एस. का माणस बताया। रलदू पै कई मटके पाणी सा पड़ग्या। फेर थोड़ी सी वार मैं बोल्या - चाहे तूं और किसे की बी बड़ाई करले पर इन कामरेडां की बड़ाई मत करया कर। मनै ये कती आच्छे नहीं लागते। म्हारला नेता कहवै था अक इन कामरेडां कै घर परिवारै ना होन्ता। ये मां नै मां अर बाहण नै बाहणै कोण्या मानते। बूढ़यां कै बतावैं सैं गोली मरवादें सैं। इसे माणसां नै तो सूली पै लटकादे। बीरमती सैड़दे सी बोली - आज ताहिं किसे कामरेड का नाम बलात्कार करणियां मैं पढ़या सै। रलदू नै दिमाग पै जोर मारया अक अखबारां की खबरां मैं कदे कोए नाम आया हो फेर कोण्या पाया। बीरमती बोली - बूढ़यां का बहोत मान सम्मान करैं सैं ये अर औरत नै बराबर का इंसान मानैं सैं। थारे बरगे कोण्या ये। तनै बेरा सै अक नहीं? रलदू बोल्या - मनै के बेरा? बीरमती - ना बेरा तै फेर क्यों सूधा लीतरां इनके सिर पै चढ़रया सै। रलदू फेर चुप। छोह मैं आकै बोल्या - कुछ भी हो मनै इन कामरेडां का नाम आच्छा नहीं लागता। बीरमती क्यों ना लागता न्यों तै बताना ए पड़ैगा। बहोत दिन तनै मैं भी अंधेरे मैं राखली। रलदू - ये दो खूड बचरे सैं जै ये आगे तो इननै बी खोस लेंगे। बीरमती ईब तो कामरेडां का राज कोण्या आड़ै तो घणखरां के खूड ईब किसनै बैंकां मैं धरवा दिये। अर दो किले आले के कित खूड खोसे बता। बंगाल मैं इतनी धरती बांटी सै। जितनी पूरे देश में नहीं बांटी। थोड़ी धरती आल्यां धोरै धरती नहीं खोसी बडै़ की। रलदू - क्यों झूठ भकावै सै धरती खोसनिया धरती क्यूकर बाटैगा? बीरमती - या तै थारी सरकार बी मानै सै अक उड़ै धरती बंटी सै। कै तो इनमैं दोष बता अर ना मेरी बात मानले इन कान्ही देखण लाग ईब तै।

या चाल तरक्की की

या चाल तरक्की की
जुलाई 1992 में सरकार अपने बिदेशी ऋण दातावां नै संतुष्ट करण ताहिं बैंक ऑफ इंग्लैंड की तिजोरी मैं लगभग 47 टन सोना भेजण नै मजबूर होगी थी। कुछ दिन तो सांस आया पर फेर सांस चढ़ा दिये। विश्व बैंक नै एक तरफा डिग्री का नोटिस भेज दिया। भारत एक आंख तै हंसै था अर दूसरी तै रोवै था। और बी कई देशां गेल्यां ईसी ए बणरी थी जणों तै ये सारे एकै आवे के बास्सण हों। जो कर्जा देवै उसकी दाब कर्जा लेवणिया पै कितणी होसै उसनै भुगतभोगी ए बता सकै सै, हम तो अन्दाजा ए ला सकां सां। कर्जा देणिया घरुड़ कै तै ब्याज लावै अर कदे कहवैगा मेरी भैंस नये दूध होसै इसनै लेज्या, कदे हुकम दे देगा मेरा किल्ला बाहदे, कदे कहदे बालकां की मां नै खंदा दिये रोटी पोंचाज्यागी। दारु पीवण का अड्डा बी कर्जा लेवणिया के घर मैं ए बणावैगा अर कई बै तो इज्जत का गाहक बी होज्या। ओं न्यों कहवैगा अक भाई मैं तो सभनै एक आंख तै देख्या करूं। कर्जा लेवणिया उसकी एक-एक रग नै जाणदा हुया बी उसका हुकम मानै अर होंठ बन्द राखै।
इसे ढालां अमीर देश गरीब देशां नै कर्ज देन्ती हाणा बेरा ना के-के शर्त ला देंगे, इननै मानै जिब मरगे अर ना मानै तो कर्ज कोण्या मिलै। ईब कई माणस न्यों कहदें सैं अक कर्ज लेवण मैं हर्ज केसै? फेर उन शर्तां के बारे मैं विचार नहीं करैं, दिमाग पै कती जोर दे कै राजी कोण्या अक ये ब्याज की शर्त केसैं? कई कहदेंगे अक हमनै सारा बेरा सै। क्यों? बेरा सै थामनै अक न्यों ए धूल मैं लठ मारण लागरे सो? कई शेर न्यों कहदें रै हमनै इनकी शर्तां तै के लेना-देना म्हारे तो तीजां केसे कटरे सैं। फेर इन आडूआं नै न्यो कूण समझावै अक घणे दिन काच्चे कोण्या कटैं इस ढालां तो। ये शर्त सैं - सामाजिक सेवा के कामां के खर्च मैं कटौती (शिक्षा अर सेहत), खाद्यान्न पै सब्सिडी का खात्मा, सार्वजनिक क्षेत्र नै निजी क्षेत्र के हाथां बेच्चण का काम, जितने बीमार कारखाने सैं उननै बन्द करण की योजना, बिदेशी पूंजी नै सून्नी छोड़णा, बैंकां अर बीमा क्षेत्र नै बिदेशी कम्पनियां नै देणा। आई किमै समझ मैं अक पढ़दे-पढ़दे नींद आवण लागगी। बेरा सै मनै पर के करूं बातै इतनी गहरी सैं। ये समझणी जरूरी सैं नातै देश फेर गुलाम होज्यागा।
1991 मैं मुद्रा कोष की गैल भारत नै एक ऋण समझौता करया अर गैल की गैल विश्व बैंक का ढांचागत समायोजन ऋण लिया। ये सारे पापड़ बेले तो थे भुगतान संतुलन की कठिनाई दूर करण नै अर वित्तीय घाटा कम करण की खात्तर पर बणगी उल्टी। हम और घणे दाब मैं आन्ते जाण लागरे सां अर म्हारा कर्जा आये दिन बढ़ता जासै। सन् 1998 ताहिं तो करज 95 अरब 70 करोड़ डालर होग्या बताया। इसके रुपइये कितने होगे यो हिसाब तम आप्पै ए ला लियो। इसकी दाब मैंए म्हंगी बिजली बेचै सैं वे हमनै अर और भी कई ढाल बांह मरोड़ैं सै म्हारी।
घरेलू खरीद की ताकत सिकुड़गी अर बिदेशी पूंजी बेरोक-टोक आवै जावै सै। अब इसतै व्यापार का जो संयोग बणै सै ओ भारत के उत्पादकां का दिवालिया काढ़ कै छोड्डैगा। कर्ज भुगतान का बोझा बढ़ता जावण लागर्या सै। कर्ज उल्टा देवण ताहिं और कर्जा लेना पड़र्या सै। ज्याण के लाले पड़रे सैं। गरीब ज्याण बचावण की खात्तर नये ढंग के हथियार पिनावण लागर्या सै। गरीब की पिटाई मैं उसके घणखरे नुमाइंदे भी शामिल सैं।
विश्व बैंक नै बेरा था अक थारी इन नीतियां करकै गरीब मूधे मुंह पडैंगें। ज्यूकर सर्कस मैं जाल हुया करै सर्कस आल्यां की हाड्डी-पसली टूटण तै बचावण की खात्तर। न्यों ए मुद्रा-कोष नै बेरा था अक इस उदारीकरण अर वैश्वीकरण करकै घणे माणसां की कड़ टूटैगी तो इननै एक ‘सेफ्टी नेट’ बणाया पर फेल यो भी होग्या अर हाथ-पां टूटण आल्यां की गलेट लागरी सैं। पर भारत की सरकार खड़ी-खड़ी जुगालै सै। आज सब किमै बाजार की ताकत कै साहमी माथा टेकग्या दिखै सै। थोड़े से अमीरां कै सूत भी खूबै ए आरी सै। बाटा नै पहलम अपणी फैक्ट्री के संगठित मजदूरां ताहिं 80 रुपइये की दिहाड़ी देनी पड़या करती। विश्व बैंक का साहरा लेकै ये मजदूर तो घरां नै चालते कर दिये उसने अर ईब स्वतन्त्र मोचियां धोरै ठेके पै 25 रुपइये दिहाड़ी पै काम करवावै सैं। अमीरां के बालक एयर कन्डीशन्ड घर में रहवैं, एयर कन्डीशन्ड बस मैं एयरकन्डीशन्ड स्कूल मैं पढ़ण जावैं। उननै के बेरा पोह का जाड्डा किसा हुया करै? उन ताहिं हर चीज हाजिर सै। समाज आड़े ताहिं गिर लिया अक औरत की भी बाजार मैं बिठा कै और चीजां की ढालां बोली लुआदी। वाह रै तरक्की तेरे के कहणे? गंगा के पाणी मैं जहर घोलणिये इसकी पवित्रता के ठेकेदार बणे हांडैं सैं। जै याहे रफ्तार रही अर इसे दिशा मैं रही तो आगले दस साल मैं के होज्या कुछ नहीं कहया जा सकता। सत्यानाश होलेगा तो न्यों कहोगे ओहल्ले भाई! हमनै के बेरा था अक न्यू बणज्यागी?

नैतिकता की शिक्षा

नैतिकता की शिक्षा
जब भी नैतिकता की बात चालै तो मान लिया जा सै अक लोगां नै धर्म कर्म छोड़ दिया ज्यां तै चरित्र अर नैतिकता तले नै जाते जा रहे सैं। फेर असल मैं या बात ठीक इसकै उल्ट सै। इन धर्मां नै म्हारी सोच मैं अर म्हारी नैतिकता मैं जितना जहर घोल दिया उतना किसे चीज नै नहीं घोलया। जगन्नाथ के मन्दिर मैं सैंकड़ों मन दाल अर चावल हजारों पुजारियां की खातर रांधे जावैं सैं। इस मन्दिर के जय विजय दरवाजे पै पत्थर की ईसी मूर्तियां देखी जा सकैं सैं जिनमैं देवता जगन्नाथ विभिन्न ढाल के सम्भोग आसनां मैं विराजमान सैं। मन्दिर की बाहर की दीवारां पै औरत मर्द के पूरे कद काठी के अन्दाजे के हिसाब मैं 64 सम्भोग आसन खुदे औड़ सैं जिनका वर्णन सुण्या सै वात्सायन के कामसूत्र मैं लिख राख्या सै। न्यों बतावैं सैं अक रात के दस बजे मन्दिर के दरवाजे बन्द कर दिये जावैं सैं अर इसमैं नृत्य भजन हो सै। यो नाच गाना मन्दिर मैं सेवा करण आली 20 लड़कियां मां तै एक नै करना पड़ै सै। इस नाच गाने नै जगन्नाथ की निर्जीव मूर्ति अर संगीतकार ब्राह्मण पुजारी ए देखैं सैं। ज्यों-ज्यों नाच गाना शिखर पै पहोंचै सै नाचण आली छोरी अपणे लत्ते तार बगावै सै अर पूरी मगन हो कै नाच करै सै। आखिर मैं वा या कैहकै मूर्ति पै पड़जया सै - हे भगवान मैं थारी दुल्हन सूं, थाम मेरे तै प्यार करो। या जगन्नाथ की निर्जीव मूर्ति फेर उसतै प्यार करै सै अक ओ जिन्दा ब्राह्मण, इस बात का किसे नै नहीं बेरा। नाच्चण आली ये लड़कियां... जो कि... देवता जगन्नाथ की सेवा करती-करती सेवा मुक्त होज्यां सैं, पवित्र नगर जगन्नाथ पुरी की गलियां मैं वेश्यावृत्ति करकै अपना पेट पालैं सैं अर उनके ग्राहक ईसे भगत हों सैं जो हजारां की संख्या मैं आड़ै पूजा अर्चना करण की खातर आवैं सैं। न्योए साईं बाबा के एक अमरीकन चेले ‘‘टाल ब्रुक’’ नै अपनी किताब मैं लिख्या सै अक साईं बाबा नै मेरे तै अर फुटपाथ के दूसरे गोरी चमड़ी आले नौजवानां की गेल्यां समलिंगी बलात्कार करण की कोशिश करी थी। न्योंए बीटन जॉन लेनन के कहे मुताबक बीटल नै महर्षि महेश योगी का साथ ज्यां करकै छोड़ दिया था अक उसनै एक स्त्री श्रीमति मिया फैरो की गेल्यां बलात्कार करण की कुचेष्टा करी थी। गुरू महाराज जी का चित्र, गुप्त कैमरे द्वारा उस समय खींच लिया गया जिब ओ घर की नौकरानी नै आलिंगनबद्ध करकै चूम्मण लागरया था अर उसकी अमरीकन पत्नी उड़ैए किसे दूसरे कमरे मैं थी।
प्रथम शंकराचार्य - ‘‘आदिशंकर’’ जो खुद नै बड्डा ब्रह्मचारी अर त्रिलोकदर्शी बताया करता उसतै एक भगत नै ‘काम’ के बारे में सवाल कर दिया। उसनै अपणे भगत तै कहया बतावैं सै अक मैं ‘काम’ का जवाब इसका अनुभव प्राप्त करकै दयूंगा। न्यों कहवण मैं आवै सै अक शंकराचार्य एक ब्याहे औड़ माणस के शरीर मैं प्रवेश करग्या अर उसनै उस माणस की पत्नी गेल्यां सम्भोग करया।
जो माणस स्कूल कालजां मैं धार्मिक शिक्षा शुरू करण की वकालत करैं सैं उननै कदे न्यों सोची सै अक इन कल्पित देवतावां की काम वासना आली कथावां का बालकां के भोले-भाले दिलां पै के असर पड़ैगा? एक प्रसिद्ध वकील अर लेखक फ्रैंक स्वेन कारा नै न्यारे-न्यारे देशां मैं धर्म अर अपराध के बारे मैं खोज करी सैं। उसमैं तै एक देश सिंग सिंग मैं 100 सालां के भीतर जिन लोगां ताहिं कत्ल के जुल्म मैं फांसी दी गई उनमैं 65ः कट्टर रोमन, 21ः प्रोटैस्टैंट, 6ः हीब्रूज, 2ः मूर्ति पूजक अर एक प्रतिशत के तिहाई भाग तै भी कम धर्म नै नहीं मानणिया आले थे। इसतै एक बात तो साफ दीखै सै अक अनैतिकता की सीढ़ी पै चढ़कै नैतिकता का प्रचार करणिया माणस अर देश इतिहास मैं पिछड़ते रहे सैं। एक दौर मैं जो भारत सबतै आगै था ज्ञान के प्रचार-प्रसार मैं, जित नालन्दा अर तक्षशिला जिसे शिक्षा के केन्द्र थे जित दूसरे देशां के माणस शिक्षा ग्रहण करण आया करते ओ देश रसातल मैं क्यों चाल्या गया? इसपै कोए ठोस खोज हुई हो बेरा ना। मनै दीखै सै अक म्हारे समाज मैं धर्म की कट्टरता की अर अनैतिक काम करणियां की पकड़ नै म्हारी सोच के दरवाजे खुलणै कोण्या दिये जिस करकै नई खोज नई जरूरत के हिसाब तै भारत देश नहीं कर सक्या अर धर्म के कट्टरवाद नै इसकी सोच, इसकी समझ और भी भीड़ी कर दी। जिस करकै जो कुछ पहलम हमनै बणाया था ओ बी खत्म होन्ता चाल्या गया। अर आज बी सही बात नै तर्कशील विचार नै, जनता के हक की बातां नै हम आस्था के नाम पै, परम्परा के नाम पै, राष्ट्रभक्ति के नाम पै पाछे नै धिका द्यां सां। तालिबान आल्यां की ढालां फतवे जारी करण लाग लिये सां। इसतै देश तरक्की कोनी करै। एक बात और सै अक जो लोग मन्दिरां मैं नंगे नाच करवावण के हिम्माती सैं वेहे तालिबानी फतवे भी जारी करणिये सैं। आज सभ्य जमाने के आचरण अर नैतिकता के स्तर की तुलना मैं ये देवी देवतावां की घटिया किस्म की कथा म्हारे बालकां के मनां पै इसा ए असर गेरैंगी जिसे माइकल जैक्शन के डान्स अर कै सौन्दर्य प्रतियोगिता अर कै टी.वी. की बाजारू संस्कृति। हमनै बालकां ताहिं धर्म के नाम पै ईसी झूठी अर घटिया नैतिक शिक्षा देवण तै तो परहेज करना ए चाहिये।

बेढ़ब संस्कृति

बेढ़ब संस्कृति
‘‘दखे चालदी मैं बी जो ना चलावै उसनै माणस पागल की उपाधि दे दिया करैं’’ - चान्दो बोली। क्यों के बात होगी? के काम अटक ग्या? सूरते नै जवाब दिया। ईब तनै कौण समझावै अर क्यूकर समझावै। न्यों कह्या करैं सैं अक सोवन्ता औड़ माणस तो ठाया जा सकै सै पर दड़ मारे औड़ माणस नै क्यूकर ठावै? चान्दो नै नाराजगी तै कहया। उसनै फेर होंसला सा करकै कह्या अक तनै नहीं बेरा अपणे बेटे कर्मबीर नै मास्टरी की दरखास दी सै। सुण्या सै घणीए जागां लिकड़ री सैं। सूरता बोल्या अक भरया होगा फारम, दी होगी दरखास इसमैं मेरा के जोर चालै सै। किस्मत मैं होगी मास्टरी तो कौण हाथ अड़ा सकै सै। चान्दो न्यों के हार मानण की थी। वा बोली अक तकदीर वकदीर कुछ ना। भाज दौड़ करनी पड़ैगी। किसे मन्त्री तै सढ़ा लाणा पड़ैगा। कोए बिस्बास का बिचौलिया थापणा पड़ैगा। आजकाल बिचौलिए बी तो थोथे लिकड़यावैं सैं। जे बेटे की नौकरी लाग ज्यागी तो समझो मैं तो गंगा जी न्हाई जांगी। अपणे हल्के आला एम.एल.ए. बी सुण्या सै मन्त्री बणग्या। उसकी तो दांत काटी रोटी सै तेरी गेल्यां। बेढ़ब गेल्या तो तेरा पूरा ढब सै।
जिब ओ एम.एल.ए. नहीं बण्या था तो सुरते के घरां ए पड़या रहया करता। गाम मैं तो जी नहीं लागता अर शहर मैं उसके धोरै इनतै न्यारा ठिकाना नहीं था। ऊं मन का मौजी माणस सै, यारां का यार सै। खाओ अर खाण दयो यो उसका सिद्धांत कदे कदीमी का सै। जिब बढ़िया मूड मैं हो तो कहवैगा अक मारो खाओ पर हाथ ना आओ अर जै पकड़े जाओ तै अकड़ ना दिखाओ। बस जी हजूरी तै अर कै पीसे तै काम बनाओ। मन्त्री बणण नै बणग्या पर भाईके सिद्धान्त वेहे सैं। जिब ओ किमै बी ना था तो कई बै चान्दो ताहिं कह्या करता अक के करूं भाभी क्यूकर नौकरी ल्वाऊं, राजपाट तो मेरे हाथ मैं कोण्या। जै कदे दा लागग्या तो सबतै पहलम बेटे की नौकरी का जुगाड़ करूंगा। थारे स्यान के मेरे पै इस उमर मैं उतरैं सैं। ईब मन्त्री बणे पाछै तो म्हिने हो लिए भाई नै फुरसतै कोण्या लागली भाभी तै फेटण की। रोज बेढ़ब की बाट देखै सै भाभी। भाभी नूनामल नै बेढ़ब कहया करती।
सूरते के दिमाग मैं आई अक नूनामल ईब तो बिचास कै देखना ए चाहिये। सूरता पहोंचग्या चण्डीगढ़ एम.एल.ए. होस्टल मैं। उड़े तै घणी ए वार मैं बेरा चाल्या अक नूनामल की कोठी तो सात सैक्टर मैं सै। उड़ै आया। बाहर घणीए भीड़ लागरी थी, ओ बी जाकै बैठग्या उनमैं। एक पर्ची पै नाम लिख कै दे दिया। दो घण्टे होगे भीतरै ना बुलाया। सुरते कै बहोतै घणा छोह उठ्या पर के पार बसावै थी छोरा नौकरी जो ल्वाणा था। खैर बुला लिया भीतर। उठकै कौली भरकै फेट्या नूनामल। इतनी वार मैं तिवाड़ी जी आण बिराज्या। तिवाड़ी जी नै बताया अक छोरा एम.ए. करकै घरां बैठ्या सै। इबकै ये ठेके पै लैक्चरर लावण लागरे सैं। उसमैं उसका बी नम्बर आज्या तो कुछ तो साहरा लागैएगा। नूनामल नै तो सैड़दे सी उड़ती चिड़िया के पर गिण लिये अर न्यों बोल्या अक तिवाड़ी जी जै थारा काम नहीं होगा तो फेर किसका होगा। छोरे के नम्बर कितने ए अक सैं? सत्तर फीसदी नम्बर लेरया सै और के कहया करैं सैक्ट भी पास करराख्या सै। खेलां मैं बी घणा अगाड़ी था। नूनामल बोल्या अक तिवाड़ी जी समझो थारा काम होग्या। सीरनी बांटो जाकै। या तो अपनी संस्कृति की बात सै ना अक काम होए पाछै लोग सरीनी बाँटया करते तो अपनी संस्कृति तो आपां नै भूलनी नहीं चाहिये। आज मैं अर पहलम मैं बस फर्क इतना सा सै अक पहलम सीरनी काम होए पाछै बांटया करते आजकाल काम होए पहलम बांटैं सैं।
तिवाड़ी जी नै तो झट गोज मैं हाथ घालया अर एक मोटा सा लिफाफा काढ़या अर नूनामल ताहिं दिया अर बोल्या अक हमतो सीरनी पहलम बी अर पाछै बी बांट देंगे पर काम हो जाणा चाहिये। नूनामल नै लिफाफा गोज कै हवालै करया अर न्यों बोल्या अक फिकर मन्ना करो। जाकै ताण कै सो ज्याओ। तिवाड़ी चाल्या गया तो नूनामल नै कहया अक मैं कई दिन तै आण की सोचूं था पर फुरसतै कोण्या लागी। सूरता तो किसे और दुनिया मां तै उल्टा आया। नूनामल बोल्या - किमै काम सै तो तावला बता मनै तीन बजे मीटिंग मैं जाणा सै। रात नै डटिये घर बिध की बतलावांगे। सूरता बोल्या - काम के हो था, मैं तो बस फेट्टण आग्या था। नूनामल बोल्या - छोरे का काम हो ज्यागा तूं घबरावै मतना। सुरते कै थोड़ी शान्ति होई। फेर चालता-चालता नूनामल बोल्या - गाम मैं स्वागत पूरे ताम-झाम तै होणा चाहिये। इक्यावन हजार तै कम की माला के कोए मतलब नहीं। या सुआगत करण की रिवाज म्हारी पुरानी संस्कृति मैं सै। सुरता चाल पड़या उल्टा। बस मैं बैठ्या सुरता सोचै था - या नई संस्कृति बी मारैगी अर पुरानी संस्कृति ऊं बांसैगी। मरण सुरते का अर ठाठ नूनामल के, या कोणसी संस्कृति?

आत्मा का रगड़ा

आत्मा का रगड़ा
भारत मैं लाखां साधु-संत, स्वामी ज्योतिषी अर पुजारी इस बात का टोकरा सिर पै धरे पाज्यांगे अक आदमी के शरीर मैं परमात्मा की दी औड़ ‘आत्मा’ हो सै। मौत पाछै या आत्मा अपणा शरीर बदल लेवै सै। जिब या बात करी जा सै अक परमात्मा की दी औड़ आत्मा नाम की शरीर में कोए चीज नहीं होन्ती तो म्हारे मन मैं कई सवाल खड़े होज्या सैं अक या ‘ज्यान’ कै ‘आत्मा’ के चीज सै? मरे पाछै या ‘ज्यान’ कै ‘आत्मा’ कड़ै चाली जा सै? दूसरे माणस के शरीर में या ‘आत्मा’ क्यूकर बड़कै जन्म लेवै सै? यो सुरग अर नरक का के रोला सै? इन बातां पै गहराई तै सोच्चण की जागां आपां आसान सा रास्ता टोहल्यां सां अक ‘आत्मा’ होन्ती ए होगी। म्हारी इस दिमाग पै जोर दे कै ना सोच्चण की कमजोरी का फायदा कई ढाल के चालबाज माणस ठायें जा सैं। लूट की कमाई के साधनां पै अपणा कब्जा राखण खात्तर ये फरेबी जनता के मन मैं या पक्की जंचा दें सैं अक आत्मा हो सै। सुरग-नरक बी हो सैं अर जै आत्मा की मुक्ति नहीं हो तै या भूत-प्रेत बण कै चारों कान्हीं घूमें जा सै आर मौका पान्तैहें की साथ किसे बी शरीर मैं प्रवेश कर ज्या सै। जै लोगां के दिलां मां तै इस आत्मा का विश्वास लिकड़ ज्या तै भूत प्रेतां पर तै बी उनका विश्वास उठ ज्यागा, सुरग-नरक पै भी सवाल खड़े होज्यांगे, आगले पाछले जन्म का मामला भी गड़बड़ा ज्यावै सै। अर किस्मत का मामला भी खटाई मैं पड़ज्या सै। देखे इस परमात्मा की आत्मा के कमाल जी। एक दूसरी आत्मा सै जो माणस के भीतर हो सै अर उसकी गैल्यां ए मर बी जावैं सै। आत्मा नै कुछ लोग इच्छा शक्ति के रूप मैं देखैं सैं। कुछ लोग इसनै भीतर की आवाज भी कहदें सैं अर कुछ इसनै अन्तरात्मा की पुकार का नाम बी दे दें सैं। ये दोनू मामले न्यारे-न्यारे सैं। दूसरी आत्मा माणस नै इन्सान बणावण मैं, उसनै कुदरत तै टकरले कै नई खोज करण मैं, आत्म विश्वास बढ़ावण मैं, बहोत बढ़ियां ढालां मदद करैं सैं, माणस कै पूरा साहरा लावै सै। हां तो आज जिकरा पहलड़ी आत्मा का सै जो हमनै अपनी आंगलियां पै सारी जिन्दगी नचायें जावै सै।
हर होवण आली घटना का कोए न कोए कारण जरूर हो सै अर हर घटना कुदरत के कुछ नियमां के तहत हो सै। जै आपां परमात्मा की दी औड़ आत्मा की बाबत बताई गई सारी बातां की जांच परख गहराई तै सोच समझ कै तर्क की कसौटी पै करां सां तै हमनै या बात समझण मैं वार कोनी लागदी अक यू लूट खसोट का सिस्टम (गोरख धंधा) कायम राखण का हथियार सै। जै या आत्मा सर्वशक्तिमान सै तो अपणी मर्जी तै आवै सै। माणस इसमैं कोए दखलन्दाजी नहीं कर सकदा। पर जै माणस जहर खाकै मरज्या सै तो उसके मरतें ए आत्मा शरीर नै छोड़ के डिगरज्या सै। इसका मतलब साफ सै अक इस आत्मा नै शरीर तै बाहर करण ताहिं आदमी ए जिम्मेदार सै। जै या आत्मा सर्वशक्तिमान होन्ती तै जहर खाये पाछै बी आदमी नै जिन्दा राखती अर उसमैं रहन्ती। कोए स्वामी न्यों बी कैहन्ता पाजयागा अक जहर बी माणस नै आत्मा ए खवावै सै। मान ल्यो किसे की आत्मा नै ओ चोला छोड्डण की त्यारी कर ली अर अपणे शरीर ताहिं जहर खाकै मरण का हुक्म दे दिया। ओ जहर खावणिया माणस जहर खाकै बेहोश होज्या सै अर उस माणस नै इलाज करकै डाक्टर बचालें सैं तो फेर उस सर्वशक्तिमान आत्मा के हुक्म का के हुया? न्यों बी कह्या जा सै अक या आत्मा नंगी तलवारां तै बी नहीं डरती। इस आत्मा नै कोए भी हथियार काट नहीं सकदा, आग जला नहीं सकदी, अर पाणी डबो नहीं सकदा कै गला नहीं सकदा। या आत्मा तै अमर सै, निडर सै। फेर असल मैं देखण मैं आवै सै अक जिब कोए संकट (ज्यूकर बाढ़) आवै सै तो कई सौ माणस डूब के मरज्यां सैं अर उनकी आत्मा उनका शरीर छोडज्या सैं, इसका मतलब ये आत्मा संकट का मुकाबला करण तै डरैं सैं। कई न्यों कैहदें सैं अक जै परमात्मा आली आत्मा ना होती तो बढ़िया विचार किततै पैदा होन्ते? जै ये आत्मा ए आच्छे विचार माणसां मैं पैदा करैं सैं तो म्हारी धरती पै पांच अरब माणस रहवैं सैं जिनमां तै घणे ए बढ़िया सैं अर घणे ए भंूडे बी सैं। तो ये भूंडे माणस जो माफ ना करे जा सकण आले जुलम करैं सैं तो उनमैं ये बुरे विचार किसनै पैदा करे? उनकी परमात्मा आली आत्मा नै? इसे भूंडे विचार पैदा करण आली परमात्मा की आत्मा के बारे मैं के ख्याल सै म्हारा? असली बात या सै अक आच्छे भूंडे काम तै म्हारा समाज अर म्हारी शिक्षा पैदा करै सै। उस आत्मा (परमात्मा आली आत्मा) गेल्यां इसका कोए रिश्ता नहीं सै, हां म्हारी इच्छा शक्ति (माणस की खुद की आत्मा) गेल्यां इसका रिश्ता जरूर सै। आज के वैज्ञानिक युग मैं तो या परमात्मा आली आत्मा माणस की इच्छा शक्ति, माणस की आत्मा आगै पूरी तरियां गोड्डे टेकगी। थोड़ा दिमाग पै जोर देकै समझण का मामला सै। फेर हरियाणे आल्यां की एक बड्डी कमजोरी या सै अक अपणे दिमाग पै जोर देकै सोच्चण का ब्यौंत घाट सै। जो और किसे नै सोच कै बता दिया उसकी हां मैं नाड़ हिला देंगे, कै ना मैं नाड़ हिला देंगे। अर जै किमै ऊक चूक होज्या तो कैह देंगे - ओहले हमनै के बेरा था इसका मतलब यू था।
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हरियाणा बिक लिया

हरियाणा बिक लिया
बिजली बेच दी, बीमा कम्पनी बेचण की तैयारी सै, बैंक बेच दिये, हवाई जहाजां आला म्हकमा बेच्या जावण लागरया सै, टी.वी. बेच दिया, पब्लिक सैक्टर की और कई कम्पनी बेच दी, देश का सोना बेच दिया, देश का भाईचारा बेच खाया, देश की रेल बेचण की तैयारी करण लागरे फेर बी सरकार रूक्के मारै सै अक हम भारत माता नै चांद पै पहोंचा के दम लेवांगे। वाह रै मेरी प्यारी सरकार इसके गैहणे बेच के इसके लत्ते बेच कै अर इसकी इज्जत आबरू बेच कै चांद पै पहोंचावण का तरीका बहोत काम्मल टोहया।
देश की शिक्षा बेच खाई - यूनिवर्सिटी बेच खाई, देश का स्वास्थ्य बेच खाया - अस्पताल बेच खाये - हल्दी नीम अर बैंगन बेच खाये।
सब किमै बेच कै भी ढाक के वे हे तीन पात। विकास नै रफ्तार नही पाकड़ ली सै इब ताहिं। अड़ कै खड़या सै। म्हारी सरकार फेर बी रूक्कै मारै सै अक घबराओ मतना हम आर्थिक सुधारां की नई खेप ल्यावण लागरे सां। पहलड़े सुधार तै लिये दिये पड़ते ना आगलयां का और टोकरा ठा लिया म्हारी सरकार नै। एक बै एक माणस कितै गाम में बदमाशां कै फंसग्या। उन्नै उसका खंडुआ तार लिया, जूती कढ़वा ली अर लांगड़ काढ़ दी अर अड़बन्द कान्ही हाथ घाल दिया। माणस नै सोची अक बहोत भूंडी बनी या तै। उसनै हांगा सा मारया अर छटवा कै भाज लिया। गाम मैं आया तै सांस चढ़रे उसकै। लोग बूझण लागगे अक रै नफे के बात हुई?
माणस बोल्या - खंडवा तार लिया, जूती कढ़वा ली, लांगड़ काढ़ दी बदमाशां नै। पर मैं बी के बस मैं आऊं था। पछन्डे पछान्डे मार कै इज्जत बचा कै भाजे आया। म्हारी सरकार गेल्यां बी किमै इसी एसी बात होरी दीखे सै। अक यो बी बेच दिया अर वो बी बेच दिया पर फेर भी हम अपणे पाह्यां पै खड़े सां अर स्वदेशी, पुकारण लागरे सां। कई न्यों कैहदे सैं अक देश बिक लिया तो बिकै सौ बै, इसका म्हारी सेहत पै के असर पड़ैगा? ईब उस आडू नै कूण समझावै अक देश के बिकण का असर टाटा बिड़ला की सेहत पै घाट पड़ैगा अर म्हारी थारी सेहत पै सबतै फालतू पड़ैगा। देश बिक लिया होगा फेर हरियाणा क्यूकर बिक लिया? म्हारा इतना काम्मल मुख्यमन्त्री यो के हरियाणा नै बिकण दे सै। ईब पहली बात तो या सै अक जिब देश बिक लिया तो हरियाणा बिकण तै क्यूकर बचैगा?
नहीं बचै ना, अक फेर बी थारे जंचै सै अक बच ज्यागा तो म्हारे थारे बरगा आडू माणस कूण हो सकै सै? हमनै ताश खेलण तै फुरसत ना। हमनै एक दूसरे की टांग खिंचण तै फुरसत ना, हम फांचर ठोक तै बण सका सां, हम कढ़ी बिगाड़ भी हो सकां सां, हम स्मैकिये बी हो सकां सां, हम चोर जार भी हो सकां सां, हम बलात्कारी भी हो सकां सां, हम कसूते दारू के गुलाम हो सकां सां, हम बस्ता ठाऊ हो सकां सां, हम किसे मन्त्री के दलाल हो सकां सां फेर हम माणसै नहीं हो सकदे, हम एक नागरिक नहीं हो सकते? क्यूं? इस क्यूं का जवाब तै खूंटा ठोक धोरै भी कोण्या। ईब के बताऊं देश बिक लिया, हरियाणा बिकण लागरया अर हम बैठे ताश खेलण लागरे? भला क्यूं?
इस क्यूं का जवाब एक ना एक दिन ढूंढणा पड़ैगा। चाहे आज चाहे काल अर चाहे परसों। सोचणा पड़ैगा यू समाज कड़ै जावण लागरा सै? इसका इलाज के सै? इलाज सै ए कोण्या या बात नहीं सै। बैठ कै सोचना पड़ैगा, लड़ना पड़ैगा, समाज बदलना पड़ैगा। काम टेढ़ा सै। फेर सब किमै बिके पाछै न्यों मतना कैह दिये - ओहले हमनै के बेरा था न्यूं बण ज्यागी।
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तीजां केसे कट-रे सैं

तीजां केसे कट-रे सैं
देस पै 95 अरब 70 करोड़ डालर का बदेशी कर्जा चढ़रया सै जिसका ब्याज पाड़ण खातर भी म्हारे देश नै और कर्जा लेणा पड़ै सै, मूल तो न्यों का न्यों खड़या रैहज्या सै। यो कर्ज क्यों चढ़रया सै म्हारे देश पै? हमने कदे नहीं बूझ्या। सरकारी दफ्तरां की, सरकारी स्कूलां की, सरकारी अस्पतालां की माट्टी पलीद तो करैं देशी अर बदेशी कम्पनी, विश्व बैंक अर मुद्रा कोष मिलकै, अर इन सबके पताल मैं ले ज्यावण की जिम्मेदारी का घंटाला बांध्या जा सै इनमैं काम करणियां की कामचोरी कै, अर कै उनके निकम्मेपन कै, अर कै भ्रष्टाचार कै। अर जनता बी ईसी आडू. सै अक उसनै बी यो झूठा प्रचार साचा लागण लागज्या सै। देश मैं भ्रष्टाचार, कामचोरी अर निकम्मेपण की एकै राम बाण दवाई बताई जा सै - ‘निजीकरण’। अर म्हारे बरगे आडू. भी सैड दे सी, हां मैं हां मिला द्यां सां अक निजीकरण तै होणा ए चाहिये। देश मैं आज कै दिन बीस हजार तै बी फालतू बदेशी कम्पनी सैं, जिनै अपणा मकड़ जाल फैला दिया। अर हमैं इननै न्योतण आले सां। देश का धन लूट-लूट कै ये बदेशां मैं ले जावण लागरी सैं अर हमनै कोए एतराज नहीं इनके बारे मैं, म्हारा राष्ट्र प्रेम बेरा ना कित पड़कै सोज्या सै?
आज देश मैं 52 करोड़ तैं फालतू लोग बीस रुपइये रोज मैं दिनां कै धक्के देवण लागरे सैं। इनका हाल देख कै म्हारा सिर बेरा ना शर्म तै क्यों ना झुकता? बेरा ना किस मुंह तै आपां कहवां सां मेरा ‘भारत देश महान’।
लैक्शनां मैं कह्या जा सै अक यू जनता द्वारा जनता ताहिं चुण्या गया जनता का राज सै। फेर या बात जचण की तो कोण्या। यू राज जनता का सै के? अक यू राज बदेशी कम्पनियां का सै? अक बड्डी-बड्डी देशी कम्पनियां का सै? माफिया का राज सै के? बची खुची खुरचन मैं मुंह मारणिये बस्ता-ठाऊआं का सै? सवाल टेढ़ा सै। एक बात तै जमा नंगी होकै साहमी आली अक यू रोज रोज के बीस रुपइये कमावणिया अर इसतै कम आले 91 करोड़ लोगां का कोन्या। और चाहे किसे का बी हो।
तो फेर किसका सै यो देश? जिसकै बी इस देश की कमाई का चौखा हिस्सा हाथ लागरया सै, यू देश तो उसे का मान्या जाणा चाहिये। तो इस हिसाब तै सबतै फालतू लेगी बदेशी, कम्पनी अर उनकै लागता सा मिल्या बड्डी देशी कम्पनियां नै उस पाछे नम्बर लाग्या जमींदारां का अर घणी धरती आले अमीर किसानां का। भ्रष्ट अफसर, भ्रष्ट नेता, माफिया, चन्द्रा स्वामी बरगे जीमगे एक हिस्से नै। बासी कुशी तले की तिलच्छट हाथ आवै सै मध्यम वर्ग कै, अर टटपूंजिये कर्मचारियां कै। ईबतै समझ आगी होगी अक यो देश किसका सै? अक और बी खोल कै बतावणी पड़ैगी?
सवा सौ करोड़ तै फालतू की आबादी आले देश मैं तीन करोड़ लोग तै तीजां केसे दिन काटण लागरे सैं, अर बाकी के 97 करोड़ क्यूकरै घिसटन लागरे सैं, इस बाट मैं अक कदे तो थारे बी दिन बाहवड़ैंगे। ये तीन करोड़ कैहन्ते हांडैं सैं अक ‘हमाम मैं सब नंगे सैं’ तो हम भी कैहण लागज्यां सां ‘हां हमाम मैं सब नंगे सैं’। इसतै इन लुटेरयां का नंगापन ढंक ज्या सै, अर हमनै बेरा ए नहीं पाटता। न्योंए ये तीन करोड़ कहवैं सैं अक म्हारे ता तीजां बरगे दिन कटरे सैं, तो हम भी कहवां सां अक म्हारे तो तीजां केसे कटरे सैं। जिसनै बीस रुपये रोज मिलैं, जिसनै दस रुपइये रोज मिलैं, ओ तीजा बरगे दिन क्यूकर काटण लागरया सै, मेरी तो समझ तै बाहर सै, अर जै थारी समझ आरी हो तै मनै भी बताइयो मेरे बीरा!

वैश्वीकरण की माया

वैश्वीकरण की माया
     दुनिया मैं विकास की राही आन्धी सुरंग मैं जाली लागै सै। इसनै ठीक राही पै ल्यावण खात्तर चार बातां की राम बाण दवाई की खोज करी गई - वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण अर बाजारीकरण। ईब कई माणस ईसे पावैंगे जिननै इनके मतलब का ए कोनी बेरा। कई तै इनका नाम सुणकै ए सिर पाकड़ कै बैठगे होंगे। चालो इनपै तो फेर कदे चर्चा कर ल्यांगे जिब थाम ठाली से होवोगे फेर ईब चर्चा इस बात पै सै अक इस राम बाण दवाई नै के असर दिखाया? तो थोड़ा सा जी करड़ा करकै सुनियो। म्हारे देश की खाद्य सुरक्षा तै कति मूंधी मारदी। विश्व वाणिज्य संस्था के दबाव मैं म्हारे देश नै कृषि पै अनुदानां (सबसिडी) पै कटौती कर दी अर जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की घीस काढ़ कै गेर दी। अनाज अर दूसरे खाद्य सामग्रियां की खुले व्यापार की इजाजत दे कै मुनाफा खोरां ताहिं लाभ पहोंचावण आली नीति अपणा ली। इन सारी बातां नै मिलकै ईसी हालत पैदा कर दी जिसमैं जनता के विशाल हिस्से नै जिंदगी की मूलभूत सामग्रियां के लाले पड़ण लाग लिये सैं। जनता रम्भावण लागरी सै म्हंगाई की मार करकै।
     1995-98 मैं गिहूं की पैदावार मैं 50 लाख टन की गिरावट आई। चावल अर दाल पाछली जागां पै ए खड़े कदम ताल करें गये। इसतै गाम के माणसां नै दाल रोटी का और फालतू संकट होग्या। फेर गामोली बी बण बेरा ना कूणसी माट्टी के रहे सैं। भूखे मरै सैं पर कोए हाल बूझै तो बेरा सै के कहवैंगे? न्यों कहवैंगे अक तीजां बरगे कटरे सैं। हां तो रेपसीड अर सरसों के उत्पादन मैं भी 20 लाख टन घाट पैदावार हुई। तिलहन मैं 20 लाख टन की, गन्डे मैं 10 लाख टन की, आलू मैं 50 लाख टन की अर आदि वासी लोगों के मोटे खाद्यान्नों मैं भी 30 लाख टन की गिरावट आई। कई जिन्स दूसरे देसां तै मंगवानी पड़ी। फेर बी प्रति व्यक्ति खाद्यान्नां की उपलब्धता प्रति दिन 473.7 ग्राम तै घटकै 450.9 ग्राम रैहगी। दालां की 38.4 ग्राम तै घटकै 32.3 ग्राम पै आगी अर यू सारा काम एकै साल मैं हो लिया।
     इस बात का म्हारे साइन्स दानां नै बेरा पाड़ लिया अक प्रत्येक व्यक्ति नै रोज कम तै कम बीस 40 ग्राम दालां की अर 478 ग्राम नाज की जरूरत हो सै। फेर इस बखत ये हालात इस सच्चाई नै ए आगै ल्यावैं सैं अक गामां की जनता भुखमरी के दरवाजे पै खड़ी ल्या करी। एक चाला और देखो देश मैं तो लोग भूख तैं मरण लागरे सैं अर हम गिहूं का निर्यात करण लागरे सां (दूसरे देसां नै भेजा सां)। गिहूं 120 डालर प्रति टन के हिसाब तै बाहर भेजण का फैसला कर लिया जबकि गिहूं की पैदावार अर उसकी आपूर्ति पै 190 डालर प्रति टन का खर्चा आवै सै। मेरै तो समझ नहीं आया यो हिसाब किताब अर जै थारै समझ आया हो तै बीरा एक पोस्ट कारड पै लिख कै जरूर भेजियो दखे भूल मतना जाइयो। रामधन सिंह किलोई आला ईब याद आवै सै। देश के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डा. एम.एस. स्वामी नै हिम्मत करकै इसी देश विरोधी अर जनता विरोधी नीतियां कै खिलाफ आवाज ठाई सै अर चेतावनी भी दी सै। वाह डाक्टर साहब जुग जुग जियो। मेरै बड़ा घी सा घल्या जिब थारे बारे मैं बेरा लाग्या।
     यू तो ट्रेलर सै जिब पूरी फिल्म आवैगी तो देखियो के बणैगी? ईबै मेरी बात घाट जचै सै फेर आन्धी सुरंग का विकास तावला ए जंचा देगा। हमनै भी खाली नहीं बैठना चाहिये अखाड़ बाढ़े तै हटकै अपणी समझ पैणी करके सिर कै मंडासा मारकै मैदान मैं उतरना पड़ैगा। मित्तर की प्यारे की अर असली बैरी की पिछान करणी पड़ैगी, निशान देही करनी होगी। पाले बन्दी करकै वार करने पड़ैंगे।

आपाधापी घणी मचाई देस के ठेकेदारां नै

आपाधापी घणी मचाई देस के ठेकेदारां नै
     सारी दुनिया नै जो विकास की राही पकड़ी उस करकै अमीर तै और घणा अमीर होग्या अर गरीब और घणा गरीब होन्ता आवै सै। सारे न्यों कहवैंगे अक यो तै किस्मत का खेल सै ऊपर आला किसे नै राजा तै रंक बणा दे अर रंक नै राजा। हर बात की किस्मत कै गांडली बांध कै सोवण के आदि होगे हम भी अर अपणे दिमाग पै तो माड़ा सा भी जोर देकै राज्जी कोन्या अक यो इस दुनिया मैं होवण के लागरया सै? शहीदां के बालक तै खस्ता हाल सरकारी स्कूलां मैं धक्के खावैं सैं अर मुखबिरां के बालक एयरकंडीशंड घर मैं रहवैं, एयर कंडीशंड बस मैं एयर कंडीशंड स्कूल में पढ़ण जावैं। अर इस सारे घालमेल नै फेर किस्मत का खेल बतावैं अर हम बी उनकी गेल्यां मिलकै हां मैं हां मिलावैं तो म्हारे तै निरभाग कौण होगा? काले बाजारियां की किस्मत मेहनतकश किसान तै बढ़िया लिखण आले भगवान की बी नीयत पै सवाल तो उठै ए सैं फेर हम सवाल ठाणा तो भूले गए। विकास की खामियां नै किस्मत के जिम्मै छोड्डें काम कोणी चालै। सच ही कहा है किसी कवि ने -
आपाधापी घणी मचाई देस के ठेकेदारां नै,
सारे रिकार्ड तोड़ धरे धन के भूखे साहूकारां नै।
विकास राही माणस खाणी इनै रोजगार घटाया सै,
महिला जमा बाहर राखी ईसा महाघोर मचाया सै,
बाबू बेटा ज्यानी दुश्मन बहू सास मैं जंग कराया सै,
बूढ्यां की तै कदर कड़ै जिब जवानां का मोर नचाया सै,
माणस तै हैवान बणा दिये सभ्यता के थाणेदारां नै।
ईसा विकास म्हारा नाश करैगा या बात क्यों जरती ना,
गरीब अमीर की या खाई आज क्यों दुनियां मैं भरती ना,
चारों कान्हीं माफिया बधगे या बुराई आज डरती ना,
अच्छाई पै हमला कसूता फेर बी कदे या मरती ना,
बदेशी कम्पनी छागी छूट दे राखी राज दरबारां नै।
यो कौण दादा पाक गया सारे कै आतंक मचाया सै,
थोड़ा सा साहमी बोल्या इराक पढ़ण बिठाया सै,
यूगोस्लोविया पै बम्ब गेरे यो कति नहीं शरमाया सै,
तीसरी दुनिया चूस लई भारत मैं जाल बिछाया सै,
बदेशी अर देशी डाकू सिर चढ़ा दिये सरकारां नै।
उल्टी राही चला दई म्हारे देश की जनता किसनै रै,
सोच समझ कै बेरा पाड़ां देश तै भजावां उसनै रै,
इस विकास राही नै बदलां मोर बनाया जिसनै रै,
म्हारा ईसा विकास हो जो मेटै सबकी तिसनै रै,
दीन जहान तै खो देगी या जनता इसे बदकारां नै।
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आडू.

आडू.
नेता जिसकी पीठ पै एक बर हाथ फेर दे सै उस माणस का दिमाग काम करणा छोड़ज्या सै, उसकी तर्क शक्ति की ताकत सापड़ज्या सै, आच्छे-भूण्डे का फरक करण की ताकत मारी जा सै, हां मैं हां मिलावण की आदत पड़ ज्या सै, देखी आंख्यां माक्खी निगलण की खूब ‘प्रैक्टिस’ होज्या सै, झोटे की ढालां गस खाणा भी आज्या सै, अर नेता के सम्मोहन मैं फंसज्या सै। नेता की हर बात की चाद्दर के पल्ले कै गांठ मार ले सै। उसकी रीढ़ की हाड्डी कड़ थेपड़तें ए की साथ बेरा ना कित रफ्फू-चक्कर होज्या सै अक पिंघल ज्या सै। ज्यूकर सामण के आन्धे नै हरया ए हरया दिख्या करै न्योंए उस माणस नै बी ओए दीखै सै जो उसका नेता दिखाना चाहवै।
सत्ता पक्ष के लोग तो अपणे कार्यकर्त्ता नै समझावैंगे अक जो अपणी चालदी मैं नहीं चलावै ओ माणस बी किमै माणस हो सै? सदियां तै यो दस्तूर चालदा आया सै। जिस की चाली उसनै चलाई। महाराजा अशोक तै हिन्दुस्तान का अशोक सम्राट माण्या जा सै फेर गद्दी पै बैठण ताहिं तो उसनै बी अपणे तीन-चार भाइयां का कत्ल करवाया ए था। तो फेर आज के जमाने मैं राज डाट्टण की खात्तर बीस-तीस कत्ल कर दिये जां कै करवा दिये जां तो के हरजा सै? या तै म्हारी विरासत सै, म्हारा रिवाज सै यो, म्हारी पुरानी संस्कृति का सवाल सै। म्हारी आस्था नै ठेस पहोंच सकै सै जै हम बख्त-बख्त पै सौ-दो सौ चार सौ माणसां नै धर्म पै कै जात पै लड़वा कै मरवा नहीं द्यां। शाबाश रै म्हारे नेताओं! तम अशोक समा्रट की सही साच्ची शुद्ध सन्तान सो।
बिना मैरिट, नौकरी दिवावण का झांसा देकै राखणा, बिना मैरिट यूनिवर्सिटी मैं दाखला, बिना मैरिट मैडीकल मैं लैक्चर अर प्रोफैसर लवाणा, रातों-रात करोड़पति बणा देणा ये सारे गुण सैं आजकाल के नेतावां मैं। कायदे-कानूनां को ठोक्कर मारकै घटिया काम करणियां ताहिं बचाणा, ये सारी चीज़ ऊपर तै लेकै तले ताहिं घटण की जागां बधती जावैं सैं। ईसे नेता आण्डी कै फक्कड़ कहे जावैं सैं। अर हम भी पक्के आडू. सां जो इन की इतनी घटिया बातां नै आंख मूंद कै सहन करें जावां सां। म्हारे मां तै कई तो न्यों कहवैंगे अक जै माणस चालती मैं भी नहीं चलावैगा तो फेर नेता बणण की जरूतै के सै? ईब ईसे ढालां सोचणिया माणस आडू. तै न्यारा के हो सकै सै?
ये नेता दूसरी बात अपने चेले-चपट्यां नै या सिखाया करैं अक अपणा मारै छां मैं गेरै। अर हम बी न्यों कैहण लागज्यां सां अक बात तो सोला आने सही सै। अपणी समझदाणी पै जोर देकै सोचण की तो आपां नै बी सूं खा राखी सै। पहली बात तो या सै अक आपां अपणा किसनै समझां सां अर पराया किसनै समझां सां। ऊत, बलात्कारी, कात्ल, सुलफाबाज, काला धन कमावणिया तै हमनै प्यारा लागै सै इस करकै अक ओ म्हारी जात का सै, ओ म्हारा गोत्ती भाई सै, ओ रिस्तेदारी मैं पड़ै सै। ईमानदार, आम जनता का भला चाहवणिया, साच नै साच अर झूठ नै झूठ कहवणिया, अपणे असूलां पै चालणिया सरीफ माणस हो तै आपां उसनै सूंघते बी कोण्या। इस करकै अक ओ अपणी जात का कोण्या, ओ गोत्ती भाई कोण्या। कोए बूझै तो कैहद्यां सां अक ऊत सै तो के सै, सै तो अपणी जात का। जिस माणस की फितरत बलात्कारी की होगी ओ जात की छोरियां तै भी बदफेली करैगा अर दूसरी जात की छोरियां गेल्यां बी। औं नहीं बक्शै किसे जात नै। अर फेर बी हम उसनै अपणा मानां अर उस पै केस नहीं चालण देवां।
जिस माणस का काम सुलफा बेचण का सै तो ओ योहे काम तै म्हारे बालकां नै भी सिखावैगा। बताओ ईसे रिस्तेदार अर गोत्ती भाई नै के कोए चाटै? ये हे माणस सैं जो अपणे बचण की खातर यो मुहावरा इस्तेमाल करैं सैं अक अपणा मारै छां मैं गेरै। हम भी सैड दे सी कहवांगे अक बात सही, अपणा माणस फेर बी किमै तो ख्याल राखैगा ए। हम एक बात कति भूल ज्यावां सां अक मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? मरै पाछै निर्जीव शरीर का कोए किमै करो के फर्क पड़ै सै? कई माणस तो समझण लागगे अक जात पै बांट कै ये नेता म्हारा उल्लू बणावैं सैं। फेर कई झकोई इसे पावैंगे जो मान कै ए कोण्या दें। समझाल्यो क्यूकर समझाओगे ईसे आडूआं नै। आडू. कैहण का बुरा मानज्यां, अपणे आप सोचैं ना, दूसरे की समझाई औड़ समझैं ना। पढ़्या-लिख्या माणस घणा आडू पावै सै। अनपढ़ आडू. फेर बी समझाया जा सकै सै फेर पढ़े-लिखे आडू. नै समझा कूण दे, अंगद की ढालां पां गाड कै खड़या होज्या सै। सबनै दीखै सै अक ये बदेशी कम्पनी सब क्याहें पै छावण लागरी सैं फेर म्हारा नेता इनपै चुप सै तो आपां भी चुप खींचरे सां। न्यों चुप खींच कै कितने दिन काम चालैगा? इस बाजार व्यवस्था मैं सब किमै पीस्से के पाछै भाज लिया अर म्हारे नेता इसका गुणगान करण लागरे सैं, तो हम भी इसके कसीदे खींचण लागगे। अरै इन नेतावां तै कोए सवाल भी करैगा? कोए बूझैगा अक इस देश का, इस देश के लोगां का क्यों आडू. बना राख्या सै? किसे दिन म्हारे नेता जी बदेश मैं बैठे पावैंगे अर हम आडै़ एक-दूसरे की धोती की लांगड़ पकड़ कै खींचते रहवांगे। अर तुम हमनै के बेरा था न्यूं बणज्यागी? 

अधखबड़ा माणस

अधखबड़ा माणस
म्हारे देस मैं अर खास कर हरियाणा मैं अधखबड़े माणसां की गलेट लागै सैं। दो साल पहलम गणेस की मूर्तियां नै दूध पीणा सुरू करया। देस के महानगरां मैं अर बिदेसां मैं ये खबर जंगल की आग की ढालां फैलगी। भौतिक प्रयोगसाला का एक साइंसदान बी दूध प्यावण आल्यां की भीड़ में खड़्या पाया गया। कुछ साल पहलम बम्बई के मसहूर टाटा इन्सिटिच्यूट ऑफ फण्डा मैंटल रिसर्च के एक माने ओड़ खगोल शास्त्री के बारे में चर्चा थी अक ओ ग्रहण लागण के बख्त न्हाण का पाखण्ड कर्या करता। जै इसे अन्धविस्वासी साइंसदान देस मैं वैज्ञानिक नजरिये की एक धुरी सैं तो दूजे छोर पै ओ मोची सै जिसनै टी.वी. पै यो साबित कर दिया था अक उसका तीन टांगा आला औजार भी गणेश की ढालां दूध पी सकै सै। इस बात तै एक बात तै साफ उभर कै आवै सै अक म्हारे देस मैं वैज्ञानिक शिक्षा अर वैज्ञानिक सोच में कोए सीधा रिस्ता नहीं सै। कोए जमाना था जब शिक्षा अर वैज्ञानिक दृष्टिकोण एक प्रक्रिया का हिस्सा थे। मतलब आधुनिकता का हिस्सा थे। पढ़े लिखे माणस अन्ध विश्वासां तै अपणी मुक्ति नै अनपढ़ां के मुकाबले मैं अपणी श्रेष्ठता का कारण बतान्ते हान्डया करते। पर आज वे बातै कोन्या रैहरी। कई माणस वैज्ञानिक दृष्टिकोण नै कुदरत अर व्यक्तिगत जिन्दगी ताहिं ए लागू करैं सैं पर समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण नै वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हिस्सा कोन्या मानते। बस योहे अध खबड़ापन सै उनका अक वे विज्ञान के नजरिये नै समाज तै न्यारा करकै राखै सैं।
म्हारी आज की संस्कृति नै एक अधखबड़ा माणस तैयार करण का ठेका सा ठा राख्या सै। यो अधखबड़ा माणस एक ढाल तै विचारसील हो सै, वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी हो सै उसका, वैज्ञानिकां आले काम भी सारे करै सै पर दूसरे कान्ही ओ विवेकहीन भी सै अर अवैज्ञानिकता का सिकार भी सै। अर या बात हरियाणे मैं तो हर सहर अर गाम मैं पावै सै पर इसे अधखबड़े माणस सारी दुनियां मैं सैं।
एक डॉक्टर (अधखबड़ा माणस) मरीज का परेसन करकै न्यों कहवैगा अक ले हमनै तो जो करणा था सो कर दिया, ईब बाकी ऊपर आला जाणै। मास्टर जी स्कूल मैं तो बालकां नै पढ़ावैगा अक बरसात बादलां तै हो सै अर घरां आकै अड़ कै बैठ ज्यागा अक बरसात हवन करे तैं हो सै। बताओ इसा मास्टर बालकां मैं किसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करैगा? इन अधखबड़े माणसां नै ब्रूनो नाम का साइंसदान जिन्दा जला दिया था। ब्रूनो का कसूर इतना ए था अक उसनै एक सच्चाई दुनिया के साहमी ल्यावणी चाही थी अक म्हारी धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै। इसतै पहलम दुनियां न्यों मान्या करती अक म्हारा सूरज म्हारी धरती के चारों कान्हीं घूमै सै। आज जिब जमाना इतनी आगै जा लिया, विज्ञान नै इतनी तरक्की करली तो भी इन अधखबड़े माणसां नै राजस्थान मैं भंवरी बाई गेल्यां सामूहिक बलात्कार कर्या। उसका कसूर इतना ए था अक उसनै बाल विवाह का विरोध कर्या था। बेरा ना म्हारे संविधान (जिसमें बाल विवाह कानूनन जुर्म मान्या गया सै) के रुखाले भंवरी बाई नै बचावण क्यूं नहीं आये। उल्टा बलात्कारियां के पाले मैं जा खड़े हुए। और भी घणे कारण रहे होंगे इसके पर मनै लागै सै अक ये अधखबड़े माणस थे अर उनकी अधखबड़ी सोच थी जिसनै भंवरी बाई ताहिं न्याय नहीं मिलण दिया।
म्हारे समाज नै, म्हारी मानवता नै, इन्सानियत नै जै सबतै घणा खतरा किसे तै सै तो इस अधखबड़े माणस तै सै इसकी अधखबड़ी सोच तै सै अर उस समाज व्यवस्था तै सै जिसनै ये अधखबड़े माणस बणावण के बड्डे कारखाने ला राखैं सैं।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

रोग कसूता के करूं

रोग कसूता के करूं
हरियाणा के विद्वानों, राम-राम!
मेरी उम्र सै याणी सी। मैं सौला सतरा साल का बालक सूं। जवानी पहरे मैं पां धरया ए था अक एक दूसरी दुनिया मैं आग्या जणो तै। म्हारी गाल मैं आठ जणे सां म्हारी उम्र के। म्हारी गाल मैं चार छोरी सैं म्हारी उम्र की। मेरे तै पहलम तीनां गेल्यां तीनां की यारी थी। चौथी गेल्यां मेरा बी याराना होग्या। सारी हाण डर लाग्या रहवै। अपणे घरक्यां का डर कदे छोरी के घरक्यां का भय कदे गाम के लोगां का भय। पर या लुका छिपी म्हारी दो तीन साल चाली। एक दो बर उनके घरां मैं थ्यावन्ता थ्यावन्ता बच्या। इस सारी बातां का बेरा ना मेरे दिमाग नै बोझ मान्या अक के बात हुई मेरा तै करंट खत्म होग्या। वैद धोरै दवाई ली। शक्ति क्लीनिक मैं धक्के खाये। जुनेजा क्लीनिक बी गाह कै गेर दी। मेरठ मैं एक हकीम बताया उसकी दवाई बी बेअसर रही। मनै सहज सहज यार दोस्तां तै जिकर करया तै उन मां तै बी कईयां नै बताई अक म्हारे बी गोड्डे से टूटे रहवैं सैं। किसे काम मैं जी लागता ना। सरीर मैं कमजोरी आगी। सवाल सै अक मैं ठीक हो ज्यांगा अक नहीं? एक बात और सै मेरी बातां नै मजाक मैं मतना लियो या एकला मेरा सवाल नहीं सै। मनै तै होंसला करकै विद्वानां कै साहमी अपनी किताब खोल कै धरदी पर घणे सैं जिनकी किताब बन्द सै। सोचो किमै अर बताइयो हमनै। मैं करूं तै के करूं?
म्हारी गली का कर्मबीर सै। उसकै बी यो रोग था। उसनै सर्मान्ते नै अपणे घरक्यां आगै या बात बताई कोण्या। उसका ब्याह होगा फेर उसे दिन तै भाई तो और भी घणा कमनू सा रैहवण लागग्या। उसकी घर आली नै अपणी सासू ताहिं बतादी सारी बात अर वा कर्मबीर नै ठायें ठायें हान्डै सै। कदे कितै तै झाड़ा लुवा कै ल्यावै सै अर कदे किते तै गन्डा ताबीज बन्धवा कै ल्यावै सैं। पर उसकी घर आली दो बरस तै अपणे घरां बैठी सै। कर्मबीर कै और घणा सदमा होग्या। एक दिन तै ओ सल्फास की गोली खाग्या था। बड़ी मुस्किल तै मैडीकल आल्यां नै पांच छह दिन की खुबात करकै बचाया। उसकी घर आली बी आई कै आणा पड़या उसनै।
पर मनै तो बहोतै घणी चिन्ता होरी सै। इस चिन्ता नै दीखै मेरा और बी घणा भट्ठा बिठा दिया। कर्मबीर तै होंसला लेकै मैं भी मैडीकल मैं गया। उड़े तै डाक्टरां नै बस इसा ए सा देख्या अर गोली लिख दी। मेरे कोए आराम कोन्या हुया। मुंह की हाड्डी चिलकण लागगी। बेरी मैं एक वैद बताया इस बीमारी का उस धोरै दवाई ल्याया। छह म्हिने दवाई खाई। मुस्किल ते नकल नुकल मारकै बी.ए. करली इब आगै कोए राह नहीं दीखता अक करूं तै के करूं?
नौकरी ना कितै। कोए काम धन्धा चलाऊ तै पीस्सा कोन्या। ऊं बी हिम्मत सी कोन्या बनती। दो चारां नै अपणा काम धन्धा सुरू करया था। सारे के सारे तीस-तीस अर कै पचास-पचास हजार तलै आगे अर ईब ठन-ठन गोपाल हुये हांडैं सैं।
तो मेरी हरियाणा के विद्वानां तै, याड़े के कद्रदानां तै, म्हारे नेता महानां तैं जो ईब लैक्सन लड़ण आवैंगे या हाथ जोड़ कै प्रार्थना सै अक मेरा मार्ग दर्सन करो। मैं किस धोरे अपणा इलाज कराऊं? मैं कित तै रोटी खाऊं? अर क्यूकर अपणा ब्याह रचाऊं? मनै इन्तजार सै थारी सलाह का। मेरा पता बूझणा चाहो सो? तो मेरा पता सै हरियाणे के हर गाम मैं मेरे बरगे तीस-चालीस नौजवान जरूर पा ज्यांगे, उनके किसे के नाम तै एक चिट्ठी मैं लिख कै बता दियो समझो वा चिट्ठी मेरे धोरै पहोंच ज्यागी।

मैडीकल ठेके पै

मैडीकल ठेके पै
मैडीकल नै आजकाल पी जी आई कहवण लागगे। न्यों कहवैं सैं अक सरकार नै इसका औधा बधा दिया। बाकी सब किमै न्यों का न्यों तै नाम बदलण की बी के जरूरत थी। हरियाणे का इकलौता मैडीकल पर अखबारां आले इसके पाछै पड़े रहवैं सैं। आजकाल मैडीकल आल्यां कै एक धुन और सवार होई सै। या धुन आई तै वर्ल्ड बैंक धोरे तै चाल कै सै पर आड़े के कार मुख्त्यार इसनै निखालस अपणे दिमाग की उपज बतावैं सैं। सुद्ध हरियाणवी अर और बी सही कही जा तै सही रोहतकी। या धुन सै सब किमै ठेके पै देवण की। पहलम कैन्टीनां का ठेका उठ्या करता, स्कूटर स्टैंड का ठेका उठता देख्या फेर इबतै ठेक्यां का कोए औड़ै कोण्या रह्या।
मैडीकल कालेज मैं रहणियां की सबकी सारी हाण घिग्घी बन्धी रहवै सै। कदे इस डाक्टर कै घरां चोरी तै कदै उस डाक्टर के घरां चोरी। कदे स्कूटर की चोरी तै कदे कार की चोरी की सीनाजोरी। अस्पताल मैं वार्डां मैं मरीजां के रिश्तेदारां की सामत आई रहवै सै रोज, ओ पी डी मैं बीमारी की मार फेर ऊपर तै भीड़ की लाइन की मार अर सोने पै सुहागा यो अक पाकेट मारां की मार। डाक्टर मरीजां पै वार करैं अर जेब कतरे मरीजां अर डाक्टरां दोनूआं पै दया दृष्टि राखैं सैं अपनी। चोरी की बी देखी जा माणस और मेहनत करकै कमा ले।
आजकाल एक साक्का और बधग्या। महिला चाहे डाक्टर हो चाहे नर्स हो, चाहे स्वीपर हो अर चाहे मरीज हो अर चाहे पढ़ण आली हो, उसकी गेल्यां बहोतै भुण्डी बणै सै। राह चालदी औरतां नै छोरियां नै छेड़ना बधता जावण लागरया सै। बदमासां के टोल के टोल हांडे जावैं सैं। कोए रोक टोक ना। कई डाक्टर अर नर्स बतावैं सैं अक कई बर तो ड्यूटी पै उनकी गेल्यां बहोतै भुण्डी बणै सै। कई महिला मरीजां अर उसकी रिस्तेदार देखभाल करण आली औरतां की मजबूरी का फायदा ठावन्ते लोग वार नहीं लावन्ते। लेडी डाक्टर अर नर्सां के छात्रावासां मैं भी असामाजिक तत्वां की घुसपैठ दिन पै दिन बधती जावण लागरी सैं। सुरक्षा के प्रबन्ध बहोतै ढीले बताये अर पुलिस चौकी (मैडीकल आली) पै तै दिन छिपे पाछै सोमरस का भोग लाकै घणखरे पुलिस आले राम की भक्ति मैं लीन हुए पावैं सैं। कई बै ये सवाल उठे अर आखिर मैं प्रशासन के समझ मैं आगी अक मैडीकल की सुरक्षा का काम ठेके पै दे दिया जा तो चोरी जारी अर बदमाशी पै कंट्रोल कर्या जा सकै सै। देखियो कदे जिन ताहिं ठेका दिया जा वोहे चोहदी के बदमाश लिकड़याए तै के मण बीघै उतरैगी?
कई बै जिब मरीज धोई औड़ बैड सीट मांगले कै ड्राई क्लीन कर्या औड़ साफ काम्बल मांगले तै उसनै नहीं मिल सकता चाहे मंत्री ताहिं की सिफारिस करवा कै देख ले। अर मंत्री बी उस एक मरीज की खातर तै टैलीफोन कर देगा फेर बाकी भी तै मरीज सैं इस मैडीकल मैं उनकी चिन्ता ना मन्त्रियां अर ना मुख्यमंत्री जी नै। जड़ बात या सै अक साफ बैड सीट का जिकरा चालै तै लाण्ड्री का जिकरा चाल पड़ै अर इसकी मसीन 30 साल पुरानी, बदलै कूण? तै प्रशासन मैं बैठे लोग फेर न्यों कैहदें सैं अक कपड़यां की धुलाई का काम भी ठेके पै देण की प्लान बणन लागरी सै।
वार्डां की सफाई का मसला हो चाहे बाथरूमां की सफाई का मसला हो अर चाहे प्रेशन तै पहलम मरीज के बालां की सफाई का मसला हो, इन सारे कामां खातर ठेकेदारी प्रथा की वकालत करणिया बहोत पैदा होगे हरियाणा मैं। तै फेर तै सारा ए मैडीकल ठेके पै छुटा दिया जा। सरकार का 32 करोड़ का बजट बच ज्यागा अर 30-40 करोड़ रुपइये मैं इसका ठेका उठैगा। इसी तंगी के बख्तां मैं सरकार ने 72 करोड़ का फायदा हो सकै सै इस दवाई तै। ठेके पै काम तै डाक्टरां की ‘स्टीराइड’ आली रामबाण दवाई सै बेरा ना इब ताहिं सरकार की समझ मैं क्यों नहीं आली ?
जनता का के होगा? इसकी परवाह ना सरकार नै सै अर ना खुद जनता नै सै। अर जै न्यों ए चालता रहया तै पहलम तै पूरा मैडीकल ठेके पै ठवाया जागा। फेर न्यों ए एक पूरा जिला ठेके पै चलावण की बात बी चाल सकै सै अर फेर पूरा हरियाणा अर फेर कदे पूरा भारत देश ठेके पै जावैगा।
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इस जात तै बच कै

इस जात तै बच कै
आजकाल पूरे रोहतक मं चर्चा सै महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय मैं सुहाग साहब की अर जे के शर्मा जी की। जितने मुंह उतनी बात। कोए कहवै सै अक यूनिवर्सिटी का नाम तो दयानन्द पै अर आड़ै काम इतने घटिया। आड़ै काम करणिये औधेदार बेरा ना कुणसी दुनियां मैं रहवैं सैं। धरती पै पां टेक कै ए ना चालते। दूसरा बोल्या अक यू राजनीति का खाड़ा बणा कै गेर दिया। राज मैं बैठे औड़ लोगां की वी.सी. इतनै गलत सही सारी बात माणता रहवै इतनै तो ओ वी सी बहोत काम्मल सै उन खात्तर अर जै माड़ा सा भी अहरा पहरा होज्या तै उसकी खाट खड़ी करण मैं चण्डीगढ़ मैं बैठे नेता माड़ी सी बी वार कोण्या लावैं। रिकाट सै इस यूनिवर्सिटी का अक जितने वी.सी. आये वे अधम बिचालै गए अर कै बस आखरी दिन क्यूकरै पूरे करकै गए। चाहे बतरा का मसला हो, चाहे जे डी सिंह का राज हो, चाहे हरद्वारी लाल की सल्तनत का बख्त हो, चाहे जे डी गुप्ता का बख्त हो, चाहे एस एन राव वी सी रहया हो, चाहे राम गोपाल की हकूमत रही हो, चाहे कैपरीहन धोरै चार्ज रहया हो, चाहे लेफ्टीनैंट जी सी अग्रवाल का जमाना हो, चाहे ब्रिगेडियर चौधरी की टरम की बात हो, चाहे विवेक शर्मा के दौर की चर्चा हो, अर चाहे ले.ज. कौशिक के मौसम का जिकरा हो, इस यूनिवर्सिटी नै अपणा जोबण कदे देख्या नहीं अक न्यों कैह सकै माणस अक ओ बख्त बहोत बढ़िया था।
आड़ै जात्यां कै ऊपर कुछ लोगां नै अपणी गोटी फिट करण की रिवायत घाल राखी सै। जो वी.सी. इस जात के शिकंजे तै थोड़ा बहोत बाहर रैहग्या ओ ओरां के मुकाबले ठीक बी कहवाग्या। आड़ै च्यार पांच पोस्ट सैं उन पोस्टां पै नया वी.सी. आन्ते ए की साथ उस जात के माणस आ बैठ्या करदे अर कैहन्दे अक ईब जाटां का राज सै यूनिवर्सिटी मैं, ईब बाह्मणां का राज सै, ईब पंजाबियां का राज सै, ईब बणिया का राज सै। इन जात्यां के कई-बई सौ कर्मचारी अपणी मांगां खात्तर धक्के खान्ते हांडैं जां सैं - उनकी इन राज आल्यां नै कदे परवाह नहीं करी। असल मैं ये इन जात्यां के वफादार बी कोण्या, ये मौका परस्त लोग सैं, अपणा काम काढू चाहे क्यूकरै बी लिकड़ो इन नै नहीं जात की इसी तिसी करी। पर हम भी इतने आडू सां अक जात कै पाछै इनकी आंख मींच कै जय बोलते वार नहीं लावन्ते। म्हारे आडूपन के कारण ये आज ताहिं काच्चे काटदे आये सैं।
हां तै जो भी वी.सी. आया उसनै यूनिवर्सिटी का भला करण की बहोत कोशिश करी पर यूनिवर्सिटी ऊपर नै उट्ठण की जागां तलै नै जान्ती गई। अर ईब तै लोगां की तनखा के बी लाले पड़रे सैं। इसे बख्तां मैं आये सैं म्हारे नये वी.सी. साहब। बख्त बहोत अष्टा सै। यूनिवर्सिटी की माली हालत खस्ता सै - सरकार नै मदद देवण के नाम पै हाथ खड़े कर दिये अर न्यों कहया बतावैं सैं अक यूनिवर्सिटी आले अपणा आप कमाओ अर खाओ।
पढ़ण लिखण का माहौल भी माड़ा ए सै। ना कोए पढ़ कै राज्जी अर ना कोए पढ़ाकै राज्जी। जो पढ़ाणा चाहवै भी उसनै और पढ़ावण नहीं देवैं जो पढ़णा चाहवै उसनै पढ़ण ना देवैं।
इसे माहौल मैं एक माणस जो वी.सी. साहब का फैन सै, उसनै बहोत उम्मीद सैं अक बहोत कुछ होवैगा ईब यूनिवर्सिटी मैं। उसकी भावना इस रागनी के मांह कै ओ पहोंचाणा चाहवै सै बेरा ना पहोंचैगी अक नहीं पहोंचैगी।
वायस चान्सलर बणग्या इस यूनिवर्सिटी का आज तूं,
तीन साल मैं म्हारे धोरै म्हारे पूरे कर दिये काज तूं।
यूनिवर्सिटी कालेज का प्रिंसीपल घणे दिन का खटकै सै,
डी एस डब्ल्यू की पोस्ट भी म्हारे रैह रैह कै नै अटकै सै,
म्हारा भाणजा नौकरी खात्तर यो घणे दिनां का भटकै सै,
कई डेलीवेज कुकावैं सैं उनका केस बी तो लटकै सै,
अपणी चालती मैं चलाकै मेट लिए ईब सारी खाज तूं।
कई कर्मचारी हिमाती धुरके आच्छी पोस्ट पै बदली करदे,
कई जो विरोधी म्हारे उनका आज सिर काट कै न धरदे,
राजा मिस्त्री आला राज तेरा कर म्हारा तूं ऊंचा सिरदे
ब्योहारी माणस दो दिन मैं घर अपणा खुशियां तै भरदे
आज तलक जो चाल्या कोण्या इस चला दिये रिवाज तूं।
नेता जी नै तूं राजी राखिये उनका पूरा कैहण पुगाइये,
गलत सही वे जो भी कैहदें बस हां में हां भरता जाइये,
दिन नै रात अर रात का दिन सुर मैं सुर मिलाइये,
बिल्ली के भागां छींका टूटया काच्चे काट कै खाइये,
तिकड़म लड़ाकै पहरें रहिये यो वी.सी. आला ताज तूं।
नियम कायदे अर नैतिकता ये सब बात कैहणे की सैं,
पाणी का बहाव देख कै रूत लहरां के बल बैहणे की सैं,
के बेरा कितणे दिन ये पावर थारे धोरै रैहणे की सैं,
हमनै अपणे हक की बात पूरी ढालां तै लैहणे की सैं,
खूंटा ठोक कै जूत मारिये मतना करिये लिहाज तूं।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

इस जात तै बच कै

इस जात तै बच कै
आजकाल पूरे रोहतक मं चर्चा सै महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय मैं सुहाग साहब की अर जे के शर्मा जी की। जितने मुंह उतनी बात। कोए कहवै सै अक यूनिवर्सिटी का नाम तो दयानन्द पै अर आड़ै काम इतने घटिया। आड़ै काम करणिये औधेदार बेरा ना कुणसी दुनियां मैं रहवैं सैं। धरती पै पां टेक कै ए ना चालते। दूसरा बोल्या अक यू राजनीति का खाड़ा बणा कै गेर दिया। राज मैं बैठे औड़ लोगां की वी.सी. इतनै गलत सही सारी बात माणता रहवै इतनै तो ओ वी सी बहोत काम्मल सै उन खात्तर अर जै माड़ा सा भी अहरा पहरा होज्या तै उसकी खाट खड़ी करण मैं चण्डीगढ़ मैं बैठे नेता माड़ी सी बी वार कोण्या लावैं। रिकाट सै इस यूनिवर्सिटी का अक जितने वी.सी. आये वे अधम बिचालै गए अर कै बस आखरी दिन क्यूकरै पूरे करकै गए। चाहे बतरा का मसला हो, चाहे जे डी सिंह का राज हो, चाहे हरद्वारी लाल की सल्तनत का बख्त हो, चाहे जे डी गुप्ता का बख्त हो, चाहे एस एन राव वी सी रहया हो, चाहे राम गोपाल की हकूमत रही हो, चाहे कैपरीहन धोरै चार्ज रहया हो, चाहे लेफ्टीनैंट जी सी अग्रवाल का जमाना हो, चाहे ब्रिगेडियर चौधरी की टरम की बात हो, चाहे विवेक शर्मा के दौर की चर्चा हो, अर चाहे ले.ज. कौशिक के मौसम का जिकरा हो, इस यूनिवर्सिटी नै अपणा जोबण कदे देख्या नहीं अक न्यों कैह सकै माणस अक ओ बख्त बहोत बढ़िया था।
आड़ै जात्यां कै ऊपर कुछ लोगां नै अपणी गोटी फिट करण की रिवायत घाल राखी सै। जो वी.सी. इस जात के शिकंजे तै थोड़ा बहोत बाहर रैहग्या ओ ओरां के मुकाबले ठीक बी कहवाग्या। आड़ै च्यार पांच पोस्ट सैं उन पोस्टां पै नया वी.सी. आन्ते ए की साथ उस जात के माणस आ बैठ्या करदे अर कैहन्दे अक ईब जाटां का राज सै यूनिवर्सिटी मैं, ईब बाह्मणां का राज सै, ईब पंजाबियां का राज सै, ईब बणिया का राज सै। इन जात्यां के कई-बई सौ कर्मचारी अपणी मांगां खात्तर धक्के खान्ते हांडैं जां सैं - उनकी इन राज आल्यां नै कदे परवाह नहीं करी। असल मैं ये इन जात्यां के वफादार बी कोण्या, ये मौका परस्त लोग सैं, अपणा काम काढू चाहे क्यूकरै बी लिकड़ो इन नै नहीं जात की इसी तिसी करी। पर हम भी इतने आडू सां अक जात कै पाछै इनकी आंख मींच कै जय बोलते वार नहीं लावन्ते। म्हारे आडूपन के कारण ये आज ताहिं काच्चे काटदे आये सैं।
हां तै जो भी वी.सी. आया उसनै यूनिवर्सिटी का भला करण की बहोत कोशिश करी पर यूनिवर्सिटी ऊपर नै उट्ठण की जागां तलै नै जान्ती गई। अर ईब तै लोगां की तनखा के बी लाले पड़रे सैं। इसे बख्तां मैं आये सैं म्हारे नये वी.सी. साहब। बख्त बहोत अष्टा सै। यूनिवर्सिटी की माली हालत खस्ता सै - सरकार नै मदद देवण के नाम पै हाथ खड़े कर दिये अर न्यों कहया बतावैं सैं अक यूनिवर्सिटी आले अपणा आप कमाओ अर खाओ।
पढ़ण लिखण का माहौल भी माड़ा ए सै। ना कोए पढ़ कै राज्जी अर ना कोए पढ़ाकै राज्जी। जो पढ़ाणा चाहवै भी उसनै और पढ़ावण नहीं देवैं जो पढ़णा चाहवै उसनै पढ़ण ना देवैं।
इसे माहौल मैं एक माणस जो वी.सी. साहब का फैन सै, उसनै बहोत उम्मीद सैं अक बहोत कुछ होवैगा ईब यूनिवर्सिटी मैं। उसकी भावना इस रागनी के मांह कै ओ पहोंचाणा चाहवै सै बेरा ना पहोंचैगी अक नहीं पहोंचैगी।
वायस चान्सलर बणग्या इस यूनिवर्सिटी का आज तूं,
तीन साल मैं म्हारे धोरै म्हारे पूरे कर दिये काज तूं।
यूनिवर्सिटी कालेज का प्रिंसीपल घणे दिन का खटकै सै,
डी एस डब्ल्यू की पोस्ट भी म्हारे रैह रैह कै नै अटकै सै,
म्हारा भाणजा नौकरी खात्तर यो घणे दिनां का भटकै सै,
कई डेलीवेज कुकावैं सैं उनका केस बी तो लटकै सै,
अपणी चालती मैं चलाकै मेट लिए ईब सारी खाज तूं।
कई कर्मचारी हिमाती धुरके आच्छी पोस्ट पै बदली करदे,
कई जो विरोधी म्हारे उनका आज सिर काट कै न धरदे,
राजा मिस्त्री आला राज तेरा कर म्हारा तूं ऊंचा सिरदे
ब्योहारी माणस दो दिन मैं घर अपणा खुशियां तै भरदे
आज तलक जो चाल्या कोण्या इस चला दिये रिवाज तूं।
नेता जी नै तूं राजी राखिये उनका पूरा कैहण पुगाइये,
गलत सही वे जो भी कैहदें बस हां में हां भरता जाइये,
दिन नै रात अर रात का दिन सुर मैं सुर मिलाइये,
बिल्ली के भागां छींका टूटया काच्चे काट कै खाइये,
तिकड़म लड़ाकै पहरें रहिये यो वी.सी. आला ताज तूं।
नियम कायदे अर नैतिकता ये सब बात कैहणे की सैं,
पाणी का बहाव देख कै रूत लहरां के बल बैहणे की सैं,
के बेरा कितणे दिन ये पावर थारे धोरै रैहणे की सैं,
हमनै अपणे हक की बात पूरी ढालां तै लैहणे की सैं,
खूंटा ठोक कै जूत मारिये मतना करिये लिहाज तूं।

कुछ तै सरम करो

कुछ तै सरम करो
रमलू अर उसका परिवार शुक्रवार की सांझ नै टी.वी. देखण लागरे थे। सांझ नै चाण चणक सी खबरां मैं देख्या अक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री की सपथ लेण लागर्या सै अर बिहार का गवरनर सपथ दिलावण लागर्या सै। आगली न्यूज मैं लालू यादव एक सौ साठ एमएल्यां की लिस्ट दिखावण लागर्या सै। रमलू नै न्यूज देख कै के सोची भला बिहार के गवरनर के बारे मैं:
टेक: जनतंत्र का चौड़े मैं दिया क्यों गल घोट तनै।
इसकै क्यों कालस लादी मारी कसूती चोट तनै।।
1. जनतंत्र की जागां लाठा तंत्र बिहार मैं घुमाया आज
नीतीस कुमार तै सपथ दिवादी किसा खेल रचाया आज
संविधान पाड़ बगाया आज के खाये नोट तनै।।
2. कायदे कानून और परम्परा पढ़ण बिठाये क्यों
बेसरमी की हद होगी राबड़ी हर ना बुलाये क्यों
बाजपेई बौखलाये क्यों जनता देवै ना वोट तनै।।
3. काले धन का ईब उड़ै खुलकै दौर चलाया जागा,
लालच दे एम.एल.ए. तोड़ैं न्यों हाथ उठाया जागा,
गरीब उड़ै दबाया जागा करया भारी खोट तनै।।
4. बिहार की जनता ना सै माड़ी या सबक सिखावैगी,
बिहार की गद्दी खोसैगी दिल्ली मैं हाथ दिखावैगी,
या जेलां मं खंदावैगी उड़ै मिलैंगे सूके रोट तनै।
इतनी वार मैं रमलू के पड़ौस तैं मनभरी आज्या सै रमलू की घरआली सन्ता तै फेट्टण। रमलू की घरआली रमलू की बात सुणकै गरमी खारी थी। वा मनभरी ताहिं के कैहवण लागी भला:
टेकः आहे सखी एक बात बताऊं, यो दिल अपणा खोल दिखाऊं
नीतीश नै कर दिया चाला, हे मनै तेरी सूं।
गवरनर नै सपथ दिलवाई, नीतीश कै न्यों कुर्सी थ्याई
यो होग्या गुड़ का राला, हे मनै तेरी सूं।
राबड़ी की कुर्सी खोस लई, जनता की आस मोस दई
जनतंत्र का पिट्या दिलवाला, हे मनै तेरी सूं।
नीतीश टोहले कुआं झेरा, जीवन का काम ना तेरा
तेरा चेहरा होग्या काला, हे मनै तेरी सूं।
किसे ढाल बी हक ना बणै, फेर बी कुर्सी पै आण तणै
डेमोक्रेसी का सै गाला, हे मनै तेरी सूं।
ओ कीड़े पड़कै मरियो, कान बात मेरी पै धरियो
खिंचग्या संघर्ष का पाला, हे मनै तेरी सूं।
मनभरी बोली अक न्यों कहवै सैं अक हक तै राबड़ी का ए बणै था पर इन बाजपेई हर नै टेलीफून कर दिया गवरनर ताहिं अक यू नीतीश मुख्यमंत्री बणाणा सै। टेलीफून का रंग चढ़ग्या सै अर वा भी सुर मैं सुर मिला कै के कैहवण लागी भला:
टेकः नीतीश कुमार बिहार का मुख्यमंत्री बण्या देखो,
यो काला बादल असमान के मां आज तण्या देखो।
1. फासीज्म की भारत मैं या बुनियाद धरी गई,
देस तोड़ण की नीम भाई दिल्ली के मां भरी गई,
साजिस पूरी करी गई मेरै सांप सा लड़या देखो।
2. बिहार की आवाज घोट दी सारे नर-नार सुणो,
ये कानून गये भाड़ मैं चाहिये सरकार सुणो,
विधानसभा मैं हाहाकार सुणो रास्सा छिड़या देखो।
3. अवसरवाद और कट्टरवाद का इननै बेरा पटज्या,
विधानसभा मं रैहज्यां थोड़े सिर ठोड़ै ए कटज्या,
नीतीश पाछै नै हटज्या ना तै बिहार ठण्या देखो।
4. खूंटा ठोक की बातां नै कदे भूल ना जाइयो,
किसे के बहकावे ऊपर ध्यान मूल ना लाइयो,
रै घणे टूहल ना जाइयो जाल कसूता बुण्या देखो।
सन्तरा मनभरी की बात सुणकै बोली - कुछ तै सरम करैं। के कोए दीन ईमान बच्या सै अक नहीं इनकै? बडे़ पाक साफ चेहरे आले बतावैं थे अपणे आप नै पर यू चेहरा तै बड़ा खूंखार लिकड्या। मनभरी बोली - मैं तै राबड़ी धोरै एक चिट्ठी गेरूंगी अक घबराइये मतना हम हरियाणे की महिला अर पूरी जनता थारी गैल सैं।

रोहतक डूब लिया

रोहतक डूब लिया
रोहतक जिले का सत्यानाश जावण मैं बस माड़ी सी कसर रैहरी सै। रोहतक जिले की पागड़ी सबतै भार्या। रोहतक जिले की नाक सबतै लाम्बी। रोहतक जिला हरियाणा की इज्जत मान्या जावै। हरियाणा मैं राजनीति का गढ़ रोहतक मान्या जा सै। इसा कामल इतिहास रहया सै म्हारे रोहतक जिले का फेर बेरा ना ईब के होग्या इसकै। ईब तै रोहतक जिले के खाते मैं पूरे हिन्दुस्तान मैं महिलावां की सबतै कम संख्या होवण का तमगा आवै सै। एक हजार माणसां पै रोहतक जिले मैं 796 महिला बताई। अर ईस 2000-2001 के साल मैं ये और भी नै जाली होंगी।
बेरा ना के चाला सै छोरे की भूख बधती ए जावै सै रोहतक आल्यां की। सुरते हर तीन भाई थे। ईब सुरते के तीन छोरी अर चौथा छोरा आगै सैं। पांचमा बालक सुरते की बहू कै होवण आला सै। किसे नै टोक लिया सुरते अक रै ईब तो बस कर खसम, ईब तो छोरा भी सै तो सुरता बोल्या एक का बी होना ना होना बराबर सै, दो तै होणे ए चाहिए। छोरा होगा तो बुढ़ापे की लाठी बणैगा। छोरियां का के सै ये तो पराया धन सैं। जिस माणस नै सुरते टोक्या था ओ बोल्या अक सुरते थाम कितने भाई सो? सुरते बोल्या अक हम तीन भाई सां। टोकणिया माणस बोल्या अक थारे मां बाबू कूणसे मैं रहवैं सैं वे? सुरता बोल्या - वे तै न्यारे ए रहवै सैं। हम तीनू भाई न्यारे-न्यारे सां। ओ माणस बोल्या - थाम तो इनके बुढ़ापे की लाठी कोन्या बणे तो वे थारे बुढ़ापे की लाठी क्यूकर बणज्यांगे? आज काल छोरी ए तो थोड़ी घणी सम्हाल बेशक करले मां बाप की बाकी छोर्या कै बिसर तो रहियो ना। पर छोरियां के घर का तो हमनै म्हारी परम्परा मैं मनाही सै। जै छोरी के घर का पाणी बी पी लिया तो चौबीसी आली पंचायत जात बाहर कर देगी। अर महापंचायत बुला लेगी अक सुरते के बाबू नै अपनी बेटियां कै घर का पाणी क्यूं पी लिया?
सुरते बोल्या - थाम्बू तूं भी बेरा ना कित की बात नै कित लेग्या। मेरा मतलब था अक छोरा तो वंश चलावण आला हो सै। बिना छोरे के वंश क्यूकर चालै माणस का? थाम्बू बोल्या - जवाहर लाल का वंश कोनी चाल्या के? जवाहर लाल की बेटी थी ना इंदिरा गांधी। जिब उसके नाम तै नेहरू परिवार आवण लागर्या तो म्हारी छोरियां के नाम तै म्हारे परिवार क्यूं ना चालैंगे? थाम्बू बोल्या - फेर क्यूं कोली भर्या सै इस वंश की? ये बालक तनै सूंघैं ना अर छोरियां कै तूं जावै ना, उनके घर का पाणी पीवै ना। थारी परम्परा, थारे रिवाज, थारी मूंछ का बाल बणज्यां सैं। तो फेर मैं के करूं थाम्बू? सुरते दुखी हो कै बोल्या। थाम्बू बोलया - इन अपणे रिवाजां नै चूंघै जा अर दिन तोड़े जा। थाम्बू बोल्या अक तूं इस जमीन मां तै छोरियां का हिस्सा छोरियां नै दे दे। आड़ै दो किले बाटैं आवैं सैं उसकै, उसनै बुला ले अर आड़ै बसा ले। सुरते का पीला मुंह होग्या अर बोल्या - इसतै आच्छा तो मैं फांसी खाल्यूंगा। थाम्बू नै कम तै कम दस गामां के नाम गिणवा दिये जित छ-छ सात-सात छोरी अपने गामां मैं आकै बसरी थी। सुरता फेर बोल्या - न्यो तै म्हारे गाम मैं कई गोत होज्यांगे। फेर उनके ब्याहवां मैं रोला माचैगा। थाम्बू बोल्या - कितै कुछ ना होवै चौटाला गाम मैं तीन चार गौत सैं उनके गाम की गाम की आपस मैं ब्याह होवण लागरे तो म्हारे गाम मैं के डूबा पड़ै थी। दो-तीन दिन पहलम खबर थी अखबार मैं अक एक छोरा था उसनै ना रूजगार मिल्या कितै अर ब्याह बी कोण्या हुया। उसका तो बेटे नै मां अर बाबू दोनूआं का कत्ल कर दिया अक या प्रोपर्टी तावली हाथ लागज्या अर ब्याह होज्या। इसतै बड्डा जुलम और के हो सकै था? एक खबर या भी थी एक बिहार के किसे गाम तै 15 जवान छोरी लापता सैं। शक था अक छोरी बेचण आले गिरोह आले उननै ठा लेगे। सुरता बोल्या - म्हारे घरां तै बालक की मां न्यूं कहवै थी अक छोरी कम होगी तो आच्छा ए सै अक इनकी कीमत बधज्यागी। इबतै जला दें सैं दहेज के लोभी फेर हथेलियां पै राख्या करैंगे छोरी नै। थाम्बू नै माथे मैं हाथ मार लिया अर बोल्या - रै सुरते ये माणस सैं माणस, डांगर कोण्या, कै प्याज कोण्या अक इनकी कीमत बधज्यागी। इनपै अत्याचार बधैंगे। समाज मैं असुरक्षा का माहौल बधैगा। सुरता दुखी सा होकै बोल्या - रै जिब इसका इलाज बी बतावैगा किमै? थाम्बू बोल्या - मनै बीमारी खोल कै बता दी ईब इलाज तो गाम राम टोहवैं!

फासीवाद

फासीवाद 
एक बर मने एक सेमिनार मैं जावण का मौका मिलग्या। मनै सोच्ची अक ले तूं भी ले चाल किमै ज्ञान की बात चालकै गाम मैं बताइये भाइयां ताहिं। उड़ै बात होवण लागरी साम्राज्यवाद पै, पूंजीवाद पै, सामन्तवाद पै अर फासीवाद पै। कई बोलणियां आये अर अपणी बात अंग्रेजी मैं के टूटी फूटी हिन्दी मैं कैहकै चाले गए। मेरै आधी एक बात पल्लै पड़ी अर कई बात कानां पर कै बी गई। खड़या होकै कुछ बूझल्यूं इसकी हिम्मत नहीं पड़ी। फेर एक बात जरूर समझ मैं आगी अक इन वादां के बारे मैं बेरा पाड़े बिना ईब म्हारा काम कोण्या चालै। दो तीन दिन बहोत बेचैन रह्या। मेरे यार दोस्त भी मेरे बरगे क्लीन स्लेट थे इस मामले मैं। अपणे कालेज के टीचरां तै बूझण की कोशिश करी तो उननै न्यों कैंहके धमका दिया अक घणा आण्डी मतना पाकै ईबै तै राजनीति मतना करै पढ़ले। आच्छी ढालां, पहलम अपणा कैरियर बणा ले फेर इन हरफा की पूछड़ ठा ठाकै देखें जाइये। मेरै और बिश्वास होग्या अक इनके बारे मैं जानना तो और भी जरूरी होग्या। यो टीचर आप तै राजनीति मैं बड़या रहैसै हमनै दूर राखणा चाहवै सै।
लायब्रेरी मैं चाल्या गया। उड़ै किताबा मैं माथा मारया। कई किताब देखी पर उड़ै इन हरफां के दर्सन कोन्या होकै दिये। आच्छा साका हुया। मेरा इसा हाल होग्या अक जणूं तै मनै बावली गादड़ी के कान पाकड़ लिये हों - छोडडूं तो मरग्या अर ना छोडडूं तो ऊं पसीने आ लिये। मेरा इसा हाल होग्या अक बस के बताऊं। उठते बैठते, सोते-जागते मेरे दिमाग मैं फासीवाद, साम्राज्यवाद, सामन्तवाद के हथौड़े से लागण लागगे। मैं एक अपणे पड़ौस मैं कांग्रेसी नेता धोरै गया अर उसपै बूझया इनका मतलब तै ओ हंसकै टालग्या। मेरै बी जिद्द होगी अक बेरा जरूर पाड़णा सै इनके मतलब का। चौटाला का भगत सै मेरा एक स्साला मैं उसके धोरै गया। ओ तै जमा कोरा काल्लर पाया। न्यो बोल्या मनै तो पहली बार सुणे सैं ये सब। हां ताऊ पहलम पूंजीवाद अर पूंजीपतियां का जरूर जिकरा कर्या करता अर इननै गाल बकया करता। इननै बहोतै भूंडे बताया करता। पर इसका मतलब कदे खोल कै उसनै बी नहीं बताया म्हारे ताहिं। अर आजकाल तै ताऊ की यारी दोस्ती होरी सै उनकी गेल्यां तो ईब तो इसका मतलब क्यांनै बतावै था। मैं माथा पाकड़ कै बैठग्या। यो नेता माड़ा सा स्याणा दीखै था मनै पर यो बी निरा धौल कपड़िया पाया।
कांग्रेसी बूझ कै देख लिए, इनेलो आले झाड़ पिछोड़ लिये तो मैने सोच्ची अक ईब कित जाऊं? मैं एक बीजेपी आला रहवै सै म्हारे पड़ोस मैं उसके घरा चाल्या गया। चा बणवा ली अर बात सुरू होगी। भाई नै तो अपणा रिकाट चढ़ा दिया अटल का। अटल जी न्यूं, अर अटल जी न्यूं, आध घन्टे ताहिं सांसै कोन्या लेकै दिया बन्धु नै। फेर बोल्या हां तो बन्धु बताओ कैसे आये? मेरे जी मैं जी आया अर मनै बूझया अक मैं इन चार हरफां का सताया औड़ हांडण लागरया सूं - साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, सामन्तवाद, अर फासीवाद। इनका मतलब मनै खोल कै समझाद्यो बंधू जी। अरे मेरे कान्ही इसे ढालां लखाया ज्यूकर कसाई बकरे कान्ही देख्या करै। फेर बोल्या ये म्हारी संस्कृति के सब्द कोन्या। संस्कृत मैं अर म्हारे पुराण ग्रन्थों मैं इन हरफां का कितै जिकराए कोण्या। ये सब तै कोरे बदेसी सबद सैं बन्धु इनके चक्करां मैं मतना पड़ै। भूलज्या इन हरफां नै अर फेर भूल के बी याद मतना करिये। मैं अपणा सा मुंह लेकै आग्या। सोच्चण लाग्या अक मामला तो घणा गड़बड़ सै। पूरे हरियाणा मैं इतने पढ़े लिखे माणस, हरियाणा इतनी तरक्की करग्या अर इन चार हरफां का मतलब साफ-साफ खोल कै बतावणिया कोए नहीं पा लिया।

म्हारा बजट-2001

म्हारा बजट-2001
मानगे इस साल के बजट नै। चाले पाड़ दिये बतावैं सैं। चारों कूट रुक्का पड़रया सै ‘स्वप्न बजट’, ‘स्वप्न बजट’ का। अर भाई रोल्ला के झूठा सै? कार सस्ती होगी, ए.सी. सस्ते होगे अर इसे ढाल की बाकी चीजां भी सस्ती होगी। ईबै गर्मी नहीं सै फेर ठंडे की बोतल सस्ती होगी। कर्जे सस्ते होगे। बाहर तै पूंजी ल्यावणा सस्ता होग्या। भीतर का हो चाहे ना हो, बाहर तै समान मंगवाणा सस्ता होग्या। बड़ी कमाई बी सस्ती होगी अर सुण्या सै सरकार बी सस्ती होगी। अर जिब सरकार सस्ती होगी तै सरकारी कारखाने बी सस्ते तो होवणे ए थे। होगी होंगी किमै राशण-वाशण की कुछ चीजां महंगी। कुछ दवा-दारू, बिजली, आण-जाण का भाड़ा किमै महंगे जरूर होगे होंगे। फेर इन चीजां की महंगाई का रोणा कितने दिन ताहिं रोवन्ते रहवांगे आपां? बताओ ऊंबी राशण इंसान खात्तर सै अक इंसान राशण की खात्तर? बहोत दिन सस्ता नाज (राशण) खा लिया, सस्ती बिजली जला ली, सस्ती गाड्डी मैं घूम लिए, सस्ते मकान मैं रह लिए, सस्ती पढ़ाई पढ़ ली, सस्ते इलाज करा लिये। ईब पब्लिक भी तै अपणी कैड़ तै कुछ कौड़ी दो कौड़ी खरच करना सीखै। जनता की या मुफ्तखोरी के हमेशा चालती रहवैगी? भला ये बिचारे पीस्से आले भी कद ताहिं अपणा पेट काट-काट कै इस नाशुक्री जनता के ऐश-आराम का खर्चा भरते रहवैंगे? अर बिचारे राज करणिया दिल्ली आले कद ताहिं राशण-पानी तै लेकै अर दीयाबात्ती ताहिं के जनता ताहिं इन्तजाम करते रहवैंगे? जै ईसै मैं ये लाग्गे रहे तो देश नै इक्कीसवीं सदी मैं क्यूकर लेज्यांगे? बम-बाम्ब क्यूकर बणावैंगे? हम भी कुछ सां, यो दुनिया खात्तर क्यूकर दिखावांगे? यू राष्ट्र-गौरव का मामला सै अर राष्ट्र के गौरव खात्तर तो कोए भी कीमत कम सै। ईब राष्ट्र-गौरव भी जनता नै मुफत मैं चाहिये? इसकी कुछ तै कीमत देणी ए पड़ैगी ना?
एक बात सै म्हारा वित्त मन्त्री पूरा गुरू सै गुरू। इसनै मन मोहन सिंह अर चिदंबरम सब पाछै छोड़ दिये। गुरू के कटोरा दांव तै सारे विरोधी चित् पड़े सैं। गुरू नैं तो शब्दां के मतलबै बदल कै धर दिये। ईब विपक्ष आले करलें विरोध क्यांका करैंगे। वे कहवैंगे कुछ अर उसका मतलब कुछ लिकड़ैगा। सरकार ना तै राशण खरीदैगी अर ना राशण बेचैगी - इसनै ईब विकेन्द्रीकरण कहवैंगे। पब्लिक तै ईब हर चीज का ज्यादा दाम वसूल्या जावैगा - इसनै ईब सुधार कहवैंगे। नाज, दवा, बिजली, पाणी, रेल, सबतै सरकार हाथ खींच लेगी अर इसतै ईब गरीबी घटना कह्या जागा। नौकरी, मजदूरी सब मैं कमी होगी - इस ताहिं रोजगार की स्थिति मैं सुधार बताया जागा। बाल्को तै झांकी सै अर यू सारा पब्लिक सैक्टर बाकी सै। इस सारे नै बेच कै अर्थव्यवस्था मजबूत करी जागी। जिसनै टेलीविजन दिखावैगा वा पब्लिक मान जागी बाकी जनता जाओ भाड़ मैं।
चारों कान्हीं बजट की तारीफ होवण लागरी सैं। कोए टेलीविजन के इस चैनल पै फूल बरसावै सै तो कोए उसपै। कोए बजट की किसे बात पै लट्टू होरया सै तो कोए किसे पै। जड़ बात या सै अक बजट बहोतै घणा काम्मल सै। कितना काम्मल सै यो असली जनता धोरै कोए जान्ता ए कोण्या। रही-सही कसर सुलफे, स्मैक अर दारू नै पूरी करदी। सोने पै सुहागे का काम टी.वी. नै कर दिया। जनता भूखे पेट भी राम-राम पुकारै अर बजट बढ़िया-बजट बढ़िया न्यों पुकारै। देखियो सारा साल इस बजट तै क्यूकर पूरा होवैगा?

एक मरण मैं सै

एक मरण मैं सै
या बात जग जाहिर होली अक विशाल देहात मैं किसान कसूती फफेड़ मैं आरे सैं। एक बी अखबार कोन्या, एक बी पत्रिका इसी कोन्या जिसमैं इस संकट का जिकर रोजाना इसके पन्यां पै ना आन्ता हो। देश के कोने कोने तै किसानां के संघर्षां की भी खबर छपैं सैं। संसद मैं भी किसानां के इस संकट पै बहोतै हंगामा हुया सै। राज्य सरकारें केन्द्र पै राहत की खातर दबाव गेरण लागरी सैं। फेर ज़मीनी तौर पै हालात मैं सुधार ही झलक कोण्या दीखती। पाछली बरियां धान के भा बधवाणा भूल कै किसान इस बात पै आ लिये थे अक किसे भी भा सरकार म्हारे धान खरीद ले। फेर खरीदणिया भी टोहे नहीं पाये। ईबकै बी 30 रुपइये गिहूआं के बधा के स्याण सा करया सै किसानां पै फेर जै कोए मण्डी मैं 610 के भा तै ठावणिया ए नहीं पावैगा तो इस टोफी का के बणैगा?
किसानां की इस बदहाली के कई पहलू सैं। जै फसल भरपूर होज्या तै उसका खरीददार नहीं मिलता। सरकारी एजैंसी कोए बाहणा बणा कै नाज खरीदण तै इन्कार कर दें सैं। किसान नै अपनी गुजर बसर करण की खातर जो सामान खरीदणा पड़ै उस खातर फालतू पीस्सा देणा पड़ै। ऊपर तैं खाद पै सब्सिडी घटा दी। अर डीजल की कीमत बधा दी। बिजली के रेट तै बढ़ा दिये फेर उसकी आपूर्ति तै नियमित कोण्या करी। सारे देश मैं मजबूरी मैं फसल घटे औड़ दामां पै बेचण की दर्दीली दास्तान सुनाई देण लागरी सैं। ईसा अजीबो गरीब वाक्या होवण लागरया सै जो आजाद भारत मैं ईब ताहिं अनजान था। आड़ै सस्ती कृषि जात चीजां के आयात की इजाजत दे दी गई सै जिस करकै कीमत गिरती जावण लागरी सैं। दूजे कान्हीं अपने देश मैं मौजूद नाज के भण्डारां नै कोए खरीदणिया कोण्या। कर्जदारी बढ़ती जावण लागरी सैं। बड़े पैमाने पै किसान अपनी जमीन तै हाथ धोवण लागरे सैं अर मजदूरां के गैहटे मैं शामिल होवण लागरे सैं। कई किसान तो आत्महत्या जिसा हताशा भरया कदम ठावण पै मजबूर हुए सैं। चारों कान्हीं तै हमला सै किसान पै अर इस संकट की जड़ सै यो भूमंडलीकरण। इस वैश्वीकरण की चाल के साहमी राज में बैठे लोगां नै तो कति गोड्डे टेक दिये लाग्गैं सैं।
पर इस संकट नै किसानां के संघर्ष मैं भी एक नई ज्यान घाली सै। उनके गुस्से का बहोतै जुझारू ढंग तै इजहार होवण लागरया सै। अफसरां, मंत्रियां अर आड़े ताहिं अक मुख्यमंत्रियां ताहिं भी नीं बख्स्या जान्ता। खबर सै अक राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कारवां पै पत्थर बरसाये अर छोह मैं आये किसानां नै एक जनसभा मां तै खदेड़ भी दिया था। चन्द्र बाबू नायडू नै कई जनसभावां मैं किसानां के प्रदर्शनां का सामना करना पड़या। पंजाब मैं भी किसानां ने मोरचा थाम्बया। हरियाणा मैं भी सुरसुराहट सै फेर जात ईबै पट्टी बांधरी सै। पहल्यां आले संगठन ठप्प से होगे अर गरीब अर मझोले किसानां के नये संगठन उभर कै आवण लागरे सैं। कवारी के असली हिम्माती मसले पै जुझारू संघर्ष जारी सै जिसमैं महिला भी शामिल सैं। पाले बन्दी होवण लागरी सै। किसानां के असली हिम्माती कूण सैं नकली हिम्माती कूण सैं ईबकै जरूरी बेरा लागज्यागा। घणे दिन काठ की हान्डी चढ़ी नहीं रैह सकदी।
एक बर एक कुम्हार कै दो छोरी थी। एक का ब्याह थोड़ी धरती आले कै कर दिया अर दूसरी का ब्याह बर्तन बणावण आलै कै कर दिया। साल पाछै कुम्हार की घरआली नै कहया अक बिमला अर कमला का बेरा तो लिया। कुम्हार चाल्या गया पहलम बिमला कै। हाल चाल बूझया। बिमला बोली - बाबू खेती सूकण लागरी सै, जै मींह बरस ज्यागा तो जी ज्यावैंगे। बाबू बोल्या - करैगा राम जी मेर सी। दूसरी छोरी कमला धोरै गया तो उसका हाल चाल बूझया। कमला बोली बर्तन बहोत थाप राखे सैं। जै मींह नहीं बरस्या तो जी ज्यांगे बाबू। बाबू बोल्या - राम जी मेर करैंगे। घरां आकै कुम्हार की घर आली नै बूझया अक के हाल सै छोरियां का। कुम्हार बोल्या - एक मरण मैं सै।
तो आई किमै समझ मैं अक नहीं? इन नकली नेतावां मैं तै अर किसानां मां तै एक मरण मैं सै। जै किसानां नै इन नकली नेतावां का असली रूप नहीं पिछाणा तो वे मरगे अर जै इन नकली नेतावां का असली चेहरा पिछणग्या तो ये नकली नेता मरगे। फेर यू पिछाण करण आल्या काम क्यूकर होवै अर कूण करैगा?
यू किसानां नै करना पड़ैगा। अर ज्यूकर जात का चश्मा तारकै ये जिब भैंस खरीदण जावैं सैं तो धार काढ़ कै देखैं सैं तो न्यों ए किसानी का चश्मा पहर कै इन नकली नेतावां की असली करतूत देखणी पड़ैगी। नहीं तै जात के चश्मे मैं इनका असली चेहरा साहमी कोनी आवै।