शनिवार, 15 जुलाई 2017

जात के ठेकेदारों की लीडरी के ओछे हथियार ये हथकंडे


जोंधन खुर्द में जो कुछ हुआ उससे सभी पढ़ा लिखा वर्ग वाकिफ है। इससे घटिया और पिछड़ी मानसिकता का प्रतीक शायद ही पिछले बीस साल मैं हरियाणा में देखने को मिलता हो। बहुत से गांव में महिलाएं जागरूक हुई हैं और अपनी बातें कहने के लिए मुंह खोला है उन्होंने। जोंधन खुर्द की इस घटना को पिछड़ी विचार व सोच वालों ने तो खत्म सी ही मान लिया। परन्तु यह खत्म होने वाली घटना या बात नहीं है। यह पिछड़े और अगाड़ी विचारों का संघर्ष है जो पहले भी समाज में चला है, आज भी चल रहा है और आगे भी जारी रहेगा। एक महिला गांव के एक पंचाती से कुछ सवाल जवाब इस बारे में करती है और क्या कहती है भला -
सन्तरा -
जोंधन खुर्द मैं के हौया मनै खोल बतादे सारी आज
पंचाती -
रिवाज तोड़ कै घणी पुराणी जात तारली म्हारी आज। (टेक)
वार्ता - दो गोतों में पांच सौ साल पहले यदि भाईचारे की कोई बात हुई थी तो इसका मतलब यह तो नहीं की वह पत्थर की लकीर हो गई। पहले बहुत सी बातें हम अज्ञानवश करते थे मगर अब ज्ञान का फैलाव होने के कारण हम उन्हें छोड़ रहे हैं। पहले दूसरी जात में शादी करना बहुत बुरा माना जाता था मगर अब हम कर रहे हैं। क्या ऐसा करने से कोई पहाड़ टूट पड़ा? सन्तरा गांव के पंचाती से पूछती है कि गांव में रोजाना बलात्कार हो रहे हैं तो इन पंचायतियों को सांप क्यूं सूंघ जाता है? तब गांव की इज्जत का सवाल क्यूं पीछे चला जाता है? गांव में सबसे ज्यादा जमीन पर कब्जा करने वाला जात बाहर क्यों नहीं किया जाता? गांव पंचायत का सारा पैसा हड़प कर जाने वाले लोगां का सामाजिक बहिष्कार ये पंचायतें क्यों नहीं करती? क्या कहती है भला -
दो गोतां का किमै जिकरया होया
खोल कै मनै बात बता
गामां के मां बलात्कार रोज़ाना
क्यों ना होती पंचात बता
पंचात होज्या तो छोरी नै
दाबैं करैं ठाडडे की हिमात बता
जमीनां पै नाजायज कब्जे
इनकी ऊंची क्यों जात बता
बीर मरद के रिश्ते पै ढाया
जुल्म कितना भारी आज
उनके हक मैं मत ना बोलै
बणकै सेठ कुठारी आज
पंचाती
वार्ता - सन्तरा के सवाल सुनकर पंचाती गांव की इज्जत की दुहाई देने लगता है और कहता है कि एक ही गांव में यदि शादियां होने लगेंगी तो गांव उजड़ जायेंगे तबाह हो जायेंगे। हमें गोत नात का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा ना। इस अधर्म के होते हुए कोई भी सच्चा इंसान कैसे चुप रह सकता है। यह पूरे जाट समुदाय का मामला था और दो गोतों के भाईचारे का सवाल था।
वह पंचाती क्या कहने लगा भला:
पुराने रूढ़िवादी विचार बता
क्यों मखौल उड़ावै म्हारा
म्हारे साहमी मत ना पड़ो
तम हौ ज्याओ नौ दो ग्यारहा
पाणी मैं बैर मगरमच्छ तै
थमनै पटज्या बेरा सारा
पांच सौ साल पुराणा इन
दो गोतां का यो भाइचारा
आपस मैं ब्याह रचा लिया क्यूं
अकल मारगी थारी आज
सही और नई-नई बातां की
जनता लेरी सै उडारी आज
सन्तरा -
वार्ता: सन्तरा पंचाती की बात सुणकर पूछती है कि तुम्हें अपनी कौम के गोत नातों की इतनी चिन्ता क्यों है? हमारे ही हरियाणा में जिस कौम में चाची और बुआ की लड़की से शादी करना गौरव समझा जाता है उस कौम का सामाजिक सम्मान पिछले पचास साल में बढ़ा है कम नहीं हुआ है। हमारी ही जाटों की कौम में गाम की गाम में बसने वाले गोतों में आज शादियों का रिवाज है जिसका जीता जागता उदाहरण चौटाला गांव है। इस जोंधन गांव के मामले पर ताऊ की चुप्पी बहुत अखरने वाली है। हमारी ही जाटों की कौम में पंद्रह बीस साल पहले तक नानी का गोत भी ऊकाया जाता था। मगर आज नहीं क्यों? नये बास में कुछ घर दहिया के हैं मगर वहां के मुख्य गोत के लोगों की शादियां दहिया में होती थी और हो रही हैं। भाई और बहिन दहिया में ब्याहे जाते रहे हैं वहां तो फिर जोंधन खुर्द में यह बवाल क्यों? सन्तरा पूछती है कि नानी का गोत ना ऊकाने का फैसला करने के लिए कौणसी पंचायत हुई थी? क्या कहती है भला-
कई कोमां मैं चाची बुआ के घर मैं
ब्याह कराया जावै
इसतै हटकै ब्याह होवै तो
छोरी मैं कोए खोट बताया जावै
आज किस फैसले तहत
नानी का गोत ना ऊकाया जावै
चौटाला गाम मैं आपस मैं क्यों
उड़ै ए ब्याह रचाया जावै
दुनिया चाँद पै जाली जोंधन
खुर्द पाछै जाती जारी आज
पंचाती -
वार्ता: पंचाती के पास कोई ठोस तर्क या बात नहीं मिलती संतरा के सवालों का जवाब देने के लिए। और हरियाणा का मर्द जब निरूत्तर हो जाता है तो वह मार पिटाई पर उतर जाता है। पंचाती भी जिद्द में आकर यही कहता है कि पंचात का फैसला सही है उसे अब नहीं बदला जा सकता। संतरा कहती है कि इस फैसले से वह पूरा परिवार तबाह हो जाएगा। रोजगार है नहीं, गांव से पंचायत ने निकाल दिया तो अब वह परिवार कैसे जिन्दा रहेगा? पंचाती जिद्द पे अड़ जाता है आर क्या जवाब देता है।
भाई बाहण की ढालां रहवैं
गाम नै फैसला सही सुनाया था
कुछ जात गोत बिगाड़ आगे
उननै फैसला यो उल्टाया था
बीर मरद बणे रहवैंगे
बहिष्कार का यो ठप्पा लाया था
रीत पुरानी बचा लई जिनपै
थमनै यो तीर चलाया था
सुणकै थारी बात संतरा मेरी
तबीयत होगी खारी आज
थारे इन पिछड़े विचारां नै
समाज की इज्जत तारी आज
सन्तरा
वार्ता: सन्तरा पंचाती से पूछती है कि क्या हाथ गल जाने पर मानव की जिन्दगी बचाने के लिए उसके हाथ को काट कर अलग नहीं कर दिया जाता? समाज विकास का दस्तूर है कि जो पुरानी चीजें आज प्रासंगिक नहीं हैं उनका खत्म होना लाजमी बात है उनके बारे में भावुकता से काम नहीं चल सकता। बैल की खेती थी हरियाणा में। बैल गऊ का जाया था तो कौन सी पंचायत में फैसला हुआ था कि बैल की खेती नहीं करेंगे और ट्रेक्टर की खेती किया करेंगे? यह पंचायत क्यों चुप रही उस वक्त और अब बखेड़ा खड़ा कर रही है। क्या पूछती है भला -
इतना खयाल राखिये पंचाती
पुराणा सही ना होता सारा
हाथ जै गल ज्या जा तो
पूरे शरीर नै खतरा होज्या भारया
सौला हाथ भी पड़ज्या
काटना चाहे हो कितना ए प्यारा
कानून भी म्हारा साथी सोच ले
भूंडा सै जेल का नजारा
रणबीर सिंह बरोने आले की
या कलम पुकारी आज
मनै थारी बात ठीक लागती
पर जागी रोटी मारी आज
पंचाती -
वार्ता - संतरा थारी सारी बात ठीक सै फेर भी गोत नात का मामला इबै चालैंगा। काल अखबार मैं थी अक श्योरान खाप में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है और लोग इकट्ठे हो रहे हैं। संतरा कहती है कि ये वे जात के ठेकेदार कट्ठे हो रहे हैं जो मेडिकल में आने के बाद खून चढ़वाते हुए उन खून देने वाले की जात के बारे में कभी तहकीकात नहीं करते। ऐसे लोगों ने अपनी लीडरी चमकाने के लिए हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करने का ओछा काम अपने हाथ में लिया हुआ है और इसमें सबसे ज्यादा उत्पीड़न महिलाओं का किया जा रहा है। देखना यही है कि हमारी राजनेता और हमारा कानून कब तक चुप्पी साधे रहता है।
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रै आर्यभट नै क्यों भूलगे ?


सते, फत्ते, नफे, कविता, सरिता, सविता, आये शनिवार की ढालां ईबकै बी धापां की बैठक में कट्ठे होगे। बात सत्ते नै शुरू करी अर बोल्या - नफे सिंह भाई के रहया थारे उस मामले का। नफे बोल्या - के रहया छोरा छोरी का तो बेरा नहीं पाट लिया अर पंचायत नै दोनूं घरां का होक्का पाणी बंद कर दिया अर पिटाई करी। दोनूं घर-गाम छोड़गे। सरिता बोली - फेर न्यूं गाम की गाम मैं क्यूंकर काम चालैगा? सविता बोली - चौटाला गाम के गाम मैं जिब ब्याह होवण लागरे तो म्हारे गामां मैं क्यूं नहीं हो सकदे? फत्ते बोल्या - बात तो बिचार करण की सै। जिस बात नै आपां इतनी घटिया मानां सां उसे बात नै करणिया गाम नै हरियाणा ताहिं दो मुख्यमंत्री अर एक डिप्टी प्राइम मिनिस्टिर दिया सै। पुरानी परंपरावां नै बी आज एक बै हटकै सोच्चण का अर उनपै बिचार करण का बख्त तो आ ए गया। सविता बोली - याहे तो कमजोरी सै म्हारी। सत्ते बोल्या - आर्यभट्ट प्राचीन भारत का पहला गणितज्ञ-ज्योतिषी था जिसनै पूरी दुनिया ताहिं जीरो का ज्ञान दिया। आर्यभट की सबतै बड्डी बात या थी अक उसनै भूभ्रमण का सिद्धांत सबतै पहलम भारत मैं दिया। नफे बोल्या - होगा इसका म्हारे तै के लेना देना?
सत्ते बोल्या - यू ए तो रोला सै। हम प्राचीन संस्कृति, प्राचीन परंपरा की बात करां अर उसके बारे मैं जानकारी जीरो हो तै हमनै कोए बी भका सकै सै इस पुरानी परंपरा के नाम पै। अर सबतै दिलचस्प बात आर्यभट के बारे मैं या सै अक जो कुछ आर्यभट नै अपणी किताब मैं कहया उसनै तोड़-मरोड़ कै पेश करण की बहोत कोशिश करी। आर्यभट के ग्रंथ मैं जड़ै-जड़ै भूः अर कु (पृथ्वी) शब्द थे उड़ै-उड़ै वे भं (तारामंडल) मैं बदल दिया गया। दूसरी बात या सै अक उसके ग्रंथ की हस्त लिपियां देश के अधिकतर भागां मैं तै गायब कर दी। उसकी बातां का जिकरा दूसरे बुद्धिजीवियां नै भी करना बंद कर दिया। लोकभय के कारण भास्कर प्रथम (समकालीन या बाद के बुद्धिजीवी) अर दूसरयां नै भी आर्यभट के नये सिद्धांतों की व्याख्या भिन्न प्रकार तै करी।
सोच्चण की बात सै अक यू लोकभय किन लोगां का था? यू भय समाज के उस हिस्से का था जिसके हित साधन मैं आर्यभट का भू-भ्रमण का सिद्धांत बाधक बनकै खड़या होग्या था। यू वर्ग था पुरोहित वर्ग, जिसका हित वेदां, धर्म शास्त्रां अर आर्यभट के एक दो सदी पहलम तैं लिखी जावण लागरी नयी नयी पुराण पोथियों के वचनां की रक्षा के साथ जुड़या औड़ था। आर्यभट का नया भूभ्रमण का सिद्धांत पुरानी मान्यताओं का खंडन करै था। वेदां के अर धर्मशास्त्र के हवाले दे कै ‘अचला’ मतलब ‘पृथ्वी’ का जो लोक विश्वास कायम करया गया था उसनै टिकाए राखण मैं सबतै फालतू हित पुरोहित वर्ग का था। इसे करकै समाज के इस प्रभावशाली वर्ग नै आर्यभट के भू-भ्रमण के सिद्धांत का हर तरियां तै विरोध करया। फेर आर्यभट के सिद्धांत का यूरोप मैं भी प्रसार हुया अर उड़ै कोपर्निकस का सूर्य केंद्र सिद्धांत भी उभर कै आया अर ब्रूनो नाम के बुद्धिजीवी नै घूम-घूम कै यूरोप के नगरां मैं इसका प्रचार करया। रोम के ईसाई धर्माचार्यां के हुकम तै 1600 मैं ब्रूनो को जिन्दा जला दिया गया। आर्यभट के सिद्धांत का भारत मैं विरोध अर यूरोप मैं ब्रूनो का जलाया जाना एकै बात सैं। फत्ते बोल्या - सरिता आई किमै समझ मैं सत्ते की बात अक नहीं? सरिता बोली - समझ मैं आवण की हो तै आवै। सविता बोली - आर्यभट का उदाहरण दे कै सत्ते न्यूं कहणा चाहवै सै अक नये विचार का विरोध हमारे समाज की पुरानी परम्परा मैं भी था चाहे आगै चाल कै उस नये विचार नै कितनाए समाज का भला करया हो। आज यू जो अंतरजातीय ब्याह का मामला सै यू एक नया विचार सै। इसे तरयां गाम की गाम मैं ब्याह का मामला सै। सत्ते का कहवण का मतलब सै कि ये आज के छोरा छोरी तो आर्यभट सैं अर ज्यूकर आर्यभट का विरोध पुरोहितां नै करया वेदां का हवाला दे कै, न्यौए ईसे ब्याहयां का विरोध ये तथाकथित सामन्ती सोच के माणस वेदां कै, पुरानी परंपरा के हवाले दे कै करण लागरे सैं इस पर।

के धरया इन बात्तां म्हं, जिब पत्ते ले लिए हात्था म्हं


हरियाणा के एक गाम का किस्सा है। इस गाम का कोए भी नाम हो सकै सै। मान लिया इस गाम का नाम रामपुर सै। इस गाम की आबादी 2000 के लगभग सै। इसमैं 35 प्रतिशत जाटां के घर सैं, जिनमैं 16 गोतां के लोग शामिल सैं। इनै गोतां मां तै एक गोत के नाम तै यू गाम गुहांड मैं जाण्या जावै सै। बाकी पन्दरा गोत इस गोत के मातहत सैं ज्यूकर कबील्यां मैं सारा कबीला कबीले के सरदार के मातहत हुया करदा। बाकी बाहमणा के गोतां का कोए जिकरा ना, दलितां के गोतां की कोए बूझ ना पर बिचारे कुम्हारां नै अर धानक भाइयां की तो बूझ करै ए कूण था। जबकि 15 प्रतिशत जनता ब्राह्मण परिवारां तै सै अर 26 प्रतिशत लोग दलित भाई सैं। दस प्रतिशत के लगभग पिछड़े वर्ग के लोग बी सैं। छह सात घर पंजाबियां के बी सैं अर तीन घर मुसलमानां के सैं। कुछ परिवारां नै छोड़ के जाटां के घरां मैं ईब टयूबवैल के पानी के कनैक्शन आगे।
इन परिवारां नै पानी की खात्तर ईब डिग्गी के पानी के नलक्यां पै घंटों पानी के आवण का इंतजार कोनी करना पड़ता। ईब तो कुछ परिवारां की भैंसां की बी चान्दी होगी। गाल मैं ए नहवाई जावैं सैं। गरीब जाट परिवारां धोरै पानी का यू जुगाड़ कोन्या। उन धोरै कनेक्शन के 4000 कै पांच हजार रुपइये कोन्या। आए मिहनै दो सौ तीन सौ रुपइये खर्च बी उन धौरै कोन्या। कुछ परिवारां नै खाते पीते परिवारां धोरै एक घंटे पानी के 50 रुपइये मिहना के हिसाब तै पानी ले राख्या सै। गाम के बहोत से घर अर खास करकै दलित अर कमजोर तबक्यां के लोग सैं जिननै के तो डिग्गी के पानी तै काम चलाना पड़ै सै अर कै नलके के पानी तै अर कै एकाध कुआं बचरया हो तै उसके पानी तै।
डिगियां का जो हाल सै वो सबनै बेरा से। जंगल के हाथ बी उसमैं धौवैं, डांगर बी उसमैं नहावैं, मरे औड़ कुत्ते उसमैं पड़े रहवैं अर और बेरा ना के के। धरती तै तले के पानी का बी सत्यानाश करण मैं कसर नहीं रैहरी। हमनै रासायनिक खाद अर कीटनाशक दवाईयां तै खेत जमा आंट दिये। ये कीटनाशक धरती तले के पानी नै भूंडी ढाल खराब करण लागरे सैं। इस धरती तै तले के पानी करकै बी गाम के हर घर मैं खाज, कालजा दुखना, पेट का दर्द, खांसी बरगी बीमारी पलाथी मारकै बैठगी। कई बै तो पानी दो तीन किलोमीटर तै ल्यावणा पडै़ सै। कमजोर परिवारां की महिला कै बालक अपने-अपने बर्तन ठाकै पाणी ल्यावंते पा ज्यांगे। कई गामां मैं तो धरती तै तले के पाणी का चौआ भी तले नै ए जावण लागरया सै। ये पाणी प्यावण आले ट्यूबवैल कदे बी बैठ सकै सै फेर पाणी कित तै आवैगा गाम मैं, या किसे की चिन्ता कोन्या। बिसलेरी का पानी खरीदण का ब्यौंत नहीं अपने पाणी का ख्याल नहीं, ठीक सै गेर रै पत्ता गेर, इस खूंटा ठोक की तो आदत होरी सै, हमनै बिसरावण की। दस्तां मैं, पेट दरद मैं, खांसी मैं डॉक्टर कै म्हिने के दौ सौ चार सौ रुपइये पूज के आवण मैं कोए एतराज नहीं, फेर खूंटा ठोक की बिना पीस्से की सलाह मानन ताहिं फुरसत कोन्या ताश खेल्लण तै। ठीक सै। इन टयूबवैलां का पानी टैस्ट तो करवा कै देखल्यो हो सकै सै इस खाज अर पेट दरद का कारण इसमैं पाज्या।
हम बदेशी कम्पनियां के घर भरण लागरे सां अपनी कमाई तै। बिशलेरी का पानी बदेशी कम्पनी का, सबमरसिबल पम्प सैट बदेशी कम्पनी का, कीटनाशक बदेशी कम्पनी का, शरीर म्हारा, अर बीमारी म्हारी फेर इन बीमारियां खात्तर दवाई बदेशी कम्पनियां की। हम फेर बी ताशां पै बैठे न्यो कैहद्या सां म्हारै ये बदेशी के सेहद करैं सैं? अर यो बुश इन कम्पनियां का सरदार। यो हटकै फेर आग्या अमरीका का राष्ट्रपति बणकै अर हम फेर कैह द्यां सां आग्या तो आग्या हमनै के लेना-देना इसतै। मेरे बीरा लेना देना सै। म्हारे पानी के प्रदूषण तै, म्हारी पेट की बीमारी तै इसका लेना-देना सै। किल्ला एक खरीद के सारे गुहांड के पाणी पै बी कब्जा कर लिया अर हम बैठे-बैठे कहवां सां ‘‘गेर रै गेर पत्ता गेर, के समाधान हो इसका’’? पहली बात तो इन बातां पै आप्पां सोचना शुरू करां। हरियाणा मैं छह हजार तै फालतू गाम सैं। एक जवाब तै सारे गामां का काम कोन्या चालै। छह हजार गामां नै अपने-अपने ढंग तै सोचना पड़ैगा।

अपनी मर्जी का मतलब


सत्ते, फत्ते और नफे, कविता, सविता अर सरिता धापां की बैठक मैं शनिवार की सांझ कै फेर कट्ठे होगे। नफे का मुंह किमैं उतरया उतरया सा था। सत्ते बोल्या - के बात नफे आज किमै ढीला-ढीला सा नजर आवै सै? इतना उदास तो नफे कदे बी कोण्या देख्या। बस कविता का तो न्यों कैहणा था अर नफे तो फफक-फफक कै रो पड़या। सारे हैरान अक या के बणी? फत्ते बोल्या - भाई नफे बात बता किमै तो जी हलका होवैगा। नफे बोल्या के बताऊं बूझै मतना। ओ छोटना भाई नहीं सै सज्जन, उसनै पुलिस पाकड़ लेगी अर उसकी बहोत पिटाई करी। बिना बात पुलिस नै पीट्या या तो माड़ी बात सै नफे, सरिता बोली पर बिना बात पुलिस क्यों पीट्टण लाग्गी। नफे बोल्या ओ सज्जन अपणी बुआ कै जा रया था गाछरौली। उड़ै म्हारी बुआ का छोरा सै श्यामलाल उसपै गाम आल्यां नै इल्जाम ला राख्या था अक पड़ौस की गोसाइयां की छोरी भजा लेग्या श्याम लाल। सरिता बोली - गाम की गाम मैं यू काम बहोत माड़ा करया श्याम लाल नै। नफे बोल्या फेर आगै तो इसतै बी माड़ी बात हुई। सत्ते बोल्या के बात हुई? नफे बोल्या श्यामलाल के बाबू गणेशी नै अर श्याम लाल के छोटे भाई नै अर मेरले छोटे भाई सज्जन नै पुलिस पाकड़ कै लेगी। थानेदार न्यों कहवै था अक इनकी मिलीभगत तै भजा कै लेग्या सै श्यामलाल छोरी नै। सरिता बोली, जिसकी छोरी चाली गई वो फिकर तो करैगा अर न्यों बी चाहवैगा अक या तावली सी पाज्यां। कविता बोली - श्यामलाल की उमर कितनी सै? नफे बोल्या - उसकी बी 20-21 बतावैं सैं। कविता के मुंह तै एक दम लिकड़ग्या जिब मियां बीबी राज्जी तो के करैगा काज्जी। नफे सिंह बोल्या - ले मनै राम की सूं उननै कति नहीं बेरा था उनका अक वे कित चले गये।
सविता फेर पुलिस आले उननै क्यों पाकड़ कै लेगे? नफे बोल्या - पूछताछ खातर थाणे मैं बुलावैं तो देखी जा। थानेदार नै तो म्हारा फूफा उन बालकों कै साहमी उघाड़ा करकै पुलिसिया पिटाई करी छिककै। बालक बोले तो वे दोनूं बालक बी धुन दिये। नफे सिंह बोल्या - जिब ऊपरले अफसरां धोरै गए तो उननै बी सीधे मुंह बात कोण्या करी। उननै अपणे निशान दिखाये अर थानेदार कै खिलाफ कार्यवाही की मांग करी। फेर गाम का सरपंच अर और गाम के छटैल एसपी कै जा पेश हुए थानेदार के हक मैं। एसपी बी करै तो के करै? सत्ते - एसपी नै तो सही बात की तरफदारी करनी चाहिए थी। सविता बोली - ईब पहलम आले अफसर कड़े रैहरे सैं? नफे सिंह बोल्या - उनका मैडिकल करवावण खातर बी कोर्ट की शरण मैं जाणा पड़या। डाक्टरां नै बी कई बै मसकोड़े से मार कै पर्चा काट्या। पर्चा कटग्या तो पुलिस नै केस दर्ज नहीं करया। उल्टा पुलिस नै दूसरी ढालां का दबाव और बनाना शुरू का दिया। ईब पुलिस कै खिलाफ इस्तगासां करां तो इतना फूफां का ब्योंत कोण्या पीस्यां का। ऊपर तै गाम की इज्जत कै बट्टा लावण के नाम पै रोज गाम मैं पंचायत होवण लागगी। पंचायत नै कहया अक कै तो छोरे छोरी नै इनके मां बाप पेश करैं नहीं तो इनका हुक्का पाणी बंद करांगे। कविता बोली - नफे एक दिन जनवादी महिला समिति का बी किमै ब्यान था अक बालिग छोरा छोरी सैं जे वे अपणे हिसाब तै ब्याह करकै रैहणा चाहवैं सैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत देवै सै तो गाम आल्यां नै बीच मैं रोड़ा नहीं बनना चाहिये।
नफे बोल्या - समिति आली बहनजीयां करकै तो उनका डाक्टरी पर्चा कट्या ना तो हमनै के राह पावै था। भला हो उनका। फेर गाम आले ये पंचायती तो उनकै बी खिलाफ होरे सैं। सते बोल्या - लुहार के छोरे नै अर गोसाई की उसे गाम की छोरी नै साथ रैहवण का मन बना लिया तो इसपै कई सवाल खड़े हों सैं। इन सवालां पै बहस होनी चाहिये अर उनकै खिलाफ पंचायत जो फतवे जारी करैं सैं उनपै प्रशासन नै हरकत मैं आणा चाहिये। पुलिस नै बेकसूरां की पिटाई करी उसपै पुलिस कै खिलाफ एक्शन हो अर छोरा छोरी ताहिं प्रशासन नै सुरक्षा देनी चाहिए ना तो ये तालिबानी दिमाग उननै फांसी दिये पावैंगे।

हमनै तो ताश खेल्लण तैए फुर्सत कोन्या


            हरियाणा मैं आज के दिन महिलावां की जिंदगी तनाव, असुरक्षा, अभाव अर असहायता मतलब लाचारी मैं डूबती जावण लागरी सै। कोए कैह सकै सै महिलावां नै खेलां मैं खूब खंबे गाड़ दिये। पर वे इस करकै नहीं गाड़ पाई अक हमनै गामां मैं खेलण कूदण का उन ताहिं कोए माहौल बणा कै दिया हो, वे अपणी खुबात तै जीत ल्याई मैडल। औरत पै तो शिंकजा और मजबूत होन्ता आवै सै। स्त्री भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, इज्जत के नाम पै हत्या का ग्राफ ऊपर नै जावण लागरया सै। यौन उत्पीड़न, बलात्कार, डराना, धमकाना, घरेलू हिंसा, औरतां का अपमान, असुरक्षा अर घुटन इस हद ताहिं बधगी कि लोगां नै न्यूं मान लिया अक ये तो आम बात सैं। आर्थिक संकट दरवाजे पै आण खड़या हुया अर परिवार टूटते जावण लागरे सैं। जीवन के साधन बचे नहीं तो खुली-छुपी वेश्यावृत्ति कान्हीं भी औरत अकेली जावण लागरी सैं। ईब गामां मैं भी इस वेश्यावृत्ति नै तेजी तै अपणे करतब दिखाने शुरू कर दिये।
अराजकता अर मनमानेपन का जो माहौल आड़ै बण्या सै उसमैं महिलावां नै ‘सस्ते मैं उपलब्ध’ अर ‘आसानी तै उपलब्ध शिकार’ की शक्ल मैं देख्या जावै सै। इस आर्थिक असमानता और सामाजिक असमानता के चालते ताकतवर तबके महिलावां की गेल्यां कुछ बी कर सकैं सैं। कुल मिला कै सौ का तोड़ यू सै अक महिलावां का अवमूल्यन हुया सै। गरीब तै गरीब तबक्यां मैं भी अपणे समुदाय अर परिवार के बीच मैं इन महिलावां पै अत्याचार बढ़ै सैं। औरतां नै ‘क्षणिक मजे’ की चीज की ढालां देखना अर इस मजे की खातर इन औरतां ने मौका लागते की साथ घेर लेना बड़ी आसान बात होगी। पाछले दिनां मैं हरियाणा मैं परित्यक्ताओं अर औरतां की साथ संबंधां मैं धोखाधड़ी बहोत बधी सै। ब्याह के दो दिन पाछै के कुछ दिन बाद लड़कियां नै छोड़ देवण की घटना बधण लागरी सैं।
दूजै कान्हीं लिंग अनुपात मैं विषमता के कारण, लड़कियाँ दूर-दूर तै खरीद कै ल्याई औरत पसंद नहीं आई तो उसनै उल्टी छोड़ आये अर उसकी बाहण नै लियाये उसकी जागां। ईब तै औरतां की खरीद फरोख्त के धंधे मैं दलाल बी पैदा होगे। या खरीद फरोख्त तेजी तै रफ्तार पकड़ण लागरी सै। जिब औरतां के हक मैं बोलणिया माणस कै संस्था दीवा लेकै टोहें भी पावणे मुश्किल सैं। हरियाणा के समाज मैं संघर्ष करण आली महिलावां की खातर ‘सपोर्ट सिस्टम’ की जरूरत सै। परित्यक्ताओं, एकल मांओं, अविवाहित महिलाओं, यौन उत्पीड़न की शिकार उजड़ी औड़ महिलाओं, बच्चियों की जरूरतों नै ध्यान मै राख कै समझ कै समाज मैं उनका स्थान बनाना बहोत जरूरी होग्या सै। शार्ट स्टे होम, कामकाजी महिला होस्टल, लड़कियों के होस्टल, मुफ्त जच्चा बच्चा केन्द्र, कानूनी सहायता केंद्र, सलाह केंद्र, तनाव मुक्ति केंद्र, मनोचिकित्सा केंद्र, कौशल विकसित करण आले कार्यक्रम, एकल मांओं के बच्चों की शिक्षा के लिए अनुदान और कर्ज की सुविधा, महिला स्वास्थ्य केंद्र, व्यायामशालाएं, सामूहिक रसोईघर, हिंसा की शिकार महिलावां की खातर कानून अर स्वास्थ्य से संबंधित आपातकालिक व जल्द सेवाओं की मांग समाज मैं ठावणी बहोत जरूरी होगी। ज्योण बी जड़ै सै उसनै इसे सपोर्ट सिस्टम के खड़या करण मैं आपणी मदद जरूर करनी चाहिए अर सरकार पै भी दबाव बढ़ाणा चाहिए इस सपोर्ट सिस्टम के विकास की खातर।
हरियाणा मैं पढ़े लिखे लोगां मैं लिंग अनुपात एक हजार पुरुषों मैं छह सौ सतरह महिलावां का पहोंच लिया था एकबै। या खतरे की घंटी बाज ली हरियाणा मैं, पर लोगों नै ताश खेलण तै फुरसत कोण्या, कै गाल की दो फुट जमीन पै कब्जा करण की जुगाड़ बाजी मैं सैं। इन सारी बातां पर गाम अर शहर के लोगां नै अर महिलावां नै गंभीरता तै सोच्चण की जरूरत सै।

असली पुलिस ?


कर्म सिंह नया-नया पुलिस असफसर बन्या था। उसके मन मैं देश प्रेम अर दिल मैं ईमानदारी थी। जनता की सेवा करना वो अपना धर्म समझया करता। एक दिन पड़ौस के एक गाम का लड़का भाजता भाजता आया। उसनै देख कै कर्म सिंह नै बूझया - के बात? इतना क्यूं हांफै सै बेटा? लड़का बोल्या - जल्दी चालो थानेदार साहब, मेरे घर मैं चोरी होगी। कर्म सिंह सैड़दे सी उसकी गेल्यां चाल पड़या।
कर्म सिंह गाम मैं आकै एक बूढ़े तै बूझण लाग्या - बोल्या - हां बाबा जी थारे तै बूझूं सूं चोरी कद हुई? इतनी सुणकै बूढ़ा गिड़गिड़ावण लाग्या अर बोल्या - माफ कर दयो साहब। लड़का नादान सै। इसी गलती फेर कदे नहीं करैगा। जै मैं होन्ता तो हरगिज रिपोर्ट नहीं करण देन्ता अर ना आप नै इतनी तकलीफ होन्ती। कर्म सिंह हैरान होकै बोल्या - या बी के बात कही बाबा जी? जै आप चोरी की रिपोर्ट नहीं करोगे तो हम चोर नै किस तरियां पकड़ैंगे? आप न्यों बताओ अक चोरी मैं के के गया। बूढ़ा बोल्या - छोड्डो नै साहब क्यूं खामैखा परेशान होवण लागरे सो। ल्यो दूध पीओ। दूध का गिलास बूढ़े नै हाथ मैं ले कै कहया। कर्म सिंह बोल्या - ना मैं तो ईब ड्यूटी पै सूं अर मैं कुछ नहीं ल्यूंगा। बाबा जी थाम खड़े क्यों सो बैठ जाओ। कर्म सिंह की बात सुणकै बूढ़ा आसपास के लोगां गेल्यां कुछ काना फूसी करकै अर फेर कर्म सिंह धोरै आकै हाथ जोड़ कै बोल्या - साहब कुछ रुपये राखल्यो अर इस बात नै आडैए रफा दफा करद्यो। मैं मानूं सूं थामने बहोत तकलीफ होई सै। आपका इतना कीमती बख्त बरबाद हुआ। यू उसै का हर्जाना सै। कर्म सिंह बात सुणकै चकरा ग्या फेर अपने आप नै सम्भाल सी कै बोल्या - बाबा थारी बात मेरी समझ तै बाहर सै। रुपइये क्यूं ल्यूं? हमनै सरकार तनख्वाह क्यां नाम की देवै सै। कर्म सिंह के न्यों कहवण की देर थी अर बूढ़ा चिल्लाया - क्यूं भाइयों ईब बी कोए शक की गुंजाइश सैके? पकड़ल्यो इसनै अर कसकै रस्सी गेल्यां जूड़दयो। माड़ी सी वार मैं लोगां नै कर्म सिंह जूड़ दिया। बूढ़ा बोल्या - यू कोए ठग सै। यो पुलिस का आदमी हो ए कोनी सकदा। बूढ़़े नै एक छौरे ताहिं कह्या - जा तावला सा असली पुलिस आले नै बुलाल्या। कर्म सिंह बोल्या - अरै मैं ए सूं पुलिस आला। बूढ़़ा गुस्से मैं बोल्या - बहोत हो लिया तेरा नाटक। अरै मैं तो तनै जिबै पिछाण गया था जब तनै मेरी ताहिं बाबा कहया। पुलिस आले इसे थोड़े ए ना हुआ करैं। थोड़ा सी वार मैं पुलिस आला पान चबाता हाथ मैं डंडा घुमान्ता आया अर कर्म सिंह नै रस्सी मैं बंध्या देख के गुुस्से मैं बोल्या - क्यों बे स्साले बूढ़े इन्हें क्यों बांध राख्या सै? गाली सुनते की साथ बूढ़ा बोल्या - यो सै असली पुलसिया। कितने वार तैं बाबा-बाबा करण लागरया सै। उसनै सोच्ची पुलिस की ट्रेनिंग अधूरी रैहगी लागै सै। यो सब देख कै कर्म सिंह कै तो सन्नपात सा मारग्या। उसनै सोच्ची अक पुलिस की ट्रेनिंग अधूरी रहेगी पूरी कोना हुई। उस दिन पाछे ओ एक महीने की छुट्टी पै घरां चाल्या गया। कर्म सिंह ईब रोज अपणे बड़े बुजुर्गों नै उनकी तसबीर कै साहमी बैठ कै गाली देन्ता। उसनै सोच समझ कै अपने दोस्त के घर मैं गांजा धर दिया अर दूसरे दिन पुलिस बुलवा कै उस ताहिं नशीली दवा राखण के जुर्म मैं पकड़वा दिया अर तीस हजार रिश्वत के चढ़वा कै उसका केस रफा दफा बी करवा दिया। किसे का शक उसपै नहीं गया। उस दिन कर्म सिंह नै सोच्ची अक आज मेरी पुलिस की ट्रेनिंग पूरी होई सै। जनता के सोच्चण की गड़बड़ करकै आच्छे बीच्छे माणस बी अपनी राह बदल ज्यावैं सैं। इस करकै जनता का चौकस होना बहोत जरूरी सै। यो बी जरूरी सै अक चोर लोग साह का रूप धारकै जिब आवैं तो हाम उनकी पिछाणै ना कर सकां। दूसरी बात म्हारे पुलिसिया भाइयां की बी सोच्चण की सै, अक वे असली पहलम आले कर्म सिंह नै मानैं सैं अक बाद आले कर्म सिंह नै?

सर्वनाश करने वाले अब निर्माण करेंगे इराक में


अमरीका ने अपनी फौजों द्वारा इराक पर एक तरफा हमला किया। इसको इसमें ब्रिटिश सरकार का समर्थन व सहयोग भी प्राप्त था। इस हमले और कब्जे का सबब यह था कि अमरीका और ब्रिटेन इस अरब देश इराक से बहुत खतरा महसूस करते रहे हैं। यह एक ऐसा झूठ व मनगढंत दावा है जैसा कि मालदीप से हमला होने के डर के बहाने भारत मालदीप पर हमला करदे। नोम चोमस्को ने कहा है कि चुनाव में बुश के प्रशासन को अमरीकी जनता धाराशायी कर देती यदि सामाजिक और आर्थिक मुद्दे चुनाव में प्राथमिकता पर रहते तो, मगर बुश की सरकार ने इन मुद्दों को पीछे धकेल दिया और सुरक्षा के मुद्दों को उभारकर लोगों को प्रभावित किया। लोग ताकत की छतरी के नीचे खींच लिए गए।
महज एक सामाजिक मुद्दे को विस्तार से विश्लेषित करने पर ही बुश के प्रशासन की चाल की पोल स्पष्ट रूप से खुलकर सामने आ जाती है। उदाहरण के लिए यदि शिक्षा के मुद्दे को ही लें, तो इसी से काफी कुछ तोड़ खुलासा हो जाता है। दुनिया के इस सबसे अमीर देश में यह एक शर्मनाक सच्चाई है कि 280 मिलियन की जनसंख्या में से 40 मिलियन से ज्यादा लोग नहीं पढ़ सकते, वे मुश्किल से अपना नाम अटक-अटक कर पढ़ सकते हैं, 50 मिलियन लोग पांचवीं की किताब ही पढ़ सकते हैं और 60 मिलियन लोग ऐसे हैं जो आठवीं से आगे की किताब नहीं पढ़ सकते। वहां की शिक्षा प्रणाली ने इतना गलत माहौल बना दिया है कि 96 प्रतिशत लोगों में अपना दिमाग लगाकर इस प्रकार के गंभीर मुद्दों पर दिमाग लगाकर, सोच कर सही नतीजों पर पहुंचने की क्षमता ही नहीं विकसित हो सकी है।
काले अमरीकनों को, जो कि 15 प्रतिशत हैं उचित शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण इनमें से 44 प्रतिशत अनपढ़ हैं। भूख, आवास, इलाज आदि पर सोचकर समाधान ढूंढने का काम लोगों को सौंप दिया जाए तो इन मुद्दों के समाधान के लिए निष्कर्षों पर नहीं पहुंचा जा सकता। ऊपर से खास ढंग से लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने की बुश की यह सोची समझी चाल थी। जिसका शिकार अमरीकी जनता हुई। सन् 1980 के दौर में भी रीगन व सीनियर बुश ने ऐसी नीतियों का पालन किया जो आम अमरीकी नागरिक के खिलाफ जाती थीं। मगर लोगों में भय पैदा करके उन्होंने अमरीकी नागरिकों को नियंत्रण में रखा। अमरीकनों को बताया गया कि निकारगुआ की फौजों को टैक्सास से चलकर अमरीका पर कब्जा करने के लिए दो दिन का समय काफी है। प्रशासन द्वारा अमरीकनों को यह बताकर भी डराया गया, कि ग्रेनेडा के एयर बेस से रशियन उन पर हमले करेंगे।
इराक पर हमले का एक और कारण यह भी है और वह है अपने आप में पूंजीवाद। चीजों के उत्पादन की क्षमता तथा लोगों की चीजों का इस्तेमान कर पाने की क्षमताओं के बीच गहरा अंतर्विरोध है। इस अंतर्विरोध के चलते इस व्यवस्था में आर्थिक संकट से उभरने के लिए युद्धों व इस प्रकार के एकतरफा हमलों का सहारा लेना एक अनिवार्य पहलू है। जब बड़े और ज्यादा कीमत वाले मिल्ट्री के उपकरणों का इस्तेमाल युद्धों में होता है तो व्यापक पैमाने पर ये हथियार व उपकरण युद्ध में नष्ट होते हैं। तभी तो इन उपकरणों व हथियारों के बनाने वाले कारखानों को और अधिक सामरिक हथियार व उपकरण बनाने का अवसर मिलता है। इसी प्रकार जब हजारों इमारतें तथा आवासीय स्थान तबाह होते हैं तो इनसे पूंजीवाद के ठेकेदारों को कंस्ट्रक्शन करने और ठेके मिलने का रास्ता साफ हो जाता है। इसलिए जब सैकड़ों हजारों इराकी इराक में मारे गये तो सभी पूंजीवादी देशों में पूंजीपति अपने हाथ इस उम्मीद में रगड़ रहे हैं कि उन्हें बहुत से ठेके मिलेंगे। इस सबके बावजूद इस हमले ने पूरी दुनिया में लोगों ने भारी प्रदर्शनों के माध्यम से दबाव बनाकर अपने देशों की सरकारों को बुश और ब्लेयर के खिलाफ पोजीशन लेने पर मजबूर किया है। यही वह दूसरा ध्रुव (पोल) है जो सोवियत यूनियन के ढहने के बाद उभर कर आया है। यह एक सच्चाई है कि यदि हम चुंबक की छड़ी को तोड़कर दो हिस्से कर देते हैं तो उनकी पोलेरिटी खत्म नहीं हो जाती। दोनों टुकड़ों में नये पोलों का निर्माण हो जाता है। यह डायलैक्टिस का सिद्धांत है। इराक पर अमरीका और ब्रिटेन के द्वारा किए गए हमले ने एक नई संभावना को जन्म दिया है, फासीवादी पूंजीवादी विश्व में इसके वर्चस्व के खिलाफ दुनिया के लोगों की एकता।
एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात और है वह यह है कि अमरीका की कुछ संस्थाओं ने अनुमान लगाये हैं कि इराक पर हुए इस हमले में 100 अरब डालर से लेकर 200 अरब डालर तक का खर्च होने के अनुमान लगाए हैं। यदि हम सबसे नीचे के आंकड़े को भी लेकर चलें तो यह 100 अरब डालर की रकम बराबर है - जर्मनी के कुल संघीय बजट के 40 फीसदी हिस्से के सौ-सौ डालर के नोट एक के ऊपर एक रखें तो 100 किलोमीटर ऊँची गड्ढी बने। के-12 शिक्षा पर अमरीकी संघीय सरकार के कुल खर्च से तीन गुणा के1 अमरीका के अंतरराष्ट्रीय मामलों से संबंधित बजट के चार गुणा से ऊपर के। अमरीका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ई.पी.ए.) के बजट से 12 गुणा के1 या यों भी कहा जा सकता है कि इस सौ अरब डालर से अमरीका या ब्रिटेन में बनाए जा सकते हैं एक लाख पैंतालीस हजार किंडर गार्डन इस समय जर्मनी में 2 लाख बच्चों के लिए किंडर गार्डन सुविधा की कमी है।
अमरीका में तमाम एक करोड़ दस लाख गैरबीमित बच्चों के लिए पांच वर्ष के लिए स्वास्थ्य बीमा, अमरीका में एक करोड़ 40 लाख से ज्यादा बच्चों के लिए स्कूल-पूर्व तैयारी स्तर का प्रबंध, अमरीका में जितने स्कूलों के निर्माण की जरूरत है उनमें से लगभग हरेक का पुनर्निर्माण। अमरीका के चार लाख छात्रों के लिए एक सौ तेईस वर्ष की फीस का इंतजाम। निम्न आयु वर्ग परिवारों के इतने ही बच्चे हैं जो आर्थिक असमर्थता के चलते स्कूल नहीं जा पाते हैं। अमरीका में ही चौदह लाख 30 हजार परिवारों के लिए ऐसी आवास व्यवस्था जिसका वे खर्च उठा सकते हों। अमरीका में उन्नीस लाख एलीमेंटरी शिक्षकों के लिए एक वर्ष की तनख्वाह। जाहिर है कि गरीब देशों में इससे 20 से 50 गुणा तक लोगों की तनख्वाह बनती है।
अमरीका में तैंतीस लाख नर्सों, वृद्ध जनसेवकों या समाजसेवियों की एक साल की तनख्वाह। 35 लाख रोजगार प्रशिक्षण स्थलों के लिए या रोजगार निर्माण योजनाओं के लिए तीन वर्ष का खर्चा। या फिर इसी राशि से दुनिया के पैमाने पर, यूनिसेफ के अनुसार सभी बच्चों के लिए सवा तीन वर्ष के लिए पर्याप्त भोजन, बुनियादी स्वास्थ्य रक्षा, प्राइमरी शिक्षा तथा पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था की जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के समूचे बजट की 13 वर्ष तक भरपाई की जा सकती है और इसमें शांति का पालन कराने की तथा अन्य विशेषीकृत संस्थाओं के खर्चे भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के तमाम शांति रक्षा मिशनों (1966 के पैमाने से) का 80 वर्ष का खर्चा दिया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 250 वर्ष के खर्चे की भरपाई की जा सकती है। यूरोपीय सुरक्षा व सहयोग संगठन (ओएससीई) का 540 वर्ष का खर्चा दिया जा सकता है। ग्रीनपीस इंटरनेशनल के 700 वर्ष के काम के लिए साधन जुटाए जा सकते हैं।
गरीब देशों में एक बच्चे को बचाए रखने के लिए कितनी मदद की जरूरत होगी? 100 डालर प्रति वर्ष। इसलिए अगर इस हमले पर 100 अरब डालर ही खर्च खर्च होते हैं तब भी इतनी रकम से एक अरब बच्चों को एक वर्ष तक बचाए रखने का इंतजाम तो किया ही जा सकता था। इस हमले के गंभीर परिणाम महज इराक तक ही सीमित नहीं रहेंगे, इस साम्राज्यवादी हमले की मार पूरी दुनिया को झेलनी पड़ेगी। बुश ने दुश्मनों की अपनी लंबी सूची को स्पष्ट करने में देर नहीं की और ‘पाप की धुरी’ का ऐलान कर दिया। याद रहे कि 1999 से 2003 के बीच यानी चार वर्ष के इस अर्से में ही, यह चौथा युद्ध है जो एक स्वतंत्र देश के खिलाफ अमरीका ने लड़ा है।

चोर कोण साह कोण


रमलू: पहलम जो रिश्वत लेवणिया माणस था उसनै म्हारा समाज अर म्हारा शहर अर गाम बहोतै खराब माणस मान्या करता। सहज रिश्वत नै जोर पकड़या तो समाज मैं फजीहत होई। रिश्वत का नाम बदनाम होगा।
ठमलू: इस बदनामी तै बचण का राह मिनटां मैं टोह लिया होगा बट्या नै। घणै कसूते बटमार होरे सैं।
रमलू: रिश्वत के इन ठेकेदारां नैं एक सभा बुलाई।
ठमलू: के बात इनकी भी यूनियन सै के कोए। ये म्हारी यूनियन कै तो हाथ धोकै पीछै पड़े रहवैं सैं।
रमलू: इनकी यूनियन घणे गजब की सै वा रजिस्टर करवावण की भी जरूरत कोन्या। वा नम्बर दो के खात्यां मैं चलती बताई। हां तै इननै फैंसला कर लिया अक रिश्वत नै म्हारा समाज खोखला कर दिया इसका जड़ तै खात्मा कर देना चाहिए।
ठमलू: या बात उननै कही जो सोवन्ते बी अर खान्ते बी रिश्वत के सपने लेवैं सैं।
रमलू: हां अर म्हारी या आडू. जनता भी बहौत राजी होरी थी अक रिश्वत का साच माच मैं खात्मा होवण आला सै। (सभा का सीन)
सभा मैं सबतै बड्डा रिश्वतखोर खड़या होकै बोल्या - हम कसम खावां सां अक हम रिश्वत नहीं लिया करांगे आज तैं पाछै।
दूसरे दो तीन जणे बोले: तो खा कमा लिये हमतो अर कसम तोड़ी तो मुसीबत।
बड्डा रिश्वतखोर: फेर हम रिश्वत कोनी लेवां आज तै हम कमीशन लिया करांगे। तो रिश्वत तो आपै ए खत्म हो ज्यागी।
(सबनै तालियां तै स्वागत करया)
चार पांच साल मैं रिश्वत का नाम लेणा भूलगे लोग। कमीशन छाग्या सारे कै।
एक कमीशन एजेंट: आज काल कमीशन पै काम करवाणा बहोत आसान होग्या।
दूसरा: और के यार इस रिश्वत नै तो किते कै बैठण जोगे नहीं छोड्डे थे समाज मैं ईब तै ठाठ तै दुकान पै लिखवा कै काम करां सां कमीशन एजेंट फलाणा फलाणा।
तीसरा: फेर इन पाछले दस सालां मैं इस कमीशन की बी घिस काढ़ कै धरदी म्हारे यारां नैं। राव साहब, चौधरी साहब, मेहता साहब, यादव साहब, स्वामी जी तै लेकै खुराना जी ताहिं किस किस का नाम गिनाया जा सब कमीशनदार होगे।
दूसरा: यो कमीशन भी बहोत बदनाम हो लिया भाई।
पहला: तो ईब के करया जा। लोग बात तै म्हारे म्हां कै चलावैंगे अर फेर सीधी बात जा करैं सैं। हमनै फेर इसे ढाल बिचाले तै काढ़ बगावैं सैं जिसी दूध मां तै माक्खी।
तीसरा: इस कमीशन का बी किमै सोचना पड़ैगा। हमने अपने भाइयां की एक पंचायत बुलानी पड़ैगी। उसमैं फेर कोए सर्व सम्मति से फैसला करणा पड़ैगा।
(पंचायत सीन)
एक: सोचो भाइयो पाछली पंचायत के बाद दस साल म्हारे बड़े सुख तै गुजरे। ईब फेर सोचो अक इस कमीशन एजेंटी तै क्यूंकर पैंडा छूटै म्हारा।
दो: कुछ ना होरया थाम ऊंए घबरारे सो। कमीशन तै बड़े-बड़े तोपां के अर हवाई जहाजां के सौद्यां मैं बी लिया जा सै। हम तै मामूली सा कमीशन लेवां सां।
तीन: वा बात तै सही सै फेर समाज मैं कमीशन एजेंटां की इज्जत तै दो आने की बी कोन्या रहरी। बद तै बदनाम भूण्डा आली बात होरी सै म्हारी गैल्यां।
एक: वा तो बात ठीक सै हम तो मेहनत करकै या कमीशन कमावां सां। ऊपर तै बिना हाथ पां हिलाए उनके हिस्से का कमीशन उनके धोरै पहोंच ज्या सै।
दो: ईबै इतनी तावल मतना करो थाम। और सोचल्यो थोड़ा बहोता।
तीन: वा बात सै ना अक काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल मैं परले होयेगी बहुरि करैगा कब।
एक: रै न्यों करो भाई इस कमीशन नै सर्विस चार्जिच का लत्ता उढ़ा द्यो। दस बीस साल इसमैं लिकड़ ज्यांगे। आगे की आगै देखी जागी।
तीन: सही बात कही भाई ईब तै आगै सर्विस चार्जिज नाम होग्या। एजेंटी सब खत्म। कमीशन की टांग ईस पंचायत मैं तोड़ दी सै।
दो: ठीक सै जो कमीशन एजेंट रैहणा चाहवैं सैं इबै उसनै जात बाहर मतना करियो। (फैसला होग्या सब चले जाते हैं)
रमलू: सुण्या सै इन रिश्वत खोरां की भी कोए पंचायत हुई थी।
ठमलू: रिश्वत खोर नहीं कमीशन एजेंट बोल कमीशन एजेंट।
रमलू: हां वोहे कमीशन एजेंटों के फर्क पड़ै सै।
ठमलू: फरक तो पड़ै ऐ सै भाई। एक तै एक माणस नै न्यों कहवैं अक तेरे पिता जी आए थे अर एक न्यों कहवैं अक तेरी मां का लोग आया था। बात तो वाहे सै पर फरक तो घणा ए सै ना।
रमलू: चलो तूं अपणी बात मनवाएं बिना के मानै सै। फेर इन्हें बातां करकै चोर अर साह मैं फरक कर पाणा बहोतै घणा मुश्किल होरया सै।
ठमलू: या तो मैने बी लागै सै। चोरां नै आजकल यो प्रचार बड़े जोर शोर तै चला राख्या सै अक आज की दुनिया मैं कोण ईमानदार रहरैया सै।
रमलू: म्हारे दफ्तर मैं जो धापकै पीस्से खावै सै ना ओ बी एक दिन न्यों बोल्या अक हमाम मैं सब उघाड़े हो लिए।
ठमलू: मनै लागै या बात सही कोण्या। असल बात या सै अक उघाड़े माणस अपणा उघाड़ापन लहकोवण खातर सबनै उघाड़ा बतादें सैं अर आप्पां बी इसे आडू. सां अक सैड़ दे सी दो सेर का सिर हां मैं हिलाद्या सां।
रमलू: दिमाग तै काम लेणा तो आप्पा नै कई बरस तै छोड्डै राख्या सै। झूठ साच का भेद करण का म्हारा ब्यौंत कोण्या बचरया आज।
ठमलू: और के जिब घोटाल्यां का जिकर चालै सै तो न्यो कहया जा सै अक कौन बचरया सै इनतै?
अर म्हारी फेर हां मैं हां। हम न्यों सोचण का माड़ा सा बी कष्ट नहीं करदे अक कौण बचरे सैं इनतैं। कौण जनता के मैं सै अर कोण खिलाफ सैं?
रमलू: फेर एक बात सै ठमलू चोर कूण सै अर साह कूण सै इसका बेरा लाणा भी तो मुश्किल होंता आवै सै।
ठमलू: सही बात सै अर म्हारे बरगी मोटी बुद्धि आल्यां के तो बसका कतिए कोण्या। म्हारे बरगे कई बार मार खाज्यां सैं।
एक बै म्हिने की पहली तारीख नै रलदू नै तनखा मिली थी। रलदू सोचदा जावै था। डीटीसी की बस मैं चढ़ लिया। भीड़ चौखी थी। सोचदा चाल पड़या अक ब्याह होए नै तीन साल हो लिए पर घर आली ताहिं कुछ बी खरीद कै नहीं लेग्या। आज एक बढ़िया सी साड़ी खरीद कै ले ज्यांगा। कन्डक्टर नै टोक दिया अक टिकट? रलदू बोल्या अक एक शाहदरा की। कन्डक्टर टिकट पकड़ा कै बोल्या अक तीन रुपये। रमलू नै पाछली गोज पै हाथ मारा अर भाई कै पसीना आग्या।
रमलू: क्यों पसीना क्यों आग्या हार्ट अटैक तै नहीं होग्या था उसकै।
ठमलू: कन्डक्टर बोल्या - अक पीस्से दे था। गौज कटगी भाई। रलदू मरियल सी आवाज मैं बोल्या। कन्डक्टर बोल्या रै मैं जाणूं सूं थारी बाहणे बाजी। तीन सौ साठ देखूं सूं तेरे बरगे रोज।
रमलू: कन्डक्टर बी के करै?
ठमलू: रलदू नै कटी औड़ गोज दिखाई पर कन्डक्टर बोल्या के बेरा घर तै काट कै ल्यारया हो। तबै एक आदमी कंडक्टर तै बोल्या अक कितने पिस्से। कन्डक्टर बोल्या तीन रुपये। उसनै पांच का नोट दिया अर बोल्या मार सिट्टी।
रमलू: देख्या मैं कहूं था ना अक ईबी इन्सानियत बचरी सै। भला हो उसका। औरां का बी बखत बरबाद होण तै बचा लिया उसनै। बड़ा देवता माणस था ओ तै।
ठमलू: घणखरी सवारी भी उसके गुण गावण लागगी। फेर बेरा सै असल मैं ओ कूण था।
रमलू: कोए हो, था भला माणस।
ठमलू: ओ ओए जेब कतरा था जिसनै रलदू की गौज काटी थी। अर रमलू इतना स्याणा होकै तूं भी गच्चा खाग्या। तो भाई इन देवता किसम के जेब कतरयां तै बचियो लैक्शनां मैं।

मंगलवार, 30 मई 2017

अपनी मर्जी का मतलब

सत्ते नफे कविता सविता अर सरिता धापां ताई की बैठक मैं शनिवार की साँझ कै फेर कठ्ठे होंगे | नफे का मुँह किमै उतरया उतरया सा था | सत्ते बोल्या -- के बात नफे आज किमै ढीला ढीला सा नजर आवै सै ? कविता --इतना उदास तो तूँ कदे बी कोण्या देख्या | बस कविता का तो नयों कहना था अर नफे तो फफक फफक कै रो पड़या | सारे हैरान अक या के बणी ? फत्ते बोल्या -- भाई नफे बात बता किमैं तो जी हलका होवैगा | नफे बोल्या -- के बताऊँ  बूझै मतना | ओ छोटना भाई नहीं सै सज्जन उसनै पुलिस पकड़ कै लेगी अर उसकी बहोत पिटाई करी | सरिता बोली-- बिना बात पुलिस नै पिटया या तो माड़ी बात सै नफे | बिन बात पुलिस क्यों पीट्टण   लागी ?  ,नफे बोल्या--ओ सज्जन अपनी बुआ कै जारया था माछरौली | उड़ै म्हारी बुआ का छोरा सै श्यामलाल उसपै गाम आल्यां  नै  इलजाम ला राख्या था अक पड़ौस की गोसाइयाँ की छोरी भजा लेग्या श्यामलाल | सरिता बोली -- गाम की गाम मैं यू काम बहोत माड़ा करया श्यामलाल नै | नफे बोल्या -- फेर आगै तो इसतैं भी माड़ी बात हुई | सत्ते बोल्या-- के बात हुई? नफे-- श्यामलाल के बाबू गणेशी नै अर श्यामलाल के छोटे भाई नै अर मेरले  भाई सज्जन नै पुलिस पाकड़ कै लेगी |  थानेदार नयों कहवै था अक इनकी मिलीभगत तैं भजा कै लेग्या सै श्यामलाल छोरी नै | सरिता-- जिसकी छोरी चाली गई वो फ़िक्र तो करैएगा अर नयों भी चाह्वैगा अक वा तावली सी पाज्या |
कविता -- श्यामलाल की उम्र कितनी सै ? नफे बोल्या -- 21 -22 बतावैं सैं | कविता के मुँह तैं एकदम लिकड़ग्या जिब मियां बीबी राजी तो के करैगा काज्जी | नफे -- ले मनै राम की सूँह सज्जन नै कटी नहीं बेरा उनका अक  चाले गए |
   सविता -- फेर पुलिस आले उणनै क्यों पकड़ कै लेगे ? नफे -- पूछ ताछ खातर थाणे मैं बुलावैं तो देखी  जा |  थानेदार नै तो म्हारा फूफा उन बाळकां कै साहमी उघाड़ा करकै पुलिसिया पिटाई करी छिक कै | बालक बोले तो वे दोनूं भी धुन दिए अच्छी तरियां | नफे -- जब उपरले अफसरां धोरै गए  तो उणनै भी सीधे मुँह बात कोण्या करी | उणनै अपने निशान दिखाए पिटाई के अर थानेदार के खिलाफ कार्यवाही की मांग करी |  फेर गाम का सरपंच अर और पांच छह छटैल एसपी कै जा पेश हुए थानेदार के हक़ मैं |  एसपी भी करै तो के करै ? सत्ते -- एसपी नै तो सही बात की तरफदारी करनी चाहिए थी | सविता -- ईब पहलम आले अफसर कड़ै रैहरे सैं |  नफे -- उनका मैडीकल करवावण खातर भी कोर्ट की शरण मैं जाना पड़या | डॉक्टरां नै भी कई बै मसकौड़े से मार कै पर्चा काटया | परचा कटग्या तो पुलिस आलयाँ नै केस दर्ज नहीं करया | उल्टा पुलिस नै दूसरी ढालां का दबाव और बनाना शुरू कर दिया |  ईब पुलिस कै खिलाफ इस्तगासा करां तो फूफा का इतना ब्योंत कोन्या पीस्याँ का |
ऊपर तैं गाम की  इज्जत कै बट्टा लावण के नाम पै रोज गाम मैं पंचायत होवण लागरी सैं |  पंचायत नै कह्या अक कै तो छोरे छोरी नै इनके माँ बाप पेश करैं नहीं तो इनका होक्का पाणी बंद | कविता- नफे  जनवादी महिला समिति का बी किमै ब्यान था अक जै बालिग छोरा छोरी सैं अर जै वे अपने हिसाब तैं ब्याह करकै रैहना चाहवैं सैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत देवै सै तो गाम आलयाँ नै बीच मैं रोड़ा नहीं बनना चाहिये |
  नफे -- समिति आली बहनजियां करकै तो उनका मैडीकल का परचा बणया ना तो हमनै के रह पावै था | भला हो उनका | फेर  गाम आले  ये पंचायती तो उनकै भी खिलाफ होरे सैं | सत्ते -- लुहार के छोरे नै अर गोसाईं की उसे गाम की छोरी नै साथ रैहवन का मन बना लिया तो इसपै कई सवाल खड़े होंसें |  इन सवालों पै बहस होनी चाहिए अर उनके खिलाफ पंचायत जै कानून अपने हाथ मैं लेवै सै तो प्रशासन नै हरकत मैं आणा चाहिए | पुलिस नै बेकसूरों की पिटाई करी उसपै पुलिस कै खिलाफ एक्शन हो अर छोरा छोरी ताहिं प्रशासन नै सुरक्षा देनी चाहिए | कदे वे रेल तलै कट्टे पावैं |
खूंटा ठोक उर्फ़ रणबीर 

हमनै तो ताश खेलण तैं फुर्सत कोण्या

हमनै तो ताश खेलण तैं फुर्सत कोण्या
खूंटा ठोक
हरियाणा मैं आज के दिन महिलावां की जिंदगी तनाव , असुरक्षा , अभाव ,अर असहायता मतलब लाचारी मैं डूबती जाण लागरी सै |  कोय कह सकै सै अक महिलावां नैं खेलां मैं तम्बू गाड़ दिए |  ठीक |  पर वे इस करकै नहीं गाड़ पाई अक हमनै गामां मैं खेलण कूदण  का उन ताहिं कोये माहौल बना कै दिया हो , वे अपनी लग्न अर खुबात  तैं जीत ल्याई मैडल |  औरत पै तो शिकंजा और मजबूत होंता आवै सै |  इस्री भ्रूण हत्या , दहेज़ हत्या , इज्जत के नाम पै हत्या का ग्राफ ऊपर नै जावण लागरया सै |  यौन उत्पीड़न ,बलात्कार , छेड़ छाड़ ,डराना -धमकाना ,घरेलू हिंसा ,औरतां का अपमान , असुरक्षा अर घुटन इस हद ताहिं बढ़गे अक नेतावां  नै और लोगां नै न्यूँ मान लिया अक ये तो आम बात सैं | आर्थिक संकट आज दरवाजे पै आकै खड़्या होग्या अर परिवार टूटते जावण लागरे सैं |  जीवन के साफ़ सुथरे साधन बचे नहीं तो खुली छिप्पी वैश्यावृति कांहीं भी औरत सारे कै धकेली जावण लागरी सैं |
    अराजकता और मनमानेपन का जो माहौल आड़ै बण्या सै उसमैं महिलावां नै 'सस्ते मैं उपलब्ध अर 'आसानी तैं उपलब्ध शिकार'  के  रूप मैं देख्या जावै सै |  इस आर्थिक असमानता अर सामजिक  असमानता के चालतें ताकतवर तबके महिलावां की गेल्याँ कुछ भी अर किसे भी हद ताहिं बेरा ना कितना घृणित काम कर सकैं सैं | के  कुल मिला कै सौ का तोड़ यूं सै अक महिलावां का अवमूल्यन हुआ सै |  गरीब तैं गरीब तबक्यां मैं भी उनके अपने समुदाय और परिवार के बीच मैं भी इन महिलावां पै अत्याचार बढ़े सैं |  औरतां नै ' क्षणिक मजे की चीज ' की ढालां देखना अर इस तथाकथित मजे खातर इन औरतां नै मौका लागते की साथ घेर लेना बड़ी आसान और आम बात होगी |  पिछले दिनों मैं हरियाणा मैं परित्यक्ताओं   और औरतों के साथ संबंधों मैं धोखाधड़ी बहोत बधी सै |  ब्याह के कुछ दिन पाछै लड़कियां पै हिंसा बढ़ी सै और क़त्ल और आत्म हत्या के केस साहमी आये सैं |   दूजे कांहीं लिंग अनुपात मैं विषमता के कारण लड़कियां दूर दूर तैं खरीद कै ल्याई औरत पसंद नहीं आयी तो उसनै उल्टा छोड़ आये अर उसकी बाहण नै  लियाये उसकी जागां  | ईब तै औरतां के खरीद फरोख्त के धंधे मैं दलाल भी पैदा होंगे |  या खरीद फरोख्त तेजी  तैं रफ़्तार पकड़ण लागरी सै अर औरतां के हक़ मैं बोलनिया मनस कै जनवादी महिला समिति बरगी संस्था बहोत थोड़ी सैं |  हरियाणा के समाज मैं संघर्ष करण आली महिलावां की खातर 'स्पोर्ट सिस्टम 'की बहोत कमी सै |  जितनी सामाजिक असुरक्षा बढ़ती जाण लागरी सै उसके हिसाब तैं यूं एक दो नारी निकेतन का मामला कोणी रेहरया  |  परित्यक्ताओं , एकल माओं ,अविवाहित महिलाओं ,यौन उत्पीड़न की शिकार उजड़ी औड़ महिलाओं ,बच्चियों की  जरूरतों नैं ध्यान राख कै समझ कै समाज मैं उनका स्थान बनाना बहोत जरूरी होग्या |  शार्ट स्टे होम , कामकाजी महिला हॉस्टल ,लड़कियों के हॉस्टल , मुफ्त जच्चा बच्चा केंद्र , कानूनी सहायता केंद्र , सलाह केंद्र, तनाव मुक्ति केंद्र , मनोचिकित्सा केंद्र, कौशल विकसित करण आले कार्यक्रम , एकल माओं के बच्चों की शिक्षा के लिए अनुदान और कर्ज की सुविधा , महिला स्वास्थ्य केंद्र , व्यायामशालायें , सामूहिक रसोईघर , की मांग जरूरी होगी | हिंसा की शिकार महिलावां की खातर कानून और स्वास्थ्य से संबंधित आपातकालिक व जल्द सेवाओं गंभीरता तैं की मांग समाज मैं ठावनी बहोत जरूरी होगी |  जौण बी जड़ै सै उसनै ईसे स्पोर्ट सिस्टम के खड़या करण मैं आपणी मदद जरूर करणी चाहिए |  इसके साथ साथ सरकार पै भी दबाव बढ़ाना चाहिए इस स्पोर्ट सिस्टम के विकास की खातर |
   हरियाणे मैं पढ़े लिखे लोगां मैं लिंग अनुपात एक हजार पुरुषां पै छह सौ सतरह महिलावां का पहोंच लिया था कुछ साल पहले |  या खतरे की घंटी बाज ली हरियाणा मैं |  पर लोगां नै ताश खेलण तैं फुर्सत कोन्या , कै गाल की दो फुट जमीन पै कब्ज़ा करण की जुगाड़ बाजी मैं सैं | इन सारी  बातां पर गाम अर शहर की महिलावां नै अर पुरुषां नै  गंभीरता तैं सोच्चण की जरूरत सै 

लत्ता कोन्या औढूं

लत्ता कोन्या औढूं
आठ-दस किल्ले। चौखा काम चाल रहया। तीन भाई दो बाहण। बड्डे का ब्याह होरया। एक दिन किसे बात पर सल्फास की गोली खा कै जात्ता रहया। मां-बाप बहोत दुखी। छोटा छोरा नफे 16 साल का दसमीं मैं पढ़ै। एक कान्ही तो उस ताहिं न्यों कहया करदे अक बड्डी भाभी मां बरोबर। तेरहवीं आले दिन तै दो दिन पहलम सुगबुगाहट शुरू होगी अक नफे का लत्ता उढ़ावांगे। कमला की उमर 27 साल की अर वो सोलह साल का। कमला नाटगी लत्ता औढ़ण तै। ढाल-ढाल की चरचा। म्हारी परम्परा की नाक कटा दी अर और बेरा ना के-के। कितै और निशाने साध राखे सैं। आजकाल म्हारे जाट गोतां के कुछ भाईयां नै हरियाणा की संस्कृति की चिंता बहोत सतावण लागरी सै। गांव का ताना बाणा छिन्न-भिन्न होत्ता जावण लागरया इसकी बहोत चिन्ता सै। परम्परा का कौण सबतै बड्डा रुखाला इसका बहोत बड्डा कम्पीटिशन-सा होरया सै। 18 तारीख नै रात नै एनडीटीवी चैनल पर तो एक पंचायती नै आड़े ताहिं कह दिया अक हमनै हिन्दुआं की पुरानी किताबां तै कोए लेना-देना नहीं। हमतो आर्य सैं। वैदिक संस्कृति नै मानां सां हम तो। किसे नै कहया अक स्वामी दयानन्द नै तो छुआछूत के खिलाफ संघर्ष करया तो उस पर तो माट्टी गेर दी। पंचातियां धोरै कोए जवाब नहीं था। फेर सवाल आया अक ईब ताहिं एक बी इसा केस हो जित बहन-भाई नै आपस मैं ब्याह करया हो? तो भी घुमा-फिरा कर बात करी, सीधा जवाब कोन्या दिया अक यो केस सै बहन अर भाई के ब्याह का। गाम के गाम मैं अर गोत के गोत मैं ब्याह का भी बस एकला मनोज अर बबली का केस सै ओर कोए इसा केस नहीं बता पाए पंचायती। बार-बार दुहाई दी जा रही थी अक भाईचारे के गोतों में शादी करने से हमारी परम्पराओं का अपमान होता है। खेड़े के गोत का सम्मान करना हमारी परम्परा रही है। सीम कै लागदे दूसरे गोत के गाम मैं भी शादी न करना म्हारी परम्परा रही सै। चार गोतों को छोड़कर शादी करना म्हारी परम्परा रही है। तीन दिन की शादी करना हमारी परम्परा रही है। आर्य समाज के शादी के नियम कहते हैं कि शादी के वक्त बराबरी की हैसियत से लड़का लड़की एक-दूसरे के साथ पति-पत्नी का संबंध स्वीकार करेंगे। विवाह व्यवस्था कसूते संकट मैं सै। गोत-नात जात-पात सब कुछ देख द्याख कै करे औड़ ब्याह एक-दो साल के भीतर तलाक पर आकै खड़े होज्यां सैं। क्यों? के जवाब सै म्हारे धोरै? समाज मैं कुदरतन विकास के कारण जो बदलाव आवैं सैं उनको रोकना ठीक नहीं होत्ता। जनता कै जिब समझ मैं आज्या सै तो वा बदलाव स्वीकार करले सै म्हारे पंचायती भाई स्वीकार करो चाहे मत करो। चाहे कितने ए फरमान जारी करल्यो? फरमान की आड़ मैं कत्ल करने आल्यां नै बचावण की कोशिश करनियां नै या कुदरत माफ कोन्या करै। या जद्दोजहद सदियां तै चालती आई सै इस समाज मैं, इसनै कोए नहीं रोक सकदा। रोक सकदे तो बल्दां की खेती तै के थोड़ा प्यार था हमनै। फेर बख्त बदल लिये। समझदार हैं वो लोग जो वक्त से पहले वक्त की धार पहचान कर अपने आप को बदल लेते हैं। इसलिए लत्ता औढ़ण तै इन्कार करण आली महिला को कुलच्छनी कहने की बजाए उसको शाबाशी देओ अक उसनै आज के बख्ता मैं इस अन्यायकारी परम्परा कै खिलाफ आवाज बुलन्द करी। बेमेल विवाह तो है ही यह। कई बार जवान होने पर देवर अपनी मर्जी की शादी भी कर लेता है। उस औरत को अपनी मर्जी से चुनाव करने का कोई हक नहीं है। इन परम्पराओं की समीक्षा आज के समय की मांग है। लोग इसमें मौजूद अन्याय की जगहों को अब पहचानने लगे हैं। देखना यही है कि इस विवाह संस्था के संकट से हम किस तरह से निबटते हैं। समाज को आगे ले जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं या पीछे ले जाने वाले रास्तों का?

सोमवार, 29 मई 2017

हरियाणा की तिग्गी

हरियाणा की तिग्गी
तिग्गी का मतलब तीन चीजां का तिग्गड्डा मतलब तीन चीज इकट्ठी। एक तिग्गी का मतलब ताश की तिग्गी। पान की तिग्गी, ईंट की तिग्गी, चिड़ी की तिग्गी अर हुकम की तिग्गी। दूसरी तुरुप की तिग्गी। तुरुप की तिग्गी साधारण इक्के ने बी पढ़ण बिठादे सै। कई बै तिग्गी की ट्रेल दो इक्यां के पेयर का भी भूत बणादे सै। या ताशां की तिग्गी माणसां का बहोत सत्यानाश करै सैं। फेर जै ताशां की तिग्गी जब समाज का धुम्मां ठा सकै तो माणसां की असली तिग्गी समाज का के कर सकै सै या बात हरियाणा के हरेक माणस कै आसानी तै समझ मैं आ सकै। हरियाणा की किस्मत कहवां अक बदकिस्मत मेरे कम समझ मैं आवै सै। म्हारे हरियाणा मैं गऊ, गऊ का गोबर अर गऊमूत्र की तिग्गी नै सदियां तै गुल खिलाये सैं अर ईब तो हद होगी अक दुलिना मैं गउआं के बदलै 5 माणसां की बलि चढ़ाकै बहुत खुश हुये म्हारे समाजी भाई। हालांकि आज ताहिं सिद्ध नहीं हो लिया अक एक बी गऊ उन मरण आल्यां नै मारी थी। हरियाणे के समाज मैं एक तिग्गी और बताई - दलित विरोध, महिला विरोध और विज्ञान विरोध की तिग्गी। इस तिग्गी नै तो पढ़े लिखे माणसां के दिलां मैं भी घणी डूंगी जड़ जमा राखी सै वट वृक्ष की ढालां। इस तिग्गी का काम सै अक मजाल सै जै तर्क अर विवेक की खुली हवा किसे खिड़की के म्हां कै घर कै भीतर चली जावै। इसे ढाल कई ढाल की तिग्गी सैं जिन करकै हरियाणा में आर्थिक विकास तो होग्या फेर सामाजिक विकास कै कसूती कैंची मार राखी सै इन तिग्गियां नै। कई बर तो ये पिछाण मैं ए कोन्या आत्ती। आज ताहिं जिसनै इन तिग्गियां नै छेड़न की हिमाकत करी सै तो छेड़निया का ए नुकसान हुया सै। मजे की एक बात और सै अक तर्क, विवेक और वैज्ञानिक रुझान की तिग्गी नै सदिया तै इन सामाजिक अवरोध पैदा करण आली तिग्गियां ताहिं चुनौती दी सै अर आज बी देवण लागरी सैं। जब ब्रूनो नै कहया अक सूरज धरती के चारों तरफ कोनी घूमता बल्कि धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो ब्रूनो को धर्म, राष्ट्र अर परंपरा की तिग्गी नै जिंदा जला दिया था। आज बी कोए कैहकै तो देखो अक जिब कोए चीज जलै से तो कार्बनडायक्साइड पैदा हो सै मतलब वातावरण में असुद्धि पैदा हो सै फेर हवन मैं भी तो चीज जलैं सैं तो शुद्धि क्यूंकर होवै सै? खैर इसपै फेर कदे सही।
बात तिग्गियां पै चाल रही थी। हरियाणा मैं एक खास बात और देखण मैं आवै सै। राजनीति के दंगल मैं भी म्हारे हरियाणा महान मैं तिग्गियां की गलेट लागैं सैं। एक दौर सै हरियाणा मैं लाल तिग्गी का इसनै चाहे पान की तिग्गी कहवां चाहे ईंट की तिग्गी। मतलब बंसीलाल, भजनलाल अर देवीलाल की तिग्गी। इस तिग्गी का नतीजा सै यू अधखबड़ा हरियाणा। अधखबड़ा क्यूंकर? यो न्यों अक आर्थिक तरक्की मैं तो गोआ पाछै इसका दूसरा नंबर अर सामाजिक तरक्की मैं यू सबतै फिसड्डी। इसा हरियाणा का मॉडल या लालां की तिग्गी ए रच सकैं थी और किसे के बाक्स की बात नहीं थी या। इस तिग्गी नै समझले हरियाणा पै 1966 सै लैकै 1985 ताहिं राज करया। इस तिग्गी मैं भी फेर आगै तिग्गी देखी जा सकैं सैं। बंसीलाल, सरोज अर सुरिंदर की एक तिग्गी। कई साल पूरा हरियाणा इननै खूब मोर की ढालां नचाया। मजाल किसकी अक कोए चूं बी करज्या। न्योंए फेर एक तिग्गी उभरी देवीलाल, ओमप्रकाश चौटाला अर रणजीत सिंह की। फेर देवीलाल के रैहन्ते इस तिग्गी का एकछत्र राज कोन्या चाल्या। फेर जिब औम प्रकाश चौटाला, अभय अर अजय की तिग्गी आई तो हरियाणा के एक बै फेर भाग जाग्गे। विकास के कामां का ढूं मार के गेर दिया। मजाल सै जै किसी चौथे माणस के कैहंते पत्ता बी हिलज्या हरियाणा मैं। फेर हरियाणे आल्यां की यादाश्त बहोतै कमजोर सै अर थोड़े से दिनां मैं पाछली बातां नैं भूल ज्यावै सैं। इस तिग्गी नै हरियाणा मैं के के गुल खिलाये इसका किसनै नहीं बेरा। फेर बख्त तो परिवर्तनशील सै। इसे दौर में भजनलाल, चंद्रमोहन अर कुलदीप बिश्नोई की तिग्गी आई। या तिग्गी अपनी तुरुप चाल मैं फेल होगी अर इस ताहि एक दूसरी तिग्गी नै मात दे दी। या मात देवण आली तिग्गी बड़े कमाल की सै। या तिग्गी सै भूपेंद्र हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा अर आशा हुड्डा की हरियाणा मैं पड़गहाट उठरया सै। इस तिग्गी की चौधराहट के नशे-नशे मैं दो साल तो काढ दिये। फेर ईब मुशीबत होरी सै लोगां नैं। निरी चौधराहट तै कद पेट भरया सै। आई किम्मै समझ मैं हरियाणा की तिग्गी अक नहीं। म्हारे भारत देश मैं भी तिग्गी की अवधारणा कदे कदीमी तै चाल्ली आवै सै। ब्रह्मा शिव गणेश की तिग्गी नै कोण नहीं जानता। फेर ईब देखना योहे सै अक तर्क विवेक, वैज्ञानिकता की तिग्गी क्यूंकर हरियाणा मैं पैर फैलावै इन ढाल ढाल की तिग्गियां जो विकास विरोधी अर मानव विरोधी सैं उनतै निजात मिले। फेर हरियाणा आल्यां कै ईबै जच नहीं ली सै अक इस तिग्गी की जकड़न तै छुटकारा मिल सकै सै।

बहुत दुःख है

बहुत दुःख है
बहुत दुःख की बात है कि सरकार शिक्षा मैं आरक्षण लागू कर रही है। ऊंची जातियों वाले, अमीर परिवार वाले दुःखी हैं। मीडिया वाले, कारपोरेट वाले दुःखी हैं। राजनीति में पक्ष-विपक्ष वाले दुःखी हैं। सब ज्ञानीजन दुःखी हैं। ऐसा लगता है कि इस समय दुःख ही देश की कथा है।
ऊंची जातियों वाले दुःखी हैं कि हमने क्या बिगाड़ा था वी पी सिंह का और क्या बिगाड़ा था अर्जुन सिंह का। पहले उन्होंने मंडल लागू किया। अब ये मंडल लागू कर रहे हैं। पहले उन्होंने नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण दिया। अब ये शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हैं। यह दुःख उनका है जिन्हें शिक्षा और रोजगार में सदियों से आरक्षण हासिल रहा। सत्ताईस या उनचास फीसद नहीं। पूरे सौ फीसद।
खैर, उनका यह दुःख धीरे-धीरे गुस्से में बदलता है। गुस्से में वे जूते पालिश करने लगते हैं और सड़कों पर झाडू. लगाने लगते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि देखो आरक्षण लागू हुआ तो हम ऐसे ही घटिया काम करने को मजबूर होंगे। यह गुस्सा उनका है जिन्हें कभी इस अन्याय पर, इस समाज व्यवस्था पर गुस्सा नहीं आया कि कोई सदियों से झाडू. लगा रहा है और उनकी गंदगी साफ कर रहा है, कि कोई सदियों से उनके जूते पालिश कर रहा है।
फिर उनका यह गुस्सा नस्लवादी अहंकार में बदलता है। वे ऐंठते हुए कहते हैं कि ये पिछड़े, दलित और आदिवासी तो ऐसे ही रहेंगे। वे शिक्षा में हमारी बराबरी कैसे कर लेंगे? वे मैरिट में हमारा मुकाबला कैसे कर लेंगे? वे योग्यता में हमारे सामने कहां टिकेंगे। यह अहंकार उनका है जो कभी कोई कबीर पैदा नहीं कर सके, कभी कोई रैदास पैदा नहीं कर सके, रामचरितमानस के रचयिता तुलसी बाबा को जिन्होंने मस्जिद में शरण लेने पर मजबूर किया और भूले से भी ज्ञान की बात सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवाया।
पिछड़ों के लिए आरक्षण के खिलाफ यह दुःख, यह गुस्सा, यह नस्लवादी अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पैसे वालों के लिए सौ फीसद आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। कभी जुलूस नहीं निकाला, कभी कोई प्रदर्शन नहीं किया। वहां मैरिट नहीं होती। थैली होती है। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने डालर वाली एनआरआई औलादों के लिए जितना मांगो, उतने आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। वहां भी मैरिट नहीं होती। डालर होते हैं। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जो कहते हैं कि मैरिट और प्रतिभा का आदर नहीं किया गया तो घटिया डॉक्टर और इंजीनियर ही पैदा होंगे। मैरिट के इन दावेदारों ने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में कभी मैरिट नहीं मांगी। इन कालेजों से कितने योग्य डॉक्टर और इंजीनियर निकल रहे हैं, पूछिए।
आज वे पैसेवाले भी दुःखी हैं, जो हजारों-लाखों का डोनेशन देकर अपने बच्चों का अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला कराते हैं। लाखों रुपए फीस और हजारों रुपए ट्यूशन देते हैं। हजारों रुपए कोचिंग सेंटरों में खर्च करते हैं ताकि उनके बच्चे मैरिट ले आएं। डाक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वकील बनें, मैनेजर बनें। पर आरक्षण मिल गया दलितों को, आदिवासियों को और पिछड़ों को। उन्हें लगता है जैसे उनके सामने रखी नोटों की गड्डियां दलित, आदिवासी और पिछड़े ले उड़े।
मीडिया वाले भी दुःखी हैं कि देखो फिर से मंडल आ गया। वीपी सिंह गया तो अर्जुनसिंह आ गया। उनका दुःख है कि उस मंडल जैसा मंडल तो आया, पर उस मंडल जैसा मंडलविरोध नहीं आया। आत्मदाह तक नहीं हो रहे। कोई विजुअल ही नहीं मिल रहा। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापीं कि जिन्हें आरक्षण मिल रहा है, वे ही आरक्षण नहीं चाहते। कि आरक्षण से दाखिला पाने वाले चल ही नहीं पाते और वे बीच में ही छोड़कर भाग जाते हैं। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापी कि आरक्षण के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। एसएमएस अभियान चल रहा है। सारे देश के आरक्षण विरोधी छात्र दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। उन्होंने गुब्बारे में खूब हवा भरने की कोशिश की। ये दुःख उन लोगों का है जिनका दावा है कि वे प्रगतिशील हैं, न्याय के पक्षधर हैं।
कारपोरेट वाले भी दुखी हैं कि देखो इससे मैरिटवाले प्रतिभावान लोग आगे नहीं आ पाएंगे। इससे विकास और प्रगति पर बुरा असर पड़ेगा। अभी हम आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे हैं। दुनिया में अपने झंडे गाड़ने जा रहे हैं। यह दुःख उन लोगों का है जिन्हें कदम-कदम पर आरक्षण चाहिए। इनसेंटिवों के नाम पर। जिन्हें सरकारी बैंकों से कर्जे लेकर डकार जाने का आरक्षण चाहिए। जिन्हें सरकारी कारखाने और कंपनियां मिट्टी के मोल हथिया लेने का आरक्षण चाहिए।
सरकारी पक्ष दुःखी है। कमलनाथ दुःखी है। कपिल सिब्बल दुःखी है। वे कहते हैं कि हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। पर यह प्रतिभा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विपक्ष दुःखी है। भाजपा तो बहुत ही दुःखी है। तब वाले मंडल का मुकाबला तो रथयात्रा से कर लिया था, पर अब वाले मंडल का मुकाबला कैसे करें। अब तो रथयात्राओं को बीच में छोड़ना ही पड़ रहा है। वे कहते हैं कि समाज बंटना नहीं चाहिए। वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। यह दर्द उनका है, जिन्हें पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का वोट बैंक अवश्य चाहिए।
अब तो ज्ञानीजन भी दुःखी हो गए। ज्ञानीसम्राट सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि ज्ञान उपयोग के आठ में से छह ज्ञानी आरक्षण के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, पर ऐसे आरक्षण के हम खिलाफ हैं। यह दुःख उन सैम पित्रोदा का है, जो भारत के नागरिक तक नहीं हैं।
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स्कूल कड़ै जा लिये ?

स्कूल कड़ै जा लिये ?
फत्ते बोल्या - इन स्कूलां का सत्यानाश जा लिया। सविता बोली - बहोत तावली बेरा लाग्या। कविता बोली - स्कूलां की किसै नै चिंता ए कोन्या दीखती। सरपंच के बालक प्राइवेट स्कूल मैं जावैं। हैडमास्टर जी के दोनूं बालक दिल्ली पढ़ैं। डाक्टर प्रदीप नै अपने बालक स्नावर मैं भरती करवा दिये। सविता बोली - कदे बख्त थे जिब स्कूल की पूरी की पूरी बिल्डिंग रिटायर्ड फौजी रिसाल सिंह साहब नै अर पूरे गांम नै खड़े हो कै बनवाई थी। बाजे भगत का सांग तीन दिन हुया था गाम मैं अर ढाई लाख रुपये कट्ठे होगे थे उन बख्तां मैं। फत्ते बोल्या - आज कोए ढाई आने देकै राज्जी कोन्या। सत्ते बोल्या - असल मैं सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई का भी तो भट्ठा बैठ लिया। फत्ते बोल्या - भट्ठा बिठाया किसनै? कविता बोली - भट्ठा बिठाया म्हारी शिक्षा की नीतियां नै अर रही सही कसर गाम आल्यां नै पूरी करदी। स्कूलां मैं जाकै इनकी संभाल करनी बंद करदी। गुटबाजी होगी गाम मैं। बदमाशां नै सिर जोड़ लिये अर घणी ठाड्डी यूनियन बणाली अपनी। सविता - के नाम सै इनकी यूनियन का? कविता - यूनियन का नाम कोन्यां फेर असामाजिक तत्वां की यूनियन सै ऊपर ताहिं। ये स्कूल का माहौल खराब राखैं सै अर इननै बचावण नै ऊपर आले तैयार रहतै सैं। महिला टीचरां गेल्यां बहोत बुरा बर्ताव होरया सै स्कूलां मैं। सत्ते - ईबतै महिलावां अर छोरियां गेल्यां पूरे समाज में बुरा बर्ताव होरया सै। फत्ते - बात सही सै फेर जै स्कूलां मैं ये सिरफिरे मास्टर जिनकी संख्या मुट्ठी भर सै जै लड़कियां गेल्यां यौन उत्पीड़न करैं सैं तो या तो घणी माड़ी बात सै ना। कविता - 6 तैं 19 फरवरी के एक पखवाड़े में हरियाणा के सरकारी स्कूलां में कई मास्टरां द्वारा छात्रावां का यौन शोषण लगातार करण करकै आठवीं, नौवीं की मासूम लड़कियां के गर्भवती होवण की खबरां नै मेरा तो दिल हिला कै धर दिया। मनै थारा बेरा ना। फत्ते - झकझोर कै तो हम भी धर दिये। शिक्षक-शिष्य संबंध नै म्हारे आड़ै सारे संबंधां मैं सबते पवित्र संबंध मान्या जावै सै। सविता - 6 तारीख नै ढराणा झझर, 8 तारीख नै दुर्जनपुर जींद, 9 तारीख नै रानिया, 17 तारीख नै बराड़ा अंबाला तै ये खबर ज्यूकर चारों कान्हीं तै आई तै हरियाणा का चूची बच्चा हिलग्या। फत्ते - जित माणस बणण की शिक्षा दी जावै, उड़े इतनी घिनौनी हरकत? मेरै तो जणों सन्नपात सा मारग्या।
कविता - मेरी कई बर स्कूल, कालेज अर यूनिवर्सिटी मैं पढ़ण आली लड़कियां तैं बात हुई सै। ये एक दम तै हुई चाण चक आली घटना कोन्या। हकीकत या सै अक स्कूल तै ले कै यूनिवर्सिटी ताहिं मैं प्रेक्टिकल के नम्बर कम लावण की, लैक्चर शार्ट करण की, इन्टरनल एसैसमेंट खराब करण की, खेलां में सलेक्शन ना होवण देवण की, पेपरां में पास ना होण देवण की, प्रवेश परीक्षावां मैं फेल करण की, पीएचडी पूरी ना होवण देण की आड़ लेकै छात्रावां का कई अध्यापकां अर कर्मियां द्वारा यौन शोषण एक घणी गहरी अर दूर-दूर ताहिं फैली समस्या है। जै इनै घटनावां नै देखां तो एक-एक स्कूल में इस हिंसा का शिकार होवण आली छात्रावां की बड़ी संख्या, स्कूलां मैं पाये गये कंडोम, गर्भपात की दवाइयां, चौकीदार तै लेकै डीईओ ताहिं का इसे काले कामां मैं शामिल होना, इसे कोढ़ी मास्टरां पै बख्त रहन्ते कार्रवाई करण के पंचायतों के प्रस्तावां तक की डीईओ बरगे अफसरां द्वारा अनदेखी, ऊंची जागां पै बैठे लोगों की आम अध्यापकों के बारे मैं बयानबाजी अर इन कोढ़ी मास्टरां नै बचावण की तलै ए तलै कोशिश बहोत किमै कहवै सै।
सविता बोली - म्हारी सरकार अर प्रशासन इन घटनावां नै अध्यापकां की नैतिक गिरावट, मानसिक विकार आदि कहकै अर एकाध अपराधी के खिलाफ आधी-अधूरी कार्रवाई करकै आंख्यां मैं धूल झोंकण की कोशिश करैं सैं। फत्ते बोल्या - मनै सुन्या सै लड़कियां के स्कूलां मैं पुरुष अध्यापक नहीं लाये जावैंगे। सत्ते बोल्या - घर मैं मां तो रहै सै, इस हिसाब तै बाबू काका अर पड़ोसी बी ताहने पड़ैंगे फेर तो। सविता बोली - मेरे आर्य समाजी भाई तो न्यों बी कहवैं थे अक सहशिक्षा नहीं होनी चाहिये। इसनै सत्यानाश कर दिया म्हारा फेर उनतै कोए न्यूं बूझै एक फेर बीर मरद नै गाड्डी के दो पहिये क्यों बताया करैं? कमला चुपचाप सुनै थी वा बोली - न्यों बी कैहन्ते पाज्यांगे अक आज काल ये छोरी बी कम कोन्या रैहरी। तरां-तरां की बेसिर पैर की बात बी सुणण मैं आरी सैं। न्यों कहवैं सैं अक लुगाई की जागां घर मैं सै। बाहर जाणा ए खतरे तै खाली कोन्या। सविता बोली - घर मैं कड़ै सुरक्षित सै या? घरेलू हिंसा के थोड़ी सै? बलात्कार की घटनावां मैं आधा कोढ़ घरक्यां कै रिश्तेदारां कै ए तो जिमै लागै सै। महिला ना बाहर सुरक्षित ना घर मैं सुरक्षित तो कड़ै जावैं? कविता - जावैं कड़ै फांसी खावैं अर सुरग मैं जागां पावैं।
फत्ते बोल्या - फांसी खायें कोन्या काम चालै। महिला पुरुष दोनूआं नै मिलकै लड़ना पड़ैगा। जिबै कोए राह लिकड़ैगा। सत्ते - और के इन घटनावां के खिलाफ बी तो लोगां नै राह रोके, स्कूल बंद करे, इन कोढ़ियां कै खिलाफ कार्रवाई की आवाज ठाई सै। कविता - फत्ते या बात तो सही सै अर शुभ संकेत बी सै फेर निहित स्वार्थां नै, असामाजिक तत्वां नै हालात काबू कर लिये अर ‘गाम की इज्जत’ की दुहाई दे कै न्याय की पुकार पै बर्फ की सिल्ली धर दी। सत्ते - जातिवादी पंचायत बी गाम भाईचारे अर इज्जत की दुहाई दे कै उत्पीड़ित लड़कियां के परिवार आल्यां नै अपने बयान बदलन खातर मजबूर करण लागरी सैं। रोहतक जिले का मातो भैणी गाम सै उसके स्कूल की पांचमी क्लास की दो छात्रावां नै हैडमास्टर कै खिलाफ लिखित बयान दरज करवाये। धर्म सिंह जो बाद मैं आया था बोल्या - फेर कुछ हुआ नहीं उस हैडमास्टर का? सविता - ना के होना था। एमएलए की दाब मैं दोनों पक्षों का समझौता होग्या। फत्ते - मतलब बलात्कार करो अर फेर समझौता करल्यो? सत्ते - पूरे समाज में सड़ांध मारण लागली। फेर राह कोए दीखता ना। कमला बोली - मेरै तो उन ज्ञान विज्ञान आल्यां की बात समझ मैं आई। कविता - के कहया था उननै जिब पाछै सी गाम मैं आरे थे। कमला - उसनै कहया था अक म्हारी लड़ाई कोए दूसरा लड़ण कोनी आवै। म्हारी अपनी लड़ाई हमनै खुद लड़नी पड़ैगी अर गाम-गाम मैं नये समाज सुधार आंदोलन की खातर शरीफ, ईमानदार, गरीब, अमीर, दलित, महिला, युवा सबनै सिर जोड़ कै न्यारी लीक पाड़नी पड़ैगी अर हाल साल का जो यो खरना सै यूं बदलना पड़ैगा।

लकीर हाथ की

लकीर हाथ की
पंडित देशराज नै धर्मवीर की दाईं हथेली अपने हाथ मैं पकड़ी, उसे ध्यान से सब तरफ से देख्या अर बोल्या - तुम बहोत भाग्यशाली हो। तुम्हारी विद्या रेखा बहोत साफ सै। तुम जरूर डाक्टर बनोगे। नौजवान धर्मबीर ने राज्जी होकै बूझ्या - या कौन-सी लकीर सै? देख या रही - पंडित जी नै दिखाई। धर्मबीर पंडित जी तै बोल्या - फेर या तो लकीर म्हारे लख्मी दादा कै तो कति नहीं रही होगी? मैं जाकै देखूंगा अक मेरी दादी अर दादा कै या लकीर सै अक नहीं सै। वे तो एक हरफ बी कोनी पढ़े। हाथ की लकीरों का इस तरिया मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यो भी एक विज्ञान सै।
धर्मबीर बोल्या - ना! ना! मैं मजाक नहीं उड़ाऊं था। फेर साच माच का सवाल उठ्या था मेरे मन मैं। आच्छा पंडित जी न्यों बताओ अक मैं कद मरूंगा? पंडित जी नै उम्र आली लकीर की जांच-पड़ताल करी अर बोल्या - 72 साल तै पहलम कोनी मरदा। फेर तेरी मौत कैंसर तै होवैगी। धर्मबीर बोल्या - मैं कितना किस्मत आला सूं। ईब मैं बिल्कुल चिंतामुक्त जीवन जी सकूं सूं। मनै एड्स की बीमारी लगने की भी कोए चिंता नहीं रही। मेरै कोए गोली या बम मारकै मन्ने नहीं मार सकता इस करकै मैं सेना मैं अफसर बन सकूं सूं। पंडित जी कुछ नाराज होगे। धर्मबीर ने तसल्ली देनी चाही - नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा। थारी बातां तै साच माच मैं मेरी चिंता दूर होगी। ईब मनै एक और जरूरी बात भी बूझनी सै अक के इसी कोए भी संभावना सै अक मनै पुलिस पकड़ कै ले ज्यावै, मुकदमा चलावै अर जेल की हवा खिलावै?
पंडित जी नै पूरे विश्वास तै जवाब दिया - नहीं कोए संभावना कोनी। तूं एक बड्डा अफसर बनैगा। धर्मबीर बोल्या - बहुत बढ़िया। ईब मैं निडर होकै उस बदमाश की हत्या कर सकता हूं अर फेर सेना मैं भर्ती हो ज्यांगा। पंडित जी नै बूझी - किस बदमाश की? धर्मबीर बोल्या - उस धोखेबाज नर सिंह की। मनै पक्का यकीन है अक मेरा मोबाइल उसनै ए चोरी करया सै। पंडित जी - फेर इतनी छोटी-सी चीज की खातर किसे ताहिं मार देना अपराध सै। जै पुलिस नै बेरा लाग्या तो? धर्मबीर - लेकिन आपने ही तो कह्या सै अक इसी कोए संभावना नहीं अक पुलिस मनै पकड़ सकै। असल मैं अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती। पंडित जी - अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती? क्या बकते हो? धर्मबीर - हमारे पैदा होने से पहले ही हमारा भाग्य तय हो चुका है। तो अगर मैं उसको मार भी डालता हूं तो यो पहले से तय है। किसे बड्डी ताकत नै तय करया। सारे उस बड़ी शक्ति के आदेशां पै काम करण लागरे सैं।
पंडित जी बोले - मनै बेरा पटग्या अक तूं नास्तिक सै। धर्मबीर - नाराज मत हो। मैं तो मजाक करूं था। किसे नै भी मेरा मोबाइल नहीं चुराया। क्या आपको मालूम है कि हमारी हथेली मैं इतनी लकीरें क्यों होती हैं? पंडित जी - भविष्य बताने के लिए और किस लिए? धर्मबीर - अपना हाथ ढीला करो। अपनी हथेली की चमड़ी को चुटकी मैं पकड़ कै खींचो। या काफी लचीली अर ढीली सै। ईब रेखाओं नै खींच कै देखो। ये नहीं खींचरी क्योंकि रेखाओं पर चमड़ी नीचे की मांसपेशियों से मजबूती से जुड़ी हैं। क्यों? क्योंकि यदि आप हथेली से कुछ भी पकड़ना चाहते हैं तो आपको इसे मोड़ना होगा। मोड़ने से मांसपेशियां फूल जाती हैं और चमड़ी ढीली पड़ जाती है। मगर चमड़ी हर जगह ढीली होगी तो पापड़ की तरह फूल जायेगी अर आप कुछ भी नहीं पकड़ सकोगे। इनसान के विकास के समय ये गोड़ रेखायें बनी थीं। पंडित जी - तो हाथ पढ़ना मूर्खता है? धर्मबीर - मूर्खता नहीं तो क्या है? जरा सोचो मेरे भाई अर मनै बी बताइयो अक जितने हजारों लोग सुनामी मैं मरे उन सबकी एक जिसी आयु रेखा रही होगी के?

बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन

बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन
कई दिनांतै एक शब्द पढ़ण अर सुणन मैं आ वै सै - रेशनलाइजेशन। बेरा सै के मतलब सै इसका? शिक्षा के जगत मैं इसका मतलब सै शिक्षा जगत का सुधारीकरण। स्कूली शिक्षा मैं जितने बिगाड़ पैदा होगे उन सबकी एकै राम बाण दवाई सै अर वा सै शिक्षा का सुधारीकरण अर सुधारीकरण का मतलब सै शिक्षा का निजीकरण। कहवण नै कहया जा सै अक शिक्षा मैं सुधार करया जागा अर गुणवत्ता ल्याई जावैगी। बालकां की पढ़ाई लिखाई अर उनका ठीक-ठ्याक सा रोजगार येहे दो चिंता सैं घणखरे मां-बापां की। शिक्षा का गिरता स्तर, आपाधापी अर नकल, पेपर लीकेज, प्रमाण पत्र अर डिग्रीयां की बिक्री स्कूल स्तर तै ले करके उच्च स्तर ताहिं की प्रतियोगी परीक्षावां के परीक्षा परिणामां में हेराफेरी अर और बेरा ना के-के होवण लागरया सै। एक बर की बात सै अक रमलू ताई की चाक्की राहवण चाल्या गया। घरां ताई एकली थी। पानी ल्यावण का बख्त होरया था। ताई ने सोच्ची अक इतनै रमलू चाक्की राहवै इतनै पाणी की दोघड़ भर ल्याऊं। ताई पाणी नै चाली गई। रमलू नै भूख लागरी थी। भूख-भूख मैं जोर की चोट लागगी अर चाक्की के पाट के तीन टूक होगे। सोची ले रोटी खा ल्यूं। बोइहया मैं तै रोटी ले ली तो ऊपर नै उठ्या तो ऊपर घीलड़ी लटकै थी उसकै सिर लाग्या अर वा पड़कै फूटगी। फेर सोच्ची अक कढावणी मां तै मलाई तारके उसकी गेल्यां रोटी खाल्यूं। कढावणी मैं तै मलाई तारण लाग्या तो कढ़ावणी लुढकगी अर सारा दूध गया हारे मैं। इतनै बाहर ताई की आवाज सुणी रमलू नै तो उसनै सोच्ची चाल भाजले आली ताई। भाजते-भाजते रमलू ताई की गेल्यां देहलियां पै भिड़ग्या। ताई की दोघड़ पड़कै फूटगी। तो ताई माथै हाथ मारकै बोली - रे रमलू तनै रोल्यूं। तो रमलू छुटद्या ए बोल्या - ताई ईब्बै कैसे ज्यूं-ज्यूं भीतर बड़ैगी त्यूं त्यूं रोवैगी। फेर बात थी म्हारी स्कूली शिक्षा की हालत की तो जितना गहराई मैं जावांगे जितना भीत्तर बड़कै देखांगे उतना ए रोवणा बी फालतू आवैगा।
सवाल यू है सै अक करया के जावै? हाथ पै हाथ धरकै बैठे रहवां। हाथ-पां हिलावां तो किन मुद्या पै हिलावां? गैलयां बात या बी सै अक आपां सबतै पहलम इस समस्या नै ठीक-ठीक जागां तै समझल्यां। हां तै इस रेशनलाईजेशन के नाम पै अध्यापक छात्र अनुपात 1ः60 कर दिया अर इस ढालां अध्यापकां का भी वर्क लोड बढ़ा दिया। एक और तरीका सै। मान लिया प्लस टू के स्कूल जिनमैं साइंस बी सै सौ स्कूल सैं। इनमैं 55 बायोलोजी के, चालीस कैमिस्ट्री के अर 35 फिजिक्स के लैक्चरर सैं। इसमैं होना तो यू चाहिये था अक कम तै कम 25 स्कूलां मैं तो तीनों सबजैक्टां के टीचर लाये जात्ते। उलटा ये सौ टीचर सौ स्कूलां मैं न्यारे-न्यारे ला दिये। जिस स्कूल मैं कैमिस्ट्री का टीचर कोन्या। तो बालक क्यूं दाखला लेंगे $2 मैं साइंस मैं। जिब बालकां नै दाखिला नहीं लिया तो उस स्कूल मैं वो फिजिक्स आला टीचर बी सरप्लस होग्या।
म्हारे हरियाणा मैं कितने स्कूल सैं बेरा सै के? कोनी बेरा। मास्टर जी धोरै बूझ कै देख। उसनै बी कोनी बेरा। हां तै हरियाणा मैं 8710 प्राथमिक, 1455 माध्यमिक, 1751 उच्च अर 1090 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सैं। इन मां तै बहुत से स्कूलां के मुखिया पद कई-कई बरस तै खाली पड़े सैं। मिडल स्कूल मैं 8 साल पहलम मुख्याध्यापक लाये थे। उस पाछै कोए पदोन्नति नहीं करी। प्राथमिक विद्यालयों के हैड टीचर के पद समाप्त करण की गुप्त योजना घड़ी जावण लागरी बताई। स्कूल का स्तरोन्यन (दर्जा बढ़ाई) राजनैतिक आधार पै करी जावै सै अर उड़ै अध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं करे जान्दे। प्राध्यापक कोन्या भेजे सरकार नै इस कर कै ज्यादातर ग्रामीण विद्यालयों मैं विज्ञान अर वाणिज्य संकाय बंद करने पड़े सैं। गुणवत्ता बढ़ावण के नाम पै पहली जमात तैए अंग्रेजी पढ़ावण अर कम्प्यूटर शिक्षा देवण का काम बहोत बड़ी उपलब्धी के रूप में पेश करया जावै सै। अंग्रेजी शिक्षा शुरू करण का दावा आत्मवंचना के अलावा कुछ नहीं सै। कोरा थोथा नारा सै। सच्चाई तो या सै अक छटी तै दसवीं जमात तक अंग्रेजी अनिवार्य विषय बताया, फेर पूरे प्रदेश मैं अंग्रेजी अध्यापक का एक बी पद स्वीकृत नहीं सै, पहली तै ले के दसवीं जमात ताहिं। देख्या कमाल। दूजे कान्हीं कम्प्यूटर शिक्षा के जरिये डाटा इन्फोटेक व हाइट्रोन का धंधा जरूर जमवा दिया अर गेल्यां ए अपणा बी जमा लिया। कम्प्यूटी की फीस न दे पावण करकै निर्धन बालक पढ़ाई छोड़ देवण की खातर मजबूर करे जावैं सैं। खासकर दलित वर्ग के बालक अर लड़कियां इसके सबतै बड्डे शिकार सैं। दो बरस हो लिए फेर किसे बी नये खोले गये अर कै स्तरोन्नत करे गये। विद्यालय मैं अध्यापकां-प्राध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं हो लिये। क्यों? इसका जवाब कौन देवै। बिल्ली के गल मैं घंटी कौन बांधै? दूसरे स्कूलां मां तै प्रतिनियुक्ति पै अध्यापक भेज राखे सैं। नतीजा यू हुया अक कौवा चल्या हंस की चाल, अपणी बी भूल बैठ्या, ना पुराने स्कूल मैं ठीक पढ़ाई चाल रही अर नये मैं तो चालै ए क्यूकर थी।
सैमस्टर प्रणाली बिना सोचे-समझे लियाये। इम्तिहान मैं आब्जैक्टिव टाइप विधि लियाये। तैयारी कोए कर नहीं राखी। डीपीईपी प्रोग्राम पढ़ण बिठा दिया, ईब सर्व शिक्षा अभियान नै पढ़ण बिठा देंगे। बेरा ना जनता इननै कद पढ़ण बिठावैगी अर पहलम की ढालां स्कूल अपनी रहनुमाई मैं चलावैगी। ओ दिन एक ना एक दिन आवैगा जरूर। मेरे बीरा ताश खेलते-खेलते इन बातां पै बी चरचा तो करे लिया करो। आम तौर पै कहया जा सै अक मास्टर पढ़ाते कोन्या स्कूलां मैं। याहे बात न्यों बी कही जा सके सै अक म्हारी सरकार अर म्हारी जनता कोन्या चाहती अक सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई हो। जिस दिन ये दोनूं धड़े चाहवैंगे, उस दिन स्कूलां की हालत जरूर सुधरैगी अर असल मैं असली रेशनलाइजेशन शिक्षा जगत मैं होवैगा।

किस्सा कोठी का

किस्सा कोठी का
सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, सरिता अर भरपाई शनिवार नै आ बैठे भरपाई के घर मैं। चर्चा चाल पड़ी। नफे नै बूझ लिया - सत्ते कित गया था काल? सत्ते बोल्या - शहर मैं कोठ्ठी पै गया था छोरे की भरती खातर। फत्ते बोल्या - आजकल तो कोठियां का ए बोलबाला सै। हर ज़िले मैं एक कोठ्ठी मशहूर सी होरी सै अर डीसी का आधा दफ्तर तो कोठ्ठी पर तै ए चालै सै। मैं तो एक ज़िले की कोठ्ठी का कसूता भुगतभोगी रह्या सूं। 1999 का साल रह्या होगा। सीनियर सैकेंडरी की वार्षिक परीक्षा मैं बतौर केंद्र अधीक्षक के मेरी ड्यूटी आगी। मैं इसे ढाल की ड्यूटी तै हमेश्या बचण की कोशिश करया करूं। मनै एकाध बर इसे ढाल की ड्यूटी दी सै। वा भी जिब दी जिब इसतै बचण का कोए रास्ता नहीं बच्या। थारे दिमाग मैं सवाल उठ्या होगा अक मैं इस ड्यूटी तै क्यों बचना चाहूं सूं। सीधी सी बात सै अक मैं इसके काबिल नहीं सूं। इम्तिहाना तै दो दिन पहलम बेरा लागै सै अक इबकै ड्यूटी कड़े की सै। कुछ लोग तो पहलमै बेरा पाड़लें सैं अक उनकी ड्यूटी कित लागी सै। अर कुछ तो अपनी पसंद की जगहां भी ड्यूटी लुवा ए लेवैं सैं। कई बर तो कुछ विद्यालयों के इन्चार्ज अपनी मर्जी तै अपनी पसंद के केंद्र अधीक्षकां की ड्यूटी लुवा ले सैं। एक-दो बर मेरे तै भी इसे तरां की ड्यूटी खातर ऑफर आई, फेर मैं ऑफर एक्सैप्ट कोनी कर पाया। ईबकै मेरी ड्यूटी देवशाला केंद्र पै लागगी। परीक्षा तै एक दिन पहलम मनै पहोंचना था। मैं तड़कै 10 बजे देवशाला की खातर लिकड़ लिया। कैम्प पै पहोंच कै कमरयां की निगरानी, लिपिक की व्यवस्था अर पहले पेपर की पूरी तैयारी करी। इतनी वार मैं एक महाशय आये अर मनै न्यों बोले अक मैं थामनै लेणे शहर गया था थारे घरों अपनी गाड्डी (कार) लेकै। थाम रोज क्यूं दुखी होवो आण-जाण मैं। थामनै मैं लियाया अर छोड़ाया करूंगा। उसनै कहया अक ये सारे बालक अपने सैं। मेरी तो याहे इच्छा सै अक इनका क्यूकरै भला होज्या। मनै उसका धन्यवाद करया अर उसका ओ प्रस्ताव स्वीकार कोनी करया। मैं तो घरां उल्टा आग्या। पाछे तै उस महाशय नै उन मास्टरां तै संपर्क साध्या जो सुपरवाइजर के रूप मैं उस सेंटर में ड्यूटी पे आणे थे। वे सारे नेड़े-धोरे के गामां के थे। उन मास्टरां गेल्यां के बात करी इसका बेरा मनै कोन्या लाग्या उस बख्त।
आगले दिन पहला पर्चा शुरू हुया। सारे बालक खुल्लम-खुल्ला नकल करना चाहवैं थे। मैं नहीं चाहूं था अक इस ढाल खुल्लम-खुल्ला नकल होवै सैंटर मैं। कुछ तो धरया ढक्या रैहणा ए चाहिए। फेर मेरे सारे के सारे सुपरवाइजर बगावत पै उतरेंगे। वे खुल्लम-खुल्ला नकल के हक मैं थे। मेरी बात नै कानां पर कै टाल जां थे। जिब मैं दीख ज्याऊं तो नकल रोक्कण का दिखावा सा कर दें ना तो कोए लेना-देना नहीं था। मेरी बी फिरकी बनगी। एकै बर मैं सारे कमरयां मैं जाणां पड़या। मेरी दिल तै इच्छा थी अक नकल नहीं होवण द्यूं। फेर रोकूं तै रोकूं क्यूकर? स्कूल का हैडमास्टर चाहवै, सुपरवाइजर चाहवैं, बालक चाहवैं अर उनके मां-बाप चाहवैं नकल करवाणा। मनै बी बेरा था अक मैं नकल पूरी तरियां कोन्या रोक पारया। हां, कुछ कंट्रोल जरूर कर पारया था। सांझ नै जब घरां उल्टा आवण लाग्या तो धमकी दी गई। फेर दो पेपर तो मनै किसे तरियां बिना नकल के करवा दिये। तीसरे दिन उड़नदस्ते मैं एक बड़े शिक्षा अधिकारी आगे। उनके साथ एक अध्यापक भी थे। मैं उस अध्यापक जी नै बहोत आच्छी तरियां जानूं। शिक्षा अधिकारी जी नै पहलम तो चारों कान्ही का केंद्र का दौरा करया। दिखावे खातर मेरे तै बूझया भी अक केंद्र किसा चालण लागरया सै? उननै इन्सपैक्सन बुक मैं टिप्पणी भी बढ़िया कर दी। फेर वे अपनी कार मैं जाकै बैठगे। उननै उस अध्यापक के कानां मैं कुछ घुस-फुस करी अर मेरे को अपने पास बुलाया। अधिकारी बोल्या - फते सिंह। मैं हैरान था अक अधिकारी नै मेरे नाम का क्यूकर बेरा लाग्या। खैर उस अध्यापक नै ए बताया होगा मेरा नाम। अधिकारी नै मेरै तै कह्या अक केंद्र नै ठीक-ठ्याक चला ल्यो। इस ठीक-ठ्याक का मतलब था मैं कुछ ढील द्यूं। फेर अधिकारी आगै बोल्या अक काल कोठ्ठी पै गाम की पंचायत आरी थी। कोठ्ठी पै या चर्चा थी अक इसा केंद्र अधीक्षक देवशाला गाम के केंद्र पै ठीक नहीं। यो कोठ्ठी का चुनावी हलका सै। आड़ै इतनी सख्ताई ठीक कोन्या। अधिकारी आगै बोल्या अक कोठ्ठी पर तै मेरी ड्यूटी लागी सै अक कै तो केंद्र ने ठीक-ठ्याक चलवाद्यो मतलब नकल होवण द्यो के फेर अधीक्षक नै हटा कै कोए बढ़िया अधीक्षक लगा दयो। अधिकारी विकल्प के रूप मैं पिवानी स्कूल तै एक भौतिकी का अध्यापक गेल्यां लैके भी आरे थे। मनै कहया अक मैं तो केंद्र नै ठीक-ठ्याक चलावण लागरया सूं। नकल तो मैं कोन्या होवण द्यूं। भला हो अधिकारी का। उसनै तुरत-फुरत मेरे ताहिं रिलिविंग चिट पकड़ा दी। बाकी दिनां की परीक्षाएं कोठ्ठी के मुताबिक हुई।

बढ़िया ब्यौंत, घटिया सेहत

बढ़िया ब्यौंत, घटिया सेहत
भारत देश में दुनियां मैं सबतै फालतू मैडीकल कालेज सैं। विकासशील देशां मैं भारत सबतै फालतू डाक्टर तैयार करै। इन डाक्टरां का निर्यात कर्या जावै सै कई देशां मैं अर हुनर के हिसाब तै भी ये डाक्टर ‘बेस्ट’ माने जावैं सैं दुनियां मैं। भारत देश मैं ‘मैडीकल टूरिज्म’ का व्यापार बढ़ता आवै सै। दूसरे देशां के लोग आड़ै अपणा इलाज करवावण की खातर आवैं सैं। इसका मतलब आड़ै की स्वास्थ्य सेवाएं घाट नहीं सैं किसे तै। दूसरे देशां के लोग जिन अस्पतालां मैं इलाज करवावैं सैं इनका मुकाबला दुनिया के ‘बेस्ट’ अस्पतालां तै कर्या जा सकै सै। म्हारा भारत देश महान दवाई बणावन मैं चौथे देश के नम्बर पै आवै सै अर आड़ै बणे औड़ दवाइयां का बी बड़े पैमाने पै निर्यात कर्या जावै सै। एड्स की दवाई तो विकसित देशां के मुकाबले मैं बहोतै सस्ती बनावै सै भारत देश की सिपला कम्पनी। कड़ थेपड़ण की खातर बहोत सैं इतनी काम्मल काम्मल बात। बाहर आले लोगां के स्वास्थ्य की तो जिम्मेदारी ठाली फेर भारत देश की जनता के स्वास्थ्य की के हालत सै? इसमैं कोए शक की बात नहीं सै अक ये सारे काम करने की खातर ‘रिसोरसिज’ की जरूरत तो होए सै। पीस्यां की बी अर माणसां की बी।
इसमैं बी कोए शक नहीं सै अक लोग स्वास्थ्य के ऊपर खर्च करने में वार कोनी लान्ते अर दूसरे विकासशील देशां के मुकाबले मैं फालतू खर्च करैं सैं। म्हारे धोरै इस क्षेत्र में इतने मार्के के ‘रिसोरसिज’ होन्ते होए भी जब कई गामां मैं अर शहरां मैं जाकै जनता के स्वास्थ्य के बारे मैं जानना चाह्या तो बहोत ताज्जुब हुया जब न्यों देख्या अक इन सबके बावजूद बड़ी तादाद मैं जनता की पहुंच तै दूर सैं ये क्वालिटी स्वास्थ्य सेवाएं। इसे करके स्वास्थ्य के क्षेत्र के आंकड़े भी बढ़िया कोन्या भारत देश के दूसरे देशां के मुकाबले मैं। टीकाकरण का स्तर घणा ए नीचै सै। हांगा लाकै 50 प्रतिशत तै भी कम बालकां का पूरा टीकाकरण हो पाया सै। इसे तरियां गर्भवती महिला के तीन चैक-अप होने चाहिये। फेर 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं के न्यूनतम चैक-अप बी कोन्या होन्ते। जो स्वास्थ्य सेवाएं म्हारे धौरे सैं भी उनकी ‘असैस’ उपलब्धता मैं भारी असमानता पाई जा सै। जो जितना अमीर सै उस खातर उतनी बढ़िया अर खर्चीली स्वास्थ्य सेवाएं हाजिर सैं। फेर ग्रामीण क्षेत्रां मैं तो बची खुची खुरचन के हिसाब की रूडिमैंटरी स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध कोन्या। दाखिल होवण आले मरीजां मैं अमीरां की संख्या कम तै कम छह गुणा फालतू सै गरीबां के मुकाबले मैं। देखी म्हारी ‘क्वालिटी’ स्वास्थ्य सेवाएं?
इतना भारी भरकम दवा उद्योग भारत देश मैं जो पूरी दुनिया के कई देशां मैं इन दवाइयां का निर्यात करण लागर्या जबकि भारत की दो तिहाई जनता नै आवश्यक ‘एसैनसियल’ दवाइयां का बी टोटा सै। भारत देश ‘पैरोडोक्सिज’ का अद्भुत देश सै। एक कान्हीं तो अमीर घरां की औरत ‘अननैसेसरी सिजेरियन’ आपरेशनां ते दुखी। शहरां में आधी ‘डेलिवरी’ जाप्पा आपरेशन तै होवै सैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रां की गरीब महिलाएं बच्चे नै जन्म देवण के बख्त बहोत बर मरज्यां सैं, इसे सिजेरियन आपरेशन की सुविधा उड़ै ना होवण करकै। हालांकि जनता स्वास्थ्य पै बहोत खर्च करै सैं। गरीब तै गरीब परिवार भी अपनी कुल आमदनी का आठवां हिस्सा स्वास्थ्य पै खर्च करै सै अर सरकार जनता के स्वास्थ्य पै तो बहोत कम खर्च करै सै। भारत देश मैं स्वास्थ्य पै कुल खर्च का हर स्तर की सरकार पांचवां हिस्सा खर्च करै सै फेर बाकी का सारा का सारा खर्च बीमार की जेब तै होवै सै। इसतै या बात साफ सै अक भारत देश का स्वास्थ्य ढांचा दुनियां का सबतै ज्यादा ‘प्राइवेटाज्ड’ ढांचा सै। इस ढाल कह्या जा सकै सै अक भारत देश बहोत पैराडोक्सिस आला देश सै। साइनिंग इंडिया अर सफरिंग इंडिया साफ-साफ नजर आवै सै आज के दिन। सफरिंग इंडिया का ख्याल करनिया बहोत थौड़े लोग सैं। फेर एक बात साफ सै अक यो मैडीकल टूरिज्म अर ये अपोलो अर फोरटिस बरगे अस्पताल सरकारी अस्पताल का सत्यानाश करण लागरे सैं अर वो दिन दूर नहीं जिब लोग अपने स्वास्थ्य की देखभाल की खातर सड़कां पै उतरैंगे अपनी बढ़िया सेहत की मांग की खातर। अर ले कै मानैंगे।

हरियाणा मैं महिलाएं

हरियाणा मैं महिलाएं
हरियाणा मैं हरित क्रांति के चालते अर छोटा प्रदेश होवण करकै जो आर्थिक प्रगति हुई सै इसके चलते हरियाणा नै स्टेट के विकास के मॉडल की ढालां आज पेश करया जावै सै। फेर या तो आधी सच्चाई सै, पूरी सच्चाई कोन्या विकास की। सामाजिक क्षेत्र का आकलन कुछ दूसरी ही तसवीर पेश करै सै। यह विरोधाभास क्यूं सै, यो जटिल अर गम्भीर मुद्दा सै। फेर हरियाणा के प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग नै वो पक्ष देखण के कम प्रयास करे दीखैं सैं। इसे करकै हरियाणा के आर्थिक विकास का बोलबाला ए चारों कान्ही दिखाई देवै सै। समाज का बहोत बड़ा हिस्सा, समाज के वंचित तबके, दलित, महिलांए व युवा वर्ग इस विकास प्रक्रिया के दायरे मैं नहीं आ लिया बल्कि इन तब्कयां ताहिं तो और बी हाशिये पै धकेल्या जावण लागरया सै। इसे संदर्भ मैं जो हरियाणा मैं महिलावां की हालत दिखावण आले आंकड़यां पै नजर दौड़ाई जावै तो शायद तसवीर का दूसरा रूप भी थोड़ा-बहुत सामनै उभरकर आ सकै सै। एक तरफ दीखै सै अक छोरियां की संख्या मैडीकल रोहतक मैं भी बधगी, एमडीयू मैं भी पहलम तै बधगी, दूजे कान्ही तसवीर कुछ और ए सै - हरियाणा के बारे में मशहूर सै ‘हरया भरया हरियाणा जित दूध दही का खाना।’ फेर महिलावां मैं खून की कमी के आंकड़े कुछ और हकीकत बयान करैं सैं। खून की कमी काफी ज्यादा महिलावां मैं सै। शहरी महिलावां मैं खून की कमी का प्रतिशत 45.8 सै अर देहात की महिलावां मैं यू प्रतिशत 47.5 था। गुड़ महिलावां की पहुंच तै बाहर, बथुआ अर हरी सब्जियां भी इसका मतलब इननै नसीब नहीं सैं। इसे करकै और बीमारी भी घेरे रहवैं सैं। इसे ढालां बालकां के लालण-पालण मैं भी बराबरी का हक लड़की को नहीं मिल पाया।
जैविक रूप मैं बीमारी तै लड़ण की ताकत छोरियां मैं फालतू हो सै। फेर बी लड़क्यां मैं शिशु मृत्यु दर 52.9 प्रतिशत सै अर लड़कियां मैं या दर 66.0 प्रतिशत सै। ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू आबादी मैं 25.4 प्रतिशत पुरुष निरक्षर सैं अर स्त्रियां मैं या निरक्षरता 50.2 प्रतिशत सै। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पुरुषां मैं 7.3 प्रतिशत घरेलू आबादी मैं सै अर महिलावां मैं या दर 1.9 प्रतिशत बताई। इसे ढाल हरियाणा मैं च्यार मैं तै एक पत्नी के साथ मारपीट की कम तै कम एक वजह स्वीकार करी गई सै। पांच मैं तै दो महिलाएं मतलब 39 प्रतिशत इसी सैं जिननै पाछले 12 म्हीने मैं हिंसा का अनुभव करया कै जिनकी पिटाई हुई सै। ये सारे आकड़े एनएफएचएस द्वितीय, 1998-1999 तै लिए गए सैं। 0-6 साल की उम्र मैं 1000 लड़क्यां पै 820 लड़कियां सैं हरियाणा मैं। पूरे भारत मैं लिंग अनुपात के सबतै तरले 10 जिल्यां मैं तीन हरियाणा के सैं। कुरुक्षेत्र मैं यो अनुपात 770 सै, सोनीपत मैं 783 सै और अंबाला का 784 सै। 0-6 की उम्र के बालकां मैं 331773 छोरियां की कमी सै छोरयां के मुकाबले मैं। हरियाणा मैं पुरुष साक्षरता दर 79.25 प्रतिशत सै अर महिलावां मैं या दर 56.31 प्रतिशत सै। मतलब दोनूआं का अंतर 22.94 प्रतिशत का सै। इसमैं जै दलित महिलावां के आंकड़ों का आंकलन करया जावै तो अंतर और भी घणा होगा। दलित महिलावां मैं साक्षरता की दर 34.82 सै।
ये आंकड़े असल मैं एक तसवीर पेश करै सैं। इसकी गेल्यां ए एक आंकड़ा और उभर कै आवण लागरया सै अक ज्यादातर गामां मैं दस-दस, पन्दरा-पन्दरा महिलाएं खरीद कै ल्याई जावण लागरी सैं दूसरे प्रान्तां तैं। कुल मिला कै कहया जा सकै सै अक महिला का अवमूल्यन बड़े पैमाने पै होवण लागरया सै। दूसरी तरफ कल्पना चावला, संतोष यादव अर और दो-च्यार नाम गिनवा कै कहया जावै सै अक देखो हरियाणा की महिला कितनी आगै जा ली। या बात सही सै अक इन महिलावां नै अर औरां नै भी हरियाणा का मान-सम्मान बढ़ाया सै फेर हरियाणा की सारी महिलावां का स्तर भी ऊंचा होग्या या बात ठीक नहीं लागती। यो जुमला भी खूबै सुनने मैं आवै सै अक ‘लुगाइयां नै घणा सिर पै मत चढ़ाओ।’ हकीकत मैं उनको नीचेे गिराया जा रहया सै अर कहया कुछ और जा रहया सै। कुल मिलाकै स्थिति आच्छी कोन्या। एक खास बात और सै अक आज चारों कान्ही महिला सशक्तीकरण पै जोर दिया जावण लागरया सै। ईसा लागै सै अक यू शब्द बी एक तकिया कलाम-सा बणग्या हो। जो बी सरकार आवै सै वा ‘अपनी बेटी अपना धन’ अर कै ‘लाडली’ स्कीम अर और बी कुछ स्कीम लागू करै सै। फेर ये लागू कितनी हों सैं एक बात। दूसरी बात या सै अक महिला का अवमूल्यन इस ढाल की स्कीमां तै घणा सा रुक्कण आला नहीं सै। इस सामाजिक लिंग-भेद का खातमा सामाजिक संरचनाओं मैं मूलभूत बदलाव ल्याकै अर लोगां की सोच मैं बदलाव ल्याकै ए सम्भव सै। पीस मील मैं इस ढाल की सामाजिक समस्यावां का समाधान आधा-अधूरा ए रहवैगा। आशा की बात या सै अक महिलावां नै अपना दबाव बढ़ाया सै, अपनी अभिव्यक्ति, अपने मान सम्मान अर अपनी सामाजिक सुरक्षा की खातर। फेर यू मामला सिर्फ महिलावां का मामला कोन्या, यू पूरे समाज का मामला सै। या एकली महिलावां की लड़ाई कोन्या यह पूरे समाज की लड़ाई सै। एक नये समाज सुधार आंदोलन की दरकार सै। नवजागरण का आंदोलन हरियाणा मैं कमजोर सै पर सै, उसनै तगड़ा करण की जरूरत सै। आई किमै समझ मैं अक नहीं?

सवाल हरियाणवी भाषा का

सवाल हरियाणवी भाषा का
एक दिन मनै देखा अक मेरे पास छह-सात चिट्ठी आई सैं। एक चिट्ठी थी पलवल के एक कालेज मैं पढ़ने वाले गाभरू छोरे की। उसनै लिख्या था अक थारी खरी-खोटी पै कुछ खरी-खरी बातें कहना चाहता हूं। इसमें लिखी बात पढ़ना बहोत मुश्किल हो ज्यावै है। कई शब्द बहोत गूढ़ होवै हैं। अंदाजे से बात का सार तो समझ मैं आवै है पर देर बहोत लग ज्यावै है। बात तो थारी ठीक ठ्याक होती हैं। पढ़ने की दिक्कत बहोत है, कुछ समाधान करो। हमारी लिखी बातों पर कुछ ध्यान धरो। हरियाणवी भाषा में लिखो रोहतकी भाषा में मत लिख्या करो। थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। ज्यादा फूंक मत ले जाना। दूसरी चिट्ठी थी सिरसा के नेशनल कालेज की बीए अंतिम साल में पढ़ने वाली छात्रा की। उसकी भी यही शिकायत थी कि आप हरियाणवी में तो लिखते ही नहीं, ठेठ रोहतक वालों की भाषा में लिखते हो। सिरसा के लोकां नूं इनूं पढ़ण विच दिक्कत आन्दी ए। असी पढ़णा चाहन्दे हां पर पढ़ नहीं पान्दे। किसी रोहतकी तो पढ़वानी पैन्दी ए। कई कर्मचारी ने तुहाडे इलाके दे ओ पढ़के सुनान्दे ने। गलां तां चंगियां लिखदे हो पर की करिये तुसी हरियाणवी चे लिखिया करो। तीसरी चिट्ठी मिली, जो रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के बार्डर पर बसे एक गांव के बुजुर्ग की तरफ से थी। उसने शाबाशी दी थी। पहले तो कि अलग-अलग मुद्दों पर हर इतवार को खरी-खोटी में कुछ न कुछ नई बात पढ़ने को मिलती है। फेर पढ़ण मैं बहोत मुश्किल होती है। आहिस्ता-आहिस्ता पढ़ता हूं। बात गहरी होती हैं। फेर दिक्कत तो या है कि हरियाणा की अपनी एक हरियाणवी भाषा तो कोए सै कोनी, न्यारी-न्यारी बोली सैं और हर बीस कौस पै बोली मैं फरक आ जावै है तो कई शब्द जो रोहतक मैं बोले जावैं हैं वे रिवाड़ी वालों के समझ कोनी आते। पलवल और फरीदाबाद में बृज बोली की रंगत है, मेवात में उर्दू भाषा की संगत है, म्हारी तरफ रिवाड़ी, महेंद्रगढ़ में राजस्थानी बोली की महक दिखाई देवै है तो हिसार मैं भी इसकी परछाई है। सिरसा, अंबाला, करनाल में पंजाबी की चासनी दिखाई देती है।
पानीपत, रोहतक, सोनीपत, जींद, झज्जर की अपनी रोहतकी बोली है। जींद और रोहतक मैं भी फरक नजर आवै है। पांच-छह ढाल की रंगत की न्यारी-न्यारी बोलियां नै शामिल करके साझला बाजा बजाना बहोत मुश्किल काम है रणबीर। पर मुन्नाभाई लगे रहो वाली बात है। बुजुर्ग नै आगे लिखा कि एक बात समझ नहीं आती कि पंजाब में भी बोली तो कई बोली जाती हैं - मुल्तानी, झंगी, खड़ी पंजाबी पर उन सबको मिलाकर पंजाबी भाषा का साझला बाजा बाज सकै सै तो हरियाणवी भाषा का विकास क्यों नहीं हो सकदा? इसी भाषा जिसमैं गुड़गांव, पलवल भी हो, जिसमैं मेवात भी हो, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ भी हों, हिसार, सिरसा, जींद हों। एक और चिट्ठी मैं लिख्या था अक हरियाणवी भाषा का विकास कोनी हो सकदा आज की तारीख मैं, म्हारी अपनी राजधानी ना, कोए सांस्कृतिक संस्थान नहीं, कोए आपसी संवाद नहीं। हां, इन सारी बोलियां के शब्द हिन्दी भाषा में शामिल करकै खड़ी हिन्दी का विकास करकै ही हरियाणवी साझला बाजा बन सकता है। सपना खुल ग्या। देख्या तो कड़ै चिट्ठी थी। पर साची साच बताऊं सूं ये चिट्ठी सपने मैं पढ़कै मेरा आगला कालम रोहतकी मैं लिखने का साहस माड़ा सा बी कोनी बच्या। दो दिन और दो रात सोचें गया अक इन चिट्ठियों मैं जो बात लिख राखी सै उनके हिसाब तै तो मैं रोहतक, झज्जर और सोनीपत के लोगां की खातर कलम घिसाई करण लागरया सूं। बाकी का हरियाणा? पता नहीं उनकी खातर किसा लिखूं के करूं? सन् 66 मैं हरियाणा बन्या। हमनै बड़े-बड़े काम कर दिये। बहोत विकास करया। आदर्श हरियाणा बना कै छोड्या हमनै। हरित क्रान्ति लियाये। फेर हरियाणवी भाषा कित सै? मेरे तै घणे स्याणे, मेरे तै फालतू ज्ञानी ध्यानी, हरियाणा अर हरियाणवी संस्कृति के ठेकेदार, हरियाणा के भीतर हों चाहे हों इसके बाहर, सबतै रणबीर का हाथ जोड़ कै नमस्कार, मेरी बातां पै थोड़ा घणा बैठकै करियो कदे विचार, हरियाणवी बोलियां कैसे बनैं हरियाणवी भाषा रूपी हार, रणबीर को रहवैगा हमेशा थारे सुझावां का इंतजार। यू मसला सै टेढ़ा इसका मनै सै पूरा-पूरा ख्याल, म्हारे थारे सबके स्याहमी सै यो एक गम्भीर सवाल - हरियाणा असल मैं हरियाणा सै बी अक नहीं अक सूके बजावां-सा गाल, हरियाणा आल्यो सवाल का जवाब पड़ै ढूंढना आज नहीं तो काह्ल। हिन्दी भाषा करैगी म्हारी सम्भाल अक हरियाणवी भाषा दिखावैगी अपना कमाल। हट हट कर मेरे कानों मैं गूंजै सै सपने मैं पढ़ी चिट्ठियों मैं ठाया गया सवाल। अपनी तरफ तै पांचों-छहों रंगत की बोलियां का ध्यान राखूंगा अर कोशिश करूंगा अब रोहतकी बोली तै थोड़ा-बहोत बाहर आ पाऊं। पास फेल की बात न्यारी, जतन करने की जिम्मेदारी म्हारी, थाम बी खरी-खोटी आये इतवार पढ़ने का प्रयास राखियो जारी।

पैरेलल इकोनोमी

पैरेलल इकोनोमी
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता और ताई भरपाई शनिवार नै पहोंचगे जन चेतना केंद्र मैं। सरिता बोली - इस जन चेतना केंद्र मैं हमै हम आवां सां हमनै और माणस बी बुलाने चाहियें। सविता बोली - हम तो शनिवार नै आवां सां। बाकी दिनां मैं भी इसमैं कुछ ना कुछ प्रोग्राम होन्ते रहवैं सैं। म्हारै रविता बतावै थी दस बारा दसमी की छोरी कठ्ठी होकै लाइब्रेरी मैं किताब का वाचन कर्या करैं। पाछले मंगलवार नै सदगति कहानी की किताब पढ़कै चरचा करी थी, उसनै। म्हारी चर्चा मंडल तो इस जन चेतना केंद्र तै भी पुराना सै। खैर आज की बातचीत पै आगे। सत्ते बोल्या - आज पैरेलल इकोनोमी पै चरचा करनी थी अर तैयारी करके आनी थी सविता नै। सविता बोली - इसनै समानान्तर अर्थ व्यवस्था भी कहदे सैं। यह सालाना घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत मतलब 12,00,000 करोड़ रु. जरूर सै। कविता बोली - हे मनै राम की सूं। इतना घणा काला धन तिजोरियां मैं क्यूकर आवै सै? सविता बोली - 12,00,000 करोड़ रु. धरण की खातर बेरा ना कितने गोदाम बनाने पड़ैंगे? रुपइया धर्या नहीं जाता यो इन्वैस्ट कर्या जा सै - धन्ध्यां मैं कै फेर बैंका मैं। काला धन राखण आले लोग इस धन नै धरती मैं गाड कै कोनी राखते, इस पीस्से तै और धन कमावैं सैं अर ब्याज बणावैं सैं। फत्ते बोल्या - न्यौ क्यूकर? सविता बोली - उसे दुकानदार कै मिल मालिक नै लेल्यां सैं जिसनै बिलटी घोटाले तै काला धन बनाया था। उसनै कई जागां खुद घूस देनी पड़ै सै। सेल्स टैक्स, एक्साइज इंस्पैक्टर, पुलिस, बाबू लोग, लोकल नेता, ये सब सम्भालने पड़ते हैं। पर नकद! काले धन का इस्तेमाल एक समानान्तर नकद अर्थ तंत्र में होता है जड़ै नकद चालै सै।
ताई भरपाई बोली - बोरियां मैं, थैलियां मैं, सूटकेसां मैं - मनै फिल्मां मैं देख्या सै - नकद नारायण। फत्ते - चलो फिल्मां तै कुछ तो सीख मिली तनै। सरिता बोली - और के बैंक मैं खाता खुलवाना हो तो कितने पापड़े बेलने पड़ैं सैं - स्थाई पता, दूसरे खाते आले की सिफारिस आदि। शहरां मैं लाखां का रहवण का ठिकाना ए कोन्या तो बैंक खाता कड़े तै खुलै था। नकद ही बढ़िया सै। सबकी खातर बराबर...। सविता बोली - ठीक कह्या सरिता नै। इसतै न्यारा गाम मैं भी नकद का चलण बहोत सै। भारत के बैंकां मैं कुल जमा राशि लगभग 15 लाख करोड़ रु. सै अर सालाना उत्पाद मतलब एक साल की कृषि, उद्योग अर सब कुछ की उपज ही लगभग 30 लाख करोड़ रु. सै जिसमां तै बचत दर जै 20 प्रतिशत (असल मैं 18 प्रतिशत सै) भी मान ली जा तो इसका मतलब यू हुआ एक साल मैं 6 लाख करोड़ रु. की बचत हैवे सै। मगर बैंका मैं जमा राशि की सालाना बढ़त सिर्फ लगभग 45 हजार करोड़ रु. सै। फत्ते बोल्या - सविता सारा हिसाब किताब आजैए सिखावैगी के। बहोत कसूती तैयारी करकै आरी दीखै सै। न्यों बता या समानान्तर अर्थ व्यवस्था के हमेशा न्यारी रहवै सै? सुन्या सै आज काल काला धन भी सफेद बनाया जा सकै सै?
सविता बोली - तेरे कान तो बहोत तेज सैं फत्ते। तनै ठीक सुन्या सै। काला धन हमेशा काला नहीं रैहन्ता। अनेक रास्त्यां तै गुजर कै बहोत सा काला धन बैंकों मैं आकै सफेद होज्या सै। फत्ते बोल्या - सविता ये बैंक तो सरकारी सैं। ये बैंक इस काले धन नै पकड़ क्यों नहीं लेन्ते? सविता बोली - या बात समझण की सै अक बैंक सरकारी होन्ते हुये भी अलग संस्थान सैं। सरकार का कर विभाग न्यारा सै। बैंकिंग कानून के हिसाब तैं पैसा जमाकर्त्ता तै यो नहीं पूछया जान्ता अक यो धन घोषित सै अक अघोषित सै। साथ-साथ एक बात और सै अक बैंक जै काला धन पकड़ण कै पकड़वावण लागै तो उसके पास पीस्सा जमा कूण करावैगा? सरिता बोली - फेर ये बैंक यो काला धन धंधों मैं क्यूकर लावैं सैं? काला धन्धा तो नहीं करते ये? सविता बोली - एक बर बैंक में जमा हुए पाछै धन काला कै सफेद नहीं, बस धन हो सै। यो व्यापार, उद्योग, कृषि के कामां मैं ब्याज पै उधार दिया जावै सै। सत्ते बोल्या - एक मिनट सविता। पहलम न्यों बता अक यू काला धन बैंकां मैं आवै सै क्यूकर? बोर्यां मैं भरकै जमा कराया जावै सै के? सविता बोली - तम न्यों बूझो सो एक काला धन सफेद क्यूकर होसै? बैंक मैं आण का मतलब सै धन का घोषित हो जाना, सफेद हो जाना। यो बहोत बड़ा ही धन्धा सै। पहली तो बात या सै अक भारत मैं हम 20 हजार रुपये तै ज्यादा की भुगतान नकदी मैं नहीं कर सकदे, बैंक मैं जमा नहीं करा सकदे। बाहर के देशां की बात और सै...। सत्ते - ज्यूकर स्विस बैंक के खाते? सविता - हां, बोरियां मैं ले ज्या कै पीस्से जमा हो सकैं सैं। कैहण का मतलब यू सै अक या पैरेलल इकोनोमी काबू आवण की कोन्या जब ताहिं हम तम सारे इसनै आच्छी ताहि नहीं समझल्यांगे। हमनै ताश खेलण तै फुरसत कोन्या।