रविवार, 28 मई 2017

कोल्हू का बछेरा

कोल्हू का बछेरा
पुराने जमाने की बात सै। एक गाम में एक व्यापारी रहया करता। उसके पास एक घोड़ी थी। घोड़ी पर सवार होकै वो व्यापार करने जाया करता। एक बार व्यापारी घोड़ी पर सवार होकै लम्बे सफर पै चाल पड़या। घोड़ी थी वा गर्भवती। लाम्बी यात्रा करकै घोड़ी मुश्किल तै चाल पावै थी। थकावट बी आगी थी। व्यापारी नै सड़क के किनारै तेल निकालने वाले एक कोल्हू को देख्या। उस बख्त वहां कोई नहीं था और कोल्हू बी बंद था। व्यापारी घोड़ी तै नीचे उतरया अर घोड़ी कोल्हू कै बांध दी। पास के गाम मैं चल्या गया। वहां पेट भरकै खाणा खाया अर घोड़ी की खातर बी जरूरत के हिसाब तै चना ले लिया। इस बीच घोड़ी नै एक सुंदर से बछेरे को जन्म दे दिया अर उस कोल्हू का मालिक बी वहां पहुंच गया। उसने घोड़ी और बछेरे को देखा तो उसने मन मैं लालच आ गया। उसनै घोड़ी के बछेरे को अपने घर ले जाने की सोची। व्यापारी के लौटने से पहले ही वह बछेरे को अपने घर उठा लेग्या। जब व्यापारी वापस आया तो उसको पता चल्या अक कोल्हू का मालिक बछेरे को अपने साथ अपने घर ले गया। वह बछेरे को मांगने के वास्ते कोल्हू के मालिक के घर पहोंच गया। व्यापारी बोल्या - कोल्हू के मालिक मेरा बछेरा मुझे वापस दे दो। कोल्हू का मालिक तेज आवाज मैं बोल्या - यो बछेरा तो मेरा सै। इसे मैं तनै क्यूं द्यूं? व्यापारी नै फेर हाड़े खाये - कोल्हू के मालिक मेरी घोड़ी ने इस बछेरे को जनम दिया सै। मेरा बछेरा मनै दे द्यो। फेर कोल्हू का मालिक बछेरा वापस करने के लिए तैयार नहीं था। कोल्हू का मालिक बोल्या - नहीं यो मेरे कोल्हू का बच्चा सै। इस करकै यो मेरा सै।
इब व्यापारी नै बी गुस्सा आया अर वो बोल्या - कोल्हू कै भी कदे बच्चे पैदा होवैं? तुम मनै बेवकूफ क्यों बनाओ सो। इस पर व्यापारी अर कोल्हू के मालिक के बीच तेज-तेज आवाज मैं बहस होवण लागगी। शोर-शराबा सुन कै गाम वाले भी आगे। झगड़ा निबटावण की खातर पंचायत बुला ली गई। पंचायत के साहमी व्यापारी ने अपना दावा पेश करया और कहा - बछेरा मेरा है क्योंकि मेरी घोड़ी नै इसे जनम दिया सै। कोल्हू के मालिक नै कहया - नहीं मेरा कोल्हू बछेरे का बाप सै। उसनै या बात बड़ी तेज आवाज मैं जोर तै चिल्ला कै कही। गांव में बड़े-बूढ़े सारे चक्कर मैं पड़गे। वे समझ नहीं पा रहे थे अक इस झगड़े का निबटारा क्यूकर करैं? काफी देर तक सोचते रहे इस मामले पर फेर कोए नतीजा नहीं काढ़ पाये। आखिर मैं थक-हार कै उननै कहया - कोल्हू के मालिक तुम म्हारी बात सुणो अर घोड़ी के मालिक थाम बी सुणो। केवल थारे बयान पै हम विश्वास नहीं कर सकते इस करकै गवाह चाहिये। तुम दोनों कल आओ अर साथ अपने-अपने गवाह भी ल्याओ। गवाहों की बात सुनने के बाद ही हम कोए फैसला कर पावांगे। फैसला होने तक बछेरा पंचायत के पास रहेगा। व्यापारी बेचारा जंगल मैं चलया गया। उसनै घोड़ी को घास चरण की खातर छोड़ दिया अर खुद एक पेड़ की छाया मैं लेटग्या। वो असल मैं बहोत परेशान था। उसकी समझ जवाब देगी थी। उस ए बख्त एक लोमड़ी उड़े कै गुजरी। लोमड़ी नै परेशानी मैं घिरया व्यापारी देख्या अर उसतै बूझया - व्यापारी जी बहोत परेशान लागो सो। के बात? व्यापारी ने जवाब दिया - मनै घोड़ी कोल्हू कै बान्धी। घोड़ी नै बछेरा जनम्या। कोल्हू का मालिक बछेरा ठा लेग्या। पंचायत नै गवाह मांगे सैं। कोल्हू का मालिक आड़े का रहवण आला सै वो तै आसानी तै गवाह ले आवैगा। मैं के करूं?
लोमड़ी बोली - व्यापारी तुम परेशान मत होवो। मैं गवाही देउंगी। अगले दिन पंचायत बैठी तो कोल्हू का मालिक एक झूठा गवाह ले आया। गांव वालों ने व्यापारी से पूछा तो व्यापारी बोल्या - लोमड़ी मेरी गवाह सै। इसपै सारे हंस पड़े। बाट देखी लोमड़ी की। कोनी आई। आखिर घणी बाट दिखाकै आई लोमड़ी। वा जोर-जोर की जम्हाई लेवै थी। पंचायत नै पूछया - अरै लोमड़ी, तनै इतनी देर क्यों करदी? लोमड़ी नै नींद मैं जवाब दिया - सम्मानित बुजुर्गों, कल रात समुद्र मैं आग लाग गी अर मनै पात्ती गेर-गेर कै आग बुझाई। सारी रात लागगी। इसे करकै देर तै आई सूं। सारी रात सो नहीं पाई। सारे बूढ़े एक आवाज में चीखे - झूठ, झूठ। लोमड़ी सफेद झूठ बोलगी। मान भी लेवैं अब समुंद्र मैं आग लागगी तो पात्ती तै क्यूंकर बुझाई जा सकै सै? लोमड़ी पंचायत के गुस्से तै डरी कोन्या। अर अपनी बात पै डटी रही। पंचा तै बूझया - जै समुन्द्र मैं आग नहीं लाग सकती, अर जै वा आग पात्ती तै नहीं बुझाई जा सकदी तो बछेरा कोल्हू का बालक क्यूकर हो सकै सै? लोमड़ी के इस सवाल पर पंचायती चुप। कोए जवाब नहीं सूझया। उनकै अपनी गल्ती समझ मैं आगी। उननै व्यापारी का बछेरा वापस कर दिया। पंच परमेश्वर की कहानी मुन्शी प्रेम चंद जी नै लिखी। फेर कड़ै सैं उसे पंच परमेश्वर। हरियाणा के पंचायती तो इन पंचायतियां तै बी दो चन्दे फालतू सैं। इस पंचायत नै तो बछेरा कोल्हू का बालक बणाया फेर म्हारे आजकाल के पंचायती तो बीर-मरद नै बाहण अर भाई एक मिनट मैं बणा दें। चाहे आसण्डा हो, चाहे जौन्धी हो, चाहे नया बास हो। एक खास बात और सै अक व्यापारी की मदद मैं लोमड़ी तो आगी थी। इन पंचायतां के फतव्यां कै साहमी बोलण की हिम्मत कोए नहीं करदा। हरियाणा मैं तो इन फतव्यां के भुक्त भोगियां की लोमड़ी जनवादी महिला समिति दीखै सै जो जाथर थोड़ा होत्ते भी कई सालां तै बहोत घणा बोझ ठावण लागरी सै इन मामल्यां मैं। हरियाणा मैं जब ताहिं तर्क, विवेक अर वैज्ञानिकता की सोच जन-जन मैं पैदा नहीं होवैगी इतनै ये पंचायती न्योंए खेलें जांगे म्हारी जजबातां तै।

हरियाणा नम्बर वन

हरियाणा नम्बर वन
सते फते नफे सविता कविता सरिता नमिता संगीता अर ताई भरपाई जन चेतना केन्द्र मैं आई अर दुख-सुख की बतलाई। कविता बोली - के बात आज सरिता कमनू सी लागै सै। सरिता बोली - कमनू सी के, बातै कुछ इसी सै। कविता - बता तो सही के बात सै। चरचा करैगी तो किमै राह बी लिकड़ैगा। सरिता बोली - म्हारी रिस्तेदारी नंूह कान्ही से मेवात मैं। उड़ै गई तो बेरा लाग्या अक गाम के दो माणसां नै जिनमैं एक सरपंच का भानजा भी था एक बहू की गेल्यां खेतां में जोर जबरदस्ती कर ली। पहलम तो पुलिस नै ए रिपोर्ट लिखण मैं दिन मैं तारे दिखा दिये। बेरा ना वे कित कित घुमा दिये। महिला पुलिस का चक्कर पड़ग्या फेर। एक पुलिस आला तो बोल्या अक ताली एक हाथ तै कोन्या बाजती। सुनकै उसके घर आला बहोत दुखी हुया फेर के करै? उसका गांव तिगाव पी एच सी के तहत आवै सै। अर इस पी एच सी मैं कोए बी लेडी डाक्टर कोन्या। उड़े तै चाल कै नूंह के अस्पताल में आये तो बताया अक महिला डाक्टर एकै ए सै अर वा रक्साबन्धन पै छुट्टी लेकै जारी सै। बहू का बुरा हाल। कोए इलाज नहीं शुरू हुया अर लोगां के तान्ने वे न्यारे। घरआला बोल्या होलदार नै अक होरी सै डाक्टरी, तूं हमनै म्हारे घरां जानदे। नूंह तै चाले-चाले माण्डी खेड़ा पहोंचे। यो मेवात जिले का जिला स्तर का अस्पताल सै। उड़ै बी एक लेडी डाक्टर ठेकेदारी आले खाते मैं ला राखी। वा बोली अक म्हारे ताहिं इस तरियां के मैडीकोलीगल केस करण की इजाजत कोन्या।
बड़े हाड़े खाये फातमा के घरआले नै, फेर उस डाक्टरनी नै कति हाथ खड़े कर दिये। घरआले नै उसके पां पकड़ लिये तो वा छोह मैं आकै बोली - मेरी नौकरी मैं डांगर हांड ज्यावैंगे। मैं नहीं कोए मदद कर सकदी थारी। फेर पां पकड़ण का एक फायदा होग्या अक उस लेडी डाक्टर नै उसका केस गुड़गावां के सीएमओ कै रैफर कर दिया। रात होगी। कित जावैं? होलदार उड़े के थाने मैं लेग्या। फातमा के घर आले का दिल धक-धक करै था अक कदे और लेने के देने पड़ज्यां। फेर ओ होलदार बढ़िया माणस था। क्यूकरै रात उड़ै काटी अर आगले दिन बख्तै गुड़गामा के अस्पताल मैं पहोंचगे। उड़ै लेडी डाक्टर की घंटा भर बाट देखी। आई तो कागज देखे अर कागज देख के बोली अक यो तो मेवात जिले का केस सै इसका दूसरे जिले का डाक्टर परचा नहीं काट सकदा। फातमा के घरआले की पाहयां तले की जमीन लिकड़गी। करै तो के करै? बताओ उसनै आगै के करना चाहिए था? होलदार गुड़गामा के सीएमओ धोरै गया। सीएमओ साहब कितै बीजी थे। एक घन्टे पाछै आये। पूरी बात सुनी फेर बोले अक यह तो मेवात के जिला अस्पताल में ही होगा। के बीती होगी फातमा अर उसके घरआले के दिल पै या बात शब्दां मैं ब्यान करना बहोत मुश्किल सै। अंग्रेजां के बख्तां मैं सुन्या करदे अक भारतवासियां खातिर ना कोए दलील थी ना अपील थी। फातमा के घरआले नै इसा महसूस हुया जणो तो अंग्रेजां का राज हटकै आग्या। वे डिंग आगे नै धरैं अर पां पाछै नै जावैं। एक अखबार ले लिया उसनै। बस मैं बैठे तो पहला पेज पढ्या उसमैं लिख राख्या था हरियाणा नम्बर एक बनाना सै। प्रति व्यक्ति आय मैं हरियाणा नम्बर एक पै आ लिया।
फातमा बोली - म्हारी खातिर इन नम्बरां के के मायने सैं? खैर चाल कै फेर माण्डी खेड़ा आगे। उड़ै आये तो सिविल सर्जन साहब नहीं मिले। कित गये कोए बता कै देवै ना। छुट्टी पै सैं? ना छुट्टी पै बी कोन्या। तो कित सैं न्यों बी बेरा कोन्या। आखिर मैं दुखी होकै होलदार नै अपने मेवात के एसपी तैं बात करी अर सारी राम कहानी बताई। एसपी नै डीसी गुड़गामां तै बात करी। डीसी गुड़गामा नै सीएमओ तै बात करी। सीएमओ नै बताया अक सीएमओ गुड़गामा कोओपरेट कोनी करर्या।
डीसी बोल्या मेवात पूरे जिले में बस एक लेडी डाक्टर सै रैगुलर बेस पर? सीएमओ बोल्या - एक ही है जी और वह बी छुट्टी पर गई हुई सै। डीसी साहब नै गुड़गामा के डीसी साहब ताहिं कही अर उसनै फेर गुड़गामा के डीसी ताहिं कही अर फेर फातमा गुड़गामा गई अर उड़ै उसका मैडीकल हुया। ईब्बै आगै और के के बनैगी उसका बेरा कोन्या फातमा नै। मनै जिब या सारी बात सुनी तो मन बहोत उदास हुया। कविता बोली - बात तो उदास होण की नहीं, कुछ करण की सै। पाणी तो सिर पर कै जा लिया इस नम्बर वन हरियाणा मैं। यो एकले मेवात का रोला नहीं सै। कमोवेश पूरे हरियाणा की याहे तस्वीर सै। आई किमै समझ मैं?

बेटियां खरल गांव की

बेटियां खरल गांव की
सते, फते, नफे, सविता, कविता, सरिता और ताई भरपाई शनिवार की शाम को फिर इकट्ठे हो जाते हैं। फते कहता है - गाम मैं तो लड़कियों का जीना मुहाल होग्या। गली में आती-जाती लड़कियों पर बहोत छींटाकसी करते हैं लोग। कोए किसे म्हां कै बोल मारदे अर कोए किसे के म्हां कै बोल मारदे। किसे का ब्योंत नहीं रह्या अक इननै कोए किमै कहदे। ऊपर ताहिं पहोंच सै इनकी। मनै तो गाम के घणखरे लोग मानसिक बीमारी का मरीज दिखाई देवैं सैं। ना छोटी बच्ची सुरक्षित अर ना सत्तर अस्सी साल की बुजुर्ग औरत। कोए रिस्ता इसा नहीं बचरया जो कलंकित ना हुया हो अर गम्भीर बात या सै अक लड़कियां उन्हीं के द्वारा धोखेबाजी की शिकार हुई जिन पर उननै सबतै ज्यादा विश्वास करया।
सरिता बोली - बूझो मत ना! महिला ना तो घर के बाहर सुरक्षित और ना ही घर के अन्दर। किसे घर मैं चाचा का छोरा तो किसे घर मैं ताऊ का तो कितै जीजा तो कितै पड़ौसी जवान होती लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करके या बहला-फसला कर कुकर्म करते हैं। परिवार वालों को जब पता लगता है तो सारी बातां पै माट्टी गेरण खातर डाक्टर के पास लेकर जाना पड़ता है।
सते कहता है - क्या करैं? पूरा माहौल ही खराब हो लिया। सविता ने कहा - माहौल खराब तो करनिया तम अर इसनै ठीक कौन करैगा? माहौल ठीक तो जब होगा जब थामनै ताश खेलण तै फुरसत हो। इस जन चेतना केन्द्र मैं भी हफ्ते मैं एक दिन हाड़े खवा कै आओ सो। ज्ञान-विज्ञान आले बतावैं थे अक युवतियां नै ग्रामीण जीवन मैं चौबीस घण्टे मैं एक भी मिनट का मौका किसे काम के करण के बख्त इसा कोन्या अक वे आध-पौण घण्टा आपस मैं कठ्ठी होलें अर दुख-सुख की बतलालें।
सते बोल्या - या बात तो सविता की सही सै अक बाकी तबके तो किसे-ना-किसे बाहणै कठ्ठे होलें सैं फेर इन नौजवान छोरियां नै तो इसा कोए मौका नहीं।
सविता बोली - जै किमै सुधार करना सै गाम मैं तो इन युवक-युवतियां ताहिं कोए तो इसा काम टोहवणा पड़ैगा जिसके करण तै इनकी ऊर्जा का, ताकत का सही-सकारात्मक इस्तेमाल हो।
फते बोल्या - इनने न्यारे न्यारे राहण द्यो क्यों भिरड़ां के छत्ते कै हाथ लाओ सो।
सरिता बोली - इस न्यारपन करकै तो घणा नाश होवण लागरया सै। घर मैं जो बिगाड़ सै वो किस ढाल के न्यारपन तै ठीक होवैगा? इसमैं कोए दो राय नहीं अक युवक-युवती कठ्ठे होकै अपना रास्ता जिब ताहिं नहीं खोजैंगे बात कोन्या बणै। न्यारे करकै के काढोगे या तो घर मैं बी सुरक्षित कोन्या। यो म्हारी नजर का खोट सै। हम औरत नै भोग की वस्तु अर बालक बणावण की मशीन तै न्यारा कुछ समझते ए कोन्या। यो अपने पड़ौस मैं खरल गाम नहीं सै उड़ै पाछले साल तै ज्ञान-विज्ञान आल्यां नै लड़कियां की हाकी की टीम खड़ी करी सै। ब्लॉक मैं जीती वा टीम फेर जिले में जीत हासिल करी अर स्टेट मैं पांचमा स्थान हासिल करया। म्हारे गाम मैं क्यों नहीं खड़ी हो सकदी छोरियां की हाकी की टीम अर कबड्डी की टीम? नफे बोल्या - बिल्ली के घण्टी कौण बान्धै? बेरा ना के के बात बणावैंगे लोग। सरिता बोली - खरल गाम की छोरियां नै के कुछ नहीं सुनना पड़या? घरक्यां नै रोक लानी चाही, मोहल्ले आल्यां नै बेरा ना के-के सुनाई। खेल की ड्रैस पै नाक चढ़ाई। सांझ नै वार करकै घरां आवैं इसपै वे धमकाई। कई पेज भरे जा सकैं सैं उन मुसीबतां के जो इन लड़कियां नै ठाई। पर उननै भी एक समझ बनाई। आत्म विश्वास दिखाया। अर एक खास बात मैं बताना चाहूं सूं वा या सै अक वे कती नहीं घबराई। लड़के लड़कियां मैं साझली प्रेक्टिस करकै दिखाई। इस साल उननै अपना निशाना स्टेट के कप पै ला राख्या सै। शाहबाद की लड़कियां की हाकी की टीम तै टक्कर लेवण की पूरी तैयारी करण लागरी सैं। खरल गुरुकुल की लड़कियां नै हाकी टीम मैं शामिल होण की हां करदी बताई। इतना कुछ चुटकी बजान्ते नहीं होग्या। घर के समझाये, मोहल्ले आले समझाये अर गाम आले समझाये। इजाजत तो दे दी फेर कई सवाल हवा मैं ईब बी घूमें जावैं सैं। फेर लड़कियां का जोश देखण जोगा सै। लड़के बी पाछै कोन्या। उनकी बी टीम खूब मेहनत करण लागरी सै। यो सिर्फ हाकी का मामला नहीं सै। वे युवक-युवती मिलकै एक नई स्वस्थ संस्कृति की नई शुरूआत करण लागरे सैं।
सते बोल्या - तो म्हारे जन चेतना केन्द्र नै एक काम करना चाहिये अक हाम गाम की लड़कियां की साइकिल रेस करावां अर जो फर्स्ट, सैकण्ड, थर्ड आवैं उननै इनाम देवां। नफे बोल्या - इसमैं तो शहर मैं साइकिल पै पढ़ण जावण आली छोरी बाजी मार लेज्यांगी। कविता बोली - लड़कियां की न्यारी दौड़ अर बहुआं की न्यारी दौड़ करवाद्यांगे। फते बोल्या - कूण आवै सै थारी साइकिल रेस मैं। सते बोल्या - तेरे बरगे फांच्चर ठोक हरेक गली मैं एक-दो, एक-दो पाज्यांगे। फेर खरल आली बेटियां की हिम्मत देख कै हम पाछै कदम कोनी हटावैं। या बात सही सै अक नौजवानां नै किमै ढंग का काम करण का मौका नहीं मिलैगा तो फेर वे उल्टे कामां मैं लागैंगे। और लोगां नै कोस्सण की जागां आपां नै कुछ सकारात्मक कामां खातर पहलकदमी करण की जरूरत सै।
खरल मैं के लड़कियां की हाकी की टीम इतनी आसानी तै बनी होगी? खूब हांगा लाया होगा हाकी सिखावणिया पी टी आई नै अर ज्ञान विज्ञान आल्यां नै। ये छोटी-छोटी पहलकदमी हरियाणा मैं समाज सुधार आन्दोलन की नींव की ईंट सैं, इसतै ए नवजागरण का आन्दोलन अपनी रफतार पकड़ैगा। महिला, पुरुष, नौजवान, कमजोर तबके - सारे मिलकै एक माहौल पैदा करैंगे तो बुराइयां तै लड़या जा सकैगा।

अकबर बीरबल के किस्से

अकबर बीरबल के किस्से
अकबर अर बीरबल के बहोत किस्से म्हारे बीच मैं सैं। एक बर की बात सै अक अकबर अर बीरबल सैर करण लागरे जंगल मैं। इतनी वार मैं उननै देख्या अक औरत एक झाड़ी की आड़ मैं गई अर एक बालक नै जन्म दे कै बालक नै गोद मैं लेकै चाल पड़ी। अकबर बीरबल नै यू सब कुछ देख्या फेर बोले कुछ भी नहीं। रानी को भी बच्चा होने वाला था। राजा नै महल में जाकर रानी की सेवा मैं लगे सभी नौकर चाकरों व दासियों को हटा दिया। दो दिन में ही रानी परेशान हो गई कि क्या कारण है कि राजा अकबर ने यह सब मेरे साथ किया। बहुत सोच विचार के बावजूद राजा का यो व्योवहार रानी नहीं समझ पाई। रानी नै बीरबल धौरे संदेश भेज्या। बीरबल राजमहल में पहोंच ग्या। उड़ै पहोंच कै देख्या तो एक बर तो उसकै बी कोन्या समझ मैं आई बात। फेर उस दिन जंगल आला सीन घूमग्या बीरबल के दिमाग मैं। बीरबल नै रानी तै कहया अक बाग बगीचे के सारे मालियां नै बुलाओ अर कहो अक कल तै वो काम पै नहीं आवेंगे। माली हैरान! फेर रानी का हुकम। टालै क्यूकर। तीन चार दिन मैं बाग बगीचे के पौधे अर फूल सारे मुर्झागे। राजा अकबर नै देख्या तो दरबारी बुलाकै बुझया अक इन फूलां कै के होग्या? ये मुर्झा क्यूं गये?
दरबारी बोल्या - महाराज रानी साहिबा नै हुकम दिया था माली हटावण का अर बीरबल की सलाह पै रानी नै ये सब हटाये सैं। और दो च्यार बात न्यून-न्यून की लादी दरबारी नै बीरबल के बारे मैं। राजा अकबर नै रानी तै बूझया ये माली क्यों हटा दिये इन फूलां का ख्याल कूण करैगा? रानी नै जवाब देवण की जागां सवाल दाग दिया - थामनै महाराज मेरे नौकर-नौकरानी क्यूं हटा दिये। मेरी देखभाल इसे बख्त मैं कूण करैगा? अकबर नै जंगल का पूरा किस्सा सुनाया रानी ताहिं अर बोल्या जिब वा महिला झाड़ी के पाछै जाके जाप्पा कर सकै सै तो रानी क्यों नहीं? इतनी सुविधा रानी नै क्यूं चाहिये? रानी नै कोए जवाब कोनी सूझया अर वा बीरबल की कान्ही लखाई। बिना बोले बात होगी उनकी। बीरबल बोल्या - राजा धिराजा। जंगल मैं जितने पेड़ सैं, कीकर सैं, इननै कौनसे माली सींचैं सैं? वे तो आप पलैं बढ़ैं सैं। तो फेर आड़े के बाग बगिच्यां मैं मालियां की के जरूरत सै? राजा अकबर कै अपनी गल्ती समझ मैं आगी अर उसनै रानी को नौकर चाक्कर हटकै ला दिये अर बाग बगिच्यां के माली बी हटकै आगे।
अकबर राजा बीरबल नै अपना दोस्त मान्या करदे। योहे कारण था अक बाकी के दरबारी बीरबल तै बहोत घणा जल्या करदे। हर बख्त इस टोह मैं रहया करदे अक कद मौका मिले अर बीरबल के बारे में राजा आगै शिकायत ला सकैं। बख्त बख्त पै अकबर नै बीरबल के खिलाफ भड़कान्ते रहया करते। इसे ए किसे मौके पै अकबर नै बीरबल पै गुस्सा आग्या अर अकबर बोल्या - बीरबल आजकाल थाम बहोत चर्चा मैं सो। बहोत शिकायत आवण लागरी सैं थारी। काहल तै दरबार मैं मतना आइयो। बीरबल बोल्या - आपका हुकम सिर आंख्यां पै। इतना कहकै बीरबल राजदरबारां तै गायब होग्या। थोड़े दिन पाछै अकबर नै बीरबल की याद आवण लागगी। उसकी कमी खलण लागगी। दरबार मैं भी राजा अकबर का मन लागना बंद होग्या। राजा अकबर नै बीरबल बहोत ढूंढयां फेर भाई तो पाकै ए कोन्या दिया। थक हार कै अकबर नै बीरबल नै टोहवण की एक तरकीब काढ़ी। राजा नै ऐलान करवा दिया - म्हारे राज के लोग अपने साथ आधी धूप अर आधी छांव लेकर कै राज महल मैं पहोंचैं।
राजा अकबर नै आगले दिन देख्या अक् एक गांव के लोग खाटां नै सिर पै ठाये चाले आवण लागरे सैं। इन खाटां मैं मौजूद छेदां के म्हांकै छनकै किते धूप अर कितै छां उनपै पड़ण लागरी थी। या देखकै अकबर एक दम समझग्या अक जरूर इसे गांव मैं बीरबल रहवै सै। फेर अपने शक नै अकबर यकीन मैं बदलना चाहवै था। राजा अकबर नै खबर भिजवाई अक महल मैं गाम के सारे कुआं की दावत सै। जै गाम आले अपने कुएं दावत मैं नहीं भेजैंगे तो उन ताहि सजा दी जावैगी। उसी शाम गांव का प्रधान दरबार मैं आया अर न्यो बोल्या - बादशाह सलामत दावत मैं आवण की खातर म्हारे सारे कुएं राज्जी सैं फेर उनकी एक शर्त सै। राजा बोल्या - बताओ के शर्त सै। प्रधान बोल्या - वे जिबै दावत मैं आवैंगे जिब बुलावा देवण खुद महल का कुआं उनकै धौरे आवैगा। बिना बुलावे क्यूकर आ सकैं सैं आखिर इज्जतदार कुएं सैं। प्रधान का जवाब सुणकै राजा अकबर जोर तै हंस पड़या। उसकै पक्का यकीन होग्या अक उसे गाम मैं सै बीरबल। राजा नै पत्र भेजके बीरबल बुला लिया अर एक बै फेर दरबार की रौनक उल्टी आगी। बीरबल हमेश्या सोच समझकै, विचार करकै, विवेक तै बातां नै आछी ढालां समझ परख कै किसे बात का जवाब हाजिर जवाबी ढंग तै दिया करदा। दूसरी बात या भी थी अक उसका तर्क करण का आधार जमीनी आधार हुया करदा हवा मैं बात नहीं करया करदा बीरबल कदे।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग
     सत्ते फत्ते नफे सविता कविता सरिता और भरपाई शनिवार नै फेर चर्चा केंद्र मैं पहोंचगे। उड़ै उनका प्रेरक श्यामू बी था। पहलम तो उननै आठ मार्च पै एक गीत गाया अर फेर सत्ते बोल्या - यो राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के बला सै? नफे बोल्या - होगा किमै हमनै के लेना देना इसतै। सविता बोली - लेना देना क्यूं ना, म्हारे बालकां की आगे की पढ़ाई का सीधा-साधा नाता सै इस आयोग तै। मनै पढ़ी थी इसकी वार्षिक रिपोर्ट जो आयोग नै प्रधानमंत्री ताहिं रिपोर्ट टू द नेशन-2006 के नाम तै पेश करी सै। इसमें कह्या गया सै अक देश का भाग्य उन 55 करोड़ लोगां के हाथां मैं सै जो 25 बरस तै कम उम्र के सैं अर जो ज्ञान संबंधी पहलकदमियां तै सबतै फालतू लाभान्वित होवैंगे। उच्च शिक्षा दुनिया मैं दाखिल होवण आली 18 तै 24 साल की म्हारी आबादी का सिर्फ 7 फीसद हिस्सा ए उच्च शिक्षा मैं दाखिला ले पावै सै। यो आंकड़ा एशिया के औसत का सिर्फ आधा ए सै। इस करकै ज्ञान आयोग नै देशभर मैं 1500 विश्वविद्यालय खोलण की बात कही सै जिस करकै भारत 2015 तक सकल दाखिले का कम तै कम 15 फीसदी हिस्सा हासिल करण मैं सफल हो सकै। नफे सिंह बोल्या - ये तो बहोत बढ़िया सिफारिश कर दी। सविता बोली - या तो सही बात सै अक विश्वविद्यालयां, अंडरग्रेजुएट कालेजां नै प्रतिभा केंद्र बणावण की बात तो करी सै अर हाशिये पै पड़े अर वंचित तबक्यां की शिक्षा तक पहुंच आदि के मामल्यां मैं सुधार करण की सिफारिश बी सैं। नफे सिंह बोल्या - देखियो कितनी बढ़िया बात कर दी राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। मनै नहीं बेरा था इन बातां का। सविता बोली - फेर इन सिफारिशां मैं एक नुक्ता सै। सरिता बोली - के नुक्ता सै सविता? सविता बोली - एनकेसी ने अपनी रिपोर्ट मैं जो पहलकदमियां सुझाई सैं अर कै जो नुस्खे बताये सैं वे इन बातां कै ठीक उल्टे बैठे सैं। ये नुस्खे उस बिरला अंबानी रिपोर्ट मैं सुझाये गये नुस्ख्यां तै न्यारे कोन्या। इन पै गौर करके देखना पड़ैगा।
     इस रिपोर्ट का असली मकसद उच्च शिक्षा का निजीकरण सै। इसे तरियां वाइस चांसलर सर्वशक्तिमान हो ज्यांगे अर किसे के साहमी जवाबदेह नहीं रहवैंगे। इन हालातां मैं विश्वविद्यालयां का जनतांत्रिक प्रशासन जिस बी हद ताहिं आज मौजूद सै वो खत्म हो ज्यागा। इसे तरियां इस आयोग नै एक इंडिपैंडैंट रेगुलेटरी एथॉरिटी फार हायर एजुकेशन (आईआरएएचई) की स्थापना का प्रस्ताव भी सुझाया सै। इसतै सिंगल विंडो क्लियरेंस का इंतजाम होगा। धक्के खावण तै बच ज्यांगे। यो बहोत ताकतवर होवैगा। इसपै कोए सरकारी नियंत्रण नहीं होगा। इसका मतलब राज्य सरकारां के अधिकार कालेज खोलण के कै विश्वविद्यालय खोलण के खत्म हो ज्यांगे अर इस एथॉरिटी पै आ ज्यांगे। ये कालेज अर यूनिवर्सिटी अपने खर्चे पानी का इंतजाम क्यूकर करैंगे। इस पर भी लीपापोती-सी करकै कह्या गया सै अक ईब सरकार उच्च शिक्षा पै सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 फीसदी खर्च करै सै पर सही मैं यो 2 फीसदी नहीं तो 1.5 फीसद तो जरूर होना चाहिए। 2012 ताहिं इतना खर्चा करण का भरोसा-सा दिवाया गया सै। इतनै किततै करैं खर्चा? नफे सिंह बोल्या या बात बी सही सै।
     सविता बोली - आयोग नै तो आड़े ताहिं कैह दिया अक सार्वजनिक विश्वविद्यालय नै अपनी जमीन का इस्तेमाल वित्त के एक स्रोत के रूप मैं करना चाहिए। मतलब यूनिवर्सिटी की धरती बेच कै अपना खर्चा पूरा करना चाहिए। अर न्यों बी कह्या सै अक कायदे तै फीसां तै यूनिवर्सिटी के कुल खर्च का कम तै कम 20 फीसद तो काढ़णा ए चाहिए। मतलब फीस बधाओ पढ़निया चाहे भाड़ मैं जाओ। नफे सिंह बोल्या - फेर होश्यार अर जरूरतमंद छात्र फीस कड़े तै ल्यावैंगे। सविता बोली - आयोग का यू भी सुझाव सै अक जरूरतमंद छात्रां की फीस माफी करी जानी चाहिए अर गेल की गेल उनकी शिक्षा की लागत पूरी करण की खातर वजीफ्यां का इंतजाम भी होना चाहिए। नफे सिंह बोल्या - मास्टर जी तो न्यों बतावैं थे अक वजीफे फालतू करण की बात तो और बी कई कमेटियां नै करी फेर वजीफ्यां खातर तो बजट आये साल घटदा आवण लागर्या सै। ये फीस बधावण की साथ-साथ वजीफ्यां के बधावण की बात बी करैं सैं अक फीस बधावण का विरोध जरूरतमंद छात्र ना करैं। इसे ढाल की निजी निवेश बिना मुनाफे के करण की सिफारिश बी करी सै। फेर किसके सिर मैं खाज होरी सै अक ओ बिना मुनाफे की आस करें शिक्षा जगत मैं 100 करोड़ रुपइये लावैगा।
     सविता बोली - आयोग की रिपोर्ट मैं न्यों बी कह्या गया सै अक विदेशी विश्वविद्यालय भारत मैं आवैंगे तो भारत की शिक्षा की गुणवत्ता बधैगी। गुणवत्ता बधावण की आड़ मैं इन बदेशियों की लूट पै माट्टी गेरण का काम कर्या सै इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। देशी अर बदेशी एकै कानून कै तहत काम करैंगे या भी सिफारिश करी सै। देशी संस्थानां नै सरकारी फंड मिलैं सैं तो बदेशियां नै वे क्यू कर मिल सकैं सैं? असल मैं एनकेसी की इस रिपोर्ट मैं भारत मैं उच्च शिक्षा का जो पूरा ढांचा पेश किया गया सै वो कुलीनतावादी सै अर देश के 25 साल तै कम उम्र के युवाओं के भारी बहुमत की खातर फायदेमंद नहीं होवैगा। यो इसा ढांचा सै जो 2015 ताहिं दाखिल्यां नै 15 फीसद तक बढ़ावण की जागां इननै घटावैगा। तो देखियो मेरे बीरा ताश खेलते खेलते दो बात इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशां पै बी कर लियो। समझ ल्यो इसके भीतर की बारीकियां नै अर चलाओ कोए तुरप चाल अक म्हारे बालकां के कालेजां के अर यूनिवर्सिटियां के दरवाजे बंद ना हो ज्यां अर फेर हम न्यों कहवां - ओहले! हमनै के बेरा था न्यों बण ज्यागी?

म्हारा असली बैरी कौण ?

म्हारा असली बैरी कौण ?
कमलू - इन बदेशी कंपनियां मैं अर अमरीका मैं बी ठनी सै कदे। सरला - ईब ताहिं तो ठनी नहीं सै। बेशक कबरी कबरी बोली बोलती हों फेर बख्त आण पै एक होज्यां सैं। ठमलू - अर एक बात का और चाला कर दिया इन कंपनियां नै। सरोज - माड़ी खोल के बता। ठमलू - हवा, पानी, आकाश सारे कै जहरीली गैसां का जहर घोल दिया अर किसे की सुनते ना। रमलू - तो फेर या दुनिया जीवैगी क्यूकर? कमलू - इननै ठेका सै। उननै तो अपने मुनाफे तै मतलब सै। इननै सत्ते अर सरोज तै के लेणा। सरला - दखे पूरी मानवता नै अर मनुष्य की जात नै खतरा पैदा होग्या सै। रमलू - एक बात सै। सरला - कौनसी? रमलू - ये तो जहर घोलै सै फेर हम बी तो जहर घोलण मैं उनका साथ देन्ते आगा पाछा कोन्यां देखते। सरोज - हमनै अपना आप्पा ए ना देखना शुरू कर्या सै, आगा पाछा कूण देखैगा। ठमलू - अरै या बात तो समझ आगी अक अपने मुनाफे की खातर इन कंपनियां नै नाश कर दिया, फेर करां के? कमलू - म्हारी तो टपगी भाई। फेर दुनिया के नौजवान युवक युवतियां नै ये सारी बात देखनी और समझणी पड़ैंगी। सरला - या तो यही बात सै अक जवान लड़कियां नै शामिल करे बिना बात सिरै कान्या चढ़े। रमलू - सही बात सै ईब तो इस जवान पीढ़ी तै ए कुछ उम्मीद सै।
सरोज - इननै या पूरी वैश्वीकरण अर उदारीकरण की मार झेलनी सै। ठमलू - इन खूंखार अर जंगली बहुराष्ट्रीय कंपनियां के वार झेलने सैं। सरला - इन नौजवानां का भी राह बान्ध दिया इन कंपनियां नै। ठमलू - वो क्यूकर? सरला - नशा, हिंसा अर अश्लीलता सारे कै परोस राखी बताई इन ताहिं। ठमलू - और के इनकी सोच, इनके रहण सहण के ढंग बदलण लागरी सैं ये कंपनी। सरोज - इननै गुमराह करण लागरी सैं। कमलू - इन कंपनियां नै डर सै अक कदे यो नौजवान तबका थारे खिलाफ ना खड्या होज्या। रमलू - नौजवानां मैं सांस्कृतिक प्रदूषण कसूती ढाल फैलावण लागरी सैं ये कम्पनी अर म्हारी बड्डी-बड्डी कम्पनियां आले।
सरला वातावरण का प्रदूषण बी तो उतनी ए रफ्तार तै फैलावण लागरे सैं। ठमलू - और के कितै भूचाल आवै सै, कितै बाढ़ आवै सै, अर कितै तापमान बधग्या। सरोज - यो सारा प्रदूषण जहरीली गैसां के करकै बध्या सै। सरला - म्हारे पर्यावरण का भठ्ठा बिठा दिया इन कंपनियां नै। ठमलू - इनके कारखाने और बी कसूता काम करण लागरे सैं। रमलू - धरती के तले का पानी कति खराब हो लिया बताया। कमलू - नौजवानां की बात चाली थी। इन ताहिं दारु की बोतल पकड़ा दी। सरोज - छोरियां गेल्यां छेड़छाड़ करनी सिखादी टीवी नै। सरला - कितना ए समझाल्यो फेर समझै ना आंती इनकै। ठमलू - ना समझैंगे तो और दुख पावैंगे। रमलू - ये फेर घणखरे नौजवान इसे कोन्या। वे चाहवै सै किमै करना। सरला - पर एक नौजवान, एक गांव, एक प्रदेश, एक देश के न्यारा न्यारा इन बहुराष्ट्रीय खूंखार जानवरां का मुकाबला कर सकै सैं के?
कमलू - कोन्या कर सकदा। कुछ ना होना जाना। रमलू - अमरीका का आज मुकाबला कूण कर सकै सै? सरोज - न्यों कहवैं सै क्यूबा करर्यासै मुकाबला। ठमलू - सही बात सै। इसनै ईब ताहिं गोड्डे नहीं टेक लिये। सरला - तो इस मन्डी के खूंखार जनावरां तै क्यूकर निबट्या जा? कमलू - मतलब म्हारे इन आढ़तियां की लूट तै बच्चण का राह बी शामिल कर लियो। सरोज - समाज मैं बसी जनता नै अपनी अपनी जागां जात गोत नात भूलकै कठ्ठ बणाकै संघर्ष का बिगुल बजाना पड़ैगा। ठमलू - मतलब एक नौजवान तै शुरू करकै पूरे गाम मैं। रमलू - एक गाम तै शुरू करकै पूरे प्रदेश मैं। सरोज - एक प्रदेश तै शुरू करके पूरे देश मैं। कमलू - एक देश तै शुरू करकै पूरी दुनिया मैं बिगुल बजाणा पड़ैगा। रमलू - तै असल मैं न्यों हो सकै सै के? सरला - हो क्यों ना सकदा। फेर मिनिस्टरां के बस्ते ठाकै कोन्या होवै। ठमलू - चोरी करकै? कमलू - चौबीस घंटे दारू पीकै? सरोज - स्मैक चढ़ाकै? रमलू - घरआली की पिटाई करकै? ठमलू - बलात्कारियां का साथ निभाकै? कमलू - टीवी ऊपर उघाड़ी फिल्म देखकै? सरला - अपना आप्पा खतम करकै? ठमलू - बिन आई फांसी खाकै? कमलू - सब क्याहैं नै बिसराकै ईब काम कोन्या चालै। रमलू - तो काम क्यूकर चालैगा? कमलू - काम चालैगा सोच विचार करे तै, बात नै सही ढंग तै समझ कै संगठन की ताकत बाध करे तै। सरोज - सारे कठ्ठे होकै इस अमरीका कै अर इसके बाजारवाद के खिलाफ हमला बोलैंगे तो बात बणैगी। रमलू - इस खातर तै फेर घणी ए तैयारी की जरूरत पड़ैगी दीखै सै। ठमलू - काम आसान नहीं सै।

हरियाणा के मर्दों कित सो?

हरियाणा के मर्दों कित सो?
किंग्स्टन विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के हिसाब तै, यूके (ब्रिटेन) मैं विश्वविद्यालय की ऊंची फीस चुकावण की खातर छात्राएं बढ़ती संख्या में वेश्यावृत्ति करण नै मजबूर सैं। जै या नहीं तो सैक्स उद्योग के दूसरे धंधे करण नै मजबूर सैं। सुणकै अर पढ़कै एकबै तो रोम-रोम मैं करंट-सा दौड़ग्या, बेरा ना थारै किमै असर हुआ सै अक नहीं? लानत सै यू के सरकार पै जो लोगां नै तो फालतू तै फालतू निचोड़न लागरी सै अर लाखां करोड़ां पौंड उस सेना पै खर्च करण लागरी सै जो दुनिया भर मैं ‘सत्ता पलटन’ की अमेरिका की मुहिम मैं तहलडू पार्टनर के तौर पै काम करण लागरी सै। टोनी ब्लेयर की सरकार नै शिक्षा मैं जो सुधार लागू करे सैं उनके बुरे नतीजे साहमी आवण लाग रहे सैं। फेर म्हारे माथे की जमा फूटली जो वो सब कुछ हमनै कति दिखता ए कोन्या। जिस अध्ययन का जिकरा सै उसमैं कह्या गया सै अक यूके मैं छात्र जब तैं ओ फीस बधी सै तिब तैं कपड़े तारलें सैं, लैंप डांस करैं सैं, मसाज पार्लरों मैं अर एस्कार्ट एजेंसियां मैं काम करैं सैं। इसतै पहलम बी सुणण मैं आया था अक यूके मैं छात्राएं शिक्षा खातर लिये औड़ कर्जयां की मासिक किस्त जमा करावण कि खातर अपणे अंडाशय बेचण पै मजबूर हुई सैं। ये कर्ज उनने अपणी शिक्षा पूरी करण की खातर लिये बताये।
औड़ आ लिया धरती का। म्हारे नजदीकी दो तीन कंप्यूटर इंजीनियर जारे सैं यूके मैं। फेर वे तो यूके की बड़ाई करते ए कोन्या थकते। यूके न्यू अर यूके न्यूं। यूके मैं उनकी नाक तलै छात्राएं अपना शरीर बेच्चण लागरी सैं अर साथ मैं अपनी आत्मा बी अक ज्ञान अर डिग्री हासिल करण का वे अपना सपना पूरा कर सकैं। आई किमै समझ मैं अक नहीं? जै एक विकसित देश यूके मैं या हालत सै तो तीसरी दुनिया के देशां गेल्या के बनैगी? लाया सै कदे बिचार अक ताश ऐ खेलते रहोगे। यूके अर अमेरिका बरगे देशां के मालिक चाहवैं सैं अक तीसरी दुनिया के देश बी इस गल्त राही पै उनकी गेल्यां आ ज्यावैं। कित सैं म्हारे वे पंचाती जो एक छोरे अर छोरी के अंतर्जातीय ब्याह पै तो गैहटा तार कै धरदें, मौत के फतवे सुणादें। इसा ब्यौंत सै तो जारी करद्यो नै टोनी ब्लेयर के खिलाफ भी फतवा जो म्हारी छोरियां नै वेश्यावृत्ति की राही दिखावण लागर्या। दूसरी बात या बी तो सोच्चण की सै अक जै एक विकसित देश यूके मैं जड़ै न्यू मान्या जावै सै अक उड़ै सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली बहोतै मजबूत सै तो म्हारे बरगे देशों का के बनैगा? म्हारे देशां मैं तो कसूती ढालां शिक्षा का निजीकरण अर व्यवसायीकरण होवण लागर्या सै। भारत मैं भी इस ढाल के नतीजे आवण मैं वार कोन्या।
म्हारे देश मैं भी वाणिज्य मंत्रालय नै हाल मैं ए एक परिचर्चा पत्र जारी कर्या सै जिसमैं बार-बार फीस बढ़ावण की बात पै जोर दिया गया सै। या बढ़ी फीस पढ़निया छात्र अर छात्रावां धोरे वसूली जावणी सै। इस परिपत्र मैं या दलील दी गई सै अक ‘बाजार की पहुंच की फीस बरगी मौजूदा सीमावां का हटाया जाणा बहुत जरूरी सै जिसके चालते कैपीटीशन फीस नहीं वसूली जा सकदी या मुनाफा नहीं कमाया जा सकदा।’ जै यै सुझाव मान लिये गये तो के होगा? हरियाणा मैं इसके परिणाम इस साल बी देखण मैं आये सैं। कई डैंटल कालेज प्राइवेट सेक्टर मैं खुलगे। इनकी खातर सरकारी कालजां का पीएमटी टैस्ट हुया अर प्राइवेट कालजां का एंट्रैंस टैस्ट हुया। इनके मेरिट लिस्ट के बालकां तै बी डैंटल की सीट पूरी कोन्या हुई तो साधारण प्री मेडिकल के बालकां नै दाखिले की छूट दी गई पर इन कालेजां की सीट फेर बी कोन्या भरी गई। 30-35 सीट फेर बी खाली रैहगी। क्यों? सोच्चण की बात सै। इन प्राइवेट कालेजां मैं एक साल की फीस डैंटल छात्रां की डेढ़ लाख सै। मतलब 12500 रुपये म्हीना फीस अर होस्टल का बाकी खर्चा न्यारा। मतलब 20,000 रुपये म्हीने का खर्चा। किसका ब्यौंत सै इतना पीस्सा खर्च करण का?
हाल मैं ए म्हारे प्रधानमंत्री जी ने भी सेवाओं को विदेशी व्यापार की खातर खोल्लण की बात करीं सैं अर इसमैं शिक्षा बी शामिल सै। ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना के दृष्टिपत्र मैं भी फीस बढ़ावण की याहे दलील दी गई बताई सै। योजना आयोग बी शिक्षा की लागत पूरी करण की खातर आंतरिक संसाधन जुटावण की अर यथार्थवादी ढंग तै फीस बढ़ावण की बात करदा बताया। इसमैं कोए दो राय नहीं अक जै हमनै इन खून चूसण आली जोकां तैं खुली छूट दे दी तो म्हारी शिक्षा प्रणाली का नाश लाजमी सै। या पूरे देश नै अर इसके नागरिकां नै चुनौती सै अक इसी नीतियां का विरोध कर्या जा। कड़ै सैं वे हरियाणा के मर्द अर उनकी पंचायत जो गाम की इज्जत के नाम पै म्हारे गाभरूआं नै अर छोरियां नै फांसी पै लटकावण के फतवे जारी करैं सैं? इस पूरी बात पै उनका के कहना सै? यो तै पूरे हरियाणा की अर पूरे देश की इज्जत का सवाल सै। आज संबंधित आयु वर्ग के महज 8 फीसदी बालक ही विश्वविद्यालय ताहीं पहोंच पावैं सैं म्हारे देश मैं जबकि अनेक विकासशील देशां मैं यो आंकड़ा 20 तै 25 फीसदी ताहिं का सै। जै फीसां मैं और बढ़ोतरी करी जावै सै तो ये हालात और बी घणे बिगडै़ंगे। हम छात्रां मैं बढ़ती आत्महत्या पहलम ऐ देख चुके सां। ये वे छात्र सैं जो देशभर के शिक्षा संस्थानों द्वारा वसूली जावण आली अनाप-शनाप फीस चुकावण मैं असमर्थ सैं। अर जै फीस और बी बधगी तो के बनैगा यो बतावण की कड़ै जरूरत सै। तो के केरां? करांके बैठे ताश खेलते रहवां अर लाम्बी सांस भरकै कहवां फलाणे के छोरे अर छोरी की किस्मत मैं मौत इसे ढाल की लिख राखी थी। दूसरा राह सै अक इन बातां पै बिचार करां अर इस बाजारवाद का अर फीस बधण का डटकै विरोध करां। या म्हारे बालकां की लड़ाई सै इसनै म्हारे लड़ें पार पड़ैगी और दूसरा कूण लड़ैगा म्हारी लड़ाई।
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विवेक पै विवेकहीनता का हमला

विवेक पै विवेकहीनता का हमला
तर्क, युक्ति, विवेक, अनुसंधान, प्रयोग अर परीक्षण के बिना विज्ञान का विकास नहीं हो सकदा। शुरू तै ए विज्ञान अपने इन पुख्ता आधारां पै खड़या होके आगै बढ़या। इनके आधार पर वैज्ञानिकां मैं यो मानकै चलने का नैतिक बल और साहस आवै सै अक वे ईब ताहिं सही समझे जावण आले सिद्धान्तां नै चुनौती दे सकैं। नये सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकैं अर इस बात खातर तैयार रहवैं अक इनै आधारा पै उनके सिद्धांतां ताहिं बी चुनौती दी जा सकै सै अर नये सिद्धांत उसके सिद्धांता नै गल्त साबित कर सकैं सैं। फेर आज के दिन या बात देख कै हैरानी होवै सै अक खुद विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान के इन आधारां नै नष्ट करण का काम करया जाण लागरया सै। इसतै बी घनी हैरानी की बात या सै अक यो काम विज्ञान के विरोधी तो करैं सो करैं बल्कि वैज्ञानिक कहे अर माने जावण आले लोग भी यो काम करण मंडरे सैं अर बड़े पैमाने पै। जै एक हरफी बात करनी हो तै यो इस विवेक पै विवेकहीनता का हमला कहया जा सकै सै। अर यू हमला इतना जबरदस्त सै अक विज्ञान विवेक की दिशा मैं आगै बढण की बजाय उसतै पाछे नै हटता हुया दिखाई देवै सै। सोचण की बात सै अक इसा क्यूं हुआ अर इसके संसार अर मानवता पै के असर पड़ैंगे। फेर सोच्चण की फुरसत किसनै सै? जै कोए सोचना समझना चाहवै सै तो उसकी खातर पढ़ण नै एक आच्छी किताब सै ‘साइंस एंड दि रिट्रिट फ्रॉम रीजन’ जो मर्लिन प्रैस लन्दन तै 1995 मैं छपी सै। या किताब लंदन के दो लेखकां जॉन गिलैट अर मनजीत कुमार नै मिलकै लिखी सै। जॉन गिलैट गणितज्ञ सैं अर मनजीत कुमार भौतिकी अर दर्शन के विद्वान सैं।
पहलम विज्ञान की प्रगति नै समाज की प्रगति की नींव मान्या जाया करदा। साथ मैं यो विचार अक मानवता को विज्ञान के द्वारा पूर्णतर बनाया जा सकता है, प्रगति का आधार था। यो विचार सबतै पहलम ठारवीं सदी मैं एक फ्रांस के गणितज्ञ अर दार्शनिक कोंदोर्से ने अपनी किताब ‘मानव मस्तिष्क की प्रगति की एक ऐतिहासिक झांकी’ (1794) मैं व्यक्त करया था। फेर ब्रूनो नै जिन्दा जलावण आलै हरेक युग मैं हुये सैं अर आज भी सैं। एक अंग्रेज पादरी था माल्थस जिसनै फांचर ठोक कहदें तो गलत बात नहीं उसनै कोंदोर्से के विचार का विरोध करया ‘ऐस्से ऑन दि पिं्रसीपल ऑफ पापुलेशन’ (1798) मैं अपनी किताब छपवा कै। इसके बावजूद पीछे सी ताहिं कोंदोर्से का सिद्धांत काम करया करदा। उस बख्त लोगां के दिल में या आस थी यो विश्वास था अक विज्ञान के दम पै समाज की प्रगति, मानवता की प्रगति बहोत आगे ताहिं करी जा सकै सै। उननै उम्मीद थी कि अक वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी हो सकै सै अर होवैगी अर आम आदमी की जिन्दगी मैं खुशहाली आवैगी। हरित क्रांति के दौर मैं हरियाणा के लोगों नै बी खूब सपने देखे थे। फेर कितने लोगां के सपने पूरे हुए अर कितन्यां के सपने टूट कै चूर-चूर होंगे? वैज्ञानिक प्रगति तै आर्थिक विकास तो हुया फेर सामाजिक विकास पिछड़ता चल्या गया। आम आदमी के मन मैं विज्ञान के प्रति मोह भंग के हालात पैदा होगे। क्यों? सोच्चण की बात सै।
भारत मैं भी विकास का योह मॉडल तबाही मचावण लागरया सै। भारत महाशक्ति बणाण के सपने देखैं सैं फेर 80 प्रतिशत जनता का गला घोंट के महाशक्ति बण बी जावैगा तो के फायदा? एक बर फेर विवेक पै विवेकहीनता की जीत का मौका आ ज्यागा। भारत बहोत बड़ी आबादी आला देश सै, इस करकै आड़ै कुशल श्रमवाली, कम पूंजी आली अर म्हारे प्राकृतिक संसाधनां नै नुकसान ना पहोंचावण आली प्रौद्योगिकी ताहिं प्राथमिकता मिलनी चाहिए। फेर इसकी जागां आपां कैपिटल इंटेंसिव प्रौद्योगिकी अपनावां सां तो एक तरफ तो हम अपने देश के बहोत से श्रमिकों नै बेरोजगार बनावां सां अर दूसरी तरफ नई प्रौद्योगिकी बाहर से ल्यावण पै अपनी औकात तै फालतू खर्च करकै कर्ज के शिकंजे मैं फंस ज्यावां सां अर फेर विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर विश्व व्यापार संगठन बरगी संस्थावां की उन शर्तां नै माणण नै लाचार हो ज्यावां सां। ये शर्त म्हारे देश की अर्थव्यवस्था के प्रतिकूल होवैं सैं। या बात साफ सै अक जै हम ज्यादा श्रम आली अर स्थानीय ज्ञान प्रणालियां पै आधारित प्रौद्योगिकी नै विकसित करांगे तो म्हारे काम तै रोजगार बधैंगे, जनता के जीवन में खुशहाली आवैगी। जनता हमनै अपना मित्र अर हितचिंतक मानैगी अर एक बेहतर जीवन दृष्टि अपना कै अज्ञात अर अंधविश्वास फैलाने आली अवैज्ञानिक ताकतां के खिलाफ लड़ण मैं सक्षम हो सकैगी। बिल्कुल अनपढ़ अर गरीब किसान भी जानै सै अक अपने खेत मैं उसनै जो फसल पैदा करनी सै वह खाद बीज पानी वगैरह के साथ ही हो सकै सै। या फसल ना तै हिन्दुत्व, भारतीयता अर कै सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारयां तै पैदा होगी अर ना किन्हीं अंधविश्वासां अर कर्म काण्डां तै। हटकै विवेक अपनी जागां बनावैगा अर जनपक्षीय विज्ञान का विकास होगा। जिसतै समाज का आम जनता का विकास होगा। काम आसान नहीं। फेर मुश्किल बी कोन्या जै जनता के समझ मैं आज्या तो। समझल्यो तावले से मेरे बीरा। मनै बेरा सै अन्धविश्वास पैर फैलान्ते जाण लागरे सैं।

सांझी खेती

सांझी खेती
आज किसानी पर संकट बहोत गहरा सै। किसान आत्म हत्या करण लागरे सैं। कोए उनकी सुध लेवणिया बी कोन्या। इसे हालात मैं यू सांझा खेती का अनुभव रोशनी दिखा सकै सै हमनै।
किसान कोओपरेटिव बाण्डा हेड़ी हिसार की स्थापना लगभग वर्ष 2004 में एक बड़े परिवार के लगभग 10 किसानों के समूह नै की। मुंढाल हरियाणा के लगभग मध्य मैं स्थित चौबीसी पंचायत खाप के तहत आने वाला 250-300 वर्ष या इससे भी पुराना गांव सै। वर्तमान मैं इसमें तीन पंचायते हैं - मुंढाल खुर्द व कलां दो पंचायतें भिवानी जिला में सैं जबकि बांडा हेड़ी पंचायत हिसार जिला में पड़ै सै। देखने में व बस्ती के हिसाब से पूरा गांव एक ही लगता है और पहले पंचायत भी एक ही हुया करदी। ईब तीनों गामां की कुल आबादी लगभग 15 हजार होगी।
वर्ष 1995 में आई बाढ़ की वजह से लगभग पूरे गांव और विशेष तौर पर बाण्डाहेड़ी के खेतों में जो सोरखी गांव की तरफ हिसार-दिल्ली मार्ग के साथ पड़ते हैं, खड़ी फसलों में भारी नुकसान हुया था। सितम्बर मास के शुरू में आई बाढ़ तै सावनी की फसल की बिजाई भी बड़े हिस्से में नहीं हो पाई। असल में काफी सालों के बाद इतनी ज्यादा बरसात एकदम हुई थी, इस दौरान बनी सड़कों व छोटी नहरों तथा नालियों के कारण जमीन के कुदरती लेवल में अन्तर होने से बरसाती पानी के बह कर आगे निकल जाने के कुदरती रास्ते बन्द होगे इसलिए पानी लम्बे समय तक वहीं खड़या रहया। बस्ती के कुछ हिस्से में भी पानी घुसा, बीमारियां भी आई, बाढ़ के पानी को निकलवाने के सरकारी इन्तजाम भी काफी नहीं थे। वैसे यह बाढ़ की समस्या अकेले बान्डा हेड़ी व मुंढाल की न होकर पूरे क्षेत्र की थी और इसने जमीनी पानी के स्तर को ऊंचा कर दिया था। मतलब चौआ ऊपर आग्या। नहरों के साथ तो समस्या और भी ज्यादा थी। इस ढाल हर साल बरसात में पानी भरने की समस्या स्थाई हो गई। पानी भराव के कारण इससे फसलों का नुकसान भी हर वर्ष होवण लाग्या। इन वर्षों में खेती की लागत तो नई कृषि नीतियों के कारण बढ़ती गई पर पैदावार इस क्षेत्र में अनिश्चित होती गयी जिसनै अपने आप मैं एक नये संकट को जन्म दिया।
छोटी जोत के किसानों की समस्या तो और भी गम्भीर थी। अकेले-अकेले वह न तो अपने खेत से पानी निकालने के लिए पम्प सेट आदि लगा सकता था और ना ही डरेनेज विभाग से कोई मदद ले सकता था। कुछ प्रभावशाली राजनेताओं के रिश्तेदार बड़े जमींदारों के यहां तो खेतों में डरेनेज विभाग ने बड़े पम्प सेट सरकारी खर्च पर लगा दिये थे परन्तु ये जमींदार अपने खेतों के साथ लगते दूसरे छोटे किसानों के बरसाती पानी को इन पम्प सेटों से नहीं निकलने देते थे। ऐसे हालात में वर्ष 2003 में एक बार फिर जुलाई में भारी वर्षा हुई और खेतों में 4-5 फुट तक पानी खड़ा हो गया। वर्तमान में किसान कोओपरेटिव से जुड़े हुए किसानों, जिनके खेत एक परिवार होने की वजह से साथ-साथ थे, अपने सामूहिक, खर्च व मेहनत से बाढ़ का पानी निकालने की ठान ली। इस पानी को लिफट करके 15 एकड़ दूर नहर में डालने में ये लोग कामयाब रहे। इस परिवार से जुड़े स्वयं खेती करने वालों के अलावा शहर में रह रहे दूसरे सदस्यों ने भी सहयोग दिया जो अपनी जमीन हिस्से या ठेके पर दिया कर दे। सामूहिक प्रयास करने का सुझाव इन शहर में रहने वालों में से ही आया।
इस हालात में इस पानी निकालने की सामूहिक कोशिश ने सांझी खेती करने की सोच रहे किसान सभा कार्यकर्ता ने सभी से व्यक्तिगत तौर पर भी सामूहिक खेती से होने वाले फायदों पर बातचीत करी। वकील का समर्थन तो उसे पहले ही था। इस कल्पना को पहले तो गांव में रहने वाले सदस्यों ने असम्भव व अजीब मान्या। उनमें से कुछ शंकित भी थे। परन्तु क्योंकि बाढ़ का पानी सामूहिक रूप से निकालने में वे सफल रहे थे तो एक ललक भी मन मैं आई। अगली ही फसल जो वर्ष 2003 व 2004 के सैसन की साढ़ी की फसल थी जिसकी बिजाई वे बहुत लेट कर पाये थे और पानी की वजह से पूरे खेत में नहीं हुई थी उसमें आपसी तालमेल-सहयोग शुरू कर दिया। इस प्रकार वर्ष 2004-2005 के सैसन के लिए सांझी खेती करने की शुरुआत की गई। के बी सी का गठन हुआ। एक संविधान बनाई गई और शुरूआत हुई।
बाढ़ की समस्या का स्थाई हल निकल सका। रेही से खराब जमीन का सुधार हुआ। सिंचाई बेहतर हुई। साधन कृषि औजार जुटाना आसान हुआ। उत्पादन में बढ़ोतरी हुई। 2004-2005 का प्रति एकड़ उत्पादन 14 हजार रुपये का था। 2005-2006 में 17 हजार रुपये प्रति एकड़ हो गया। 2006-2007 में यह 25 हजार का हुआ। दूसरी तरफ खेती की लागत कम हो गई। आपां मारें पार पड़ैगी। आई किमै समझ में अक नहीं। वार होण लागरी सै देर करदी तो तबाही तै या सांझी खेती बी कोन्या बचा पावैगी।
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बुधवार, 22 मार्च 2017

SAMBHALO

सम्भलो 
संभालो बारूद के ढेर पर बैठे हैं हम ।  फांसी का कर या गोली से हो जाती हैं कई जान कम । गाँधी के देश में कैसे और क्यों उगी बंदूकों की फसल ? भारतीय संस्कृति  क्यों हो रही विफल ? कहाँ गयी हम सब की वह भारतीय अक्ल ।  गाँधी को भी भुला दिया ज्यों ही किया क़त्ल । छोटे हथियारों का मामला दूजा नंबर था कुछ दिन पहले अब पहला नंबर  हो गया हथियारों की खरीद में ।  कानून 1858 का आज भी हमारा है ।  मुझे बदल दो मैं तो हो गया नाकारा हूँ वह बोल रहा ।  उन्नीस सौ बासठ के बस एक संसोधन का सहारा है ।  सब चलता है यारो यहाँ सब मत खाओ गम । एक तरफ ये नारा होड़ ख़त्म हो हथियारों की ।  दूजे तरफ नुमाईश लगाई दुकानदारों की ।  छह सौ देशी और विदेशी से ज्यादा इनके ही सरदारों की ।  हथियारों को बनाया तो चलेंगे किते ना किते तो जरूर कहीं पर ।  चलैंगे तो ज्यान भी लेंगे पास कै  फेर दूर किते ।  हथियार ख़त्म हों नारे बस हवा में घुमते रहते हैं अब कभी कभी , हथियारों का व्योपार बढ़ रहा है । बारूद के ढेर पर बैठे सां हम ।  तो के किया जावै ? म्हारे बच्चों को तो ट्यूशन तैं  फुरसत कोणी , पड़ौसी का बच्चा भगत सिंह  ज्यावै ।  अर इस गंदे समाज नै ठीक करने का बीड़ा ठा लेवै । सौ दो सौ रपिये की मदद साल छह मिहने मैं म्हारे तैं भी आकै लेज्यावै । इन जालिमों की हकूमत कब तक चलेगी रै ? गरीबों की बात कदे तो बनैगी रै । सवाल यु सै अक  बारूद के ढेर पर तो भारत देश बैठाया सै फेर करया जावै तो के करया जावै ? एक कवी की लिखी कुछ बातें शायद इस बख्त सही हों -- भारत को सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत सै ।  बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं ।  सावित्री बाई फुल्ले और ज्योतिबा फुल्ले उभरे थे नए अंदाज मैं । दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत सै ।  अंडी फंडी पाखंड के खिलाफ जमकै 
लड़ी लड़ाई जिसनै उस आंबेडकर फ़कीर की जरूरत सै । 1857 मैं हजारों फांसी का फंदा चूम गए  । राज गुरु सुख देव  आजादी की खातर झूम गए । उस भगत सिंह  रणधीर की फिलहाल जरूरत है । जालियां वाले बाग़ मैं जिसने गोलियां चलायी देखो ।  जालिम डायर पै लन्दन मैं गोली चलायी देखो । उस उधम सिंह बलबीर की जरूरत सै । मजदूर किसान की खातर जिंदगी ही गुजार दई ।  मार्क्स नै दुनिया बारे एक नयी विचार दई  ।   मार्क्सवादी सूरवीर की की फिलहाल जरूरत है । महिला दलित का दोस्त हो जो आज चाहिए समाज इसा । पूंजीवादी राज अन्यायी खत्म हो मंदी का राज ईसा । इसकी तोड़ने की जंजीर  फिलहाल जरूरत सै । पूरा समाज रसातल की तरफ धकेल जा रहा है यो । तलछट पे फैंके  लोगों को समझ आ रहा है यो । एक पैनी नजर गंभीर की फिलहाल जरूरत सै । आज बख्त पीस्से आल्याँ का सै बाजार का सै ।  फेर बख्त गरीब मानस का जरूर आवैगा ।  हैवानियत के उप्पर इंसानियत एक दिन जीत जरूर दर्ज करवावैगी ।  फेर यूं अपने आप कोन्या होवै ।  समझदार अर ईमानदार लोगों नै आगै  आना पड़ेगा । आज के सिस्टम का गोरख धंधा समझना और समझाना  पड़ैगा  ।  संघर्ष का बिगुल  मिलजुल कै और तेज़ी तैं बजाणा पड़ै गा ॥ 
रणबीर 
22 . 3 . 2017 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

कमलू -- रमलू सुण्या सै 100 करोड़ की गैस सब्सिडी ख़तम करावण की खातर 250 करोड़  खर्च कर दिए ।
रमलू -- कमलू तेरै चूरने क्यूँ होरे सैं ।  250 करोड़ मैं सही फेर करा  तो दी  । 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

                         छक्का 
संविधान भारत देश का इसपै काले बादल मंडराए 
संसद म्हारी पढ़न बिठा दी अध्यादेश रोजाना ही ल्याए 
देश की बहुविविधता को तोड़ण के घणे प्रयास करे रै 
हिन्दू मुस्लिम के झगडे करा लोग घने बदहवास करे रै 
बिना बात की बातों पर संघियों नै दंगे खूब करवाए 
किसानी विरोधी कानूनों के बी जे पी नै अम्बार लगाए 



गुरुवार, 5 जनवरी 2017

फायर पै फायर


टीवी मैं देख्या अक सिवसेना के चेले चपट्यां ने बम्बई के दो सिनेमा घरां मैं चलती फिल्म ‘फायर’ के विरोध मैं सिनेमा हाल तोड़ फोड़ दिये अर फायर के हवालै कर दिये। उनकी कार्यकर्ता न्यों बोली अक तोड़ फोड़ हमनै कोण्या करी, या तोड़ फोड़ तै फिल्म देखणियां नै फिल्म ना देखण देवण के बदले मैं करी सै। आगलै ए दिन दिल्ली मैं सांग रच दिया इनके चेले चेलियां नै अर टीवी पै दिखाया अक ये सारे के सारे सूड़यां मंडरे थे सीसे तोड़ण कै अर फिल्म देखणियां तै बाटै देखते रैहगे अक कद म्हारी बी बारी आवै अर हम सीसे तोड़ां। इस फिल्म के सही कै गल्त होण पै बहस हो सकै सै। हो सकै सै इसमैं चुने गए मसले के बारे मैं हम सहमत ना होवां। पर इसे नाज्जुक मुद्दे नै लेकै लोगों की भावनावां गेल्यां यो पाखण्ड आच्छी बात कोणया। जिब सिव सेना आल्यां नै अर उनके नेड़े धोरै आल्यां नै बम्बी मैं माइकल जैक्शन का प्रोग्राम करवाया जिब कित जारी थी या संस्कृति? जिब इनकी पुत्रवधु घटिया नाच गान्यां अर ऊघाड़ेपन आली फिल्म बणावै जिब इनकी या संस्कृति कित बूम्बले खावण चाली जाया करै? जिब रूप कंवर ताहिं जबरी चिता मैं बिठा दिया जा जिब या संस्कृति ‘सती’ की हिम्मत मैं दिल धौली काटकड़ तार कै धरदे तै सही माणस इस संस्कृति के बारे मैं के सोचैगा? दहेज नै अर दहेज हत्यावां नै ये ‘फायर’ पै फायर करणिया ठीक बतावै तो के समझया जा? ये दुनिया भर की मस्त राम की पौण्डी अर कोक शास्त्र सारे हिन्दुस्तान के बस अड्यां पै अटे पड़े रहवैं इसपै कद सी ध्यान ज्यागा?
दूसरी बात हिन्दू संस्कृति की सै तै या हिन्दुस्तान की इकलौती संस्कृति कोण्या। हिन्दुस्तान की संस्कृति तै 2500 हजार साल पुरानी संस्कृति सै। जिस संस्कृति का ये सिव सेना आले अर इनके भाई भतीज टोकरा ठायें हांडैं सैं उसका अर म्हारी प्राचीन संस्कृति का कोए ढब नहीं दिखता। म्हारी पुरानी देस की सांस्कृतिक विरासत मैं वेद बी सैं, उसतै पहलम की संस्कृति बी सै, इसमैं बुद्ध बी सै, इसमैं गुरू नानक बी सै, इसमैं कबीर सै, रैदास सै, रहमान सै, इसमैं जैनी बी सै, इसमैं नास्तिक बी सैं अर आस्तिक बी सैं। इस संस्कृति का इतिहास गवाह सै अक इसमैं जिसनै बी हिटलरी अन्दाज अपणाया उसनै मुंह की खाणी पड़ी।
ईब सवाल यो सै अक जै सिव सेना की भीड़ी समझदानी के नजरिये तै बी देखां अर सही नजरिये तै बी देखां तै बम्बी मैं बाकी जितनी फिल्म बणैं सै तै वे के सारी की सारी इस ‘सो काल्ड’ संस्कृति मैं फिट बैठें सैं? अर फायर फिल्म नै रोकण का यो दहसत भरया, गुण्डई अन्दाज तै हिन्दुस्तान मैं पंजाब के उग्रवादियां की कंपकंपी चढ़ावण आली याद ताजा करवादे सै। उननै भी इस संस्कृति की इसी तिसी करण मैं कसर नहीं घाली। एक कान्हीं तै पश्चिमी संस्कृति नै गाल दे कै फरमान जारी कर दिया अक कोए बी छोरी स्कूलां तैं पीली चुन्नी तै न्यारी कोए चुन्नी नहीं औढैगी। एक स्कूल की हैडमास्टरनी नै इसका विरोध करया तै उसकै गोली मारदी अर दूसरे कान्ही बेरा ना कितनी छोयिां की इज्जत खराब करी थी उसनै। ये ‘फायर’ पै फायर करणिया बी जिब ब्यूटी कम्पीटीसन करवावैं अर माइकल जैक्शन हर नै न्यौतैं तै दूसरी बोली बोलैं अर ईब दूसरी बोलैं सैं।
जनता ईब स्याणी होरी सै अर वा ईसी चालां नै खूब समझण लागली सै। इसे पाखण्ड बहोत देख लिये जनता नै। जनता का सवाल सै अब जिब बम्बी की आधी आबादी फुटपाथां मैं सोवै सै तै इस संस्कृति नै मासा भर भी सरम क्यों नहीं आन्ती? ये रोज धड़ाधड़ कत्ल होण लागरे बम्बी मैं तै या संस्कृति चुप क्यों रहवै सै? जिब बम्बी मैं मुसलमानां पै दंगई हमले करैं अर उननै मौत कै घाट तारदें तै या संस्कृति माणस मारण के फतवे क्यों देवै सै? हां अर इनके हितैसी जैन साहब बताये उननै एक चैनल चलाया था जिसपै घणी अस्लील फिल्म रात नै दिखाई जाया करती तै ये संस्कृति के ठेकेदार न्यों कहया करते अक वे ऊघाड़ी फिल्म तै जिब दिखाई जावैं सै जिब लोग बाग सोले सैं। बहोत हो लिया इस तरां का खिलवाड़ भारत की संस्कृति गेल्यां। म्हारा अपसंस्कृति तै क्यूकर छुटकारा हो? क्यूकर के चाल्या जा उस राह पै? ये लाम्बे मसले सैं। इनपै खूब बहस होनी चाहिये पर एक बात लाजमी सै अक जिब ताहिं देस में ‘ब्लैक मनी’ का बोल बोला सै जिब ताहिं ‘काली संस्कृति’ ‘अपसंस्कृति’ इसनै किमै कहल्यो या रहवैगी। धौली संस्कृति मतलब (‘व्हाइट मनी’) नै ‘काली संस्कृति’ का गुलाम बणकै उसका तलहड्डू बणकै रैहणा पड़ैगा। ‘ब्लैक मनी’ की भ्यां क्यूकर बोलै इसपै फेर कदे सही।



कुत्ता अर माणस


मेरे याड़ी की कार जिब कोठी मैं बड़ली तै उतरती हाणां मनै बूझै लिया, ‘‘कुत्ता तै नहीं पालरे सैं?’’
मेरा याड़ी बोल्या, ‘‘के बात सै? इतना डर क्यों लागै सै कुत्ते तैं?’’ मनैं अपणी बात ऊपर राखण ताहिं जवाब दिया, ‘‘आदमी की शक्ल मैं कुत्ते तै डर कोण्या लागता मनै। उसतै तै मनै निबटना आवै सै। पर साच माच के नसली कुत्ते तै बहोत डर लागै सै।’’
असल मैं कुत्त्यां आले घर मनै आच्छे कोण्या लागदे। कुत्ते आले घरां मैं सबतै पहलम कुत्ता स्वागत करैगा भों भों करकै। तुड़ाइया कर देगा छाती पै चढ़ण खातर। घरक्यां तै ‘राम रमी’ तै हुई ना होन्ती फेर कुत्ता गाली देवण लागज्या सै।’’ आया स्साला बटेऊ। सिफारिस करवानी होगी कै रिश्वत देणी होगी। भाजज्या आड़े तै।’’ इसा लागैगा जणों भों भों करकै ओ नसली कुत्ता म्हारे भीतर की बात जाण कै हमनै नसीहत करण लागरया हो। मनै तो कुत्ते के काटण का सिंह के टपके तै भी फालतू डर लागै सै। असल मैं डर सै उन चौदा टीक्यां का जो डाक्टर पेट मैं घुसेड़ै सै। वरना तै कुत्ते के काटण तै कोण डरै सै चाहे दो बर बुड़का भर ले कुत्ता तै। आजकाल पेट की जागां बांह मैं लागण आले टीके आगे। पर पेट आले टीके तै मुफ्त लाग्या करते। पर ये बांह आले टीके तै तीन सौ रुपइयां का एक लागै सै अर सात लुआणे पड़ैं सैं। यो टीका तै पूरे कुण्बे पै मार करै सै।
फेर एक बात देखण मैं आवै सै अक कुछ माणस तै कुत्ते तै भी जहरीले हों सैं। एक माणस कै कुत्ते नै दांत गड़ा दिये। दूसरा बोल्या, ‘‘बस मिर्च बान्ध द्यो इसकै। बाकी कुछ ना होवै। उस कुत्ते की सम्भाल करो, इसका कुछ नहीं बिगड़ैगा। टीके लुआणे सैं तै उस कुत्ते कै लुआओ। कई बै कइयां के घरां के दरवाज्यां पै लिख्या पावैगा अक कुत्यां तै सावधान। ईब बेरा ना उन घरां मैं माणस रहैं सैं अक निरे कुत्ते ए रहवैं सैं? यो सवाल खामैखा का सवाल कोण्या। कोए कोए माणस तै कुत्ते तै बी गुजरया हो सै। किसे विचारक नै लिख्या सै अक जै थाम किसे कुत्ते नै रोटी खवा द्यो तै ओ थामनै कोनी काटै। माणस मैं अर कुत्ते मैं योहे असली फर्क सै। माणस सब किमै खाकै बी कितने बुड़के भरदे इसका कोए भरोसा नहीं।
म्हारे पड़ौस मैं एक साहब सैं उनका सै झबरू कुत्ता। ऊंची कद काठी, काला भूरा रंग, कान खड़े, लाम्बी पूंज। उस ताहिं तीन किलो दूध रोज का प्याया जा सै। म्हारे घरां हम पांच माणस सां ढाई किलो दूध हांग्या पुगै सै। 50-60 करोड़ माणस तै म्हारे देस मैं इसे बी होंगे जिनका ब्यौंत एक किलो रोज का दूध लेवण का भी कोण्या। उस अलसैसन कुत्ते ताहिं हफ्ते मैं तीन किलो मीट ख्वाया जा सै। म्हारे घर मैं तै आज ताहिं मीट बण्या ए नहीं सै बस कितै पार्टियां मैं दां लाग ज्या तै मुर्गे की एकाध टांग थ्याज्या सै। कम तै कम 70-80 करोड़ माणस तै इसे होंगे जिननै मुर्गी खाकै देखण का मौका ए ना मिल्या हो।
एक बै यो अलसैसन बीमार होग्या तै सारे कुण्बे के पासने पाटरे कदे इस डाक्टर नै बुला अर कदे उस डाक्टर नै बुला। कुत्ते के खाज की बीमारी होगी थी। बड़ी मुश्किल तै काबू मैं आई। दसियां हजार का बिल बैठ ग्या। डांगरां आला डाक्टर बी आण्डी ए था कोए। कुत्ते कै खाज किसके तै लागी इसकी खोज करण लागग्या शेर। पन्दरा दिन गाल दिये खोज करण मैं। फेर आखिर मैं बेरा लाग्या अक घर के मालिक कै खाज होरी थी उसके तै कुत्ते कै बी लागगी। कई डाक्टरां का बड़ा बढ़िया काम चालरया सै इन पालतू कुत्त्यां के कारण। कई लोगां नै तै कई नसली कुत्तिया पाल राखी सैं। उनतै बढ़िया नसल के पिल्ले बणावैं सैं अर पांच तै लेकै दस हजार ताहिं बेचैं सैं एक पिल्ला। मांग आल्यां की लाइनै टूट कै नहीं देन्ती। या न्यारी बात सै अक जो माणस इन कुत्त्यां की दिन रात सेवा करै सै उस ताहिं बारह सौ रुपइये म्हिने के भी कोण्या मिलते। साल मैं मालिक की कमाई यो करवादे एक लाख तै ऊपर अर इसनै साल के दस हजार (एक कुत्ता) भी नहीं मिलते।
आज के जमाने मैं यो कुत्ते पालण का शौक़ सबके बसका कोण्या। किसके बसका सै या दुनिया आच्छी ढाल जाणै सै। एक कुत्ते पालण का शौक सै अर एक कुत्ता पालण की मजबूरी सै। इन दोनूं बातां मैं जमीन आसमान का अन्तर हो सै। जिस दिन इस अन्तर की असलीयत का जनता नै बेरा लाग ज्यागा उस दिन चाला ए पाटैगा।


कम्पीटीशन बेशर्मी का


कम्पीटीशन तै बड़े-बड़े देखे अर सुणे पर इस बबाल का नाम कदे नहीं सुण्या था। रागनी कम्पीटीशन, ब्यूटी कम्पीटीशन, पी.एम.टी. कम्पीटीशन तै खूब मशहूर हुए अर इन कम्पीटीशनां की देखा-देखी म्हारे देश के नेतावां नै बेशर्मी का कम्पीटीशन बी शुरू कर दिया दिल्ली मैं। टीवी पै इसका सीधा प्रसारण होवै सै अर जनता बिचारी नै चुपचाप हो कै देखणा पड़रया सै। रागनी कम्पीटीशन मैं तै कोए रागनी आच्छी ना लागै तै हू हू करकै गावणियां नै जनता बिठा बी दे, पर इन फूफ्या का के करै? बेशर्मी के ट्रेलर तै पहलड़े नेता बी दिखा दिया करते कदे कदे पर वे शर्मा बी तावले से जाया करते। फेर इस एक साल मैं ईब आली सरकार नै तै सारी ए शर्मोहया खूंटी पै इतनी ऊंची टांग दी अक कोए तारना चाहवै तो भी नहीं तार सकदा। इसनै घणे कसूते अवतार दिये सैं। तखत की गेल्यां इन अवतारां के नाम बी बदल ज्यां सैं। किसे बख्तां मैं मतलब त्रेता, द्वापर कै सतयुग मैं जिन ताहिं अवतार कह्या जाया करता उनै ताहिं इस कलयुग मैं नेता कै मंत्री कह्या जा सै।
पहली हद तै इसे मैं होली अक अटल जी की हर बखत हिलती रहवण आली सरकार ताहिं बड़ी बेशर्मी तै स्थाई सरकार कह्या जान्ता रहया पूरे साल अर इब मूंधे मूंह पड़े पाछै बी काटकड़ तार कै गेर दिया इस स्थायित्व पै। ईब ताहिं के सबतै निकम्मे प्रधानमंत्री ताहिं सबतै काम्मल प्रधानमंत्री बतावण की बेशर्मी अर देश का भट्ठा बिठावण आली सरकार ताहिं देश नै मजबूत करण आली सरकार का तमगा देवण की बेशर्मी। या सरकार पाछे सी कितनी बेशर्मी तै प्याज नै चाब गी थी अर एक बी आंसू नहीं आया था। उस पाछै कितनी बेशर्मी तै पेटैंट बिल पास कराया अर उसतै भी घणी बेशर्मी गेल्यां प्रसार भारती का भट्ठा बठा दिया। जितनी बेशर्मी तै बिहार सरकार गिराई उसतै घणी बेशर्मी तै वाह बहाल करदी। सुन्दर सिंह भंडारी हटाया जागा का बयान दाग दिया अर फेर बोले अक कोनी हटाया जावै अर आखिर मैं उसका तबादला कर दिया। वाह रै आडवाणी साहब थारा बेशर्मी मैं कोए मुकाबला कोण्या। इस बेशर्मी के कम्पीटीशन मैं जार्ज साहब एक दो राउण्ड मैं ढीले रैहगे तै उननै भी कमर कस ली अर सबतै आगै रहवण की खातर एडमिरल विष्णु भागवत कै जा खस्या अर ओ बर्खास्त कर दिया। सिलसिला जारी सै। सरकार पड़े पाछै बी जारी सै अर विपक्ष की जै सरकार बनगी तो भी जारी रहवैगा। जै या सरकार हटकै आज्या तै इसका नाम बेशर्म जयते होणा चाहिए। इसका नारा जय जवान, जय किसान जय विज्ञान जीसे थोथे नारे की जगां कोए ठोस नारा जय बेईमान, होणा चाहिए।
ईसा लागै सै अक जै या सरकार हटकै आगी तै सारे कै बेशर्मी के कम्पीटीशन शुरू करवा देगी अर इन बेशर्मां ताहिं पदमश्री अर पद्मभूषण के खिताब दिया करैगी। फेर तै पाले, सतबीर, बाली, रणबीर, राजेंद्र खरकिया, सरिता चौधरी ये सबै भूखे मर्या करैंगे।

या के बणी


दिल्ली मैं इन दिनां मैं खूब उठा-पटक होई सै। भाजपा नै सारे नियम, कायदे कानून, सिद्धान्त ताक पै धर दिये अपणी कुर्सी बचावण की खात्तर। तलै ए तलै कई पार्टियां मैं पाड़ ला लिया। पाड़ लावण के तरीके भी सारे ए इस्तेमाल कर के गेर दिये। साम दाम दण्ड भेद सब क्यांएका सहारा लिया ज्याहे तैं तै वोट पड़ण तै पहलम् ताहिं भाजपा न्यों दंगालै थी अक वोटां का गणित उसके हक मैं सै अर घणखरे लोगां कै या बात जंचै भी थी अक एम पी खरीद खराद कै भाजपा अपणी गिणती पूरी कर लेगी।
म्हारले नेता जी भी बहोतै स्याणे बणकै दिखावैं थे इबकै फेर भाजपा नै बता दिया अक तम डाल डाल सो तै हम पात-पात सां। पहलम तै म्हारे नेता जी नै भाजपा तै समर्थन उल्टा लेवण का सांग करया अक क्यूकरै ममता कै जयललिता की ढालां उसके भी भा बध ज्यां। कई बै घर मैं कोए माणस रूस ज्या अर रोटी ना खावै अर घरके उस नै मनावैं नहीं तै दो बखत पास करने मुश्किल हो जाया करैं इसे माणस नै। वाहे बणगी म्हारे नेता जी गेल्यां अर हार फिर कै अखबारां मैं खबर दी अक समर्थन उल्टा ले लिया फेर जै कोए करड़ा बखत आया तै वोट हम भाजपा ताहिं ए देवांगे। नेता जी तै कोए बूझै अक जै न्योंए करनी थी तै समर्थन उल्टा क्यों लिया था? खैर आड़े ताहिं बी देखी गई। हरियाणे की जनता और थोड़ी फालतू उदास होगी। फेर यो विश्वास मत थोंप दिया जयललिता नै भाजपा पै तै म्हारे नेता जी का सारा कुण्बा कुकाया अक ईब बेरा पड़वा द्यांगे भाजपा नै अक तीन च्यार एम पी आली पार्टियां की कितनी औकात सै। टी.वी. मैं अखबारां मैं, दिल्ली मैं, चंडीगढ़ मैं सारे कै काटकड़ तार दिया अक हम भाजपा के विश्वास मत के विरोध मैं मतदान करांगे। टी.वी. आल्यां नै दो दो तीन-तीन बै बूझया अक यो आखिरी फैसला सै थारा? म्हारा नेता बोल्या अक यो पक्का फैंसला सै म्हारा। हरियाणे की जनता कै थोड़ा सांस में सांस आया अक नेता नै म्हारी लाज का थोड़ा घणा ख्याल तै ले आखिर मैं करे लिया। आज के जमाने मैं कूण लिहाज शर्म जिसी चीजां का ख्याल राखै सै ऊंतै पर म्हारे नेता जी की मेहरबानी अक उसनै म्हारी लिहाज शर्म राखण की सोची।
फेर खुराना जी पहोंचे म्हारे नेता जी धोरै। बेरा ना कूणसी दुखती रग का बेरा सै खुराना साहब नै अक म्हारे नेता तै बातचीत करण की जिम्मेवारी उसे ताहिं दी भाजपा नै। फेर किमै ढीले से पड़ते दीखे म्हारे नेता जी। आगले दिन फेर किमै करड़े से होगे। लोगां नै फेर राहत की सांस ली।
चाणचक दे सी प्रकाश सिंह बादल अर उसके छोरे कै बीच मैं बैठकै म्हारे नेता जी ने फेर पास्सा पलट लिया अक हम भाजपा के प्रस्ताव के हक मैं वोट गेरांगे। किसान नेता प्रधानमंत्री बणावण की सोचां थे ओ बणता कोण्या दिखाई दिया ज्यां करकै भाजपा का समर्थन करांगे। कोए बूझणिया हो अक वाजपेई नै किसानां की घणी झोली भरदी जो म्हारे नेता जी उसकी मदद मैं तिसाये होगे? बखत की करनी अक भाजपा फेर बी मूंधे मुंह पड़ी जाकै। सबतै पहलम म्हारे ताऊ जी के बख्ता मैं एक दो एम एल ऐ करकै यो आया राम गया राम का सेहरा म्हारे हरियाणा के सिर पै बंध्धा था। फेर भजनलाल जी तैं पूरी ए पाल्टी नै लेकै कांग्रेस मैं कूद गे थे। इन सारे सौद्यां मैं एक खास बात थी अक सौदेबाज नेता मगर बलि के बकरे थे उनके पाछै लागे औड़ एम.एल.ए.। पर इबकी बरियां एक औरै नजारा साहमी आया सै अर ओ सै अक नेता नै छोडकै उसके एम.पी. भाजगे। क्यूं भाजगे? कितने मैं भाजगे? किसके कहे तैं भाजगे? के सोच कै भाजगे? इन पै न्यारी-न्यारी अटकल लाई जावण लागरी सैं। फेर एक बात तै साफ होगी अक वे भाजगे थे अर म्हारे नेता जी नै तै बस अपनी लाज बचावण खातर समर्थन का दिखवाया ए कर्या, समर्थन तै भीतरै-भीतर हो लिया था। ईब हटकै फेर यूनाइटिड फ्रंट की बात कही सै। फेर कोए यकीन ना करै। हरियाणा की जनता मायूस बहोत होई सै। जो माणस म्हारे नेता के म्हां कै म्हारे ताऊ नै देख्या करते उनमैं तै और बी निराशा आई सै। इस निराशा के कारण जनता और कोए नेता टोहण की सोचै सै फेर कोए ठह्या सा नेता ए ना दीखता हरियाणे की जनता नै। या जनता करै तो के करै?
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नया साल किसा हो


इस बात मैं कोए शक की गुंजाइश कोन्या अक बीसवीं सदी मैं विज्ञान नै ताबड़तोड़ तरक्की करली। फेर आज महत्वपूर्ण सवाल यौ सै अक इस दुनिया के दुख-दर्द कम करण मैं कितना काम आया विज्ञान? उल्टा यू दुख-दर्द बधा तो नहीं दिया इस विज्ञान नै? आज दुनिया के 100 करोड़ के लगभग लोग (महिला-पुरुष) बुनियादी जरूरतों ज्यूकर रोटी, कपड़ा अर मकान तै महरूम सैं। आए साल दुनिया के लगभग 80 लाख बालकां की मौत, भूख, कुपोषण, पीने के साफ पानी की कमी, उचित आवास की कमी बख्त पै मामूली चिकित्सा सेवा ना मिलने के कारण होज्या सै। जो ये परिवार इतने गरीब न होन्ते अर उनकी बुनियादी जरूरतें पूर हो जान्ती तो इन मौतां पर काबू पाया जा सकै था। आई किमै समझ मैं अक ‘किस्मत म्हारी’ कैहकै पार बोलोगे।
आए साल मैं लगभग 4 लाख महिलावां की मृत्यु बालक होवण के बख्त होज्या सै। कारण सै अक ठीक खाणा नहीं, खून की कमी होज्या अर जच्चा-बच्चा को वांछित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती। फेर के कर्या जा? इसपै ढंग तै सोच्या जा आण आले नये साल मैं अक बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा। या बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा सकै सै? दुनिया मैं सारे महिला-पुरुषां की जरूरतां नै पूरा करण की खातर प्रतिवर्ष 40 अरब डालर और चाहिए। फेर किततैं आवै इतना पीस्सा? सोच्ची सै कदे अक ताश खेलण तै फुरसत कोन्या अर कै इन छुटभैये सफेदपोशां के बस्ते ठावण के बोझ तलै सांस चढ़े रहवैं सैं? बेरा सै केवल यूरोप मैं शराब पर एक साल मैं 105 अरब डालर खर्च होज्यां सैं। म्हारे देश के आंकड़े तो कोन्या फेर हरियाणा मैं दारू तै घर तो कोए बच नहीं रह्या फेर कोए माणस बचर्या हो तै बैरा ना? तो फेर के कर्या जा? पहलम तो पूरी समस्या आच्छे ढाल जान ली जावै अर फेर सोच्या जावै अक हम के चाहवां सां अर के करना चाहिए हमनै? हम नहीं चाहते किसे की आजीविका खोसना।
एक इन्सान का दूसरे इन्सान को लूटणा गल्त सै। दौलत की खातर दरिद्र का कूटणा गल्त सै। लूटमान अत्याचार हम कोन्या चाहते। हां, हम जरूर चाहवां सां मजदूर का मुस्कराना, किसानां का अपनी फसल देख कै खिलजाणा, हर झोंपड़ी, हर गांव मैं बालकां का खिलखिलाणा, इस नाबराबरी का दुनिया तै खात्मा जरूर करना चाहवां सां। हम कोन्या चाहते नये साल मैं ये जातिभेद अर रंगभेद। कोन्या चाहिये बेटियों के जन्म पै प्रकट होन्ता दुख-खेद, इस तरियां के भेद भाव जो करदें समाज मैं छेद, इन्सानियत का इसा अपमान कोन्या चाहिये। हां, आज हमनै चाहिये उनकी समानता जो तलछट मैं पड़े सैं, बेटी नै मौका मिलै अर वा तय कर सकै हर रास्ता, शूद्र भी शिखर छू सकै उसनै मिलै या मान्यता, काले रंग नै कृष्ण आला सम्मान मिलै या हम चाहवां सां। हम नहीं चाहते पड़ौसियों तैं रूठणा, एक ही परिवार मैं दीवारों का खींचणा, मजहबों के नाम पर किसी के घरों को रोंदणा, किसी के दिल नै तोड़णा हम कोन्या चाहन्दे।
हां, हम जरूर चाहवां सां टूटे दिलां नै जोड़णा, बहम अर बैर की हर दीवार नै तोड़णा, भटके औड़ हर कारवां नै प्यार की गली मैं मोड़णा, भजनां मैं कव्वाली की मिठास घोलणा चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे अक घरां पै गिरै कोए कहर, देखो हवा पानी मैं फैल रहे कितने जहर, बीमारियों, आपदाओं की या बढ़ती लहर, आबो हवा का यो प्रदूषण कोन्या चाहिये। हां हम जरूर चाहवां सां कोयलां का कूकणा, मृग शावक का विचरना वन बालिका तै खेलणा, चरवाहों की बांसुरी पै टहनियां का झूमणा, मुक्त नदी की खेल ठिठोली देखणा हम चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे मूक प्राणियों पै अत्याचार, विलासिता इसी करे जो पशुओं मैं हाहाकार, वो कैसा विकास जहां इन्सानों से हो मारामार, ताकत का दुरुपयोग हमनै कोनी चाहिये। हम नहीं चाहन्दे कि युद्ध तै हो ईब विनाश, अणु बम की गर्जना जो पुकारै बस नाश-नाश, धरती पै सन्नाटा हो अर रोवै आकास, ना ना इसी तबाही नहीं चाहन्दे। एक छोटा सा चमन हो, हर इंसान को अमन हो, बहै जड़ै सच्चाई का पवन हो, इसी दुनिया हम चाहवां। नया साल मुबारक।

सांच्ची बात कटारी लाग्गै


हिन्दुओं के इतिहास मैं राम का बहोत ऊचा स्थान रहया सै। आजकाल भी राम राज्य का खूबै जिकरा रहवै सै। वो राम राज्य कीसा होगा जिसमैं एक शूद्र शम्बूक का बस योहे अपराध था अक ओ धर्म कमावण की खात्तर तपस्या करण लागरया था अर इस कारण राम जीसे अवतार राजा नै उसकी नाड़ काट ली। ओ राम राज्य कीसा रहया होगा जिसमैं किसे आदमी के कहे तै राम नै गर्भवती सीता ताहिं जंगल मैं छोड़ दिया? राम राज्य मैं दास दासियां का कति तोड़ा नहीं था। ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी ताहिं दुनिया मैं दास प्रथा कितनी क्रूरता के साथ प्रचलित रही सै इसका हमनै पूरा ग्यान सै। उन बख्तां मैं (राम राज मैं) स्वेच्छा पूर्वक अपने आप नै अर अपनी संतान नै सिर्फ बेच्या ए नहीं जाया करता। बल्कि समुद्र अर बड्डी नदियां के कांठ्यां पै बसे गामां मैं तो आदमियां नै पकड़ कै ले जावण की खात्तर बाकायदा हमले हुया करदे। डाकू गाम पै छापा मारया करते अर धन-माल की साथ-साथ उड़े के काम करण जोगे आदमियां नै पाकड़ के ले जाया करते। हर साल इस तरियां के गुलाम पोर्त्तुगीज पकड़ कै बर्मा के अराकन देश मैं बेच्या करते। राम राज्य मैं जै इस ढाल की लूट अर डाकेबाजी नहीं बी होगी तो भी दास प्रथा तो जरूरै थी। मिथिला मैं ईब बी कितने ए घरां मैं वे कागज सैं जिनमैं बहिया (दास) की खरीद-फरोख्त दर्ज सै। दरभंगा जिले के तरौनी गांम मैं दिगंबर झा के परदादा नै कुल्ली मंडर के दादा को किसे दूसरे मालिक तैं खरीदया था अर दिगंबर झा के दादा नै पचास रुपइये के फायदे के साथ ओ आगै बेच दिया। इैबै तीन पीढ़ी पहलम अंग्रेजी राज तक मैं या प्रथा मौजूद थी। साच्ये धार्मिक हिंदू हों चाहे मुसलमान, दोनूं जब अपनी मनुस्मृतियों और हदीसों मैं दासां के ऊपर मालिकां के हक के बारे पढ़ैं सैं तो उनके मुंह मैं पाणी आये बिना नहीं रैहन्ता।
आवां राम राज्य की दास प्रथा की एक झांकी देखां। एक साधारण सा बाजार सै जिसमैं निखालस दास-दासियां की बिक्री होवै सै। लाखां पेडां का बाग सै। खाण-पीण की दुकान सजरी सैं। भेड़-बकरियों अर शिकार करे जानवरां तै न्यारा उच्च वर्ग के माणसां के भोजन की खात्तर मांस बेच्चा जावण लागरया सै। जागां-जागां पै सफेद दाढ़ी आले ऋषि अर दूसरे ब्राह्मण, क्षत्रिय अर वैश्य अपणे पड़ाव घालें पड़े सैं। कोए नया दास कै दासी खरीदण आया सै। किसे के दिन बिगड़ गे ज्यां करकै ओ अपणे दास-दासी बेच कै कुछ पीस्से का जुगाड़ करण आरया सै। कुछ पुराने दास बेच कै नये दास लेवण आरे सैं। म्हिने पहलम दास-दासियां की सेवा शुरू होज्या सै अक बढ़िया दामां मैं बिक ज्यावैं। उनके सफेद बाल काले रंग दिये। बढ़िया लत्ते कपड़े पहरा के बिठावैं सैं। कितै-कितै सौ-सौ दास सैं कितै एकाध दास आले मालिक सैं। खरीदण आले कहवैं सैं, ईबकै तो बाजार बहुत म्हंगा गया। पाछले साल अठारा बरस की हट्टी-कट्टी सुंदर दासी दस रुपइए मैं मिल जाया करती, ईबकै तो तीस मैं बी हाथ कोन्या धरण देन्ते। दान्त ताहिं देख्या करदे। कोए चालीस बरस की नै बीस बरस की बतावै। कोए कहवै म्हंगी कित सै। महाराज रामचंद्र के यज्ञ मैं दक्षिणा मैं हरेक ऋषि ताहिं एक-एक तरुण दासी दी जावैं सैं। कितनी दासियां के बालक उनतै कोसां दूर चाले जावैं सैं, कितनी दासियां के प्रेमी उनतै बिछड़ ज्यावैं सैं इसकी उड़ै किसनै चिंता नहीं थी। यो सै राम राज्य मैं आदमी के एक भाग का जीवन। अर यो सै राम राज्य मैं मरद-औरत का मोल। इसे पर हमनै नाज सै। ईब ताहिं तो हमनै आदमी की ढालां रैहना भी नहीं सीख लिया सै। पास पड़ौस मैं सफाई की अवहेलना मैं तो हम जानवरां तै भी गये बीते सां। म्हारे गामां जीसे गंदे गाम दुनिया के किसे देश मैं दीवा लेकै बी टोहे कोन्या पावैं। या म्हारे गांम की ए खूबी सै अक एक आन्धा माणस बी एक मील पहलमै म्हारे गाम नै पिछाण लेवै सै क्योंकि उसकी नाक बदबू नै पिछाण ले सै। तो म्हारा इतिहास कई ढाल की यादां तै भरया पड़या सै। हमनै देखना पड़ैगा अक कौन सी आज के हिसाब मैं ठीक बात सै अर कौन सी गलत सै। अन्धभगत हो कै अपने पुराने इतिहास की झोल्ली भरकै काम कोन्या चालै। आई किमैं समझ मैं?
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लड़ाई ही लड़ाई



थामनै कई ढाल की लड़ाईयां के बारे में पढ्या होगा, सुण्या होगा अर देख्या होगा। घर मैं लड़ाई किसे ना किसे बात पै आपां रोजै करां सां। कितै मां बेटे की तकरार, किते भाई भाईयां मैं मारममार, कितै मुसलमानां पै होन्ते वार, कितै देवर भाभी मैं पड़ै सै दरार। बस बुझो मतना। फेर हिन्दुस्तान मैं एक न्यारे नमूने की लड़ाई शुरू होती दीखै सै। या किसी लड़ाई सै बेरा ना? संसद तै बाहर तै कांग्रेस अर भाजपा एक दूसरे के खून की प्यासी दीखै सै, एक दूसरे की खाट खड़ी करण मैं कसर नहीं छोड़ती फेर संसद मैं दोनूआं की एकै भाषा, एकै राग लागै सै। एक पाछै एक आवण आले विधेयकां - बीमा विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक, पेटैंट विधेयक पै तै इन दोनू पार्टियां की गजलोट हुई दीखै सै। पर बीमा आले विधेयक पै भाजपा अर आर.एस.एस. मैं लड़ाई छिड़गी। बेरा ना या दिखावटी सै अक या असली सै? दूसरे कान्हीं अकाली दल मैं बादल अर टोहरा नै हथियार पिना लिये। छूट छुटावण करवाणिये अपने नम्बर बणावते हांडैं सैं। इनका यो बी नकली सौदा सै अक असली सै बेरा ना? एक और चाला देख्या लोगां नै तै बाट थी अक जयललिता वाजपेयी का धुम्मा ठावैगी फेर उसनै तै आपणा ए मोर्चा तोड़ कै धर दिया। ईब डण्ड बैठक काढ़ण लागरी सै बेरा ना किसनै तोड़ैगी अर किसनै बणावैगी? मुलायम सिंह यादव नै कांग्रेस कै खिलाफ तलवार खींच ली अर कांग्रेस नै राबड़ी देवी पै तीर कमाण कर राख्या सै तीर बेरा ना कद कमान मां तै छूटज्या। बीजू जनता दल वाले आपस मैं ए कब्ड्डी घालरे सैं। बेरा ना चाण चक दे सी यो के होग्या? ये नये-नये पाले खींचगे। किसके पाले मैं कौण जा खड़या होगा कुछ नहीं कह्या जा सकदा। गिरगिट की ढालां रंग बदलते वारै कोण्या लान्ते। पहलम आली सारी कतार बन्दियां बदलती दीखै सैं।
इलैक्शनां की जंग कांग्रेस अर भाजपा बिचालै लड़ी गई। कांग्रेस नै राजस्थान, मध्यप्रदेश अर दिल्ली मैं फेर पैर जमा लिये। कैहवणिया तो न्यों बी कहवैं सैं अक या लड़ाई गंठे अर बम्ब के बीच लड़ी गई। पर असल मैं या लड़ाई महंगाई अर जनता के बिचालै लड़ी गई। भाजपा तै महंगाई के रथ पै असवारी होरी थी अर कांग्रेस नै जनता अपणे कान्ध्या पै ठारी थी। तुलसीदास नै भी कह्या सै अक रावण रथी था ज्यां करकै ओ रथ पै सवार था अर रघुवीरा विरथ थे। ऊंह धोरै किसे रथ थे। रघुवीरा तै बांदरां के अर भालुआं के दम पै लड़या था। पर उस लड़ाई मैं तै रथी हारया था अर विरथी जीतया था। म्हारे प्राचीन संस्कृति के वाहक तै बिना रथ के कोए बी लड़ाई कोन्या लड़ते। बेशक वे रघुवीरा के भक्त सै फेर लैक्शन की पाछली लड़ाई तै उननै रथ यात्रा की बदोलतै जीती थी। जै आडवाणी जी रथ पै सवार नहीं होन्ते तो दो सांसद आला यो सीमित सुखी परिवार इतना बड्डा कुणबा क्यूकर बणता? ईब या न्यारी बात सै अक इसतै म्हारी पुराणी संस्कृति गैल्यां खिलवाड़ हुया अक नहीं हुया? इबकै भी आडवाणी जी महंगाई के रथ पै सवार हो लिए। रथ तो रथै हो सै या बात न्यारी सै अक यो पहलड़े रथ बरगा टोयटा आला रथ नहीं था जिसकी तामझाम तै सौ कोस तै बी दीखै थी। पर इबके रथ मैं महंगाई भव्य थी। जिसी आडवाणी जी के रथ नै हा हा मचाई थी कुछ उसे ए ढाल की हालत इस महंगाई नै बणादी। फेर उस हा हाकार नै तो आडवाणी जी पै वोटां की बरसात करदी थी अर इस बर की नै चुनावी हार का तमगा दे दिया।
इस चुनावी लड़ाई पाछै इसा लागण लाग्या था अक ईब साचली लड़ाई शुरू होवैगी। महाभारत का युद्ध जणो तै हटकै नै लड़या जागा। पाले बंदी बदलैगी। नये मोर्चे बनैंगे। सरकारी मोर्चा टूटैगा अर नया मोर्चा सरकार बणावैगा। फेर सरकारी मोर्चा तै न्यों का न्यों सै हां बिचारी जयललिता का मोर्चा जरूर टूटग्या। लोग बाट देखैं थे अक वाजपेई जी आज गया कै काल गया। जयललिता जी तै न्यारा भला और कोण तोड़ सकै सै सरकारी मोर्चे नै? जार्ज साहब तै-समता बेशक टूटो पर भाजपा की सरकार बच ज्याओ - इस अभियान पै जोर तै मंडरे सैं। काम जार्ज ताहिं देश की रक्षा का सौंप राख्या फेर आण्डी रक्षा वाजपेई की सरकार की करण लागरया सै। समता पार्टी मैं कई जणे मंत्री बणन के नाम पै सिंगरे हांडैं सैं फेर नम्बर कोन्या आ लिया सै भाइयां का। वे बड़े दुखी सैं अक जार्ज अर नीतिश कुमार तै मंत्री होगे अर हम सूके के सूके राख राखे सां।
उननै दुख इस बात का भी सै अक वाजपेई जी आपणे तै तीन मंत्री बणा लिये अर बाकी सबनै भूलगे। बड़ा चाला कर दिया। साहब सिंह जी वर्मा नै भूलगे उस तांहि तै उननै अपणें हाथ तै चिट्ठी लिखकै मंत्री बणण का न्यौता दिया था। जै वाजपेई जी न्यों न्यौते निधारां मैं गड़बड़ करैगा तै जनता बिगड़े बिना नहीं मानैगी। फेर वाजपेई जी बी किस किस नै याद राखैं?
एक चीज समझ मैं कोण्या आई इस लड़ाई की अक लड़णा तै भाजपा अर कांग्रेस आई नै चाहिये था। पर ये दोनूं तै नेड़े नेड़े नै आवंते दीखैं अर भाजपा गैल्यां जिननै घी खिचड़ी रैहना चाहिए था वे भाजपा तै दूर होन्ते जावैं सैं, इसकै खिलाफ बोलैं सैं। 11 दिसम्बर की हड़ताल मैं कांग्रेस नै समर्थन करणा चाहिये था पर कोनी करया। जयललिता नै समर्थन करया अर बीजू जनता दल नै करया। संघ परिवार भी इन विधेयकां नै ले कै भाजपा सरकार कै खिलाफ आण डट्या मैदान मैं। इननै तो कठ्ठा रहणा चाहिये था आपणी परंपरा निभाणी चाहिये थी। पर ये आपस मैं लड़ण लागरे सैं। बीजेपी तै अनुशासन आली पार्टी बताई जा थी तो यो चौड़े सड़क पै ईब के होण लागरया सै? यो हो के रहया सै? या किसी लड़ाई सै? न्यों कहया करैं अक झोटे-झोटे लड़ै अर झाड़ां का खोह। इन राजनेतावां नै या जनता ईब झाड़ बोझड़े समझनी छोड़ लेनी चाहिये। जनता रैफरी बण कै इस सारी लड़ाई नै देखण लागरी सै। जनता की रैफरसिप बड़े बड़यां नै रैफरसिप सिखा दे सै फेर भाजपा, कांग्रेस, मुलायम, कांशी अकाली, लालू अर जयललिता किस खेत की मूली सैं? देश की जनता अपणे अनुभव तै सीखण लागरी सै अर एक बख्त इसा जरूर आवैगा जिब जनता की राजनीति करणियां की जीत जरूर होगी।
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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

के बेरा था नयूं बणज्यागी ????

इब कोन्या ----------
एक बै एक साड़ी बेचण आला गाम मैं आग्या । उसनै एक घरबारण ताहिं कहया --देखै के सै ! घणी बढ़िया साड़ी सै ।  बस चार सौ रूपईयाँ  की । लेकै देख । सारी उम्र याद राखैगी  -----
घरबारण बोली ---- ना बाबा ना !! इसका रंग कच्चा लिकड़ाया  तो मैं के करूंगी ? देणी सै तो सौ रूपईयाँ मैं दे दे । 
---------घणी ए वार खींचतान चालती रही । 
हार करकै साड़ी आला बोल्या -------चाल तेरा जो जी करै वो दे दे । 
घरबारण डेढ़ सौ रूपईये दे दे दिए #####
उस दिन पाछै घरबारण नै साड़ी का पैंडा ए कोण्या छोड़्या । पड़ौसन कहती ----- हाय ! कितनी बढ़िया साड़ी ।  किततैं  खरीद कै ल्याई ?
--- हफ्ते मैं मैली करदी साड़ी । घरबारण गई जोहड़ पै साड़ी धोवण । 
सारा जोहड़ लाल कर दिया साड़ी नै । -----सारा रंग छूटग्या साड़ी का -----छूटती ए बोली ----ओहले मनै के बेरा था रंग उतरज्यागा  । बाकी नहीं रही घरबारण कै ।  नयों बोली------आवण दे जाये रोये नै ।  पीसे उलटे नहीं लिए तै मेरा बी नाम धमलो नहीं ।  
---फेर एक महीना बाट देखी पर जाये रोया कौनी आया ------। 
रमलू सुणकै  कमलू की बात अर बोल्या ------ इब्बी इसी इसी बावली 
रैहरी  सैं  म्हारे गाम मैं ।  भैंसवाल मैं तो सुन्या करते अक इब्बी बावले रैहरे सैं ।  --------- एक भैंसवाल का रिश्तेदार भी आरया था ---
वो बोल्या --- इब कोन्या रैहरे बावले भैंसवाल मैं । 
   रमलू नै एक चुटकला सुणाया रिश्तेदार ताहिं -----------
म्हारा एक क्लासफैलो था धनपत खर खोदे का  ओह ब्याह दिया भैंसवाल । नयी नयी शादी ।  दोनू सिनेमा देखण चले गए राज टाकीज मैं । फिल्म शुरू होगी ।  न्यूज आई ।  उनमैं कई बूढ़े बैठे बैठे होक्का पीवण लागरे थे । 
 ---  देखते की साथ धनपत की बहु नै तो एक हाथ लाम्बा घूंघट  कर लिया ।  हाफ टेम हुया  तै धनपत नै बूझी अक किसी लागी फिल्म ? 
वा बोली------फिल्म शुरू होंते की साथ वे बूढ़े आ बैठे थे ।  मनै तै जीबै घूंघट कर लिया था । फिल्म क्यूकर  देखती । ओ भैंस वालिया बी सुनै था ओ बोल्या ---- उसनै तो कदे गाम मैं भी घूंघट ना काढ्या तै उड़ै क्यूकर काढ़ लिया ? कमलू अर ठमलू जोर कै  हँस पड़े अर बोले -------तों ठीक कहवै था रमलू अक भैंस वाल के लोग इब्बी बावले रैहरे सैं ।  डमलू  बोल्या ------ भैंसवाल की तै ठीक फेर आडूआँ की तै म्हारे गाम मैं भी कमी कोन्या । किस किस का नाम गिनाऊँ । फाँचर ठोकां की एक नयी नस्ल पैदा होगी । कढ़ी बिगाड़ भी कई पा ज्यांगे ।  बांडे फांडे बी घाट नहीं । म्हारा गाम तै पूरा चिड़ियाघर होरया सै । हमनै लूट कै खावणिया कै यो पिछड़ापन खूब काम आवै सै । ज्युकर आज काल नोटबंदी पै धुम्मा ठा राख्या अर हम कहन लागरे सां करया तो ठीक बेशक दुखी होना पडरया सै । हम दिमाग पै जोर देण की कसम खाये बैठे साँ । कोए ना और धरती भिड़ी होवैगी जिब कहवैगा मनै के बेरा था नयूं बणज्यागी ????
आंडी रणबीर 


सोमवार, 2 जनवरी 2017

खरीदी बहू’ हरियाणा की


सते,नफे, फते,कविता,सविता,सरिता अर भारपाई ष्षनिवार नै कठ्ठे होकै बतलाये। सते बोल्या- चहणियां मैं जावण नै होरे सैं फेर ब्याह बिना ईब्बी ना सरता।नफे बोल्या- के बात सते आज बहोत गुस्से मैं दीखै सै। सते बोल्या- ओ नहीं सै म्हारी गाल मैं नसीब सिंह ओ पिचहतर साल का होरया सै। ल्याया सै बंगाली बहू।सरिता बोली- वो तो सात हजार मैं खरीद कै ल्याया सै अर दो हजार वो नहीं सै गुगण क्यांकै रमेष उसनै यू ब्याह करवावण के सर्विस चार्ज लिये सैं।नफे बोल्या- उसकी उमर कितनी सै। कविता बोली - वातो पन्दरा साल की बतावै थी। फेर उसकै म्हारी बोली तो कोन्या समझ मैं आन्ती।नफे बोल्या-यो किसा ब्याह। नसीब सिंह 75 साल का अर वा बहू 15 साल की। योतो कसूता बेमेल ब्याह सै जै इसनै ब्याह बी मानैं तो। नसीब सिंह नै इसा क्यूं करया।सते बोल्या- कहवै तो न्यूं था अक वंष चलावण की खातर एक छोरा सा तो होणा ए चाहिये। नफे सिंह बोल्या-तो इसकी खातर खरीद कै लियाओ बहू।सविता बोली- इसे छोरे आली मानसिकता के कारण तो हरियाणा मैं लड़कियां की संख्या चिन्ताजनक रुप तै घटती जावण लागरी सै।फते बोल्या-सविता जिब इसमैं कौनसी चिन्ता की बात सै। ये थोड़ी होगी तो इनकी तो समाज मैं कीमत बधैगी। लोग आंख्यां पै बिठाकै राखैंगे लुगाईयां नै। सविता बोली- याहे तो गलत फहमी सै फते।छोरियां की समाज मैं संख्या कम होवण करकै कीमत कोन्या बधै।इनपै हिंसा बधैगी।ये प्याज टमाटर थोड़ा ए सैं जो 60 रुपये किलो होज्यांगे।कविता बोली-या बात तो मनै सविता की सही लागै सै।पाछै सी अखबार मैं पढ़या था अक हैदराबाद के व्यापारी हरियाणा की मुर्रा भैंस एक लाख रुपये की खरीद कै लेगे।अर हम पांच पांच हजार मैं बहू उड़ीसा, बंगाल आसाम अर बिहार तै खरीद कै ल्यावां।यासै म्हारी कीमत तो।नफे बोल्या-कोए गाम नहीं बचरया जित 150 अर 200 ताहिं की संख्या मैं लड़के ना हों जो ओवर ऐज ना हो लिए हों। तड़कैं ए एड्डी ठाकै बाट देखनी षुरु करदें सैं सगाई आल्यां की।सविता बोली- नौकरी ना, गरीबी बधगी,उपर तै बिन ब्याहे,साथ मैं टी वी का नषे, सैक्स अर हिंसा का सोच्या समझ्या पैकेज। इसे करकै ये तरां तरां के विकृत रास्ते अपनावैं सैं। इसे करकै समाज मैं रेप,छेड़खानी,बदमाषी की घटना दिन पै दिन बधती जावण लागरी सैं। सते बोल्या-एक खास बात और सै अक म्हारे गुहांड मैं जाटां की फालतू संख्या आलेे गाम फालतू सैं। इनमैं खाते पीते परिवारां आले बालकां की तो इब्बै ब्याह षादी क्यूकरै हो ज्यावैं सैं बाकी तो सिर पर कै हाथ फिरांदे हांडे जावैं सैं।सविता बोली- हां गुजरां,यादवां अर रोड़ां मैं बी इसा ए हाल बताया। बाहर तैं महिलावां नै खरीद कै ल्यावैं सैं।पाछै सी 10-12 गामां का सर्वे करकै देख्या था इन ज्ञान विज्ञान आल्यां नै। इनमैं 50 महिला थी जो दूसरे प्रदेषां तै खरीद कै ल्या राखी थी। इसमैं रोहतक,भिवानी, जीन्द अर झझर के जिल्यां के गाम थे।बलियाना अर बहुअकबरपुर नै तो सारे गामां के रिकाट तोड़ राखे थे।सते बोल्या- फेर इननै ‘असली बहू’ का दरजा बी तो कोन्या देन्ते। उनकै म्हारी बोली समझ मैं आवै ना म्हारै उनकी बोली समझण मैं दिक्कत आवै। आज के युग मैं किसे माणस तै उसकी भापा-बोली खोस्सण तै माड़ा काम कोए दूसरा कोनी हो सकदा।सविता बोली-उस सर्वेक्षण मैं तो और बी कई भयानक सच्चाई साहमी आई।ये महिला ‘दोयम दर्जे की पत्नी’ कै ‘ल्याई औड़ बहू’ कै ‘खरीदी औड़ बहू’ के हिसाब तै जानी जावैं सैं।कई जागां तो इननै प्रदेषां के नाम तै बुलावैंगे ज्यूकर‘पारवी बहू’, ‘बिहारी बहू’, ‘बंगाली बहू’आदि आदि।इसतै न्यारा इनका रहन सहन,तौर तरीके,खानपान सबै किमै तो बदल ज्यावैं सैं।कविता बोली - कमाल की बात सै अक पूरे समर्पण अर मूल पहवान खोए पाछै बी ये महिला‘अन्य’, ‘बाहरी’अर कै ‘खरीदी औड़’बहू के रुप मैंए मानी जावैं सैं। सरिता बोली- इननै भयंकर एकान्त अर सामाजिक अलगााव का सामना करना पड़ै सै।पषुआं तै बी बदतर जिन्दगी जीवैं सैं ये।कई घरां मैं षुरु षरु मैं बेल मारकै राखैंगे अक कदे या भाज ना जावै।सविता बोली- ‘गरीब की बहू सबकी जोरु’आली बात इस तथाकथित सभ्य समाज मैं आज ‘ बाहरी बहू घर मैं सबकी जोरु’ के रुप मैं बदलगी।कई बर तो दो दो तीन तीन बर बेच दी जावैं सैं।सते बोल्या- या किसी विचित्र बात सै अक म्हारे गुहांड मैं अन्तर्जातीय ब्याह करण पै तो लड़के लड़कियां की हत्या करदी जावै अर इस ढ़ाल की अंतर्जातीय खरीद फरोख्त की पूरी इजाजत सै। अर ये म्हारे नौजवान बी मुंह नहीं खोलते इसी बातां पै।नफे सिंह बोल्या- हरियाणा मैं महिलावां की खरीद फरोख्त का धन्धा पूरे जोरां पै चालरया सै अर इसमैं बिचौलियां की चान्दी होरी सै वे मनमाने ढ़ग तै इस माहौल का फायदा ठारे सैं। सविता बोली- खरीद फरोख्त के इस घिनौने व्यापार मैं बाजार मतलब ‘मंडी’अर पितृसता के सबतै पिछड़े रुप रंग दोनूं एक होगे दीखैं सैं। जो ‘बाजार’मैं पीस्सा खरच करैगा उसनै बदले मैं खरीद्या औड़ एक गुलाम मिलैगा जिसनै उन पीस्यां के एवज मैं सारी उमर गुलामी करनी सै।जै वा खरीदी औड़ी महिला अपनी गुलामी का विरोध करै तो वा दोबारा खरीदी अर बेची जा सकै सै। कविता बोली-एक और बात समझ मैं नहीं आन्ती अक हरियाणा मैं एक तरफ तो दहेज का व्यापार धड़ल्ले तै चाल रह्या अर बधता जावण लागर्या सै अर दूजे कान्ही महिलावां ने खरीद कै ल्यावण का रिवाज बधता जावण लागर्या सै। योके रास्सा सै। हरियाणा के बु़िद्धजीवी करैंगे कदे इस ढाल की बातां पै बिचार। सविता बोली-हरियाणा के बुद्धिजीवियां नै कड़ै फुरसत सै अपने कैरियर तै, अपने बालकां के कैरियर तै जो म्हारी इन पेचीदा बातां पे गौर करैंगे। क्यों बख्त बरबाद करैंगे वे अपना। फेर एक बात साफ सै अक जो बात कविता नै ठाई सै उसमैं साफ झलकै सै अक दोनों हालातां मैं महिला का अवमूल्यन सै। औरत की खातर एक इन्सान के रुप मैं दोनों सौदे अपमान जनक सैं।आई किमै समझ मैं अक गई सिर पर कै!

रणबीर