रविवार, 28 मई 2017

हाजिर जवाबी हरियाणा की !

हाजिर जवाबी हरियाणा की !
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता, सरतो, भरतो अर भरपाई शनिवार की सांझ नै फेर कट्ठे होगे। संतोष नोडल प्रेरक भी आरी थी आज। सरोज प्रेरक माड़ी सी टैंस होरी थी। खैर सारे कट्ठे होगे तै चर्चा हुई अक आज चर्चा किस बात पै होवै? सत्ते बोल्या - इस डीजे पै काटकड़ उतररया सै इसपै चर्चा करल्यो। फत्ते बोल्या - ये आर्य समाजी सहशिक्षा का विरोध क्यों कररे सैं इसपै चर्चा होज्या। सविता बोली - भोपाल मैं उमर अर प्रियंका की शादी पै लोग सड़कां पै क्यूं आगे, इसपै चर्चा करल्यो। ताई भरपाई बोली - आज तो चर्चा होणी चाहिए म्हारे आपणे गाम अर आसपास के चुटकल्यां पै। सारे बोले - ताई भरपाई शुरू करैगी। ताई भरपाई नै सुणाणा शुरू करया - बोली मेरे चुटकुले का नाम सै ‘देखण आला आरया सै’ - एक बै एक भूभलनी और उसका घर आला दोनूं आपणा सामान बेचण खातिर एक गांव तै दूसरे गांव मैं जावैं थे। लुहारी आगे कै चढ़गी। लुहार पिछली खिड़की म्हां कै चढ़ग्या। कंटक्टर नै दो टिकट काट कै लुहार ताहिं पकड़ा दी। फेर आगे नै जाकै लुहारी ताहिं टिकट की कहण लाग्या। लुहारी नै बता दिया कि टिकट तो पाछै लुहार ने ले ली। फेर परिचालक मजाक करण का मारया कोण्या मान्या अर बोल्या टिकट तो तेरी काटूंगा। तै लुहारी हार कै बोली - ओ लुहार एक बै आगे नै लखाइये। लुहार बोल्या क्यांह तै, के बात सै? लुहारी बोली - तन्नै देखण आला आ रया सै। (देखण आले का मतलब सगाई आला होवे सै)। कंडक्टर बेचारा चुप होग्या अर बस की सवारी जोर-जोर तै हसण लाग्गी। सरिता बोली - हाजिर जवाबी का तोड़ कर दिया उस महिला नै। कविता बोली - ताई भरपाई नै बात भूभलियां तै शुरू कर दी तो एक बात याद आगी - भूभलियां की गेल्यां आमतौर पर गाम आले मजाक करते रहे हैं। बस मैं एक लुहारी बैठी थी अर उसके साथ कई बालक भी थे।
कंडक्टर आया और टिकट की कहने लगा। लुहारी बोली - एक टिकट दे दे। कंडक्टर बोल्या बस एक टिकट? अर या आधी जनैत गैल लेरी सै, इसकी टिकट कौन लेगा? जनेत मैं जाकै सारयां का जनैती रुपइया मांगोगे। लुहारी नै शांत भाव तै उत्तर दिया - भाई टिकट तो एक ही दे दे पर जै यो थारै जनेती आज्यां तै जनेती रुपइया मत दिये। सविता बोली बहोत बढ़िया, फेर ईब बात भूभलियां पर तै बदलो। उसनै सुणाणा शुरू कर दिया - हरियाणा मैं भात न्योतन की प्रथा सै। एक बै एक ताई भात न्योतन दिल्ली के बवाना गाम मैं जा थी। औचंदी बार्डर पै पुलिस नै भैली (पांच किलो गुड़) पकड़ ली अर थानेदार बोल्या - ताई यो गुड़ दिल्ली मैं नहीं जा सकदा। ताई बोली - भाई मेरी भाभी गर्म सुभा की है। जै गुड़ नहीं ले कै गई तो बेरा ना के के सुणावेगी। मन्नै यो गुड़ ले ज्याण दे। थानेदार की हथेली भी खजावै थी अक ताई किमै सेवा पाणी करदे तो जा लेण देंगे। ताई बहोत गिड़गिड़ाई फेर थानेदार नहीं मान्या। सोच-सोच कै ताई बोली - भाई बिना भेली तो मैं नहीं जां अर भेली तूं नहीं ले जाण दे तौ फेर न्यूं कर चार मार्च का फाग आले दिन का ब्याह सै या भेली तैहि राख अर उस दिन आ जाइये। कविता बोली - थानेदार का तो सही राह बांध दिया। एक बात मेरे बी याद आगी - एक आदमी गंजा था। उसकी पत्नी कानी थी पर वो बात-बात मैं उसपै तान्ने मारे जावै था। एक बर वो आदमी अखबार पढ़ै था। उसकी पत्नी बोली अखबार मैं के खबर आरी सै। वो बोल्या काहनोन्दे मैं आग लागगी। उसनै बी ओस्सान सा आग्या इतनी वार मैं अर वा बोली - फेर तै गंजूड़ के गंजूड़ जले होंगे।
नफे की बारी आगी। बोल्या - एक बै सरकार नै रूरल इंडस्ट्री लाण का प्रोग्राम शुरू करया था। भरतू गरीब किसान था। उसनै भी लोन ले कै एक पोल्ट्री फार्म खोल लिया। मेहनत करी चूजे ऊपर नै होगे तो लोन महकमे का अफसर चैकिंग पै आग्या। सब किमै देख दूख कै बोल्या - इन चूज्यां नै के खवाया करो। किसान बोल्या - काजू, किशमिश, अखरोट अर और बेरा ना के के। अफसर बोल्या - यो सब खवा कै तो चला लिया मुर्गी खाना। मैं जाकै इसनै बंद करण की सिफारिश करूंगा। भारतू गिड़गिड़ाया पर कोनी मान्या तो दो सौ रुपइये अफसर की गोज में घाल दिये अर बोल्या जी आगे तै ख्याल राखूंगा। दो म्हीने पाछै अफसर फेर पहोंचग्या। देख द्वाख कै बोल्या - इन चूज्यां नै के खवावै सै। भरतू बोल्या - के खवाना सै यो हे घासफूस खालें सै। अफसर बोल्या - इननै मारैगा। म्हारी बदनामी होगी। तेरा लोन वापस लेवण की सिफारिश करूंगा जाकै। भरतू नै फेर दो सौ रुपइये गोज में घाल दिये। अफसर बोल्या आगे तै ख्याल रखना। दो म्हीने बाद अफसर फिर पहोंच गया। मुआइना करने के बाद पूछा - इन चूजों को क्या खिलाते हो। भरतू बोल्या - जी मैं तो इनको कैश पेमैंट कर देता हूं इनका जो जी करै वो खालें। सारे बोले भरतू नै सही जवाब दिया। हरियाणवी जीवन मैं हाजिर जवाबी, साफगोई, व्यंग और मजाक बहोत गहरे तक पैठ बनाये हुए थे। फेर आज काइयांपन बहोत घणा आग्या। महिला विरोधी, दलित विरोधी, जात विरोधी चुटकुले बहुत मिलते हैं। इनसे तो छुटकारा पाकै ढंग के हंसी मजाक गायब होते जावण लागरे सैं वे ल्याणे होंगे। हरियाणा बोली कदे भाषा बणैगी इस बात पै कुछ नहीं कहया जा सकता। हां हिंदी मैं म्हारी बोली के खास शब्द शामिल करके हिंदुस्तानी भाषा का विकास करना बहोत घणा जरूरी सै। करै कौन? हमनै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै।

कहानी एक तोते की

कहानी एक तोते की
राजा का एक तोता था। बड़ा मूर्ख था। गाया तो करदा पर शास्त्र नहीं पढ्या करदा, उछल्या करदा, फुदक्या करदा, उड्या बी करदा। फेर उसनै इस बात का नहीं बेरा था अक कायदा कानून किस चिड़िया का नाम है। एक दिन राजा नै सोच्ची इसा तोता किस काम का? इसतै फायदा तो किमै सै नहीं फेर नुकसान जरूर सै। यो जंगल के सारे फल खा ज्या सै। उसके फल खावण तै मंडी मैं फलां का टोटा पड़ जावै सै। इस तोते ताहिं माड़ा मोटा शूहर सिखावण की जरूरत सै। अर शूहर जिब अवै जिब तोता पढ़ ज्या। राजा नै मंत्री बुलाया अर हुकम जारी कर दिया - इस तोते नै शिक्षा द्यो। शिक्षित करो। मंत्री ने तोते ताहिं शिक्षा देवण का काम राजा के भान्जे ताहिं सौंप दिया। भान्जे नै सैड़फैड़ दे सी पंडितां की एक बैठक बुलाई। इस बात पै विचार मन्थण कर्या गया अक तोते की अनपढ़ता का कारण के सै? सारे पंडितां नै खूब सोच-विचार करकै यो नतीजा काढ्या अक तोता अपना घोंसला साधारण सी खर पात तै बनावै सै। इसे घर मैं विद्या नहीं आती। इस करकै सबतै पहलम अर जरूरी बात या सै अक तोते का एक बढ़िया सा पिंजरा बनाया जावै।
पंडितां नै इस शानदार सोच अर इतने बढ़िया सुझाव की खातर दक्षिणा मिली। वे बहोत राज्जी होए अर खुशी खुशी अपने घरां चाल्ले गये। राजा के भान्जे नै सुनार बुला लिया। वो सोने का पिंजरा तैयार करने मैं जुटया। पिंजरा इतना अनोखा अर बढ़िया बन्या अक उसनै देखण देश-विदेश तै लोग आवण लागगे ज्यूकर चंद्रावल फिल्म देखण ताहिं ट्रैक्टरां मैं बैठ-बैठ कै हरियाणा के लोग सिनेमा हालां पै आया करदे। कोए कहन्ता - इस तोते के तो भागै न्यारे सैं। इसका नसीब बढ़िया सै। शिक्षा की तै अति हो गई तो कोए दूसरा बोलता - शिक्षा ना भी मिलै तो के सै सोने का इतना बढ़िया पिंजरा तो मिल ग्या। सुनार ताहिं थैलियां भर-भर कै इनाम दिया गया। वो तै इनाम पान्ते की साथ घर की राह पाकड़ग्या। उसनै बेरा था अक बेरा ना कद राजा का मूड बदल ज्या अर तेरा यू इनाम बी जावै। गुरु जी तोते नै पढ़ावण बैठगे। बैठते की साथ बोले अक तोते नै पढ़ावण खातर और ढाल की पोथियां की जरूरत पड़ैगी। राजा नै उसे टेम पोथी लिखण आले लाइन हाजिर कर लिये। फेर के था। पोथियां पै पोथी लिखी जावण लाग्गी। जिसनै देख्या वोहे बोल्या या तो इतनी विद्या तैयार कर दी अब इसनै तो धरने की जागां बी कोन्या बची। जिननै वे पोथी लिखी थी उन ताहिं इतने इनाम दिये गये अक वे खच्चरां पै लाद-लाद कै लेगे वे इनाम। इन पोथी लिखणियां के दिन बाहवड़ आये। इनकी जिंदगी मैं तंगी का नाम निशान कोन्या बच्या।
तोते का पिंजरा इतना दामी था अक उसकी देखरेख मैं राजा का भान्जा बहोत व्यस्त रहवण लाग्या। हर बख्त मरम्मत, छाड़ पोंछ अर पालिश ए होन्ती रैहन्ती। इन कामां की खातर लोग लगाये गये। अर उनके कामां की देखभाल करण की खातर और लोग काम पै लगाये गये। पूरा महकमा खड़या होग्या। सब मोटी-मोटी तनख्वाह ले कै अपनी जेब भरण लाग्गे। फेर इस संसार मैं फांच्चर ठोकां की भी कमी कड़ै सै। एक टोहो हजार पाज्यांगे। वे बोले पिंजरे की तो तरक्की होवण लागरी सै फेर तोते की खोज खबर लेण आला कोण सै? बात राजा के कानां ताहिं बी पहोंचगी। भान्जा बुलाया अर पूछया क्यों भान्जे साहब। ये के बात सुणण मैं आवै सै? भान्जा कुणसा कम था एकदम बोल्या महाराज अगर सच सुनना चाहो सो तों सुनार नै बुला ल्यो अर पंडितों नै बुला ल्यो। निन्दुकां कै हाथ कुछ नहीं लागता ज्यां करकै वे इसी बात करैं सैं। जवाब सुणकै राजा कै सारी बात समझ मैं आग्गी। अर उसनै झटपट भान्जे के गले मैं सोने का हार पहरा दिया।
कुछ दिन पाछै राजा का मन करया अक तोते की शिक्षा अपनी आंख्यां तै देखै। एक दिन पहोंचग्या शिक्षाशाला मैं। उनके पहोंचते की साथ डयोढी के धोरे शंख, ढोल, नगाड़े, मृदं बाज पड़े। पंडित गल पाड़ पाड़कै मंत्र जाप करण लाग्गे। मिस्त्री मजदूर सुनार जयजय कार करण लाग्गे। भान्जा बोल्या - देखल्यो महाराज कितनी बढ़िया शिक्षा चाल रही सै। महाराज प्रसन्न होगे आ उल्टे भागे। उड़ै झाड़ी मैं छिप्या निंदक बोल्या - महाराज थामनै तोता देख्या बी सै? राजा चौंक कै बोल्या - अरै हां तोता देखण तो मैं भूले गया। राजा तोते धोरै गया। बंदोबस्त देख कै बहोत राज्जी हुआ। तोता उस बंदोबस्त मैं दिखै ए कोनी था। राजा नै सोच्ची तोता देखण की के जरूरत सै। पिंजरे मैं दाना पानी तो नहीं था बस शिक्षा मतलब पोथियां के पन्ने फाड़ कै कलम तै तोते के मुंह मैं ठोंस राखे थे। तोते का गाना बंद होग्या। चिखण चिलावण की गुंजाइश कड़ै बचै थी। दिन पै दिन कमजोर होन्ता चल्या गया। लोगां नै सोच्या अक प्रगति आशाजनक सै। नाच गाना छोड़ कै तोता शिक्षा कै मंडरया सै। एकाध बर पंख फड़फड़ा दिया करता। कई बर चोंच तै पिंजरे की सलाख काट्टण की कोशिश करता। कौतवाल नै तोते के पंख बी कटवा दिये। शिक्षा पूरी होगी। भान्जा राजा पै गया बतावण। राजा नै बूझया ईबी कुदकै सैके? भान्जा बोल्या - नहीं। राजा बोल्या ईबी गावै सै के दाने खातर चिल्लावै सै? भान्जा बोल्या - ना कति नहीं राजा बोल्या - एक बै तोते नै ल्यां मैं देखूंगा। तोता बड़े ठाठ बाठ तै ल्याया गया। राजा ने तोते कै चुटकी मारी। तोते नै ना हां कही ना नां कही। ना चिख्या ना चिल्लाया। हां उसके पेट मैं पोथियां के सूके कागजां की आवाज जरूर गूंजै थी। तोता मर चुक्या था। आई किमै समझ मैं ?

साठ साल

साठ साल मैं के खोया, के पाया
यो पन्दरा अगस्त फेर आया
सते फते नफे सविता कविता सरिता और ताई भरपाई फेर शनिवार नै जन चेतना केंद्र मैं कट्ठे होगे अर बात चाल पड़ी पन्दरा अगस्त पै। सते बोल्या - हमनै 47 मैं आज़ादी पन्दरा अगस्त नै पाई थी जिसकी खातर भगत सिंह नै फांसी अर गांधी जी नै गोली खाई थी। ठारा सौ सतावण मैं आज़ादी की पहली जंग लड़ी लाखां लोगां नै कुर्बानी दी थी। किसान लड़े, कारीगर लड़े, बीर लड़ी, मर्द लड़े, राजे लड़े, रजवाड़े लड़े, लजवाणे के भूरा निंघाइयां लड़े। फते बोल्या - हरियाणा मैं भी तो बहोत से लोगां नै ज्यान की बाजी लाई थी। अपने खिडवाली गाम के ग्यारा लोग शहीद हुए। नफे बोल्या - के नाम थे उनके? सते बोल्या - इनके नाम थे बही शेख, लालू बालमीकी, तिरखा बालमिकी, मोहमा शेख, जुलफी मौची, सुनार रामबक्स, बेमा बालमिकी, इदुल मौची, मुफी औला पठान, मोहर नीलगर, सायर बालमिकी, अर सुंनाकी बालमिकी। खास बात तो या सै अक खिडवाली के कई मानसां धौरे बूझी इनके बारे मैं फेर किसे नै बेरा ए कोनी इनका। सविता बोली - म्हारे हरियाणा की यादाश्त कमजोर सै। इसे करके तो पूरे देश मैं 1857 राष्ट्रीय विद्रोह की 150वीं वर्षगांठ मनाई जावण लागरी सै अर हाम हाथ पै हाथ धरे बैठे सां। कविता बोली - और के मेवात मैं सदरुदीन किसान नै अपनी शहादत दी थी। ताई भरपाई बोली - 1857 अर 1947 के बीच मैं भी तो बहोत से लोगां नै कुर्बानी दी थी देश की आज़ादी की खातिर। हरियाणा के फौजी आजाद हिंद फौज मैं शामिल हुए। गांधी, नेहरू, भगत सिंह, अंबेडकर हर नै भी तो कुर्बानी दी।
फेर सवाल यू सै अक जिसी आजादी का सपना भगत सिंह हरनै देख्या था वा आजादी म्हारे पूरे भारत मैं अर म्हारे हरियाणा मैं आई अक नहीं? इस साठ साल की आजादी मैं के खोया के पाया? नफे बोल्या - और तो बेरा ना फेर हरियाणा नै तो आर्थिक मोरचे पै तरक्की के सारे रिकाट तोड़ दिये। एयरकन्डीशन्ड जीवन शैली पै पहोंचग्या हरियाणा। घर मैं, कार मैं, स्कूल मैं, दफ्तर मैं, बाजार मैं, सारै एयरकन्डीशनर छागे। साइनिंग हरियाणा सै म्हारा आज। कविता बीच में बोल पड़ी - नफे बस बहोत होली तेरे साइनिंग हरियाणा की। इसका असली रूप बहोत दूसरा सै - सफरिंग हरियाणा। आर्थिक जगत मैं जित इतनी तरक्की करी सै उड़ै ए समाजिक स्तर पै आज बी हरियाणा बहोत पाछै सै। साल 2006 का लिंग अनुपात एक हजार पै आठ सौ बीस सै। पढ़े लिख्यां मैं यो अनुपात एक हजार पै छह सौ सतरां का सै। दलितां की हालत का के जिकरा सै। महिलावां पै घरेलू अर बाहरी हिंसा बढ़ती आवै सै। नफे बोल्या - कविता तनै तो हमेशा चीजां मैं मीन-मेख काढ़ण की आदत सी होगी। ताई भरपाई बोली - मीन मेख का सवाल नहीं सै। जिस आजादी अर तरक्की का तनै जिकर करया सै वह तो दस प्रतिशत आबादी धौरे मुश्किल तै पहुंची सै। हरियाणा के 90 प्रतिशत नै जिनमैं दलित, महिला अर युवा लड़के-लड़की शामिल सैं, उननै तो मेहनत करकै हरियाणा बनाया सै फेर इस तरक्की का फल तो चाख कै बी कोनी देख लिया। हमनै आजादी के संघर्ष मैं जो जनतांत्रिक अधिकार संविधान मैं हासिल करे थे वे कड़ै पहोंचे सैं म्हारे परिवारां मैं? या पिछड़ी सोच, रूढ़िवाद अर अंधविश्वास की जड़ता अर इसके रुखालीये स्वंभू पंचायतें इनै कड़ेै बड़ण दिये नागरिक अधिकार म्हारे परिवारां मैं? इननै तो आजादी सै अंतरजातीय ब्याह करण आल्यां नै फांसी तोड़ण की, फतवे करकै तबाह करण की, इननै आजादी सै दुलिना कांड की, गोहाना कांड की, हरसौला कांड की।
इन तथाकथित पंचायतां नै आजादी सै आसण्डा कांड की, जौन्धी मैं पति-पत्नी नै बाहण-भाई बणावण की। नये बास मैं माणस मरवावण की। रविदास कहगे - ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न। सोचना चाहिए साठ साल की आजादी का हरियाणा मैं के मतलब सै?

कौन-सी परंपरा ?

कौन-सी परंपरा ?
या कहानी नहीं सै। या बनी बनाई बात नहीं सै। या असल मैं होए औड़ बात सै जो किसे बी प्रान्त हरियाणा, यूपी, बिहार, पंजाब मैं हो सकै सै। म्हारे गाम की बात हो सकै सै। थारे गाम की बात हो सकै सै। पड़ोस के गाम की बात हो सकै सै। या म्हारी गली की बात हो सकै सै। या थारी गली की बात हो सकै सै। या किसे बी गली की बात हो सकै सै। या म्हारे घर की बात हो सकै सै। या थारे घर की बात हो सकै सै। डटकै! घणी तावल करने की जरूरत नहीं सै। बातै इतनी गंभीर सै अक क्यूकर करी जा अर करी बी जा अक नहीं करी जा। तो बात या सै अक एक गरीब परिवार था। मां-बाप, एक बेटा दो बेटी। गाम मैं मजदूरी करकै, भैंस का दूध बेच कै अर छह बीघे धरती बाधे पै ले कै बहोत मुश्किल तै गुजारा करैं थे। छोरा ब्याहवण जोगा होग्या। फेर एक तो लड़की मिलना ए मुश्किल काम अर दूसरे ब्याह की खातर खर्चा पानी करने को पैसे नहीं। कई रिश्तेरियां की सिफारिश करकै छोरी पाई थी। कई जगां ब्याज पै 10,000 रुपइये लेवण गया फेर उसकी माड़ी माली हालत देख कै गाम मैं कोए भी तैयार नहीं हुया पीस्सा ब्याज पै देवण नै। एक बर तो ब्याह की तारीख बी आगे नै डिगावनी पड़ी भाई नै। मां न्यारी परेशान। बाबू न्यारा दुखी। करै तो के करै?
एक गाम के बड्डे पंचायती नै हां भरी ब्याज पै पीस्से देवण की। बहोत खुश हुया सुरता अक ईब दोबारा ब्याह की तारीख नहीं आगै सरकानी पड़ैगी। मगर चौधरी नै एक मामूली सी शर्त लगा दी ब्याज पै पीस्से देवण की। सुणकै सुरते के पायां तले की धरती खिसकगी। करै तो के करै? इस शर्त नै मानै तो मुश्किल अर ना मानै तो ब्याह कोन्या होवै। घर क्यां तै सलाह करण की बात कही सुरते नै। चौधरी बोल्या - इसी बातां की सलाह नहीं करया करते ये तो गुप-चुप हो जाया करैं। दो दिन की मोहलत ले कै आग्या सुरता चौधरी पै। मां नै बी बेटे पै पूछनी चाही तो इशारे से मैं बताई सुरते नै बात। मां किमै समझी किमै नहीं समझी। खैर सुरता 10,000 रुपइये ले आया ब्याज पै। ब्याह होग्या। बहू आगी। घूंघट के म्हां कै अर फोटू मैं उसनै अपना घर आला देख लिया था। परिवार उनका भी गरीब था। पहली रात नै जो हुया उसनै देख कै तो रमलो हैरान रैहगी अर उसकै बहोत घणा गुस्सा आया। सुरते की जागां वो चौधरी आग्या उस कमरे मैं जिसनै ब्याज पै पीस्सा दिया था। उस औरत ने बहाना बना कै उस कमरे तै बाहर लिकड़ कै पैंडा छुटवाया। उसकी सासू ने बेरा लाग्या तो वा उल्टी बहू नै समझावण लागी - ए बहू इसपै 10,000 रुपइये उधार लिये सैं। क्यों घर की इज्जत खिंडावै सै। बहू बोली - 10,000 तमनै लिये सैं एक रात का मेरा सौदा करकै अर फेर मनैए उल्टा न्यों कहवो सो अक क्यों म्हारी इज्जत खिंडावै सै।
इज्जत थामनै खिंडाई अपनी अर गैल मेरी बी। इज्जत पर तो हाथ गेरया उस बड्डे पंचायती नै जिसनै थारे तै ब्याज पै पीस्से दिये। खैर वा लड़की अगले दिन अपने पीहर चली गई और उसनै घर जा करकै सारी बात बता दी। छोरी के मां-बाप बहोत दुखी हुये। वे पांच-सात मौजिज आदमियां ने ले कै उस लड़की की ससुराल मैं पहोंचे। गाम के बुजुर्ग अर स्याणे माणस कट्ठे कर लिये। सारे लोगां का योहे था अक जो होगी उसपै माट्टी गेरो अर इनका घर बसण द्यो। जितने मुंह उतनी बात थी। फेर उस छोरी नै स्टैंड ले लिया अक वा उस घर मैं कोन्या रहवै। ईब तो दस हज़ार मैं एक रात का सौदा करया सै। कल को पता नहीं मेरे शरीर का कितने मैं सौदा कर लेंगे ये। सुरते के बाबू नै सुरते के ससुरे के पाहयां में अपनी पगड़ी टेक दी। वा लड़की बोली या पगड़ी जिब कित गई थी जिब मेरा सौदा करया था। कमाल की बात या थी अक सुरते के गाम की पूरे के पूरे की वा बहू इज्जत बनगी अर दूसरे कान्ही तै उसके अपने पीहर के गाम की बी वा इज्जत बनकै साहमी आई। अर दोनों गामां के लोग इज्जत बचावण मैं जुटगे।
लड़की नै करड़ा स्टैंड लिया तो इन सबके तेवर बदलगे अर जितनी अपील थी इन पंचातियां की वे धमकियां मैं बदलगी। वे उस लड़की नै बतावण लाग्गे अक जै तनै यो रिश्ता तोड़ दिया तो तेरी गेल्यां के बण सकै सै। जिसनै ब्याज पै पीस्से दिये सैं इसकी गाम गुहांड में बहोज इज्जत सै अर ऊपर ताहिं पहोंच सै। जड़ उस छोरी नै कह दिया अक मनै मरना मंजूर सै फेर इसे कसाइयां के गाम मैं मनै कोन्या रहना। आगे की आगै देखी जागी। खैर उस छोरी नै उसके माता-पिता बी नाता तोड़ कै अपना घरां उल्टे लेगे। फेर इस सारे वाके नै कई सवाल समाज कै साहमी ल्या दिये। पहली बात तो याहे सै अक म्हारा समाज कित जा लिया? म्हारे समाज नै (दोनूं गामां की पंचायतां नै) उस छोरी को ही समझाने पर जोर क्यों दिया? क्या उस लड़की का तथाकथित पति और उसका परिवार किसी कानून के तहत सजा का दोषी नहीं? और सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उस ब्याज पर पैसे देने वाले चौधरी की पहली रात उस लड़की के साथ बिताने की मांग को समाज ने किस ढंग से देखा? इस पूरी बात में उसे किसी ने नहीं धिक्कारा। किसी ने उसकी इस घिनौनी हरकत की भर्त्सना नहीं की। आखिर ऐसा क्यों? सोचना चाहिए। कुछ करना चाहिए? समाज का बिगाड़ तेजी तै होण लाग र्या सै।

वॉल मार्ट

घर भीतर बड़ग्या साम्राज्यवाद - वॉल मार्ट
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, ताई भरपाई शनिवार की शाम को ताई भरपाई की बैठक में आये। फत्ते बोल्या - काल अखबार मैं पढ़ी थी अक यू साम्राज्यवाद म्हारे घरां मैं बड़ लिया। ताई भरपाई बोली - ये स्वंभू पंचायत ही भतेरी थी हरियाणा मैं, यू साम्राज्यवाद और के बला आगी? कविता नै सत्ते की तरफ देख्या। सत्ते नै नफे की तरफ नजर घुमाई। नफे नै सरिता उकसानी चाही। सरिता नै सविता तै आंख मिलाई। फेर साम्राज्यवाद की परिभाषा तो किसे धोरै कोन्या पाई। नफे नै फेर एक बात बताई। बोल्या - नरसिंह अर प्यारे लाल दो भजनी हुए सैं हरियाणा मैं। एक बर चौ. छोटूराम के जन्मदिन पर भजन पेश कर रहे थे। उनके मुख से बोग्गस शब्द निकल गया। बोले - जानते हो इस बोग्गस शब्द की परिभाषा? फिर बोले - परिभाषा का तो मनै बी कोनी बेरा फेर मैं न्यों बता सकूं सूं अक बोग्गस कौण सै, फेर थाम बना लियो अपनी परिभाषा बोग्गस की। चौ. छोटूराम के परिवार मैं चौ. श्रीचन्द हुए उननै सारे लोग जानते हैं, वे स्पीकर भी बने हरियाणा विधानसभा के। उनके परिवार मैं फेर रिसाल हुया। देख्या होगा सबनै। ओ बोग्गस सै। ईब परिभाषा थाम बनाल्यो बोग्गस की। तो नरसिंह भजनी के हिसाब तै इस साम्राज्यवाद की परिभाषा का तो मनै बेरा ना फेर यू अमरीका साम्राज्यवाद सै। या के बला सै इसका थाम तोड़ पाड़ल्यो। फत्ते बोल्या - अखबार मैं लिख राख्या था अक मित्तल की भारती अर वॉलमार्ट नाम की बिदेशी कम्पनी मैं समझौता होग्या अक ये मिलकै भारत के खुदरा व्यापार मैं पीस्सा लावैंगे। सरिता बोली - यातो आच्छी ए बात सै। इसतै हमनै सस्ती, बढ़िया बिना मिलावट की चीज तो मिलैंगी। अर इन खातिर रोहतक बी कोनी जाना होगा। म्हारे बोहर गाम में, म्हारी गाल में हमनै सारी चीज मिल जावैंगी। फत्ते बोल्या - पूरी बात तामनै सुनी नहीं बीच मैं बोल पड़ी। तनै बेरा सै म्हारे गाम मैं ये किरयाणे की अर और छोटी-मोटी कितनी दुकान सैं? सरिता नै जवाब दिया - पक्का तो मनै बेरा ना फेर होंगी 20-30 दुकान तो। फत्ते बोल्या - म्हारला धर्मा का छोरा किरयाने की दुकान करर्या सै। ओ बतावै था अक म्हारे गाम में छोटी-मोटी सारी मिलाकै 100 तै ऊपर दुकान सैं।
इसका मतलब जै एक घर मैं 4 जणे बी सैं तो 400 लोगां का गुजारा होर्या सै इस खुदरा व्यापार के कारण। बेरा सै हरियाणा मैं कुल कितने गाम सैं? सारे एक दूसरे के मुंह नै देखण लागगे। फत्ते बोल्या - थोड़ा घणा अन्दाजा तो लाओ। चार हजार, पांच हजार, छह हजार? बसे अर बिना बसे कुल मिलाकै 6955 गाम बताये हरियाणा मैं। अर जै एक गाम मैं 50 किरयाने की अर और छोटी दुकान हों, और कम करल्यो 30 दुकान लाल्यो। तो 6955 गामां मैं कितनी दुकान होगी? दो लाख आठ हजार छह सौ पच्चीस होगी। इन दुकानां के पाछै इतने ए परिवार होगे। मतलब आठ लाख तै फालतू लोगां की रोटी रोजी का मामला जुड़र्या सै इस खुदरा व्यापार गेल्यां सीधम साध। और बी कई हिस्से बचगे जिनका हिसाब लागना बाकी सै। सरिता बोली - या भारती कम्पनी जो अपनी दुकान खोलैगी उसमैं रोजगार नहीं मिलैगा के? फत्ते बोल्या - दो दुकान एक काम मैं अर एक दुकान मैं दो माणस तो चार हुए बाकी बचगे 26, तो 26 का तो रोजगार गया। फत्ते बोल्या - पहलम तो सरकार इसी कम्पनियां नै होल सेल मैं व्यापार करने की इजाजत दिया करती। ईब खुदरा व्यापार मैं बी इजाजत दे दी? वॉल मार्ट इकलौता सबतै बड्डा खुदरा व्यापार का बादशाह सै जिसनै लेबर कानूनां की खूब धज्जियां उड़ाई सैं, यूनियन तोड़ी सैं, छोटे खुदरा व्यापारी पढ़ण बिठा दिये इसनै। अर मजदूरां का खूब खून चूस्या शाम दाम दण्ड भेद के गुर लागू करकै। भारत मैं बी यो म्हारे मैं तै कईयां नै तोड़ कै अपनी साथ मिला लेगा। टी वी के माध्यम तै यो अपनी बातां का प्रचार करैगा अर हम टूहल ज्यांगे उन बातां पै। सरिता बोली - इसका मतलब ये लोग तय करैंगे अक हम के खावांगे, के पीवांगे, के पहरांगे, के गावांगे, अर और बेरा ना के के। कविता बोली - इस हिसाब तै तो जै पूरे भारतवर्ष का हिसाब लावां तो ये तो करोड़ां करोड़ लोगां नै बेरोजगार करैंगे। कुछ तो करना चाहिये न्यों हाथ पै हाथ धरें के काम चालै सै? सुण्या सै 200 मिलियन डालर तै ये अपना खुदरा व्यापार शुरू करैंगे अर आवण आले बख्तां मैं 15 बिलियन डालर झोकैंगे इस धन्धे मैं।
सत्ते बोल्या - म्हारे खुदरा आले क्यूकर डटैंगे इनके साहमी? अर जो इतना पीस्सा लावैगा ओ इसतै दो तीन गुणा कमावै बीगा। समझल्यो म्हारी गोजां पै डाका सै यू। गेर रै पत्ता गेर। देखी जागी। ईब कौनसे तीजां बरगे कटरे सैं। हम न्यों ए ताश खेलते रहे तो नाश होणा लाजमी सै अर हम न्योंए ताश खेलते रहवांगे अर फेर कहवांगे - ओहले! हमनै के बेरा था न्यों बणज्यागी? ईब्बी सम्भाला लेल्यो। यो वॉल मार्ट चाहवै सै अक ये स्वंभू पंचायत हमनै न्यों ए जात गोत के सवालां पै लड़ाती रहवैं तो इनै म्हारे गल्यां मैं आर्थिक गुलामी का फन्दा घालण मैं आसानी रहवैगी। जात-पात के फन्द काट कै एक हो ज्याओ जै इस साम्राज्यवाद का मुकाबला करना सै।

कोल्हू का बछेरा

कोल्हू का बछेरा
पुराने जमाने की बात सै। एक गाम में एक व्यापारी रहया करता। उसके पास एक घोड़ी थी। घोड़ी पर सवार होकै वो व्यापार करने जाया करता। एक बार व्यापारी घोड़ी पर सवार होकै लम्बे सफर पै चाल पड़या। घोड़ी थी वा गर्भवती। लाम्बी यात्रा करकै घोड़ी मुश्किल तै चाल पावै थी। थकावट बी आगी थी। व्यापारी नै सड़क के किनारै तेल निकालने वाले एक कोल्हू को देख्या। उस बख्त वहां कोई नहीं था और कोल्हू बी बंद था। व्यापारी घोड़ी तै नीचे उतरया अर घोड़ी कोल्हू कै बांध दी। पास के गाम मैं चल्या गया। वहां पेट भरकै खाणा खाया अर घोड़ी की खातर बी जरूरत के हिसाब तै चना ले लिया। इस बीच घोड़ी नै एक सुंदर से बछेरे को जन्म दे दिया अर उस कोल्हू का मालिक बी वहां पहुंच गया। उसने घोड़ी और बछेरे को देखा तो उसने मन मैं लालच आ गया। उसनै घोड़ी के बछेरे को अपने घर ले जाने की सोची। व्यापारी के लौटने से पहले ही वह बछेरे को अपने घर उठा लेग्या। जब व्यापारी वापस आया तो उसको पता चल्या अक कोल्हू का मालिक बछेरे को अपने साथ अपने घर ले गया। वह बछेरे को मांगने के वास्ते कोल्हू के मालिक के घर पहोंच गया। व्यापारी बोल्या - कोल्हू के मालिक मेरा बछेरा मुझे वापस दे दो। कोल्हू का मालिक तेज आवाज मैं बोल्या - यो बछेरा तो मेरा सै। इसे मैं तनै क्यूं द्यूं? व्यापारी नै फेर हाड़े खाये - कोल्हू के मालिक मेरी घोड़ी ने इस बछेरे को जनम दिया सै। मेरा बछेरा मनै दे द्यो। फेर कोल्हू का मालिक बछेरा वापस करने के लिए तैयार नहीं था। कोल्हू का मालिक बोल्या - नहीं यो मेरे कोल्हू का बच्चा सै। इस करकै यो मेरा सै।
इब व्यापारी नै बी गुस्सा आया अर वो बोल्या - कोल्हू कै भी कदे बच्चे पैदा होवैं? तुम मनै बेवकूफ क्यों बनाओ सो। इस पर व्यापारी अर कोल्हू के मालिक के बीच तेज-तेज आवाज मैं बहस होवण लागगी। शोर-शराबा सुन कै गाम वाले भी आगे। झगड़ा निबटावण की खातर पंचायत बुला ली गई। पंचायत के साहमी व्यापारी ने अपना दावा पेश करया और कहा - बछेरा मेरा है क्योंकि मेरी घोड़ी नै इसे जनम दिया सै। कोल्हू के मालिक नै कहया - नहीं मेरा कोल्हू बछेरे का बाप सै। उसनै या बात बड़ी तेज आवाज मैं जोर तै चिल्ला कै कही। गांव में बड़े-बूढ़े सारे चक्कर मैं पड़गे। वे समझ नहीं पा रहे थे अक इस झगड़े का निबटारा क्यूकर करैं? काफी देर तक सोचते रहे इस मामले पर फेर कोए नतीजा नहीं काढ़ पाये। आखिर मैं थक-हार कै उननै कहया - कोल्हू के मालिक तुम म्हारी बात सुणो अर घोड़ी के मालिक थाम बी सुणो। केवल थारे बयान पै हम विश्वास नहीं कर सकते इस करकै गवाह चाहिये। तुम दोनों कल आओ अर साथ अपने-अपने गवाह भी ल्याओ। गवाहों की बात सुनने के बाद ही हम कोए फैसला कर पावांगे। फैसला होने तक बछेरा पंचायत के पास रहेगा। व्यापारी बेचारा जंगल मैं चलया गया। उसनै घोड़ी को घास चरण की खातर छोड़ दिया अर खुद एक पेड़ की छाया मैं लेटग्या। वो असल मैं बहोत परेशान था। उसकी समझ जवाब देगी थी। उस ए बख्त एक लोमड़ी उड़े कै गुजरी। लोमड़ी नै परेशानी मैं घिरया व्यापारी देख्या अर उसतै बूझया - व्यापारी जी बहोत परेशान लागो सो। के बात? व्यापारी ने जवाब दिया - मनै घोड़ी कोल्हू कै बान्धी। घोड़ी नै बछेरा जनम्या। कोल्हू का मालिक बछेरा ठा लेग्या। पंचायत नै गवाह मांगे सैं। कोल्हू का मालिक आड़े का रहवण आला सै वो तै आसानी तै गवाह ले आवैगा। मैं के करूं?
लोमड़ी बोली - व्यापारी तुम परेशान मत होवो। मैं गवाही देउंगी। अगले दिन पंचायत बैठी तो कोल्हू का मालिक एक झूठा गवाह ले आया। गांव वालों ने व्यापारी से पूछा तो व्यापारी बोल्या - लोमड़ी मेरी गवाह सै। इसपै सारे हंस पड़े। बाट देखी लोमड़ी की। कोनी आई। आखिर घणी बाट दिखाकै आई लोमड़ी। वा जोर-जोर की जम्हाई लेवै थी। पंचायत नै पूछया - अरै लोमड़ी, तनै इतनी देर क्यों करदी? लोमड़ी नै नींद मैं जवाब दिया - सम्मानित बुजुर्गों, कल रात समुद्र मैं आग लाग गी अर मनै पात्ती गेर-गेर कै आग बुझाई। सारी रात लागगी। इसे करकै देर तै आई सूं। सारी रात सो नहीं पाई। सारे बूढ़े एक आवाज में चीखे - झूठ, झूठ। लोमड़ी सफेद झूठ बोलगी। मान भी लेवैं अब समुंद्र मैं आग लागगी तो पात्ती तै क्यूंकर बुझाई जा सकै सै? लोमड़ी पंचायत के गुस्से तै डरी कोन्या। अर अपनी बात पै डटी रही। पंचा तै बूझया - जै समुन्द्र मैं आग नहीं लाग सकती, अर जै वा आग पात्ती तै नहीं बुझाई जा सकदी तो बछेरा कोल्हू का बालक क्यूकर हो सकै सै? लोमड़ी के इस सवाल पर पंचायती चुप। कोए जवाब नहीं सूझया। उनकै अपनी गल्ती समझ मैं आगी। उननै व्यापारी का बछेरा वापस कर दिया। पंच परमेश्वर की कहानी मुन्शी प्रेम चंद जी नै लिखी। फेर कड़ै सैं उसे पंच परमेश्वर। हरियाणा के पंचायती तो इन पंचायतियां तै बी दो चन्दे फालतू सैं। इस पंचायत नै तो बछेरा कोल्हू का बालक बणाया फेर म्हारे आजकाल के पंचायती तो बीर-मरद नै बाहण अर भाई एक मिनट मैं बणा दें। चाहे आसण्डा हो, चाहे जौन्धी हो, चाहे नया बास हो। एक खास बात और सै अक व्यापारी की मदद मैं लोमड़ी तो आगी थी। इन पंचायतां के फतव्यां कै साहमी बोलण की हिम्मत कोए नहीं करदा। हरियाणा मैं तो इन फतव्यां के भुक्त भोगियां की लोमड़ी जनवादी महिला समिति दीखै सै जो जाथर थोड़ा होत्ते भी कई सालां तै बहोत घणा बोझ ठावण लागरी सै इन मामल्यां मैं। हरियाणा मैं जब ताहिं तर्क, विवेक अर वैज्ञानिकता की सोच जन-जन मैं पैदा नहीं होवैगी इतनै ये पंचायती न्योंए खेलें जांगे म्हारी जजबातां तै।

हरियाणा नम्बर वन

हरियाणा नम्बर वन
सते फते नफे सविता कविता सरिता नमिता संगीता अर ताई भरपाई जन चेतना केन्द्र मैं आई अर दुख-सुख की बतलाई। कविता बोली - के बात आज सरिता कमनू सी लागै सै। सरिता बोली - कमनू सी के, बातै कुछ इसी सै। कविता - बता तो सही के बात सै। चरचा करैगी तो किमै राह बी लिकड़ैगा। सरिता बोली - म्हारी रिस्तेदारी नंूह कान्ही से मेवात मैं। उड़ै गई तो बेरा लाग्या अक गाम के दो माणसां नै जिनमैं एक सरपंच का भानजा भी था एक बहू की गेल्यां खेतां में जोर जबरदस्ती कर ली। पहलम तो पुलिस नै ए रिपोर्ट लिखण मैं दिन मैं तारे दिखा दिये। बेरा ना वे कित कित घुमा दिये। महिला पुलिस का चक्कर पड़ग्या फेर। एक पुलिस आला तो बोल्या अक ताली एक हाथ तै कोन्या बाजती। सुनकै उसके घर आला बहोत दुखी हुया फेर के करै? उसका गांव तिगाव पी एच सी के तहत आवै सै। अर इस पी एच सी मैं कोए बी लेडी डाक्टर कोन्या। उड़े तै चाल कै नूंह के अस्पताल में आये तो बताया अक महिला डाक्टर एकै ए सै अर वा रक्साबन्धन पै छुट्टी लेकै जारी सै। बहू का बुरा हाल। कोए इलाज नहीं शुरू हुया अर लोगां के तान्ने वे न्यारे। घरआला बोल्या होलदार नै अक होरी सै डाक्टरी, तूं हमनै म्हारे घरां जानदे। नूंह तै चाले-चाले माण्डी खेड़ा पहोंचे। यो मेवात जिले का जिला स्तर का अस्पताल सै। उड़ै बी एक लेडी डाक्टर ठेकेदारी आले खाते मैं ला राखी। वा बोली अक म्हारे ताहिं इस तरियां के मैडीकोलीगल केस करण की इजाजत कोन्या।
बड़े हाड़े खाये फातमा के घरआले नै, फेर उस डाक्टरनी नै कति हाथ खड़े कर दिये। घरआले नै उसके पां पकड़ लिये तो वा छोह मैं आकै बोली - मेरी नौकरी मैं डांगर हांड ज्यावैंगे। मैं नहीं कोए मदद कर सकदी थारी। फेर पां पकड़ण का एक फायदा होग्या अक उस लेडी डाक्टर नै उसका केस गुड़गावां के सीएमओ कै रैफर कर दिया। रात होगी। कित जावैं? होलदार उड़े के थाने मैं लेग्या। फातमा के घर आले का दिल धक-धक करै था अक कदे और लेने के देने पड़ज्यां। फेर ओ होलदार बढ़िया माणस था। क्यूकरै रात उड़ै काटी अर आगले दिन बख्तै गुड़गामा के अस्पताल मैं पहोंचगे। उड़ै लेडी डाक्टर की घंटा भर बाट देखी। आई तो कागज देखे अर कागज देख के बोली अक यो तो मेवात जिले का केस सै इसका दूसरे जिले का डाक्टर परचा नहीं काट सकदा। फातमा के घरआले की पाहयां तले की जमीन लिकड़गी। करै तो के करै? बताओ उसनै आगै के करना चाहिए था? होलदार गुड़गामा के सीएमओ धोरै गया। सीएमओ साहब कितै बीजी थे। एक घन्टे पाछै आये। पूरी बात सुनी फेर बोले अक यह तो मेवात के जिला अस्पताल में ही होगा। के बीती होगी फातमा अर उसके घरआले के दिल पै या बात शब्दां मैं ब्यान करना बहोत मुश्किल सै। अंग्रेजां के बख्तां मैं सुन्या करदे अक भारतवासियां खातिर ना कोए दलील थी ना अपील थी। फातमा के घरआले नै इसा महसूस हुया जणो तो अंग्रेजां का राज हटकै आग्या। वे डिंग आगे नै धरैं अर पां पाछै नै जावैं। एक अखबार ले लिया उसनै। बस मैं बैठे तो पहला पेज पढ्या उसमैं लिख राख्या था हरियाणा नम्बर एक बनाना सै। प्रति व्यक्ति आय मैं हरियाणा नम्बर एक पै आ लिया।
फातमा बोली - म्हारी खातिर इन नम्बरां के के मायने सैं? खैर चाल कै फेर माण्डी खेड़ा आगे। उड़ै आये तो सिविल सर्जन साहब नहीं मिले। कित गये कोए बता कै देवै ना। छुट्टी पै सैं? ना छुट्टी पै बी कोन्या। तो कित सैं न्यों बी बेरा कोन्या। आखिर मैं दुखी होकै होलदार नै अपने मेवात के एसपी तैं बात करी अर सारी राम कहानी बताई। एसपी नै डीसी गुड़गामां तै बात करी। डीसी गुड़गामा नै सीएमओ तै बात करी। सीएमओ नै बताया अक सीएमओ गुड़गामा कोओपरेट कोनी करर्या।
डीसी बोल्या मेवात पूरे जिले में बस एक लेडी डाक्टर सै रैगुलर बेस पर? सीएमओ बोल्या - एक ही है जी और वह बी छुट्टी पर गई हुई सै। डीसी साहब नै गुड़गामा के डीसी साहब ताहिं कही अर उसनै फेर गुड़गामा के डीसी ताहिं कही अर फेर फातमा गुड़गामा गई अर उड़ै उसका मैडीकल हुया। ईब्बै आगै और के के बनैगी उसका बेरा कोन्या फातमा नै। मनै जिब या सारी बात सुनी तो मन बहोत उदास हुया। कविता बोली - बात तो उदास होण की नहीं, कुछ करण की सै। पाणी तो सिर पर कै जा लिया इस नम्बर वन हरियाणा मैं। यो एकले मेवात का रोला नहीं सै। कमोवेश पूरे हरियाणा की याहे तस्वीर सै। आई किमै समझ मैं?

बेटियां खरल गांव की

बेटियां खरल गांव की
सते, फते, नफे, सविता, कविता, सरिता और ताई भरपाई शनिवार की शाम को फिर इकट्ठे हो जाते हैं। फते कहता है - गाम मैं तो लड़कियों का जीना मुहाल होग्या। गली में आती-जाती लड़कियों पर बहोत छींटाकसी करते हैं लोग। कोए किसे म्हां कै बोल मारदे अर कोए किसे के म्हां कै बोल मारदे। किसे का ब्योंत नहीं रह्या अक इननै कोए किमै कहदे। ऊपर ताहिं पहोंच सै इनकी। मनै तो गाम के घणखरे लोग मानसिक बीमारी का मरीज दिखाई देवैं सैं। ना छोटी बच्ची सुरक्षित अर ना सत्तर अस्सी साल की बुजुर्ग औरत। कोए रिस्ता इसा नहीं बचरया जो कलंकित ना हुया हो अर गम्भीर बात या सै अक लड़कियां उन्हीं के द्वारा धोखेबाजी की शिकार हुई जिन पर उननै सबतै ज्यादा विश्वास करया।
सरिता बोली - बूझो मत ना! महिला ना तो घर के बाहर सुरक्षित और ना ही घर के अन्दर। किसे घर मैं चाचा का छोरा तो किसे घर मैं ताऊ का तो कितै जीजा तो कितै पड़ौसी जवान होती लड़कियों से जोर-जबरदस्ती करके या बहला-फसला कर कुकर्म करते हैं। परिवार वालों को जब पता लगता है तो सारी बातां पै माट्टी गेरण खातर डाक्टर के पास लेकर जाना पड़ता है।
सते कहता है - क्या करैं? पूरा माहौल ही खराब हो लिया। सविता ने कहा - माहौल खराब तो करनिया तम अर इसनै ठीक कौन करैगा? माहौल ठीक तो जब होगा जब थामनै ताश खेलण तै फुरसत हो। इस जन चेतना केन्द्र मैं भी हफ्ते मैं एक दिन हाड़े खवा कै आओ सो। ज्ञान-विज्ञान आले बतावैं थे अक युवतियां नै ग्रामीण जीवन मैं चौबीस घण्टे मैं एक भी मिनट का मौका किसे काम के करण के बख्त इसा कोन्या अक वे आध-पौण घण्टा आपस मैं कठ्ठी होलें अर दुख-सुख की बतलालें।
सते बोल्या - या बात तो सविता की सही सै अक बाकी तबके तो किसे-ना-किसे बाहणै कठ्ठे होलें सैं फेर इन नौजवान छोरियां नै तो इसा कोए मौका नहीं।
सविता बोली - जै किमै सुधार करना सै गाम मैं तो इन युवक-युवतियां ताहिं कोए तो इसा काम टोहवणा पड़ैगा जिसके करण तै इनकी ऊर्जा का, ताकत का सही-सकारात्मक इस्तेमाल हो।
फते बोल्या - इनने न्यारे न्यारे राहण द्यो क्यों भिरड़ां के छत्ते कै हाथ लाओ सो।
सरिता बोली - इस न्यारपन करकै तो घणा नाश होवण लागरया सै। घर मैं जो बिगाड़ सै वो किस ढाल के न्यारपन तै ठीक होवैगा? इसमैं कोए दो राय नहीं अक युवक-युवती कठ्ठे होकै अपना रास्ता जिब ताहिं नहीं खोजैंगे बात कोन्या बणै। न्यारे करकै के काढोगे या तो घर मैं बी सुरक्षित कोन्या। यो म्हारी नजर का खोट सै। हम औरत नै भोग की वस्तु अर बालक बणावण की मशीन तै न्यारा कुछ समझते ए कोन्या। यो अपने पड़ौस मैं खरल गाम नहीं सै उड़ै पाछले साल तै ज्ञान-विज्ञान आल्यां नै लड़कियां की हाकी की टीम खड़ी करी सै। ब्लॉक मैं जीती वा टीम फेर जिले में जीत हासिल करी अर स्टेट मैं पांचमा स्थान हासिल करया। म्हारे गाम मैं क्यों नहीं खड़ी हो सकदी छोरियां की हाकी की टीम अर कबड्डी की टीम? नफे बोल्या - बिल्ली के घण्टी कौण बान्धै? बेरा ना के के बात बणावैंगे लोग। सरिता बोली - खरल गाम की छोरियां नै के कुछ नहीं सुनना पड़या? घरक्यां नै रोक लानी चाही, मोहल्ले आल्यां नै बेरा ना के-के सुनाई। खेल की ड्रैस पै नाक चढ़ाई। सांझ नै वार करकै घरां आवैं इसपै वे धमकाई। कई पेज भरे जा सकैं सैं उन मुसीबतां के जो इन लड़कियां नै ठाई। पर उननै भी एक समझ बनाई। आत्म विश्वास दिखाया। अर एक खास बात मैं बताना चाहूं सूं वा या सै अक वे कती नहीं घबराई। लड़के लड़कियां मैं साझली प्रेक्टिस करकै दिखाई। इस साल उननै अपना निशाना स्टेट के कप पै ला राख्या सै। शाहबाद की लड़कियां की हाकी की टीम तै टक्कर लेवण की पूरी तैयारी करण लागरी सैं। खरल गुरुकुल की लड़कियां नै हाकी टीम मैं शामिल होण की हां करदी बताई। इतना कुछ चुटकी बजान्ते नहीं होग्या। घर के समझाये, मोहल्ले आले समझाये अर गाम आले समझाये। इजाजत तो दे दी फेर कई सवाल हवा मैं ईब बी घूमें जावैं सैं। फेर लड़कियां का जोश देखण जोगा सै। लड़के बी पाछै कोन्या। उनकी बी टीम खूब मेहनत करण लागरी सै। यो सिर्फ हाकी का मामला नहीं सै। वे युवक-युवती मिलकै एक नई स्वस्थ संस्कृति की नई शुरूआत करण लागरे सैं।
सते बोल्या - तो म्हारे जन चेतना केन्द्र नै एक काम करना चाहिये अक हाम गाम की लड़कियां की साइकिल रेस करावां अर जो फर्स्ट, सैकण्ड, थर्ड आवैं उननै इनाम देवां। नफे बोल्या - इसमैं तो शहर मैं साइकिल पै पढ़ण जावण आली छोरी बाजी मार लेज्यांगी। कविता बोली - लड़कियां की न्यारी दौड़ अर बहुआं की न्यारी दौड़ करवाद्यांगे। फते बोल्या - कूण आवै सै थारी साइकिल रेस मैं। सते बोल्या - तेरे बरगे फांच्चर ठोक हरेक गली मैं एक-दो, एक-दो पाज्यांगे। फेर खरल आली बेटियां की हिम्मत देख कै हम पाछै कदम कोनी हटावैं। या बात सही सै अक नौजवानां नै किमै ढंग का काम करण का मौका नहीं मिलैगा तो फेर वे उल्टे कामां मैं लागैंगे। और लोगां नै कोस्सण की जागां आपां नै कुछ सकारात्मक कामां खातर पहलकदमी करण की जरूरत सै।
खरल मैं के लड़कियां की हाकी की टीम इतनी आसानी तै बनी होगी? खूब हांगा लाया होगा हाकी सिखावणिया पी टी आई नै अर ज्ञान विज्ञान आल्यां नै। ये छोटी-छोटी पहलकदमी हरियाणा मैं समाज सुधार आन्दोलन की नींव की ईंट सैं, इसतै ए नवजागरण का आन्दोलन अपनी रफतार पकड़ैगा। महिला, पुरुष, नौजवान, कमजोर तबके - सारे मिलकै एक माहौल पैदा करैंगे तो बुराइयां तै लड़या जा सकैगा।

अकबर बीरबल के किस्से

अकबर बीरबल के किस्से
अकबर अर बीरबल के बहोत किस्से म्हारे बीच मैं सैं। एक बर की बात सै अक अकबर अर बीरबल सैर करण लागरे जंगल मैं। इतनी वार मैं उननै देख्या अक औरत एक झाड़ी की आड़ मैं गई अर एक बालक नै जन्म दे कै बालक नै गोद मैं लेकै चाल पड़ी। अकबर बीरबल नै यू सब कुछ देख्या फेर बोले कुछ भी नहीं। रानी को भी बच्चा होने वाला था। राजा नै महल में जाकर रानी की सेवा मैं लगे सभी नौकर चाकरों व दासियों को हटा दिया। दो दिन में ही रानी परेशान हो गई कि क्या कारण है कि राजा अकबर ने यह सब मेरे साथ किया। बहुत सोच विचार के बावजूद राजा का यो व्योवहार रानी नहीं समझ पाई। रानी नै बीरबल धौरे संदेश भेज्या। बीरबल राजमहल में पहोंच ग्या। उड़ै पहोंच कै देख्या तो एक बर तो उसकै बी कोन्या समझ मैं आई बात। फेर उस दिन जंगल आला सीन घूमग्या बीरबल के दिमाग मैं। बीरबल नै रानी तै कहया अक बाग बगीचे के सारे मालियां नै बुलाओ अर कहो अक कल तै वो काम पै नहीं आवेंगे। माली हैरान! फेर रानी का हुकम। टालै क्यूकर। तीन चार दिन मैं बाग बगीचे के पौधे अर फूल सारे मुर्झागे। राजा अकबर नै देख्या तो दरबारी बुलाकै बुझया अक इन फूलां कै के होग्या? ये मुर्झा क्यूं गये?
दरबारी बोल्या - महाराज रानी साहिबा नै हुकम दिया था माली हटावण का अर बीरबल की सलाह पै रानी नै ये सब हटाये सैं। और दो च्यार बात न्यून-न्यून की लादी दरबारी नै बीरबल के बारे मैं। राजा अकबर नै रानी तै बूझया ये माली क्यों हटा दिये इन फूलां का ख्याल कूण करैगा? रानी नै जवाब देवण की जागां सवाल दाग दिया - थामनै महाराज मेरे नौकर-नौकरानी क्यूं हटा दिये। मेरी देखभाल इसे बख्त मैं कूण करैगा? अकबर नै जंगल का पूरा किस्सा सुनाया रानी ताहिं अर बोल्या जिब वा महिला झाड़ी के पाछै जाके जाप्पा कर सकै सै तो रानी क्यों नहीं? इतनी सुविधा रानी नै क्यूं चाहिये? रानी नै कोए जवाब कोनी सूझया अर वा बीरबल की कान्ही लखाई। बिना बोले बात होगी उनकी। बीरबल बोल्या - राजा धिराजा। जंगल मैं जितने पेड़ सैं, कीकर सैं, इननै कौनसे माली सींचैं सैं? वे तो आप पलैं बढ़ैं सैं। तो फेर आड़े के बाग बगिच्यां मैं मालियां की के जरूरत सै? राजा अकबर कै अपनी गल्ती समझ मैं आगी अर उसनै रानी को नौकर चाक्कर हटकै ला दिये अर बाग बगिच्यां के माली बी हटकै आगे।
अकबर राजा बीरबल नै अपना दोस्त मान्या करदे। योहे कारण था अक बाकी के दरबारी बीरबल तै बहोत घणा जल्या करदे। हर बख्त इस टोह मैं रहया करदे अक कद मौका मिले अर बीरबल के बारे में राजा आगै शिकायत ला सकैं। बख्त बख्त पै अकबर नै बीरबल के खिलाफ भड़कान्ते रहया करते। इसे ए किसे मौके पै अकबर नै बीरबल पै गुस्सा आग्या अर अकबर बोल्या - बीरबल आजकाल थाम बहोत चर्चा मैं सो। बहोत शिकायत आवण लागरी सैं थारी। काहल तै दरबार मैं मतना आइयो। बीरबल बोल्या - आपका हुकम सिर आंख्यां पै। इतना कहकै बीरबल राजदरबारां तै गायब होग्या। थोड़े दिन पाछै अकबर नै बीरबल की याद आवण लागगी। उसकी कमी खलण लागगी। दरबार मैं भी राजा अकबर का मन लागना बंद होग्या। राजा अकबर नै बीरबल बहोत ढूंढयां फेर भाई तो पाकै ए कोन्या दिया। थक हार कै अकबर नै बीरबल नै टोहवण की एक तरकीब काढ़ी। राजा नै ऐलान करवा दिया - म्हारे राज के लोग अपने साथ आधी धूप अर आधी छांव लेकर कै राज महल मैं पहोंचैं।
राजा अकबर नै आगले दिन देख्या अक् एक गांव के लोग खाटां नै सिर पै ठाये चाले आवण लागरे सैं। इन खाटां मैं मौजूद छेदां के म्हांकै छनकै किते धूप अर कितै छां उनपै पड़ण लागरी थी। या देखकै अकबर एक दम समझग्या अक जरूर इसे गांव मैं बीरबल रहवै सै। फेर अपने शक नै अकबर यकीन मैं बदलना चाहवै था। राजा अकबर नै खबर भिजवाई अक महल मैं गाम के सारे कुआं की दावत सै। जै गाम आले अपने कुएं दावत मैं नहीं भेजैंगे तो उन ताहि सजा दी जावैगी। उसी शाम गांव का प्रधान दरबार मैं आया अर न्यो बोल्या - बादशाह सलामत दावत मैं आवण की खातर म्हारे सारे कुएं राज्जी सैं फेर उनकी एक शर्त सै। राजा बोल्या - बताओ के शर्त सै। प्रधान बोल्या - वे जिबै दावत मैं आवैंगे जिब बुलावा देवण खुद महल का कुआं उनकै धौरे आवैगा। बिना बुलावे क्यूकर आ सकैं सैं आखिर इज्जतदार कुएं सैं। प्रधान का जवाब सुणकै राजा अकबर जोर तै हंस पड़या। उसकै पक्का यकीन होग्या अक उसे गाम मैं सै बीरबल। राजा नै पत्र भेजके बीरबल बुला लिया अर एक बै फेर दरबार की रौनक उल्टी आगी। बीरबल हमेश्या सोच समझकै, विचार करकै, विवेक तै बातां नै आछी ढालां समझ परख कै किसे बात का जवाब हाजिर जवाबी ढंग तै दिया करदा। दूसरी बात या भी थी अक उसका तर्क करण का आधार जमीनी आधार हुया करदा हवा मैं बात नहीं करया करदा बीरबल कदे।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग
     सत्ते फत्ते नफे सविता कविता सरिता और भरपाई शनिवार नै फेर चर्चा केंद्र मैं पहोंचगे। उड़ै उनका प्रेरक श्यामू बी था। पहलम तो उननै आठ मार्च पै एक गीत गाया अर फेर सत्ते बोल्या - यो राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के बला सै? नफे बोल्या - होगा किमै हमनै के लेना देना इसतै। सविता बोली - लेना देना क्यूं ना, म्हारे बालकां की आगे की पढ़ाई का सीधा-साधा नाता सै इस आयोग तै। मनै पढ़ी थी इसकी वार्षिक रिपोर्ट जो आयोग नै प्रधानमंत्री ताहिं रिपोर्ट टू द नेशन-2006 के नाम तै पेश करी सै। इसमें कह्या गया सै अक देश का भाग्य उन 55 करोड़ लोगां के हाथां मैं सै जो 25 बरस तै कम उम्र के सैं अर जो ज्ञान संबंधी पहलकदमियां तै सबतै फालतू लाभान्वित होवैंगे। उच्च शिक्षा दुनिया मैं दाखिल होवण आली 18 तै 24 साल की म्हारी आबादी का सिर्फ 7 फीसद हिस्सा ए उच्च शिक्षा मैं दाखिला ले पावै सै। यो आंकड़ा एशिया के औसत का सिर्फ आधा ए सै। इस करकै ज्ञान आयोग नै देशभर मैं 1500 विश्वविद्यालय खोलण की बात कही सै जिस करकै भारत 2015 तक सकल दाखिले का कम तै कम 15 फीसदी हिस्सा हासिल करण मैं सफल हो सकै। नफे सिंह बोल्या - ये तो बहोत बढ़िया सिफारिश कर दी। सविता बोली - या तो सही बात सै अक विश्वविद्यालयां, अंडरग्रेजुएट कालेजां नै प्रतिभा केंद्र बणावण की बात तो करी सै अर हाशिये पै पड़े अर वंचित तबक्यां की शिक्षा तक पहुंच आदि के मामल्यां मैं सुधार करण की सिफारिश बी सैं। नफे सिंह बोल्या - देखियो कितनी बढ़िया बात कर दी राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। मनै नहीं बेरा था इन बातां का। सविता बोली - फेर इन सिफारिशां मैं एक नुक्ता सै। सरिता बोली - के नुक्ता सै सविता? सविता बोली - एनकेसी ने अपनी रिपोर्ट मैं जो पहलकदमियां सुझाई सैं अर कै जो नुस्खे बताये सैं वे इन बातां कै ठीक उल्टे बैठे सैं। ये नुस्खे उस बिरला अंबानी रिपोर्ट मैं सुझाये गये नुस्ख्यां तै न्यारे कोन्या। इन पै गौर करके देखना पड़ैगा।
     इस रिपोर्ट का असली मकसद उच्च शिक्षा का निजीकरण सै। इसे तरियां वाइस चांसलर सर्वशक्तिमान हो ज्यांगे अर किसे के साहमी जवाबदेह नहीं रहवैंगे। इन हालातां मैं विश्वविद्यालयां का जनतांत्रिक प्रशासन जिस बी हद ताहिं आज मौजूद सै वो खत्म हो ज्यागा। इसे तरियां इस आयोग नै एक इंडिपैंडैंट रेगुलेटरी एथॉरिटी फार हायर एजुकेशन (आईआरएएचई) की स्थापना का प्रस्ताव भी सुझाया सै। इसतै सिंगल विंडो क्लियरेंस का इंतजाम होगा। धक्के खावण तै बच ज्यांगे। यो बहोत ताकतवर होवैगा। इसपै कोए सरकारी नियंत्रण नहीं होगा। इसका मतलब राज्य सरकारां के अधिकार कालेज खोलण के कै विश्वविद्यालय खोलण के खत्म हो ज्यांगे अर इस एथॉरिटी पै आ ज्यांगे। ये कालेज अर यूनिवर्सिटी अपने खर्चे पानी का इंतजाम क्यूकर करैंगे। इस पर भी लीपापोती-सी करकै कह्या गया सै अक ईब सरकार उच्च शिक्षा पै सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 फीसदी खर्च करै सै पर सही मैं यो 2 फीसदी नहीं तो 1.5 फीसद तो जरूर होना चाहिए। 2012 ताहिं इतना खर्चा करण का भरोसा-सा दिवाया गया सै। इतनै किततै करैं खर्चा? नफे सिंह बोल्या या बात बी सही सै।
     सविता बोली - आयोग नै तो आड़े ताहिं कैह दिया अक सार्वजनिक विश्वविद्यालय नै अपनी जमीन का इस्तेमाल वित्त के एक स्रोत के रूप मैं करना चाहिए। मतलब यूनिवर्सिटी की धरती बेच कै अपना खर्चा पूरा करना चाहिए। अर न्यों बी कह्या सै अक कायदे तै फीसां तै यूनिवर्सिटी के कुल खर्च का कम तै कम 20 फीसद तो काढ़णा ए चाहिए। मतलब फीस बधाओ पढ़निया चाहे भाड़ मैं जाओ। नफे सिंह बोल्या - फेर होश्यार अर जरूरतमंद छात्र फीस कड़े तै ल्यावैंगे। सविता बोली - आयोग का यू भी सुझाव सै अक जरूरतमंद छात्रां की फीस माफी करी जानी चाहिए अर गेल की गेल उनकी शिक्षा की लागत पूरी करण की खातर वजीफ्यां का इंतजाम भी होना चाहिए। नफे सिंह बोल्या - मास्टर जी तो न्यों बतावैं थे अक वजीफे फालतू करण की बात तो और बी कई कमेटियां नै करी फेर वजीफ्यां खातर तो बजट आये साल घटदा आवण लागर्या सै। ये फीस बधावण की साथ-साथ वजीफ्यां के बधावण की बात बी करैं सैं अक फीस बधावण का विरोध जरूरतमंद छात्र ना करैं। इसे ढाल की निजी निवेश बिना मुनाफे के करण की सिफारिश बी करी सै। फेर किसके सिर मैं खाज होरी सै अक ओ बिना मुनाफे की आस करें शिक्षा जगत मैं 100 करोड़ रुपइये लावैगा।
     सविता बोली - आयोग की रिपोर्ट मैं न्यों बी कह्या गया सै अक विदेशी विश्वविद्यालय भारत मैं आवैंगे तो भारत की शिक्षा की गुणवत्ता बधैगी। गुणवत्ता बधावण की आड़ मैं इन बदेशियों की लूट पै माट्टी गेरण का काम कर्या सै इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। देशी अर बदेशी एकै कानून कै तहत काम करैंगे या भी सिफारिश करी सै। देशी संस्थानां नै सरकारी फंड मिलैं सैं तो बदेशियां नै वे क्यू कर मिल सकैं सैं? असल मैं एनकेसी की इस रिपोर्ट मैं भारत मैं उच्च शिक्षा का जो पूरा ढांचा पेश किया गया सै वो कुलीनतावादी सै अर देश के 25 साल तै कम उम्र के युवाओं के भारी बहुमत की खातर फायदेमंद नहीं होवैगा। यो इसा ढांचा सै जो 2015 ताहिं दाखिल्यां नै 15 फीसद तक बढ़ावण की जागां इननै घटावैगा। तो देखियो मेरे बीरा ताश खेलते खेलते दो बात इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशां पै बी कर लियो। समझ ल्यो इसके भीतर की बारीकियां नै अर चलाओ कोए तुरप चाल अक म्हारे बालकां के कालेजां के अर यूनिवर्सिटियां के दरवाजे बंद ना हो ज्यां अर फेर हम न्यों कहवां - ओहले! हमनै के बेरा था न्यों बण ज्यागी?

म्हारा असली बैरी कौण ?

म्हारा असली बैरी कौण ?
कमलू - इन बदेशी कंपनियां मैं अर अमरीका मैं बी ठनी सै कदे। सरला - ईब ताहिं तो ठनी नहीं सै। बेशक कबरी कबरी बोली बोलती हों फेर बख्त आण पै एक होज्यां सैं। ठमलू - अर एक बात का और चाला कर दिया इन कंपनियां नै। सरोज - माड़ी खोल के बता। ठमलू - हवा, पानी, आकाश सारे कै जहरीली गैसां का जहर घोल दिया अर किसे की सुनते ना। रमलू - तो फेर या दुनिया जीवैगी क्यूकर? कमलू - इननै ठेका सै। उननै तो अपने मुनाफे तै मतलब सै। इननै सत्ते अर सरोज तै के लेणा। सरला - दखे पूरी मानवता नै अर मनुष्य की जात नै खतरा पैदा होग्या सै। रमलू - एक बात सै। सरला - कौनसी? रमलू - ये तो जहर घोलै सै फेर हम बी तो जहर घोलण मैं उनका साथ देन्ते आगा पाछा कोन्यां देखते। सरोज - हमनै अपना आप्पा ए ना देखना शुरू कर्या सै, आगा पाछा कूण देखैगा। ठमलू - अरै या बात तो समझ आगी अक अपने मुनाफे की खातर इन कंपनियां नै नाश कर दिया, फेर करां के? कमलू - म्हारी तो टपगी भाई। फेर दुनिया के नौजवान युवक युवतियां नै ये सारी बात देखनी और समझणी पड़ैंगी। सरला - या तो यही बात सै अक जवान लड़कियां नै शामिल करे बिना बात सिरै कान्या चढ़े। रमलू - सही बात सै ईब तो इस जवान पीढ़ी तै ए कुछ उम्मीद सै।
सरोज - इननै या पूरी वैश्वीकरण अर उदारीकरण की मार झेलनी सै। ठमलू - इन खूंखार अर जंगली बहुराष्ट्रीय कंपनियां के वार झेलने सैं। सरला - इन नौजवानां का भी राह बान्ध दिया इन कंपनियां नै। ठमलू - वो क्यूकर? सरला - नशा, हिंसा अर अश्लीलता सारे कै परोस राखी बताई इन ताहिं। ठमलू - और के इनकी सोच, इनके रहण सहण के ढंग बदलण लागरी सैं ये कंपनी। सरोज - इननै गुमराह करण लागरी सैं। कमलू - इन कंपनियां नै डर सै अक कदे यो नौजवान तबका थारे खिलाफ ना खड्या होज्या। रमलू - नौजवानां मैं सांस्कृतिक प्रदूषण कसूती ढाल फैलावण लागरी सैं ये कम्पनी अर म्हारी बड्डी-बड्डी कम्पनियां आले।
सरला वातावरण का प्रदूषण बी तो उतनी ए रफ्तार तै फैलावण लागरे सैं। ठमलू - और के कितै भूचाल आवै सै, कितै बाढ़ आवै सै, अर कितै तापमान बधग्या। सरोज - यो सारा प्रदूषण जहरीली गैसां के करकै बध्या सै। सरला - म्हारे पर्यावरण का भठ्ठा बिठा दिया इन कंपनियां नै। ठमलू - इनके कारखाने और बी कसूता काम करण लागरे सैं। रमलू - धरती के तले का पानी कति खराब हो लिया बताया। कमलू - नौजवानां की बात चाली थी। इन ताहिं दारु की बोतल पकड़ा दी। सरोज - छोरियां गेल्यां छेड़छाड़ करनी सिखादी टीवी नै। सरला - कितना ए समझाल्यो फेर समझै ना आंती इनकै। ठमलू - ना समझैंगे तो और दुख पावैंगे। रमलू - ये फेर घणखरे नौजवान इसे कोन्या। वे चाहवै सै किमै करना। सरला - पर एक नौजवान, एक गांव, एक प्रदेश, एक देश के न्यारा न्यारा इन बहुराष्ट्रीय खूंखार जानवरां का मुकाबला कर सकै सैं के?
कमलू - कोन्या कर सकदा। कुछ ना होना जाना। रमलू - अमरीका का आज मुकाबला कूण कर सकै सै? सरोज - न्यों कहवैं सै क्यूबा करर्यासै मुकाबला। ठमलू - सही बात सै। इसनै ईब ताहिं गोड्डे नहीं टेक लिये। सरला - तो इस मन्डी के खूंखार जनावरां तै क्यूकर निबट्या जा? कमलू - मतलब म्हारे इन आढ़तियां की लूट तै बच्चण का राह बी शामिल कर लियो। सरोज - समाज मैं बसी जनता नै अपनी अपनी जागां जात गोत नात भूलकै कठ्ठ बणाकै संघर्ष का बिगुल बजाना पड़ैगा। ठमलू - मतलब एक नौजवान तै शुरू करकै पूरे गाम मैं। रमलू - एक गाम तै शुरू करकै पूरे प्रदेश मैं। सरोज - एक प्रदेश तै शुरू करके पूरे देश मैं। कमलू - एक देश तै शुरू करकै पूरी दुनिया मैं बिगुल बजाणा पड़ैगा। रमलू - तै असल मैं न्यों हो सकै सै के? सरला - हो क्यों ना सकदा। फेर मिनिस्टरां के बस्ते ठाकै कोन्या होवै। ठमलू - चोरी करकै? कमलू - चौबीस घंटे दारू पीकै? सरोज - स्मैक चढ़ाकै? रमलू - घरआली की पिटाई करकै? ठमलू - बलात्कारियां का साथ निभाकै? कमलू - टीवी ऊपर उघाड़ी फिल्म देखकै? सरला - अपना आप्पा खतम करकै? ठमलू - बिन आई फांसी खाकै? कमलू - सब क्याहैं नै बिसराकै ईब काम कोन्या चालै। रमलू - तो काम क्यूकर चालैगा? कमलू - काम चालैगा सोच विचार करे तै, बात नै सही ढंग तै समझ कै संगठन की ताकत बाध करे तै। सरोज - सारे कठ्ठे होकै इस अमरीका कै अर इसके बाजारवाद के खिलाफ हमला बोलैंगे तो बात बणैगी। रमलू - इस खातर तै फेर घणी ए तैयारी की जरूरत पड़ैगी दीखै सै। ठमलू - काम आसान नहीं सै।

हरियाणा के मर्दों कित सो?

हरियाणा के मर्दों कित सो?
किंग्स्टन विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के हिसाब तै, यूके (ब्रिटेन) मैं विश्वविद्यालय की ऊंची फीस चुकावण की खातर छात्राएं बढ़ती संख्या में वेश्यावृत्ति करण नै मजबूर सैं। जै या नहीं तो सैक्स उद्योग के दूसरे धंधे करण नै मजबूर सैं। सुणकै अर पढ़कै एकबै तो रोम-रोम मैं करंट-सा दौड़ग्या, बेरा ना थारै किमै असर हुआ सै अक नहीं? लानत सै यू के सरकार पै जो लोगां नै तो फालतू तै फालतू निचोड़न लागरी सै अर लाखां करोड़ां पौंड उस सेना पै खर्च करण लागरी सै जो दुनिया भर मैं ‘सत्ता पलटन’ की अमेरिका की मुहिम मैं तहलडू पार्टनर के तौर पै काम करण लागरी सै। टोनी ब्लेयर की सरकार नै शिक्षा मैं जो सुधार लागू करे सैं उनके बुरे नतीजे साहमी आवण लाग रहे सैं। फेर म्हारे माथे की जमा फूटली जो वो सब कुछ हमनै कति दिखता ए कोन्या। जिस अध्ययन का जिकरा सै उसमैं कह्या गया सै अक यूके मैं छात्र जब तैं ओ फीस बधी सै तिब तैं कपड़े तारलें सैं, लैंप डांस करैं सैं, मसाज पार्लरों मैं अर एस्कार्ट एजेंसियां मैं काम करैं सैं। इसतै पहलम बी सुणण मैं आया था अक यूके मैं छात्राएं शिक्षा खातर लिये औड़ कर्जयां की मासिक किस्त जमा करावण कि खातर अपणे अंडाशय बेचण पै मजबूर हुई सैं। ये कर्ज उनने अपणी शिक्षा पूरी करण की खातर लिये बताये।
औड़ आ लिया धरती का। म्हारे नजदीकी दो तीन कंप्यूटर इंजीनियर जारे सैं यूके मैं। फेर वे तो यूके की बड़ाई करते ए कोन्या थकते। यूके न्यू अर यूके न्यूं। यूके मैं उनकी नाक तलै छात्राएं अपना शरीर बेच्चण लागरी सैं अर साथ मैं अपनी आत्मा बी अक ज्ञान अर डिग्री हासिल करण का वे अपना सपना पूरा कर सकैं। आई किमै समझ मैं अक नहीं? जै एक विकसित देश यूके मैं या हालत सै तो तीसरी दुनिया के देशां गेल्या के बनैगी? लाया सै कदे बिचार अक ताश ऐ खेलते रहोगे। यूके अर अमेरिका बरगे देशां के मालिक चाहवैं सैं अक तीसरी दुनिया के देश बी इस गल्त राही पै उनकी गेल्यां आ ज्यावैं। कित सैं म्हारे वे पंचाती जो एक छोरे अर छोरी के अंतर्जातीय ब्याह पै तो गैहटा तार कै धरदें, मौत के फतवे सुणादें। इसा ब्यौंत सै तो जारी करद्यो नै टोनी ब्लेयर के खिलाफ भी फतवा जो म्हारी छोरियां नै वेश्यावृत्ति की राही दिखावण लागर्या। दूसरी बात या बी तो सोच्चण की सै अक जै एक विकसित देश यूके मैं जड़ै न्यू मान्या जावै सै अक उड़ै सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली बहोतै मजबूत सै तो म्हारे बरगे देशों का के बनैगा? म्हारे देशां मैं तो कसूती ढालां शिक्षा का निजीकरण अर व्यवसायीकरण होवण लागर्या सै। भारत मैं भी इस ढाल के नतीजे आवण मैं वार कोन्या।
म्हारे देश मैं भी वाणिज्य मंत्रालय नै हाल मैं ए एक परिचर्चा पत्र जारी कर्या सै जिसमैं बार-बार फीस बढ़ावण की बात पै जोर दिया गया सै। या बढ़ी फीस पढ़निया छात्र अर छात्रावां धोरे वसूली जावणी सै। इस परिपत्र मैं या दलील दी गई सै अक ‘बाजार की पहुंच की फीस बरगी मौजूदा सीमावां का हटाया जाणा बहुत जरूरी सै जिसके चालते कैपीटीशन फीस नहीं वसूली जा सकदी या मुनाफा नहीं कमाया जा सकदा।’ जै यै सुझाव मान लिये गये तो के होगा? हरियाणा मैं इसके परिणाम इस साल बी देखण मैं आये सैं। कई डैंटल कालेज प्राइवेट सेक्टर मैं खुलगे। इनकी खातर सरकारी कालजां का पीएमटी टैस्ट हुया अर प्राइवेट कालजां का एंट्रैंस टैस्ट हुया। इनके मेरिट लिस्ट के बालकां तै बी डैंटल की सीट पूरी कोन्या हुई तो साधारण प्री मेडिकल के बालकां नै दाखिले की छूट दी गई पर इन कालेजां की सीट फेर बी कोन्या भरी गई। 30-35 सीट फेर बी खाली रैहगी। क्यों? सोच्चण की बात सै। इन प्राइवेट कालेजां मैं एक साल की फीस डैंटल छात्रां की डेढ़ लाख सै। मतलब 12500 रुपये म्हीना फीस अर होस्टल का बाकी खर्चा न्यारा। मतलब 20,000 रुपये म्हीने का खर्चा। किसका ब्यौंत सै इतना पीस्सा खर्च करण का?
हाल मैं ए म्हारे प्रधानमंत्री जी ने भी सेवाओं को विदेशी व्यापार की खातर खोल्लण की बात करीं सैं अर इसमैं शिक्षा बी शामिल सै। ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना के दृष्टिपत्र मैं भी फीस बढ़ावण की याहे दलील दी गई बताई सै। योजना आयोग बी शिक्षा की लागत पूरी करण की खातर आंतरिक संसाधन जुटावण की अर यथार्थवादी ढंग तै फीस बढ़ावण की बात करदा बताया। इसमैं कोए दो राय नहीं अक जै हमनै इन खून चूसण आली जोकां तैं खुली छूट दे दी तो म्हारी शिक्षा प्रणाली का नाश लाजमी सै। या पूरे देश नै अर इसके नागरिकां नै चुनौती सै अक इसी नीतियां का विरोध कर्या जा। कड़ै सैं वे हरियाणा के मर्द अर उनकी पंचायत जो गाम की इज्जत के नाम पै म्हारे गाभरूआं नै अर छोरियां नै फांसी पै लटकावण के फतवे जारी करैं सैं? इस पूरी बात पै उनका के कहना सै? यो तै पूरे हरियाणा की अर पूरे देश की इज्जत का सवाल सै। आज संबंधित आयु वर्ग के महज 8 फीसदी बालक ही विश्वविद्यालय ताहीं पहोंच पावैं सैं म्हारे देश मैं जबकि अनेक विकासशील देशां मैं यो आंकड़ा 20 तै 25 फीसदी ताहिं का सै। जै फीसां मैं और बढ़ोतरी करी जावै सै तो ये हालात और बी घणे बिगडै़ंगे। हम छात्रां मैं बढ़ती आत्महत्या पहलम ऐ देख चुके सां। ये वे छात्र सैं जो देशभर के शिक्षा संस्थानों द्वारा वसूली जावण आली अनाप-शनाप फीस चुकावण मैं असमर्थ सैं। अर जै फीस और बी बधगी तो के बनैगा यो बतावण की कड़ै जरूरत सै। तो के केरां? करांके बैठे ताश खेलते रहवां अर लाम्बी सांस भरकै कहवां फलाणे के छोरे अर छोरी की किस्मत मैं मौत इसे ढाल की लिख राखी थी। दूसरा राह सै अक इन बातां पै बिचार करां अर इस बाजारवाद का अर फीस बधण का डटकै विरोध करां। या म्हारे बालकां की लड़ाई सै इसनै म्हारे लड़ें पार पड़ैगी और दूसरा कूण लड़ैगा म्हारी लड़ाई।
---

विवेक पै विवेकहीनता का हमला

विवेक पै विवेकहीनता का हमला
तर्क, युक्ति, विवेक, अनुसंधान, प्रयोग अर परीक्षण के बिना विज्ञान का विकास नहीं हो सकदा। शुरू तै ए विज्ञान अपने इन पुख्ता आधारां पै खड़या होके आगै बढ़या। इनके आधार पर वैज्ञानिकां मैं यो मानकै चलने का नैतिक बल और साहस आवै सै अक वे ईब ताहिं सही समझे जावण आले सिद्धान्तां नै चुनौती दे सकैं। नये सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकैं अर इस बात खातर तैयार रहवैं अक इनै आधारा पै उनके सिद्धांतां ताहिं बी चुनौती दी जा सकै सै अर नये सिद्धांत उसके सिद्धांता नै गल्त साबित कर सकैं सैं। फेर आज के दिन या बात देख कै हैरानी होवै सै अक खुद विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान के इन आधारां नै नष्ट करण का काम करया जाण लागरया सै। इसतै बी घनी हैरानी की बात या सै अक यो काम विज्ञान के विरोधी तो करैं सो करैं बल्कि वैज्ञानिक कहे अर माने जावण आले लोग भी यो काम करण मंडरे सैं अर बड़े पैमाने पै। जै एक हरफी बात करनी हो तै यो इस विवेक पै विवेकहीनता का हमला कहया जा सकै सै। अर यू हमला इतना जबरदस्त सै अक विज्ञान विवेक की दिशा मैं आगै बढण की बजाय उसतै पाछे नै हटता हुया दिखाई देवै सै। सोचण की बात सै अक इसा क्यूं हुआ अर इसके संसार अर मानवता पै के असर पड़ैंगे। फेर सोच्चण की फुरसत किसनै सै? जै कोए सोचना समझना चाहवै सै तो उसकी खातर पढ़ण नै एक आच्छी किताब सै ‘साइंस एंड दि रिट्रिट फ्रॉम रीजन’ जो मर्लिन प्रैस लन्दन तै 1995 मैं छपी सै। या किताब लंदन के दो लेखकां जॉन गिलैट अर मनजीत कुमार नै मिलकै लिखी सै। जॉन गिलैट गणितज्ञ सैं अर मनजीत कुमार भौतिकी अर दर्शन के विद्वान सैं।
पहलम विज्ञान की प्रगति नै समाज की प्रगति की नींव मान्या जाया करदा। साथ मैं यो विचार अक मानवता को विज्ञान के द्वारा पूर्णतर बनाया जा सकता है, प्रगति का आधार था। यो विचार सबतै पहलम ठारवीं सदी मैं एक फ्रांस के गणितज्ञ अर दार्शनिक कोंदोर्से ने अपनी किताब ‘मानव मस्तिष्क की प्रगति की एक ऐतिहासिक झांकी’ (1794) मैं व्यक्त करया था। फेर ब्रूनो नै जिन्दा जलावण आलै हरेक युग मैं हुये सैं अर आज भी सैं। एक अंग्रेज पादरी था माल्थस जिसनै फांचर ठोक कहदें तो गलत बात नहीं उसनै कोंदोर्से के विचार का विरोध करया ‘ऐस्से ऑन दि पिं्रसीपल ऑफ पापुलेशन’ (1798) मैं अपनी किताब छपवा कै। इसके बावजूद पीछे सी ताहिं कोंदोर्से का सिद्धांत काम करया करदा। उस बख्त लोगां के दिल में या आस थी यो विश्वास था अक विज्ञान के दम पै समाज की प्रगति, मानवता की प्रगति बहोत आगे ताहिं करी जा सकै सै। उननै उम्मीद थी कि अक वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी हो सकै सै अर होवैगी अर आम आदमी की जिन्दगी मैं खुशहाली आवैगी। हरित क्रांति के दौर मैं हरियाणा के लोगों नै बी खूब सपने देखे थे। फेर कितने लोगां के सपने पूरे हुए अर कितन्यां के सपने टूट कै चूर-चूर होंगे? वैज्ञानिक प्रगति तै आर्थिक विकास तो हुया फेर सामाजिक विकास पिछड़ता चल्या गया। आम आदमी के मन मैं विज्ञान के प्रति मोह भंग के हालात पैदा होगे। क्यों? सोच्चण की बात सै।
भारत मैं भी विकास का योह मॉडल तबाही मचावण लागरया सै। भारत महाशक्ति बणाण के सपने देखैं सैं फेर 80 प्रतिशत जनता का गला घोंट के महाशक्ति बण बी जावैगा तो के फायदा? एक बर फेर विवेक पै विवेकहीनता की जीत का मौका आ ज्यागा। भारत बहोत बड़ी आबादी आला देश सै, इस करकै आड़ै कुशल श्रमवाली, कम पूंजी आली अर म्हारे प्राकृतिक संसाधनां नै नुकसान ना पहोंचावण आली प्रौद्योगिकी ताहिं प्राथमिकता मिलनी चाहिए। फेर इसकी जागां आपां कैपिटल इंटेंसिव प्रौद्योगिकी अपनावां सां तो एक तरफ तो हम अपने देश के बहोत से श्रमिकों नै बेरोजगार बनावां सां अर दूसरी तरफ नई प्रौद्योगिकी बाहर से ल्यावण पै अपनी औकात तै फालतू खर्च करकै कर्ज के शिकंजे मैं फंस ज्यावां सां अर फेर विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर विश्व व्यापार संगठन बरगी संस्थावां की उन शर्तां नै माणण नै लाचार हो ज्यावां सां। ये शर्त म्हारे देश की अर्थव्यवस्था के प्रतिकूल होवैं सैं। या बात साफ सै अक जै हम ज्यादा श्रम आली अर स्थानीय ज्ञान प्रणालियां पै आधारित प्रौद्योगिकी नै विकसित करांगे तो म्हारे काम तै रोजगार बधैंगे, जनता के जीवन में खुशहाली आवैगी। जनता हमनै अपना मित्र अर हितचिंतक मानैगी अर एक बेहतर जीवन दृष्टि अपना कै अज्ञात अर अंधविश्वास फैलाने आली अवैज्ञानिक ताकतां के खिलाफ लड़ण मैं सक्षम हो सकैगी। बिल्कुल अनपढ़ अर गरीब किसान भी जानै सै अक अपने खेत मैं उसनै जो फसल पैदा करनी सै वह खाद बीज पानी वगैरह के साथ ही हो सकै सै। या फसल ना तै हिन्दुत्व, भारतीयता अर कै सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारयां तै पैदा होगी अर ना किन्हीं अंधविश्वासां अर कर्म काण्डां तै। हटकै विवेक अपनी जागां बनावैगा अर जनपक्षीय विज्ञान का विकास होगा। जिसतै समाज का आम जनता का विकास होगा। काम आसान नहीं। फेर मुश्किल बी कोन्या जै जनता के समझ मैं आज्या तो। समझल्यो तावले से मेरे बीरा। मनै बेरा सै अन्धविश्वास पैर फैलान्ते जाण लागरे सैं।

सांझी खेती

सांझी खेती
आज किसानी पर संकट बहोत गहरा सै। किसान आत्म हत्या करण लागरे सैं। कोए उनकी सुध लेवणिया बी कोन्या। इसे हालात मैं यू सांझा खेती का अनुभव रोशनी दिखा सकै सै हमनै।
किसान कोओपरेटिव बाण्डा हेड़ी हिसार की स्थापना लगभग वर्ष 2004 में एक बड़े परिवार के लगभग 10 किसानों के समूह नै की। मुंढाल हरियाणा के लगभग मध्य मैं स्थित चौबीसी पंचायत खाप के तहत आने वाला 250-300 वर्ष या इससे भी पुराना गांव सै। वर्तमान मैं इसमें तीन पंचायते हैं - मुंढाल खुर्द व कलां दो पंचायतें भिवानी जिला में सैं जबकि बांडा हेड़ी पंचायत हिसार जिला में पड़ै सै। देखने में व बस्ती के हिसाब से पूरा गांव एक ही लगता है और पहले पंचायत भी एक ही हुया करदी। ईब तीनों गामां की कुल आबादी लगभग 15 हजार होगी।
वर्ष 1995 में आई बाढ़ की वजह से लगभग पूरे गांव और विशेष तौर पर बाण्डाहेड़ी के खेतों में जो सोरखी गांव की तरफ हिसार-दिल्ली मार्ग के साथ पड़ते हैं, खड़ी फसलों में भारी नुकसान हुया था। सितम्बर मास के शुरू में आई बाढ़ तै सावनी की फसल की बिजाई भी बड़े हिस्से में नहीं हो पाई। असल में काफी सालों के बाद इतनी ज्यादा बरसात एकदम हुई थी, इस दौरान बनी सड़कों व छोटी नहरों तथा नालियों के कारण जमीन के कुदरती लेवल में अन्तर होने से बरसाती पानी के बह कर आगे निकल जाने के कुदरती रास्ते बन्द होगे इसलिए पानी लम्बे समय तक वहीं खड़या रहया। बस्ती के कुछ हिस्से में भी पानी घुसा, बीमारियां भी आई, बाढ़ के पानी को निकलवाने के सरकारी इन्तजाम भी काफी नहीं थे। वैसे यह बाढ़ की समस्या अकेले बान्डा हेड़ी व मुंढाल की न होकर पूरे क्षेत्र की थी और इसने जमीनी पानी के स्तर को ऊंचा कर दिया था। मतलब चौआ ऊपर आग्या। नहरों के साथ तो समस्या और भी ज्यादा थी। इस ढाल हर साल बरसात में पानी भरने की समस्या स्थाई हो गई। पानी भराव के कारण इससे फसलों का नुकसान भी हर वर्ष होवण लाग्या। इन वर्षों में खेती की लागत तो नई कृषि नीतियों के कारण बढ़ती गई पर पैदावार इस क्षेत्र में अनिश्चित होती गयी जिसनै अपने आप मैं एक नये संकट को जन्म दिया।
छोटी जोत के किसानों की समस्या तो और भी गम्भीर थी। अकेले-अकेले वह न तो अपने खेत से पानी निकालने के लिए पम्प सेट आदि लगा सकता था और ना ही डरेनेज विभाग से कोई मदद ले सकता था। कुछ प्रभावशाली राजनेताओं के रिश्तेदार बड़े जमींदारों के यहां तो खेतों में डरेनेज विभाग ने बड़े पम्प सेट सरकारी खर्च पर लगा दिये थे परन्तु ये जमींदार अपने खेतों के साथ लगते दूसरे छोटे किसानों के बरसाती पानी को इन पम्प सेटों से नहीं निकलने देते थे। ऐसे हालात में वर्ष 2003 में एक बार फिर जुलाई में भारी वर्षा हुई और खेतों में 4-5 फुट तक पानी खड़ा हो गया। वर्तमान में किसान कोओपरेटिव से जुड़े हुए किसानों, जिनके खेत एक परिवार होने की वजह से साथ-साथ थे, अपने सामूहिक, खर्च व मेहनत से बाढ़ का पानी निकालने की ठान ली। इस पानी को लिफट करके 15 एकड़ दूर नहर में डालने में ये लोग कामयाब रहे। इस परिवार से जुड़े स्वयं खेती करने वालों के अलावा शहर में रह रहे दूसरे सदस्यों ने भी सहयोग दिया जो अपनी जमीन हिस्से या ठेके पर दिया कर दे। सामूहिक प्रयास करने का सुझाव इन शहर में रहने वालों में से ही आया।
इस हालात में इस पानी निकालने की सामूहिक कोशिश ने सांझी खेती करने की सोच रहे किसान सभा कार्यकर्ता ने सभी से व्यक्तिगत तौर पर भी सामूहिक खेती से होने वाले फायदों पर बातचीत करी। वकील का समर्थन तो उसे पहले ही था। इस कल्पना को पहले तो गांव में रहने वाले सदस्यों ने असम्भव व अजीब मान्या। उनमें से कुछ शंकित भी थे। परन्तु क्योंकि बाढ़ का पानी सामूहिक रूप से निकालने में वे सफल रहे थे तो एक ललक भी मन मैं आई। अगली ही फसल जो वर्ष 2003 व 2004 के सैसन की साढ़ी की फसल थी जिसकी बिजाई वे बहुत लेट कर पाये थे और पानी की वजह से पूरे खेत में नहीं हुई थी उसमें आपसी तालमेल-सहयोग शुरू कर दिया। इस प्रकार वर्ष 2004-2005 के सैसन के लिए सांझी खेती करने की शुरुआत की गई। के बी सी का गठन हुआ। एक संविधान बनाई गई और शुरूआत हुई।
बाढ़ की समस्या का स्थाई हल निकल सका। रेही से खराब जमीन का सुधार हुआ। सिंचाई बेहतर हुई। साधन कृषि औजार जुटाना आसान हुआ। उत्पादन में बढ़ोतरी हुई। 2004-2005 का प्रति एकड़ उत्पादन 14 हजार रुपये का था। 2005-2006 में 17 हजार रुपये प्रति एकड़ हो गया। 2006-2007 में यह 25 हजार का हुआ। दूसरी तरफ खेती की लागत कम हो गई। आपां मारें पार पड़ैगी। आई किमै समझ में अक नहीं। वार होण लागरी सै देर करदी तो तबाही तै या सांझी खेती बी कोन्या बचा पावैगी।
-