सोमवार, 26 सितंबर 2016

बहम का मरज

बहम का मरज
म्हारे बुजुर्गों धोरै न्यों सुनते आवां सां अक बहम के मरीज की दवाई तो लुकमान बी टोहन्ते टोहन्ते मरग्या। फेर आजकाल बहम के मरज की दवाई की मांग बहोत सै। जिसकै देखो उसे के क्याहें ना क्याहें का बहम होर्या सै। बंशीलाल जी कै दारुबंदी का बहम होर्या था। भजनलाल कै हटकै चीफ मिनिस्टरी का बहम होर्या था। देबीलाल कै अपने पोते-पड़पोत्यां नै दादालाही मुख्यमंत्री की गद्दी दिवावण का बहम होर्या था। जनता कै तीनूं लालां का बहम होर्या था। बीरेन्द्र सिंह कै बहम बड़ग्या था अक इन तीनों लालां की छुट्टी करकै मैं खुद चीफ मिनिस्टर बणज्यां। म्हारे वर्तमान मुख्यमंत्री नै हरियाणा भ्रष्टाचार अर भयमुक्त करण का बहम पाल राख्या सै। म्हारे रामदेव जी नै सारी बीमारी योग तै ठीक करण का बहम खुद बी पाल राख्या सै अर दुनिया कै बी बाड़ दिया यो बहम। बाकी बी घणे ए सै जो चेयरमैन बणण का बहम पकड़े घूमैं सैं। घणे ए इसे बी सैं जो एकै रात में अरबपति होवण का बहम लादे घूमैं सैं। कोए किसे लुगाई के बहम मैं पागल हुया हांडै सै। जड़ कैहण का मतलब यो सै अक बहम के मरज की दवाई की पूरे हरियाणा के हरेक मरद-औरत नै जरूरत सै। जै इस बहम के मरज की दवाई का नुस्खा कितै मेरे हाथ लागज्या तो मेरी चांदी जरूर होज्यागी इसका बहम मेरे बी सै। म्हारे कुलदीप जी कै लेटैस्ट बहम हुआ सै अपनी ए पार्टी कै खिलाफ बोलण का।
इस मरज की दवाई खातर मनै पूरा भारत महान घूम कै देख लिया पाछले दो साल मैं। जड़ै जड़ै गया उड़ै बी इस बीमारी का प्रकोप तो फैल्या पाया फेर इलाज का नुस्खा कोन्या थ्याया। कई बै तो इसा जी करै सै अक इन सियासतदानां नै जी भर कै गाल द्यूं अक इस मामूली सी बीमारी की दवाई बी नहीं तैयार करवा सके इब ताहिं। ऊं तो माणस चांद पै जा लिया, स्टैम सैल की खोज कर ली, जीन्ज़ की डिकोडिंग कर दी फेर बहम की दवाई ईजाद नहीं करी। अर ज्यों ज्यों बाजार व्यवस्था मैं मुनाफाखोर विकास होन्ता जावण लागर्या सै त्यों त्यों बहम का मरज बी चढ़ती कला पै सै। कई बै मेरा तो इसा जी करै सै अक इन सारे बहमियां नै कठ्ठे करकै दिल्ली मैं एक प्रदर्शन कर्या जा तो गिनिज़ बुक मैं नाम लिखणतै कोए नहीं रोक सकदा। दुनियां के 50 प्रतिशत बहमी म्हारे प्यारे भारत महान देश मैं रैहन्ते बताये। ऊं तो म्हारे बड्डे बडेरे कैहगे अक बहम की कोए दवाई तो होणी ए चाहिए, ना तो ये हरियाणा के म्हारे तेजतर्रार सियासतदान अर उनके लाडले मेडिकल के वार्ड नंबर 13 मैं भर्ती करवाने पड़ैंगे तो फेर हरियाणा नै कूण संभालैगा? हरियाणा नै राह कूण दिखावैगा? सोचो किमै तो अक न्योय ताश खेलते रहोगे अर एक दिन कैहद्योगे - ओहले! हमनै के बेरा था यो बहम का मरज इतना फैल ग्या।
जै इस मरीज की दवाई नहीं सै तो इसकी खोज तो करी ए जाणी चाहिए। बेरा ना म्हारे प्रदेश के डाक्टर कौन सी बीमारी के इलाज की खोज मैं जुटरे सैं अक इस बहम के मरज कान्हीं उनका बी ध्यान कोनी जार्या। एक बात और बी सुणण मैं आवै सै अक बहम का मरज छूत का रोग सै। यो एक माणस तै दूसरे अर दूसरै तै तीसरे मैं बहोत तावला फैलै सै। ज्यूकर रामदेव का योग का बहम (चौबीस घंटे टीवी के ऊपर योग करता दीखै सै) म्हारे मध्यम वर्ग के लोगां मैं फैलग्या। एक खास बात और सै अक इस रोग के शिकार माणसां के राज दरबार खत्म होगे, घरबार उजड़गे अर कानी कोड्डी के नहीं रहे वे माणस। माणस कै चाहे कैंसर होज्याओ फेर यो बहम का मरज नहीं होणा चाहिए। कैंसर का तो फेर बी इलाज सै फेर इस बहम का इलाज कड़ै सै? शंका, शक्क, इस मरज के दूसरे नाम बी लिए जावैं सैं फेर बहम तो बहम सै। हो सकै सै और बी कई नाम हों इसके मनै तो बेरा ना उनका थामनै बेरा होतै लिखकै भेजियो एक पोस्टकार्ड पै मेरे बीरा!
एक बर एक इसे माणस कै घरां जाणा पड़ग्या। जिसकी गेल्यां कदे उसका कसूता बैर रह्या था जीत सिंह नै। फेर आजकाल ठीकठ्याक बोलचाल थी उनकी। सामण का म्हिणा था उसनै घेवर मंगा राख्या था। जीत सिंह नै खाणा पड़ग्या घेवर पर घरां आया इतनै उसकै यो बहम होग्या अक कदे नफे सिंह नै घेवर मैं जहर ना मिला दिया हो? बस फेर के था जीत सिंह कै तो पस्सीने आगे, दिल का पंखा सा चाल पड्या, नाड़ी सौ तै ऊपर गई, जी घबरावण लाग्या। तीन च्यार बर पेशाब करण गया। इसा होग्या जणों गात का जमा ए सत् लिकड़ग्या हो। भाज्या भाज्या डाक्टर धोरै पहोंच्या। डाक्टर नै चैक कर्या सब किमै ठीकठ्याक था। डाक्टर नै जीत सिंह समझाया अक बहम मतना करै सब किमै ठीक सै। फेर जीत सिंह तो सैड़दे सी बोल्या अक बहम नहीं मनै लागै सै किमै ना किमै होण आला सै। देख बालक रुलज्यांगे मेरे तो अर तों डाक्टर ओहले कैहके एक औड़ नै होज्यागा। सारी रात पूरा घर ताणकै राख्या। आध घंटा बी नहीं सो कै देख्या बस मसकोड़े मारदा रह्या।
हरियाणे मैं यू बहम मनै लाग्गै सै अक सैबी थोड़ा फालतू। क्यों सै इसा? इस पर गहन विचार करण की जरूरत सै। म्हारा हरियाणा आर्थिक तरक्की मैं तो नंबर एक पै आ लिया फेर इसके सामाजिक सूचकांक बहोत खराब सैं मेरै इसे बात का बहम होर्या सै? फेर बहम बहम मैं बी फरक बताया। एक बहम सै समाज नै पाछे नै खींच्चण का अर एक बहम सै समाज नै आगै नै खींच कै लेज्यावण का। और बी किस्म सैं बहम भी होंसैं इनका मनै तो घाट बेरा सै। जितना बेरा था लिख दिया किसे नै फालतू बेरा हो तै जरूर लिखकै भेजियो। मनै थारी चिट्ठी की बाट रहवैगी। कदे कदे तो लिख दिया करो। मैं आये हफ्ते लिखण लागर्या। थाम कदे बी चिट्ठी कोनी गेरदे। या आच्छी बात नहीं सै। कदे थाम बी न्यों तो नहीं सोचो सो अक मेरै बी लिखण का बहम होग्या।
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विज्ञान का मतलब

विज्ञान का मतलब
सते, फते, नफे, कविता, सविता, सरिता, ताई भरपाई शनिवार को जन चेतना केन्द्र आई और दुख-सुख की बतलाई। कविता ने बात चलाई - यो विज्ञान का मतलब कोनी समझ मैं आया, इसपै चरचा करण की जरूरत सै। सरिता बोली - थोड़ा घणा तो मैं बता सकूं सूं। नफे बोल्या - अपने घर बिध की बात करल्यो नै, विज्ञान पै चरचा करकै क्यों बोर करो सो। सरिता बोली - एक कहानी सुनाऊं सूं। हो सकै सै कुछ बात बणज्या। कहानी शुरु करी - एक राजा था। कोए कमी नहीं थी। एक नान्हा सा राजकुमार भी था। इतना सब कुछ था राजा पै पर वो कुछ दिन तै खोया-खोया सा रहवण लाग्या। असल बात या थी अक छोटा राजकुमार इसे सवाल पूछ लेन्ता जिनके जवाबां का राजा नै बेरा कोनी होन्ता ज्यूकर - पिताजी चिड़िया क्यूकर उड़ै सै? कदे बूझता - ये सारी चीज हमेशा तलै नै ए क्यों पड़ैं सैं, ये ऊपर नै क्यों नहीं चली जान्ती? राजकुमार नै एक डला ऊपर नै फैंक कै दिखाया फेर वो तले नै आग्या। इन सब बातां के जवाब राजा पै थे कोनी अर राजा झुंझला पड़ता अर राजकुमार पै डांट मार देन्ता। छोटा राजकुमार कट्या-कट्या सा रहवण लाग्या राजा तै। राजा के दिमाग में ये सारे सवाल घूमते रहते। आखिर एक दिन अपने सबतै काबिल मन्त्री को बुलाया अर बोल्या - मंत्री जी, राजकुमार मेरे तै सवाल बूझै सै पर मैं उनके जवाब कोनी दे पान्ता। मेरे मन मैं भी कुछ सवाल उठैं सैं सुन्या सै इसे सवालां का जवाब विज्ञान के जरिये दिया जा सकै सै। थाम विद्वान सो, बुद्धिमान सो, बताओ नै कुछ इस विज्ञान के बारे मैं। राजा की बात सुणकै मंत्री सोच मैं पड़ग्या। एक तो विज्ञान के बारे मैं जानकारी थोड़ी, दूजै राजा बरगे अनाड़ी नै विज्ञान के बारे मैं समझावै क्यूकर? दस दिन बीतगे विचार करतें फेर राजा तै कह्या - महाराज! आपनै बहोत बड़ा सवाल कर दिया अक विज्ञान के सै? इसका जवाब देवण तै पहलम यो जानना जरूरी सै अक राजकुमार के अर थारे सवालां मैं समानता के सै? समानता या सै अक इन सारे सवालां का सम्बंध सारी दुनिया तै सै जो कि दुनिया नै समझण की जिज्ञासा करकै पैदा होवै सैं। महाराज, विज्ञान की शुरूआत इसे जिज्ञासा तै होवै सै। याहे वा जिज्ञासा सै जो किसे चीज नै देख कै, छूकै, सूंघकै, चाखकै अर सुणकै पैदा होवै सै। या जिज्ञासा एक सवाल ठावै सै अर विज्ञान उस सवाल का जवाब देवण की कोशिश करै सै। इस ढालां विज्ञान म्हारे चारों कान्ही फैली दुनिया नै समझण मैं म्हारी मदद करै सै। राजा नै सुणकै कह्या - मंत्री जी, यातो ठीक बात सै फेर यू विज्ञान इन सवालां का जवाब क्यूकर देवै सै? मंत्री बोल्या या बात समझण की खातर हमनै वैज्ञानिक के काम काज पै गौर करना पड़ैगा। पहली बात - वो समस्या के बारे मैं अवलोकन करे गये सारे तथ्य कट्ठे करै सै। फेर उन तथ्यां नै मिलाकै उस अज्ञात की एक दिमागी तसवीर बनावै सै। कई बार इसा होवै सै अक कठ्ठे करे गये तथ्य उस दिमागी तसवीर के लिए काफी नहीं होन्ते। फेर वो प्रयोग की खातर आगै कदम बढ़ावै सै अर उस मामले मैं फालतू तथ्यां की खोज करै सै। यह क्रम तब तक चलता है जब तक कि एक इसी तर्कपूर्ण अर सम्भावित दिमागी तसवीर नहीं बन जान्ती जो समस्या का ठीक जवाब हो। राजा नै कह्या - मंत्री जी, थारी बात मेरी तो समझ मैं कोनी आई। क्या आप किसे सीधे-सादे उदाहरण से अपनी बात साफ नहीं कर सकते के? मंत्री बोल्या - जी महाराज! क्यों नहीं कर सकदा, राजकुमार के ही एक सवाल नै लेल्यो। उसने बूझया था अक चीज तले नै ए हमेश्या क्यो गिरैं सैं? इस सवाल की जड़ याहे सै अक हम रोजाना देखां सां अक जब भी कोए चीज हवा मैं छोड़ दी जावै सै तो वा नीचै ए गिरै सै। फेर सोचै सैं अक क्या यो अवलोकन सभी चीजां अर सारी जगहां की खातर सही सै? इस बात का बेरा पाड़ण की खातर हमनै न्यारी-न्यारी चीजां पै अर न्यारी-न्यारी जागां पै प्रयोग करना पड़ैगा। जै हम इसा करांगे तो बेरा लागैगा अक सारी चीज ज्यूकर - पत्थर, सिक्के, सूई, कपड़े, कागज चाहे भारी हों चाहे हल्के, नीचे ए नै गिरैंगे जागां चाहे कोए हो। कई साल पहलम एक वैज्ञानिक नै इसा ए प्रयोग कर्या था अर म्हारे ताहिं इस सवाल का जवाब दिया था। राजा की दिलचस्पी काफी बधगी थी। उसनै बूझाया - वो जवाब के था? मंत्री बोल्या - जवाब तो सीधा-सा सै चीजें इस करकै नीचे नै गिरैं सैं अक धरती इन चीजां नै अपनी कानहीं खींचै सै। राजा उछल कै पड़या - इतनी सीधी-सी बात! मेरा ध्यान बेरा ना क्यों नहीं गया इस कान्हीं। मंत्री बोल्या - महाराज कई जवाब साधारण होसैं फेर उनकी तलाश इतनी साधारण बात नहीं होन्ती। पक्के नतीजे तै पहलम काफी अवलोकन, प्रयोग, विश्लेषण वगैरह की जरूरत होवै सै। कई कई बै वैज्ञानिक किसे जवाब की तलाश मैं सारी उमर गुजार देसैं फेर बी उन सवालां का जवाब उसकी मौत के कई सालां बाद मिलै सै। आगले दिन राजा नै मंत्री ते कह्या - प्रयोग करकै सिखाओ तो मैं प्रयोग करण नै तैयार सूं। आगले दिन मंत्री तीन आन्धे आदमी अर एक हाथी महल मैं लियाया। राजा, राजकुमार अर महल के निवासी कठ्ठे होगे। मंत्री नै तीनूं आन्ध्यां तै एक-एक करकै हाथी को छूने अर उसका वर्णन करण का आदेश दिया। पहले नै पूंछ टिटौली अर बोल्या या तो रस्सी बरगी चीज सै। दूसरे नै सूंड कै हाथ लाया अर बोल्या या तो सांप बरगी कोए चीज सै। तीसरे ताहीं उसकी टांग पकड़ा दी। उसनै कह्या या तो पेड़ के मोटे तने बरगी चीज सै। सारे लोग हंस पड़े। आन्धे सकपका से गये। फेर हटकै मिलकै कोशिश करण की बात करी। खूब बतलाये। किसे नतीजे पर नहीं पहोंच पाये। फेर टटोल्या मिलकै अर सूंड तै सिर पै गये, आंख टटोली, कान टटोले। पाह्यां ते पेट पर गये। कुल मिलाकै अपने अनुभवां पै चर्चा करी अर बोले - जिस चीज की हमनै खोज करी सै वो बहोत बड्डा जानवर सै, जिसकी नाक इतनी लाम्बी, पूंछ इतनी लाम्बी, बहोती मौटे पां सैं। अन्दाजा सै अक यू हाथी हो सकै सै अर कै उसे बरगा कोए और जानवर हो सकै सै। मंत्री नै राजा को बताया अक हर एक आन्धे नै उपलब्ध प्रमाण कठ्ठे करे अर उनके आधार पर उस अज्ञात जानवर की दिमागी तसवीर बनाने की कोशिश करी। चूंकि वे आन्धे थे इसलिए उनके प्रमाण भी सिमित थे इसलिए उनकी जो पहली दिमागी तस्वीर बनी वा सही नहीं थी। फेर उननै अपने अनुभवों को खोज अर प्रयोग तै बधावण की कोशिश करी। सारी सूचनाएं कठ्ठी करी। किसे एक हिस्से का व्यवस्थित तरीके तै अवलोकन कर्या अर जांच पड़ताल करी। खोजबीन के हर कदम पर अपने अवलोकन एक दूसरे ताहिं बताये अर उनपै चर्चा करी तब कितै जाकै उनके दिमाग मैं उस जानवर की ज्यादा सही तसवीर उभरी। लोगां की बात सुणकै जो हाथी का अन्दाज उनके मन मैं पहलम तै था वोह ईब साबित होग्या। प्रयोग तै अन्दाज को सही साबित करना विज्ञान का तरीका सै। योहे तो सै विज्ञान। सरिता चुप होगी। आई किमे समझ मैं?
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दूध सै, उड़ै पानी बी सै

दूध सै, उड़ै पानी बी सै                                                                               जिस महापुरुष नै अपने ग्रंथां के धरण की खातिर राजगृह जिसा विशाल भवन बनवाया था, उसे नै एक पुस्तक जला दी। क्यों? जिस बुद्धिमान के धोरै लगभग तीस हजार तै भी फालतू कीमत की निजी किताब हों, उसे ने एक दिन एक किताब जला दी, आखिर क्यों? जिस माणस का पुस्तक प्रेम अनेक विद्वानां की खातिर आश्चर्य की बात हो, उसे नै एक दिन एक किताब जला दी क्यों? उस पुस्तक का नाम के था? उसका नाम था - मनुस्मृति। याहे किताब क्यों जलाई? इस जिज्ञासा का समाधान ना करकै आपां अपने अपने पूर्वाग्रहां के हिसाब तै सोच्चण लागज्यां सां इसपै। मनुस्मृति पूरी पढ़कै देखनी चाहिये। इसकी अध्याय संख्या 12 ए सै फेर कई अध्याय इतने बड्डे सैं अक श्लोक संख्या ढाई हजार तै भी ऊपर चली गई।

  वह कौन-सा ग्रंथ सै जिसमें कोए बी बात काम की ना हो? मनुस्मृति बी उसका अपवाद कोन्या। किसे-किसे का कहना सै अक सम्मिश्रण तो हर वस्तु मैं होसै जड़ै दूध सै उड़ै पानी बी सै, फेर मनुस्मृति मैं भी जै कुछ सम्मिश्रण सै तो उसमैं के बात सै। इस पै इतनी आपत्ति क्यों? न्यों कहया जा सकै सै इसके उत्तर मैं अक जै कोए आदमी गलती तै कै जानबूझ कै दूध मैं ए सही, कितै कोए इसी चीज मिलादे जो पीवण आले की ज्यान लेले तो के उस ताहिं साधारण मिश्रण कहकै उसकी उपेक्षा करी जा सकै सै? इसमैं कुछ संदेह की बात नहीं अक चाहे किसे नै भी अर किनहे बख्तां में भी मनुस्मृति का संकलन करया तो उस बख्तां की सारी आच्छी-भुन्डी जानकारी का संग्रह मनुस्मृति मैं हुया लागै सै। आज भी ज्यूकर सामान्य ज्ञान अथवा जनरल नॉलेज की कुछ किताबें तैयार करी जावैं सैं उसी ए या कृति भी लाग्गै सै।
यों भी या कृति किन्हीं मनु महाराज की कृति नहीं लगती क्योंकि इसमें जागां-जागां इस बात की पुनरुक्ति मिलती है अक ऐसा मनु महाराज नै कहया सै। सोच्चण की बात सै फेर या क्यों जलाई गई? इस पुस्तक का रचने आला कोए बी हो, आज के मूल्यांकन की नजर तैं इस किताब मैं इसा कुछ भरया हुया सै अक इसकी मान्यतावां के प्रचलित रहन्ते इस देश में कई मसले खड़े हो ज्यां। कहवण आले कहदे सैं अक, मनुस्मृति अर उसकी आज्ञाएं तो कद की मरलीं। ईब गड्डे मुरदे पाड़न का के लाभ? फेर मनै तो जमा नहीं लागता अक मनुस्मृति मरली। आज भी जड़ै बी धर्मशास्त्र पढ़ाया जावै सै इसे घणखरे विश्वविद्यालयां मैं मनुस्मृति पाठ्य पुस्तक के रूप मैं पढ़ाई जावै सै। असल मैं आज के हिन्दू कोड का मूलाधार भी मनुस्मृति सै। सवाल असली यो सै अक याहे किताब क्यों जलाई? उसे कारण तै या पुस्तक जलाई, जिस कारण तै महात्मा गांधी नै अनगिनत विदेशी कपड़े जलवाये थे। फेर न्यों कहदें सैं एक मरे औड़ सांप कै पाछै क्यों पड़रे सो। उननै या बात कती नहीं दिखाई देन्ती अक इन कुछ ग्रंथां नै तो सुदीर्घकाल से समाज के एक हिस्से विशेष को ही डस राख्या सै। तो फेर के इनकी अन्तयेष्टि यथासंभव करया जाना जरूरी नहीं सै?
गजब की बात सै अक म्हारी सरकार इसी बातां का प्रचार करण आली किताबां नै निरोत्साहित करण की बजाय प्रोत्साहित करती दीखै सै। भारतीय सरकार नै 1969 मैं अछूतपन के बारे मैं सही-सही जानकारी हासिल करने के खातिर पेरुमल की अध्यक्षता मैं एक कमेटी बनाई थी जिसनै भारत के सारे राज्यां का दौरा करया अर जिन बातां का बेरा लाया वे म्हारी आंख खेलण ताहिं भतेरी सैं। अर मैं तो न्यों कहूं सूं अक हरियाणे की कई खूबियां का तो बेरा ए कोन्या ला पाये। हरियाणा के बारे मैं या कमेटी कहवै सै अक - सन् 1968 मैं बंशी-खुरद जिला करनाल की एक अछूत लड़की को जिस समय वह गोबर बटोर रही थी, एक जातीय अभिमानी नै बुरी तरह पीटा। सन् 1968 मै ही अंबाला जिले के फतेहपुर गांव के प्राइमरी स्कूल के एक अछूत टीचर नै पानी पीने के लिए रखे हुए बर्तन में से पानी पी लिया। यह देख मुख्य अध्यापक आग बबूला होग्या। उसनै वह घड़ा और पानी पीने का गिलास दोनों फोड़ दिये।

साइनिंग इंडिया

साइनिंग इंडिया
गाम मैं सते, फते, नफे, सविता, सरिता, कविता अर धापां ताई, शनिचर नै सब बैठक मैं आये अर आराम तै बैठ कै दुःख-सुख की बतलाये अक न्यारे ढाल के आंकड़े कठ्ठे करकै ल्यावण की ज़िम्मेदारी किस किसनै नहीं निभाई। ताई धापां या बात देखकै बड़ी खुश होई अक सब कठ्ठे करकै ल्यारे थे। जो आंकड़े कठ्ठे करकै नहीं ल्यावैगा ओ एक किलो बरफी खवावैगा या शर्त थी। ताई बोली तो सते बतावैगा अपनी बात।
सते बोल्या - ‘सारी दुनिया के स्तर पै प्रति व्यक्ति सालाना कितनी आमदन सै बेरा सै?’’ सारे गुटर-गुटर देखैं इसकी कान्हीं। सते बोल्या - ‘बस! तो ले हम बतावैं सैं - 5120 डालर सै।’ भारत मैं प्रति व्यक्ति आय कितनी सै? इबकै तो कविता बतावैगी। कविता बोली - पक्का तो बेरा ना फेर या 500 डालर के करीब होनी चाहिये। सते नै बताया - ‘हां 560 डालर सै। दुनिया मैं भारत का स्थान 162वां सै बस 29 देश भारत तै तलै बताये।’
सूरता बी इतने मैं आग्या था, वो बोल्या - ‘तूं ये आंकड़े कड़े तै ल्याया भाई? ये तो कोरी बकवास सै। ‘साइनिंग इन्डिया’ इतना नीचै क्यूकर हो सकै सै? यो सते बदेशी कम्पनियां धोरै पीस्से लेरया सै ज्यां करकै भारत के बारे मैं इतनी घटिया अर झूठी बात करै सै। आजकाल बहोत पलूरे पाल लिये इन बदेशी कम्पनियां नै।’ सते बोल्या - ‘यो तो बख्त बतावैगा सुरते अक असली दल्ले कौन सैं इन बदेशी कम्पनियां के। 1857 की लड़ाई मैं भी इन दल्यां करकै मार खागे थे अर देश की आजादी की लड़ाई मैं जिननै फली नहीं फोड़ी वे आज देश के सबसे बड्डे देशभक्त बण कै बैठे सैं ये रामभक्त। बाकी ये आंकड़े वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर-2003 तै ल्याया सूं।’ सूरता बोल्या - ‘यो इंडीकेटर तै अंग्रेज छापते होंगे ना? बदेशी रंग कद तै चढ़ग्या तेरे पै तूं तो कसूता देशी था। म्हारी पक्की आस्था सै अक म्हारा देश तै कसूती ढालां दुनिया मैं ‘शाइन’ करण लागरया सै। अर हरियाणा तो म्हारे साहमी सै।’ सते ‘ये झूठे आंकड़े नहीं चालैंगे भाई।’ सते बोल्या - ‘कहवै तो रिपोर्ट ल्याकै दिखाद्यूं।’ सूरता बोल्या - ‘के फरक पड़ै सै। जिब म्हारी आस्था सै अक तक्षशिला अर नालन्दा की म्हारी इतनी बढ़िया परम्परा का कोए मुकाबला नहीं दुनिया मैं तो ईब इस रिपोर्ट पै क्यूंकर यकीन कर ल्यूं? या हमनै बदनाम करण की साजिश सै।’
ताई बीच मैं बोली - किसे रफड़े मैं फंसगे। आस्था का अर विज्ञान का जिब बी कोए टकराव हुया तो कुरबानी तो विज्ञान नै फालतू दी फेर जीत बी विज्ञान कीए होई। फेर म्हारे बरगे बोतडू आज बी अन्धविश्वास के अन्धेरे मैं पड़े सैं। जिब ब्रूनो नै दुनिया कै साहमी या बात कही अक धरती के चौगिरदें सूरज नहीं घूमता उल्टा धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो उस बख्त के कट्टरपंथियां नै अर इन सुरते बरगे आस्था आल्यां नै ब्रूनो जिन्दा जला दिया था। इसे तरियां गैलिलियो ताहीं भी फांसी की सजा सुना दी थी। आज तो ये सुरते बरगे बी आस्था की झोली मैं जा बैठे। इबै इन आंकड़यां पै आंगली कोए नहीं ठावैगा।
सरिता नै अपनी बात शिक्षा पै कही - ‘भारत मैं दुनिया की आबादी का 16 8 फीसद रहवै सै फेर दुनिया के वयस्क निरक्षरां मैं तैं 34 फीसदी भारत मैं सैं तो भारत महान कड़े तै होग्या? 94 विकासशील देशां के शिक्षा सूचकांक मैं भारत का स्थान 76वां सै। तृतीय ‘टरसरी’ स्तर की शिक्षा मैं प्रवेश का अनुपात दुनिया का 23 फीसदी सै अर भारत मैं यो 10 5 फीसदी सै। क्या कहने भारत के।’ सरिता कै सांस से चढ़गे अपनी बात कहन्ते-कहन्ते। सूरते पै फेर कोनी टिक्या गया अर बोल्या - ‘तूं किततै ल्याई स ये आंकड़े?’ सरिता बोली - ‘यूनेस्को की रिपोर्ट, एजुकेशन फॉर आल-2003-2004 मैं तै ल्याई सूं मेहनत करकै नै। अर सुनल्यो भ्रष्टाचार सूचकांक के हिसाब से दुनिया के 102 देशां मा तै भारत 71वें स्थान पै सै।
सिर्फ 31 देश सैं जो भ्रष्टाचार मैं भारत तै आगै सैं। यू आंकड़ा ट्रांसपेरैंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट 2003 तै लिया गया सै। ईबी कुछ कहना सै सूरत सिंह जी नै इन आंकड़या के बारे मैं? कोरी आस्था के दम पै कदे बी दुनिया कोनी चाली।’ सूरत सिंह कुछ कहना चाहवै था तो ताई बोली - ‘एकबै सारे बोल लेवैं फेर दूसरा गेड़ा आवैगा तो तूं बोलिये सुरते।’
कविता की बारी आई अर वा बोली - ‘विदेशी ऋण का बोझ भारत पै 1998-1999 मैं 9823 करोड़ डालर था जो 2003 जून ताहीं बधकै 10,960 करोड़ डालर पै पहोंचग्या। 1998 में मार्च ताहीं देश के धनवानां पै बकाया कर 47,444 करोड़ रुपइये था जो 2002 के 21 मार्च ताहीं बधकै 86,342 करोड़ रुपइये होग्या। ये सारे आंकड़े मनै आर्थिक सर्वे 2002-2003 तैं कठ्ठे करे सैं। दूजे कान्हीं किसानां की 4500 हजार करोड़ के लगभग की सबसिडी पै जूत बजा राख्या सै। कम तै कम जिब म्हारे नेता गाम मैं आवैं तो इन बातां पै इनका के कहना सै हमनै बूझना तो चाहिए।’
फते कई वार का मसकोड़े से मारै था, उसका नम्बर आया तो उसनै बताना शुरू करया - ‘म्हारे बरगे 62 देशां के सूचकांक के आधार पै वैश्वीकरण की कटारी चाल्ले पाछे के विकास का किस्सा घणा दर्दनाक सै। फेर बेरा ना म्हारे देश के नीति निर्धारकां नै यो सब दिखाई क्यों ना देन्ता। इन देशां मैं दुनिया की 80 फीसदी आबादी रहवै सै। 2001 में भारत का स्थान 49वां था फेर भला हो एनडीए की सरकार का अक 2002 मैं यो 57वां होग्या, अर 2003 मैं यो 61वां होग्या। सुरते कै आज बेरा ना के होरया था बोल्या - ‘सारी काट करोगे अक किमै आच्छी बात बी बताओगे?’
सरिता बोली - ‘ईब आच्छी कड़े तैं घड़ां सुरते की खातर? हाल आले राज के आये पाछै बी हालात कोन्या ठीक हुए। आंकड़यां समेत इसपै फेर कदे सही

धन काला मन काला

धन काला मन काला
सते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता, ताई भरपाई शनिवार नै फेर कट्ठे होगे जन चेतना केंद्र मैं। सरोज के आवण की बाट देखैं थे अक रोजगार गारंटी कानून पै जो कुछ बचर्या सै उसपै बात करनी थी। सरोज का सन्देशा आग्या अक आज उसकी एक और मीटिंग सै इस करकै वा कोनी आ सकदी। खैर बात चाल पड़ी एक ब्याह की। नफे बोल्या - भक्कड़ बाल राख्या था भाई न्यादर क्यां कै ब्याह मैं। सरिता बोली - फेर काला धन के थोड़ा सै उनपै। ताई भरपाई बोली - दो तै बड्डे अफसर अर बीस किल्ले। इन धोरैं धोला धन के थोड़ा सै जो काला धन लावैंगे। सरिता बोली - साच्यी बात याहे सै ताई। चाल मेरी गेल्यां जै कोए बी पेमैंट इननै चैक तै करी हो तै मनै बता दिये। कविता बोली - यो काला धन हो सै कै? सते बोल्या - काला धन वो धन सै जो सरकार कै साहमी घोषित नहीं कर्या जान्ता। उसपै कानून द्वारा लागू टैक्स बी कोन्या दिया जान्ता। ताई बोली - या तो ठीक सै सते। फेर यो काला धन आवै कड़े तै सै? सते बोल्या - धन मतलब धौला धन सैकड़ों, हजारों रास्तों से काला धन बन सकै सै। कुछ रास्ते सैं ज्यूकर घूसखोरी का। सरकारी कर्मचारी, नेता, पुलिस आदि घूस लेवैं सैं अर घूसखोरी का यू पीस्सा, ये घूस घोषित नहीं करते। यो घूस का धन काला धन बन ज्यावै सै। फत्ते बोल्या - सुन्या से भारत सब तै ज्यादा घूसखोर देश है? सते बोल्या - सबते ज्यादा नहीं, म्हारा नम्बर 97वां सै। मतलब लगभग 96 देश हमतै फालतू सूदखोर सैं अर लगभग 60-70 देश म्हारे तै कम घूसखोर सैं। सविता बोली - सते जी थाम काले धन का रिकाट चढ़ारे थे यो बदल क्यूं दिया? सते बोल्या - हां-हां, दूसरा काला धन पैदा करण का रास्ता सै सरकारी खर्च के तरीके तै। म्हारी केंद्र की सरकार हर साल लगभग 6,00,000 करोड़ रुपये खर्च करै सै अर म्हारी प्रदेशां की सरकारें भी कुल मिला के इतना ए खर्च करैं सैं।
ताई बोली - इतना पीस्सा क्यां पै खरच कर्या जा सै? सते बोल्या - देश की सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, सड़क, पुल, नहर इत्यादि पै। नफे बोल्या - इस खरच तै काला धन क्यूंकर पैदा हुया? सते बोल्या - एक म्हारे देश के प्रधानमंत्री नै भी मान्या था कि लगभग 85 प्रतिशत रुपइये घोषित कामां मैं कोन्या लागते। बिचौलिये की मदद तै बाबू, ठेकेदार, नेता लोग इसनै हड़प ज्यावैं सैं। यो 85 प्रतिशत अघोषित धन सै मतलब काला धन। सविता बोली - हे मेरी मां, 85 प्रतिशत मतलब - इसका तो औड़ ए कोनी। सते बोल्या - जै साल का सरकारी खरच 10,000 करोड़ रु. होसै तो लगभग 8,50,000 करोड़ रु. हड़प लिये जावैं सैं। 85 प्रतिशत जै फालतू बी मान लिया जावे क्योंकि यो आंकड़ा भी एक नेता का भाषण था अर 50 प्रतिशत भी हड़पने की दर मान ली जावै तो भी सालाना 5,00,000 करोड़ रु. काला धन बनता है आये साल।
ताई बोली - कमाल होग्या। हमनै तो कदे सुण्या नहीं अक म्हारे देश मैं इतना काला धन सै। म्हारे थोड़े से धौले धन की इसकै आगै के बिसात? सते बोल्या - कुछ अर्थशास्त्रियों ने काले धन का अनुमान लगाया सै कि यो म्हारे देश के सकल सालाना उत्पाद का 40 प्रतिशत सै। आज भारत का सालाना उत्पाद लगभग 30,00,000  करोड़ रुपये सैं तो देश की अर्थव्यवस्था मैं 12,00,000 करोड़ रुपये का काला धन खपर्या सै। कुछ दूसरे इस अनुमान नै कम मानै सैं। उनके हिसाब तै काला धन 60,00,000 करोड़ रु. सैं। सविता बोली - सते माड़ी सी ब्रेक लाले। इतना पीस्यां का हिसाब सोच कै मेरा तो दिमाग पाट्टण नै होर्या सै। इतना काला धन न्यौए बनै सै - घूसखोरी, सरकारी खर्चा अर और बेरा ना के के। सते बोल्या - और के आजादी के बाद के 30-40 सालों मैं इस पीस्से की हड़प नै देश मैं केंद्रीय दलों की साथ-साथ प्रांतीय मुख्य राजनैतिक शक्तियों को जन्म दिया अर 1990 तक देश इतना कंगाल बना दिया कि विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शरण मैं जाणा पड़ग्या। नई उदारीकरण अर निजीकरण की राजनीति शुरू हुई...। सविता बोली - सते, राजनीति की तरफ स्टेरिंग मतना मोड़ै।
हम पहलम काले धन की चरचा आज पूरी करल्यां। सते बोल्या - हां या बात भी ठीक सै। तीजा बड्डा रास्ता काला धन बणावण का सै टैक्स की चोरी। मान लिया मैं एक दुकानदार सूं। हर बिक्री की साथ-साथ मनै बिल बना कर सेल्ज टैक्स काटना चाहिए। अर यू टैक्स सरकार मैं जमा करवाना चाहिये। फेर मैं कै तो बिल कोनी काटता या काटूं सूं भी तो ‘दो नम्बर’ का बिल काटूं सूं अर सेल्स टैक्स का पीस्सा सरकार नै कोनी भेजता। यू हड़प्या हुआ टैक्स काला धन बणज्या सै। कविता बोली - योहे वैट का भी तो झमेला पड़र्या सै ना? सते बोल्या - ठीक समझे। वैट लागू होण पै इसी चोरी असम्भव तो नहीं फेर मुश्किल जरूर हो ज्यागी। मैं मिल का मालिक सूं। मेरी आमदनी 100 रुपइये सै इसपै 18 रुपइये एक्साइज टैक्स बनता है। मैं बिना बिल्टी के अपने माल का ट्रक लदवाद्यूं तो 18 रुपइये बचगे। कै फेर मनै 50 रु. की बिल्टी बनवाई अर सिर्फ 9 रु. का एक्साइज टैक्स भर्या। बस काला धन तैयार। सविता बोली - आपां मकान, दुकान कै जमीन बेचां सां मानो 2 लाख रु. की, फेर सेल डीड बनवाई सिर्फ 50 हजार की। बस काला धन होग्या तैयार। बिदेश तै मशीन खरीदी एक करोड़ की पर बेचण आली कंपनी तै बिल बनवाया डेढ़ करोड़ का मतलब डेढ़ करोड़ का लोन लेकै ताकि 50 लाख रुपइये म्हारे निजी बिदेशी बैंक खाते मैं जमा हो ज्यावैं। काला धन तैयार। हरि की ढालां काले धन की महिमा भी अनन्त सै। मनै बी सारे तरीक्यां का कोनी बेरा। जै किसे नै बेरा हो तै लिख चिट्ठी मैं गेर दिये। काले धन तै मन धौला क्यूकर रह सकै सै? इसका भी कोए जुगाड़ थारे धोरै हो तै मनै बतावण की मेहरबानी करियो

गारंटी रोजगार की ?

गारंटी रोजगार की ?
सते फते नफे सविता कविता सरिता बबीता सुनीता और ताई भरपाई शनिवार को फेर आगे ताई की शाल मैं। नफे बोल्या - आज बस स्टैंड पै बहस होवण लागरी थी अक रोजगार गारंटी कानून 2005 के तहत सोनीपत जिला बी आवै सै अक नहीं? सते बोल्या - सोनीपत का नाम कोन्या। कविता बोली - तो कौनसे कौनसे जिले आवैं सैं म्हारे हरियाणा के इसके तहत? सारे थूम होगे। किसे नै पक्का बेरा ना। महिला साक्षरता समूह की बबीता जो बीए पास सै वा भी काल्लर कोरै बैठी थी इस बात पै। ऊं उसनै बहोत बातां का बेरा रहवै सै। खैर सारे गाम के माणसां धौरे जाके इसके बारे मैं जानकारी लेवण की योजना बनाई। इतनी वार मैं ज्ञान विज्ञान समिति की सरोज गाल मां के जावै थी उस ताहिं रुक्का दे लिया उननै। हाल चाल बूझया। सरिता बोली - सरोज जिब देखो जिबै तेरे हाथ मैं कोए ना कोए किताब जरूर पावै सै। इतनी क्यों पढ्या करै? के डीसी बणैगी इतना पढ़कै। सरिता नै सरोज के हाथ तै ले कै किताब का हैडिंग पढ़या - रोजगार गारंटी अधिनियम (प्रवेशिका) लेखक निखिल डे, ज्यां द्रोज अर रीतिका खेरा। सरोज के मुंह तै एकदम लिकडया - बगल मैं छोरी अर गाम मैं ढिंढोरी। इसे पै तो चर्चा होरी थी।
सविता बोली - सरोज बैठ आज इसपै बता थोड़ा घणा हमनै। सरोज नै बतावणा शुरू करया - रोजगार गारंटी कानून 2005 के तहत हरियाणा के दो जिले थे सिरसा अर महेन्द्रगढ़ अर इस साल तै दो जिले और आगे मेवात अर अंबाला। कुल 4 जिले होगे। सत्ते बोल्या - इस कानून का निचोड़ के सै सरोज? सरोज बोली - घणा तो बेरा ना फेर न्यूनतम मजदूरी पै काम करने नै राज्जी किसे माणस के रोजगार की कानूनन गारंटी ही इस अधिनियम की मूल धारणा सै। इसके तहत आवेदन करने आले किसे भी वयस्क नै बिना देरी के किसे सार्वजनिक काम मैं रोजगार पावण का अधिकार सै। 15 दिनां के भीतर रोजगार मिल जाना चाहिए। ताई बोली - यो तै बहोत बढ़िया कानून बनाया सरकार नै। फेर यो सोनीपत जिले खातर तो कोन्या।
सरोज बोली - हां बाकी कानूनां की ढालां यो भी कितना लागू होवैगा या देखना बाकी सै। जब हमनै इसकी पूरी बात का बेरा ए नहीं होगा तो यू लाग्गू कूण करावैगा? बबीता या बात तो सही सै। फेर सरकार नै तो अपनी तरफ तै यू कानून म्हारे 4 जिल्यां मैं दे दियां। सरोज बोली - इस कानून की भी अपनी कुछ सीमाएं सैं। नफे बोल्या - वे कुणसी? सरोज बोली - यह गारंटी ग्रामीण क्षेत्रां मैं दी गई सै शहरां मैं नहीं। दूसरी बात या सै अक या स्कीम प्रति घर प्रति वर्ष 100 दिन की खातर सीमित सै। फेर इसका यू मतलब बी कोन्या अक यू कानून थोथा सै। ना यू भरमा सै।
पहली बरियां सारे ग्रामीण मजदूरां नै अधिकार के तौर पर रोजगार पावण का मौका इसे अधिनियम के तहत दिया जावैगा। ताई बोली - सरोज न्यों बता इसका के लाभ होगा? सरोज बोली - कई लाभ सैं। सबतै पहलम यू एक प्रभावी रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण परिवारां की गरीबी अर भूख मिटावण मैं मदद करैगा। या बात सही सै अक न्यूनतम मजदूरी पै 100 दिनां के रोजगार की गारंटी कोए सुनहरा अवसर कदम नहीं सै फेर किसे तरियां गुजारा करणियां की खातर यू अर्थपूर्ण जरूर सै। दूसरी बात इस अधिनियम के फलस्वरूप गांवों से शहरों मैं पलायन कम हो ज्यागा। गाम मैं ए काम हो तै लोग शहरां की तरफ नहीं भाजैंगे। तीसरी बात या सै अक यू कानून महिलावां के सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण स्रोत होगा। इतनै कुछ आर्थिक आजादी तो मिलै ए गी। नफे सिंह बोल्या - सरोज न्यों बता इस कानून के तहत कौन कौन आवैंगे? सरोज बोली - कोए बी वयस्क स्त्री-पुरुष आवेदन कर सकै सै। बीपीएल कार्डधारी परिवारां ताहिं ए नहीं सै। यू सबकी खातर सै। पहली अप्रैल तै साल शुरू होगा आगले साल मार्च ताहिं। इस 12 महिने मैं 180 दिन का रोजगार। हरेक परिवार नै 100 दिन का कोटा मिलै सै। इस 100 दिन के कोटे मैं एक परिवार के अन्य मैंबरां तै भी काम दिया जा सकता है। परिवार के अलग अलग सदस्य अलग अलग दिनों या एक ही दिन काम पा सकैं सैं बशर्ते उननै उस वित्तीय वर्ष मैं 100 दिन तै अधिक काम ना मिल्या हो। सरिता बोली - मजदूरी का भुगतान कितने दिन मैं होगा? सरोज बोली - एक हफ्ते मैं होगा। 15 दिन के भीतर भीतर घणे तै घणा। सरकार रोजाना देवण का आर्डर बी दे सकै सै। नफे बोल्या - जो बख्त पै नहीं मिलै तो? सरोज - मजदूर मुआवजा/हर्जाना लेवण का हकदार होगा। पुरुष अर महिला की बराबर की मजदूरी होगी। इबै और बी कई बात रहैगी उनपै फेर कदे बात करांगे। सविता बोली - सरोज शनिवार नै एक घंटा काढ़ लिया कर म्हारी खातर। सरोज बोली - नेकी अर बूझ-बूझ।

हरियाणा की तिग्गी

हरियाणा की तिग्गी
तिग्गी का मतलब तीन चीजां का तिग्गड्डा मतलब तीन चीज इकट्ठी। एक तिग्गी का मतलब ताश की तिग्गी। पान की तिग्गी, ईंट की तिग्गी, चिड़ी की तिग्गी अर हुकम की तिग्गी। दूसरी तुरुप की तिग्गी। तुरुप की तिग्गी साधारण इक्के ने बी पढ़ण बिठादे सै। कई बै तिग्गी की ट्रेल दो इक्यां के पेयर का भी भूत बणादे सै। या ताशां की तिग्गी माणसां का बहोत सत्यानाश करै सैं। फेर जै ताशां की तिग्गी जब समाज का धुम्मां ठा सकै तो माणसां की असली तिग्गी समाज का के कर सकै सै या बात हरियाणा के हरेक माणस कै आसानी तै समझ मैं आ सकै। हरियाणा की किस्मत कहवां अक बदकिस्मत मेरे कम समझ मैं आवै सै। म्हारे हरियाणा मैं गऊ, गऊ का गोबर अर गऊमूत्र की तिग्गी नै सदियां तै गुल खिलाये सैं अर ईब तो हद होगी अक दुलिना मैं गउआं के बदलै 5 माणसां की बलि चढ़ाकै बहुत खुश हुये म्हारे समाजी भाई। हालांकि आज ताहिं सिद्ध नहीं हो लिया अक एक बी गऊ उन मरण आल्यां नै मारी थी। हरियाणे के समाज मैं एक तिग्गी और बताई - दलित विरोध, महिला विरोध और विज्ञान विरोध की तिग्गी। इस तिग्गी नै तो पढ़े लिखे माणसां के दिलां मैं भी घणी डूंगी जड़ जमा राखी सै वट वृक्ष की ढालां। इस तिग्गी का काम सै अक मजाल सै जै तर्क अर विवेक की खुली हवा किसे खिड़की के म्हां कै घर कै भीतर चली जावै। इसे ढाल कई ढाल की तिग्गी सैं जिन करकै हरियाणा में आर्थिक विकास तो होग्या फेर सामाजिक विकास कै कसूती कैंची मार राखी सै इन तिग्गियां नै। कई बर तो ये पिछाण मैं ए कोन्या आत्ती। आज ताहिं जिसनै इन तिग्गियां नै छेड़न की हिमाकत करी सै तो छेड़निया का ए नुकसान हुया सै। मजे की एक बात और सै अक तर्क, विवेक और वैज्ञानिक रुझान की तिग्गी नै सदिया तै इन सामाजिक अवरोध पैदा करण आली तिग्गियां ताहिं चुनौती दी सै अर आज बी देवण लागरी सैं। जब ब्रूनो नै कहया अक सूरज धरती के चारों तरफ कोनी घूमता बल्कि धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो ब्रूनो को धर्म, राष्ट्र अर परंपरा की तिग्गी नै जिंदा जला दिया था। आज बी कोए कैहकै तो देखो अक जिब कोए चीज जलै से तो कार्बनडायक्साइड पैदा हो सै मतलब वातावरण में असुद्धि पैदा हो सै फेर हवन मैं भी तो चीज जलैं सैं तो शुद्धि क्यूंकर होवै सै? खैर इसपै फेर कदे सही।
बात तिग्गियां पै चाल रही थी। हरियाणा मैं एक खास बात और देखण मैं आवै सै। राजनीति के दंगल मैं भी म्हारे हरियाणा महान मैं तिग्गियां की गलेट लागैं सैं। एक दौर सै हरियाणा मैं लाल तिग्गी का इसनै चाहे पान की तिग्गी कहवां चाहे ईंट की तिग्गी। मतलब बंसीलाल, भजनलाल अर देवीलाल की तिग्गी। इस तिग्गी का नतीजा सै यू अधखबड़ा हरियाणा। अधखबड़ा क्यूंकर? यो न्यों अक आर्थिक तरक्की मैं तो गोआ पाछै इसका दूसरा नंबर अर सामाजिक तरक्की मैं यू सबतै फिसड्डी। इसा हरियाणा का मॉडल या लालां की तिग्गी ए रच सकैं थी और किसे के बाक्स की बात नहीं थी या। इस तिग्गी नै समझले हरियाणा पै 1966 सै लैकै 1985 ताहिं राज करया। इस तिग्गी मैं भी फेर आगै तिग्गी देखी जा सकैं सैं। बंसीलाल, सरोज अर सुरिंदर की एक तिग्गी। कई साल पूरा हरियाणा इननै खूब मोर की ढालां नचाया। मजाल किसकी अक कोए चूं बी करज्या। न्योंए फेर एक तिग्गी उभरी देवीलाल, ओमप्रकाश चौटाला अर रणजीत सिंह की। फेर देवीलाल के रैहन्ते इस तिग्गी का एकछत्र राज कोन्या चाल्या। फेर जिब औम प्रकाश चौटाला, अभय अर अजय की तिग्गी आई तो हरियाणा के एक बै फेर भाग जाग्गे। विकास के कामां का ढूं मार के गेर दिया। मजाल सै जै किसी चौथे माणस के कैहंते पत्ता बी हिलज्या हरियाणा मैं। फेर हरियाणे आल्यां की यादाश्त बहोतै कमजोर सै अर थोड़े से दिनां मैं पाछली बातां नैं भूल ज्यावै सैं। इस तिग्गी नै हरियाणा मैं के के गुल खिलाये इसका किसनै नहीं बेरा। फेर बख्त तो परिवर्तनशील सै। इसे दौर में भजनलाल, चंद्रमोहन अर कुलदीप बिश्नोई की तिग्गी आई। या तिग्गी अपनी तुरुप चाल मैं फेल होगी अर इस ताहि एक दूसरी तिग्गी नै मात दे दी। या मात देवण आली तिग्गी बड़े कमाल की सै। या तिग्गी सै भूपेंद्र हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा अर आशा हुड्डा की हरियाणा मैं पड़गहाट उठरया सै। इस तिग्गी की चौधराहट के नशे-नशे मैं दो साल तो काढ दिये। फेर ईब मुशीबत होरी सै लोगां नैं। निरी चौधराहट तै कद पेट भरया सै। आई किम्मै समझ मैं हरियाणा की तिग्गी अक नहीं। म्हारे भारत देश मैं भी तिग्गी की अवधारणा कदे कदीमी तै चाल्ली आवै सै। ब्रह्मा शिव गणेश की तिग्गी नै कोण नहीं जानता। फेर ईब देखना योहे सै अक तर्क विवेक, वैज्ञानिकता की तिग्गी क्यूंकर हरियाणा मैं पैर फैलावै इन ढाल ढाल की तिग्गियां जो विकास विरोधी अर मानव विरोधी सैं उनतै निजात मिले। फेर हरियाणा आल्यां कै ईबै जच नहीं ली सै अक इस तिग्गी की जकड़न तै छुटकारा मिल सकै सै।

बहुत दुःख है

बहुत दुःख है
बहुत दुःख की बात है कि सरकार शिक्षा मैं आरक्षण लागू कर रही है। ऊंची जातियों वाले, अमीर परिवार वाले दुःखी हैं। मीडिया वाले, कारपोरेट वाले दुःखी हैं। राजनीति में पक्ष-विपक्ष वाले दुःखी हैं। सब ज्ञानीजन दुःखी हैं। ऐसा लगता है कि इस समय दुःख ही देश की कथा है।
ऊंची जातियों वाले दुःखी हैं कि हमने क्या बिगाड़ा था वी पी सिंह का और क्या बिगाड़ा था अर्जुन सिंह का। पहले उन्होंने मंडल लागू किया। अब ये मंडल लागू कर रहे हैं। पहले उन्होंने नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण दिया। अब ये शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हैं। यह दुःख उनका है जिन्हें शिक्षा और रोजगार में सदियों से आरक्षण हासिल रहा। सत्ताईस या उनचास फीसद नहीं। पूरे सौ फीसद।
खैर, उनका यह दुःख धीरे-धीरे गुस्से में बदलता है। गुस्से में वे जूते पालिश करने लगते हैं और सड़कों पर झाडू. लगाने लगते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि देखो आरक्षण लागू हुआ तो हम ऐसे ही घटिया काम करने को मजबूर होंगे। यह गुस्सा उनका है जिन्हें कभी इस अन्याय पर, इस समाज व्यवस्था पर गुस्सा नहीं आया कि कोई सदियों से झाडू. लगा रहा है और उनकी गंदगी साफ कर रहा है, कि कोई सदियों से उनके जूते पालिश कर रहा है।
फिर उनका यह गुस्सा नस्लवादी अहंकार में बदलता है। वे ऐंठते हुए कहते हैं कि ये पिछड़े, दलित और आदिवासी तो ऐसे ही रहेंगे। वे शिक्षा में हमारी बराबरी कैसे कर लेंगे? वे मैरिट में हमारा मुकाबला कैसे कर लेंगे? वे योग्यता में हमारे सामने कहां टिकेंगे। यह अहंकार उनका है जो कभी कोई कबीर पैदा नहीं कर सके, कभी कोई रैदास पैदा नहीं कर सके, रामचरितमानस के रचयिता तुलसी बाबा को जिन्होंने मस्जिद में शरण लेने पर मजबूर किया और भूले से भी ज्ञान की बात सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवाया।
पिछड़ों के लिए आरक्षण के खिलाफ यह दुःख, यह गुस्सा, यह नस्लवादी अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पैसे वालों के लिए सौ फीसद आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। कभी जुलूस नहीं निकाला, कभी कोई प्रदर्शन नहीं किया। वहां मैरिट नहीं होती। थैली होती है। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने डालर वाली एनआरआई औलादों के लिए जितना मांगो, उतने आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। वहां भी मैरिट नहीं होती। डालर होते हैं। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जो कहते हैं कि मैरिट और प्रतिभा का आदर नहीं किया गया तो घटिया डॉक्टर और इंजीनियर ही पैदा होंगे। मैरिट के इन दावेदारों ने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में कभी मैरिट नहीं मांगी। इन कालेजों से कितने योग्य डॉक्टर और इंजीनियर निकल रहे हैं, पूछिए।
आज वे पैसेवाले भी दुःखी हैं, जो हजारों-लाखों का डोनेशन देकर अपने बच्चों का अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला कराते हैं। लाखों रुपए फीस और हजारों रुपए ट्यूशन देते हैं। हजारों रुपए कोचिंग सेंटरों में खर्च करते हैं ताकि उनके बच्चे मैरिट ले आएं। डाक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वकील बनें, मैनेजर बनें। पर आरक्षण मिल गया दलितों को, आदिवासियों को और पिछड़ों को। उन्हें लगता है जैसे उनके सामने रखी नोटों की गड्डियां दलित, आदिवासी और पिछड़े ले उड़े।
मीडिया वाले भी दुःखी हैं कि देखो फिर से मंडल आ गया। वीपी सिंह गया तो अर्जुनसिंह आ गया। उनका दुःख है कि उस मंडल जैसा मंडल तो आया, पर उस मंडल जैसा मंडलविरोध नहीं आया। आत्मदाह तक नहीं हो रहे। कोई विजुअल ही नहीं मिल रहा। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापीं कि जिन्हें आरक्षण मिल रहा है, वे ही आरक्षण नहीं चाहते। कि आरक्षण से दाखिला पाने वाले चल ही नहीं पाते और वे बीच में ही छोड़कर भाग जाते हैं। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापी कि आरक्षण के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। एसएमएस अभियान चल रहा है। सारे देश के आरक्षण विरोधी छात्र दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। उन्होंने गुब्बारे में खूब हवा भरने की कोशिश की। ये दुःख उन लोगों का है जिनका दावा है कि वे प्रगतिशील हैं, न्याय के पक्षधर हैं।
कारपोरेट वाले भी दुखी हैं कि देखो इससे मैरिटवाले प्रतिभावान लोग आगे नहीं आ पाएंगे। इससे विकास और प्रगति पर बुरा असर पड़ेगा। अभी हम आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे हैं। दुनिया में अपने झंडे गाड़ने जा रहे हैं। यह दुःख उन लोगों का है जिन्हें कदम-कदम पर आरक्षण चाहिए। इनसेंटिवों के नाम पर। जिन्हें सरकारी बैंकों से कर्जे लेकर डकार जाने का आरक्षण चाहिए। जिन्हें सरकारी कारखाने और कंपनियां मिट्टी के मोल हथिया लेने का आरक्षण चाहिए।
सरकारी पक्ष दुःखी है। कमलनाथ दुःखी है। कपिल सिब्बल दुःखी है। वे कहते हैं कि हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। पर यह प्रतिभा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विपक्ष दुःखी है। भाजपा तो बहुत ही दुःखी है। तब वाले मंडल का मुकाबला तो रथयात्रा से कर लिया था, पर अब वाले मंडल का मुकाबला कैसे करें। अब तो रथयात्राओं को बीच में छोड़ना ही पड़ रहा है। वे कहते हैं कि समाज बंटना नहीं चाहिए। वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। यह दर्द उनका है, जिन्हें पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का वोट बैंक अवश्य चाहिए।
अब तो ज्ञानीजन भी दुःखी हो गए। ज्ञानीसम्राट सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि ज्ञान उपयोग के आठ में से छह ज्ञानी आरक्षण के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, पर ऐसे आरक्षण के हम खिलाफ हैं। यह दुःख उन सैम पित्रोदा का है, जो भारत के नागरिक तक नहीं हैं।
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आरक्षण पीस्से का

आरक्षण पीस्से का
‘दलितों के अर पिछड़यां के आरक्षण पै तो गैहटा तार राख्या सै सबनै फ़ेर पीस्से आले आरक्षण के खिलाफ कोए बी कोनी बोलदा’ - सत्ते ने बात चलाई। सविता ने सत्ते की बात सुनी कुछ देर सोचती रही फेर बोली - सत्ते सही कहवै सै। पीस्से आले आरक्षण पै बात करने के नाम पै तो सबकै सन्नपात सा मार ज्या सै। पीस्से आले का बालक बढ़िया स्कूल मैं जावैगा। फीस चाहे कितनी बी होवै। घर में आकर पांच-सात नौकर हों सै उसके आगै पाछै घुम्मण की खातर। जितने घंटे चाहवै पढ़ ले, जिब चाहवै खेल ले, जिब चाहवै सोज्या। स्कूल की पढ़ाई तै बी पेट कोनी भरदा। कविता बोली - सविता, एकै ए सांस मैं कहवैगी के सारी बात। माड़ा-सा सांस तो ले ले। कमला बोली - सांस कूण लेवण देवै सै म्हारे बरगे गरीबां नै। पीस्से आल्यां के घर एयर कंडीशन्ड, उनकी कार एयर कंडीशन्ड, उनके स्कूल एयर कंडीशन्ड, उनके बाजार एयर कंडीशन्ड। सारी बनावटी दुनिया सै उनकी। फत्ते नै कमला बीच मैं टोक दी अर बोल्या - जिननै गरमी सरदी कदे ना देखी वे ये एयरकंडीशन्ड बापां के एयरकंडीशन्ड बेटा-बेटी आईएएस के इम्तिहान मैं पास होकै म्हारे पै राज करैं सैं। इन एयरकंडीशन्ड डाक्टरां नै के मतलब म्हारी बीमारी तै? सत्ते बोल्या - स्कूल का रोल्ला फेर ट्यूशन का रोल्ला। ट्यूशन पाछै पीएमटी टैस्ट मैं बैठण खातर दिल्ली जाकै 40 हजार की कोचिंग का रोल्ला। फेर मैनेजमैंट कोटे का रोल्ला। 30-40 लाख तै तलै डाक्टरी में ये दाखिला नहीं देवैं। दाखिले पीछे 3-4 लाख की फीस का रोल्ला साल मैं। कविता ने कहा - कोई बताये तो म्हारे बालक कित जावैं? सविता बोली - एनआरआई की सीट बिकैं सैं 35 लाख मैं। बेचकै दो किल्ले धरती अर दिवादे दाखिला।
फत्ते बोल्या - बाकी घर फेर क्यूकर चालैगा? अर जिसकै पांव टेकणनै धरती कोन्या वे कित जावैं? कविता बोली - धड़ाधड़ प्राइवेट कालेज खोलण लागरे सैं। म्हारा तो ब्यौंत नहीं उनमें अपणे बालक पढ़ावण का। सत्ते बोल्या - मैं गया था अपने दोस्त की गेल्यां अंबाला। उड़ै एक नया मेडिकल खुल्या सै। उड़ै उसकी छोरी पढ़ै सै। वा बतावै थी उड़े के हाल। न्यौं कहवै थी वा तै अक आड़ै तै पढ़ावणिया डाक्टरां का बहोतै टोट्टा सै। जब कोए टीम इंस्पैक्शन करण आवै तो डाक्टरां नै बेरां नै कित तैं घेर घोट कै पाकड़ ल्यावैं सैं। इंसपैक्सन खत्म अर पढ़ावण आले डाक्टर गायब। म्हिने के कई हजार लेवैं सैं कुछ तो फेर चार-पांच दिन तै फालतू कोनी आंते। बिना पढ़ावणिया किसी पढ़ाई? ट्रस्टी उड़े के बहोत स्याणे सैं। इम्तिहान मैं परचे का बेरा पाड़लें सैं अर फेर उसनै बी बेचैं सैं। पीस्से दे कै पास होवण आल्यां की बी लाम्बी लाइन होज्या सै। बिना पीस्सा आल्यां नै बी एक-दो सवाल बता दें सैं। फेल किसे नै नहीं होवण देन्दे। कविता बोली - ये डाक्टर बणकै फेर म्हारे बालकां का इलाज किसा करैंगे? सत्ते बोल्या - इलाज की मतना बूझै। या बात तो साफ सै अक जो इतने पीस्से खरच करकै डाक्टर बणैगा ओ मरीज का मुफ्त मैं इलाज तो करने तै रह्या। मरीज की खाल इसी खींचैगा अक मरीज सारी उम्र याद राखैगा। फेर मनै तो एक दूसरी बात का बी डर सै अक उसनै पूरी बीमारियां का बी बेरा होवैगा अक नहीं? वा छोरी तो न्यों बी कहवै थी अक मरीज बी कोए-कोए आवै सै उड़ै इलाज करवावण। इंसपैक्सन की टीम नै दिखावण खातर तो उननै छह बस ला राखी सैं गामा मां तै मरीज ल्यावण खातर अर रोज के 200-300 मरीज कागजां मैं दिखा बी देवैं सैं फेर असल मैं तो कोन्या इतने मरीज। डाक्टरी कोर्स के बालक जिब ताहिं न्यारी-न्यारी ढाल की बीमारी के मरीज नहीं देखैंगे तो इलाज क्यूकर करैंगे? सविता - ये तो क्वालिटी के डाक्टर बनैंगे। फिसड्डी डाक्टर तो दूसरे आरक्षण आले बणैंगे जो कुछ बी ना जाणते। फत्ते बोल्या - आज इस बहस मैं कोन्या पड़ते अक दलित अर पिछड़े आरक्षण पै आये डाक्टर किसे होंगे। आज तो इन पीस्से आले बढ़िया क्वालिटी के डाक्टरां पैए बात राखां तो सही सै। कमला बोली - बात तो इनपै बी होनी चाहिए। इनकी पढ़ाई का ब्यौंत ना। इननै समाज मैं बराबरी का दरजा मिल्या ना। फेर बी इनके आरक्षण कै पाछै लाठा लेकै पड़रे ये पीस्से आले। फत्ते इसपै फेर किसे दिन चर्चा कर ल्यांगे। आज तो याहे चर्चा सै अक इस पीस्से आले आरक्षण पै लोग क्यूं ना बोलते? क्यूं सांप सूंघ रह्या सै लोगां मैं? वा छोरी तो न्यों बी कहवै थी अक जिसकी तनखा 40-50 हजार महीना सै उन मां-बापां का बी कोए ब्यौंत कोनी अपने बालकां नै इसे कालेजां मैं पढ़ावण का।
कमला बोली मनै ट्रिब्यून अखबार मैं जयभगवान के लेख मैं पढ्या था अक गुड़गामा के एक डैंटल कालेज मैं तो सौ मा तै पन्दरा नम्बरां आले बालक पीस्से लेकै दाखिल कर लिये (50 नंबर ओपन मैं अर 40 रिजर्व मैं कम तै कम नंबर चाहिए थे) वे किसे मैरिट आले थे? उनकी मैरिट तो पीस्सा ए थी ना? सविता बोली - ये बात तो सारी ठीक सैं अक आजकाल पीस्से का रोल्ला सै। फेर कर्या के जा? यू पीस्से का खेल म्हारे बालकां की शीक्षा मैं अर म्हारे स्वास्थ्य मैं इसे ढाल दखलंदाजी करता रह्या तो हम तो मर लिये। सत्ते - हम-हम नहीं न्यूं मान कै चालो अक 100 मां तै 90 माणस मर लिये। सविता बोली - फेर कर्या के जा? सत्ते बोल्या - ताश खेले जावैं अर सांझ नै दारू पीए जावैं और के कर्या जा? कै दलितां के अर पिछड़यां के आरक्षण का विरोध कर्यां जावैं। और के बसका सै म्हारै? सविता फेर बोली - इस पीस्यां आले आरक्षण पै कुछ बी कोन्या के करण की खातर? म्हारे बालकां के पढ़ण के मौके खत्म होन्ते जावण लागरे सैं अर आपां ताश खेलण लागरे सां। कितनी माड़ी बात सै। सारे बालकां नै बढ़िया शिक्षा मिलै इस खातर क्यूं ना सोचदे आपां। इन प्राइवेट कालेजां पै सामाजिक कंट्रोल तो होणा ए चाहिए। इस खातर कानून की बी जरूरत हो तै कानून बी बनाना चाहिए। सरकारी कालेज उच्च शिक्षा की खातर और खोले जावैं। फत्ते - सौ का जोड़ यो सै अक जनता नै आगै आना पड़ैगा अर समझाना पड़ैगा म्हारे राज करनियां ताहिं अक थाम म्हारे कान्ही सो अक पीस्से आल्यां कान्हीं? कमला बोली - हमनै फेर किसे बात पै लड़वा देंगे अर आप दिल्ली मैं बैठकै ऐश करैंगे। कविता नै कहा - हमने फूंक फूंक कै पां टेकना पड़ैगा। मर तो ऊंबी लिये। फेर अगली पीढ़ी के भले की खातर मरांगे लड़ते-लड़ते तो बात दूसरी सै। सविता बोली - लड़ते तो आपां रहवां सां फेर ठीक बात पै लड़ां सां अक गलत पै इसका फैसला कूण करै? कविता बोली - जो बात मानवता के हक की हो अर सौ मां तै 90 लोगों के हक की हो वा बात सही होगी। अर दखे कुछ लोग न्यंू बी कहवैं थे अक या हरियाणवी माड़ी अष्टी सै पढ़ण मैं दिक्कत आवै सै। कहियो रणबीर नै इसपै बी सोचै किमै।

स्कूल कड़ै जा लिये ?

स्कूल कड़ै जा लिये ?
फत्ते बोल्या - इन स्कूलां का सत्यानाश जा लिया। सविता बोली - बहोत तावली बेरा लाग्या। कविता बोली - स्कूलां की किसै नै चिंता ए कोन्या दीखती। सरपंच के बालक प्राइवेट स्कूल मैं जावैं। हैडमास्टर जी के दोनूं बालक दिल्ली पढ़ैं। डाक्टर प्रदीप नै अपने बालक स्नावर मैं भरती करवा दिये। सविता बोली - कदे बख्त थे जिब स्कूल की पूरी की पूरी बिल्डिंग रिटायर्ड फौजी रिसाल सिंह साहब नै अर पूरे गांम नै खड़े हो कै बनवाई थी। बाजे भगत का सांग तीन दिन हुया था गाम मैं अर ढाई लाख रुपये कट्ठे होगे थे उन बख्तां मैं। फत्ते बोल्या - आज कोए ढाई आने देकै राज्जी कोन्या। सत्ते बोल्या - असल मैं सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई का भी तो भट्ठा बैठ लिया। फत्ते बोल्या - भट्ठा बिठाया किसनै? कविता बोली - भट्ठा बिठाया म्हारी शिक्षा की नीतियां नै अर रही सही कसर गाम आल्यां नै पूरी करदी। स्कूलां मैं जाकै इनकी संभाल करनी बंद करदी। गुटबाजी होगी गाम मैं। बदमाशां नै सिर जोड़ लिये अर घणी ठाड्डी यूनियन बणाली अपनी। सविता - के नाम सै इनकी यूनियन का? कविता - यूनियन का नाम कोन्यां फेर असामाजिक तत्वां की यूनियन सै ऊपर ताहिं। ये स्कूल का माहौल खराब राखैं सै अर इननै बचावण नै ऊपर आले तैयार रहतै सैं। महिला टीचरां गेल्यां बहोत बुरा बर्ताव होरया सै स्कूलां मैं। सत्ते - ईबतै महिलावां अर छोरियां गेल्यां पूरे समाज में बुरा बर्ताव होरया सै। फत्ते - बात सही सै फेर जै स्कूलां मैं ये सिरफिरे मास्टर जिनकी संख्या मुट्ठी भर सै जै लड़कियां गेल्यां यौन उत्पीड़न करैं सैं तो या तो घणी माड़ी बात सै ना। कविता - 6 तैं 19 फरवरी के एक पखवाड़े में हरियाणा के सरकारी स्कूलां में कई मास्टरां द्वारा छात्रावां का यौन शोषण लगातार करण करकै आठवीं, नौवीं की मासूम लड़कियां के गर्भवती होवण की खबरां नै मेरा तो दिल हिला कै धर दिया। मनै थारा बेरा ना। फत्ते - झकझोर कै तो हम भी धर दिये। शिक्षक-शिष्य संबंध नै म्हारे आड़ै सारे संबंधां मैं सबते पवित्र संबंध मान्या जावै सै। सविता - 6 तारीख नै ढराणा झझर, 8 तारीख नै दुर्जनपुर जींद, 9 तारीख नै रानिया, 17 तारीख नै बराड़ा अंबाला तै ये खबर ज्यूकर चारों कान्हीं तै आई तै हरियाणा का चूची बच्चा हिलग्या। फत्ते - जित माणस बणण की शिक्षा दी जावै, उड़े इतनी घिनौनी हरकत? मेरै तो जणों सन्नपात सा मारग्या।
कविता - मेरी कई बर स्कूल, कालेज अर यूनिवर्सिटी मैं पढ़ण आली लड़कियां तैं बात हुई सै। ये एक दम तै हुई चाण चक आली घटना कोन्या। हकीकत या सै अक स्कूल तै ले कै यूनिवर्सिटी ताहिं मैं प्रेक्टिकल के नम्बर कम लावण की, लैक्चर शार्ट करण की, इन्टरनल एसैसमेंट खराब करण की, खेलां में सलेक्शन ना होवण देवण की, पेपरां में पास ना होण देवण की, प्रवेश परीक्षावां मैं फेल करण की, पीएचडी पूरी ना होवण देण की आड़ लेकै छात्रावां का कई अध्यापकां अर कर्मियां द्वारा यौन शोषण एक घणी गहरी अर दूर-दूर ताहिं फैली समस्या है। जै इनै घटनावां नै देखां तो एक-एक स्कूल में इस हिंसा का शिकार होवण आली छात्रावां की बड़ी संख्या, स्कूलां मैं पाये गये कंडोम, गर्भपात की दवाइयां, चौकीदार तै लेकै डीईओ ताहिं का इसे काले कामां मैं शामिल होना, इसे कोढ़ी मास्टरां पै बख्त रहन्ते कार्रवाई करण के पंचायतों के प्रस्तावां तक की डीईओ बरगे अफसरां द्वारा अनदेखी, ऊंची जागां पै बैठे लोगों की आम अध्यापकों के बारे मैं बयानबाजी अर इन कोढ़ी मास्टरां नै बचावण की तलै ए तलै कोशिश बहोत किमै कहवै सै।
सविता बोली - म्हारी सरकार अर प्रशासन इन घटनावां नै अध्यापकां की नैतिक गिरावट, मानसिक विकार आदि कहकै अर एकाध अपराधी के खिलाफ आधी-अधूरी कार्रवाई करकै आंख्यां मैं धूल झोंकण की कोशिश करैं सैं। फत्ते बोल्या - मनै सुन्या सै लड़कियां के स्कूलां मैं पुरुष अध्यापक नहीं लाये जावैंगे। सत्ते बोल्या - घर मैं मां तो रहै सै, इस हिसाब तै बाबू काका अर पड़ोसी बी ताहने पड़ैंगे फेर तो। सविता बोली - मेरे आर्य समाजी भाई तो न्यों बी कहवैं थे अक सहशिक्षा नहीं होनी चाहिये। इसनै सत्यानाश कर दिया म्हारा फेर उनतै कोए न्यूं बूझै एक फेर बीर मरद नै गाड्डी के दो पहिये क्यों बताया करैं? कमला चुपचाप सुनै थी वा बोली - न्यों बी कैहन्ते पाज्यांगे अक आज काल ये छोरी बी कम कोन्या रैहरी। तरां-तरां की बेसिर पैर की बात बी सुणण मैं आरी सैं। न्यों कहवैं सैं अक लुगाई की जागां घर मैं सै। बाहर जाणा ए खतरे तै खाली कोन्या। सविता बोली - घर मैं कड़ै सुरक्षित सै या? घरेलू हिंसा के थोड़ी सै? बलात्कार की घटनावां मैं आधा कोढ़ घरक्यां कै रिश्तेदारां कै ए तो जिमै लागै सै। महिला ना बाहर सुरक्षित ना घर मैं सुरक्षित तो कड़ै जावैं? कविता - जावैं कड़ै फांसी खावैं अर सुरग मैं जागां पावैं।
फत्ते बोल्या - फांसी खायें कोन्या काम चालै। महिला पुरुष दोनूआं नै मिलकै लड़ना पड़ैगा। जिबै कोए राह लिकड़ैगा। सत्ते - और के इन घटनावां के खिलाफ बी तो लोगां नै राह रोके, स्कूल बंद करे, इन कोढ़ियां कै खिलाफ कार्रवाई की आवाज ठाई सै। कविता - फत्ते या बात तो सही सै अर शुभ संकेत बी सै फेर निहित स्वार्थां नै, असामाजिक तत्वां नै हालात काबू कर लिये अर ‘गाम की इज्जत’ की दुहाई दे कै न्याय की पुकार पै बर्फ की सिल्ली धर दी। सत्ते - जातिवादी पंचायत बी गाम भाईचारे अर इज्जत की दुहाई दे कै उत्पीड़ित लड़कियां के परिवार आल्यां नै अपने बयान बदलन खातर मजबूर करण लागरी सैं। रोहतक जिले का मातो भैणी गाम सै उसके स्कूल की पांचमी क्लास की दो छात्रावां नै हैडमास्टर कै खिलाफ लिखित बयान दरज करवाये। धर्म सिंह जो बाद मैं आया था बोल्या - फेर कुछ हुआ नहीं उस हैडमास्टर का? सविता - ना के होना था। एमएलए की दाब मैं दोनों पक्षों का समझौता होग्या। फत्ते - मतलब बलात्कार करो अर फेर समझौता करल्यो? सत्ते - पूरे समाज में सड़ांध मारण लागली। फेर राह कोए दीखता ना। कमला बोली - मेरै तो उन ज्ञान विज्ञान आल्यां की बात समझ मैं आई। कविता - के कहया था उननै जिब पाछै सी गाम मैं आरे थे। कमला - उसनै कहया था अक म्हारी लड़ाई कोए दूसरा लड़ण कोनी आवै। म्हारी अपनी लड़ाई हमनै खुद लड़नी पड़ैगी अर गाम-गाम मैं नये समाज सुधार आंदोलन की खातर शरीफ, ईमानदार, गरीब, अमीर, दलित, महिला, युवा सबनै सिर जोड़ कै न्यारी लीक पाड़नी पड़ैगी अर हाल साल का जो यो खरना सै यूं बदलना पड़ैगा।

लकीर हाथ की

लकीर हाथ की
पंडित देशराज नै धर्मवीर की दाईं हथेली अपने हाथ मैं पकड़ी, उसे ध्यान से सब तरफ से देख्या अर बोल्या - तुम बहोत भाग्यशाली हो। तुम्हारी विद्या रेखा बहोत साफ सै। तुम जरूर डाक्टर बनोगे। नौजवान धर्मबीर ने राज्जी होकै बूझ्या - या कौन-सी लकीर सै? देख या रही - पंडित जी नै दिखाई। धर्मबीर पंडित जी तै बोल्या - फेर या तो लकीर म्हारे लख्मी दादा कै तो कति नहीं रही होगी? मैं जाकै देखूंगा अक मेरी दादी अर दादा कै या लकीर सै अक नहीं सै। वे तो एक हरफ बी कोनी पढ़े। हाथ की लकीरों का इस तरिया मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यो भी एक विज्ञान सै।
धर्मबीर बोल्या - ना! ना! मैं मजाक नहीं उड़ाऊं था। फेर साच माच का सवाल उठ्या था मेरे मन मैं। आच्छा पंडित जी न्यों बताओ अक मैं कद मरूंगा? पंडित जी नै उम्र आली लकीर की जांच-पड़ताल करी अर बोल्या - 72 साल तै पहलम कोनी मरदा। फेर तेरी मौत कैंसर तै होवैगी। धर्मबीर बोल्या - मैं कितना किस्मत आला सूं। ईब मैं बिल्कुल चिंतामुक्त जीवन जी सकूं सूं। मनै एड्स की बीमारी लगने की भी कोए चिंता नहीं रही। मेरै कोए गोली या बम मारकै मन्ने नहीं मार सकता इस करकै मैं सेना मैं अफसर बन सकूं सूं। पंडित जी कुछ नाराज होगे। धर्मबीर ने तसल्ली देनी चाही - नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा। थारी बातां तै साच माच मैं मेरी चिंता दूर होगी। ईब मनै एक और जरूरी बात भी बूझनी सै अक के इसी कोए भी संभावना सै अक मनै पुलिस पकड़ कै ले ज्यावै, मुकदमा चलावै अर जेल की हवा खिलावै?
पंडित जी नै पूरे विश्वास तै जवाब दिया - नहीं कोए संभावना कोनी। तूं एक बड्डा अफसर बनैगा। धर्मबीर बोल्या - बहुत बढ़िया। ईब मैं निडर होकै उस बदमाश की हत्या कर सकता हूं अर फेर सेना मैं भर्ती हो ज्यांगा। पंडित जी नै बूझी - किस बदमाश की? धर्मबीर बोल्या - उस धोखेबाज नर सिंह की। मनै पक्का यकीन है अक मेरा मोबाइल उसनै ए चोरी करया सै। पंडित जी - फेर इतनी छोटी-सी चीज की खातर किसे ताहिं मार देना अपराध सै। जै पुलिस नै बेरा लाग्या तो? धर्मबीर - लेकिन आपने ही तो कह्या सै अक इसी कोए संभावना नहीं अक पुलिस मनै पकड़ सकै। असल मैं अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती। पंडित जी - अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती? क्या बकते हो? धर्मबीर - हमारे पैदा होने से पहले ही हमारा भाग्य तय हो चुका है। तो अगर मैं उसको मार भी डालता हूं तो यो पहले से तय है। किसे बड्डी ताकत नै तय करया। सारे उस बड़ी शक्ति के आदेशां पै काम करण लागरे सैं।
पंडित जी बोले - मनै बेरा पटग्या अक तूं नास्तिक सै। धर्मबीर - नाराज मत हो। मैं तो मजाक करूं था। किसे नै भी मेरा मोबाइल नहीं चुराया। क्या आपको मालूम है कि हमारी हथेली मैं इतनी लकीरें क्यों होती हैं? पंडित जी - भविष्य बताने के लिए और किस लिए? धर्मबीर - अपना हाथ ढीला करो। अपनी हथेली की चमड़ी को चुटकी मैं पकड़ कै खींचो। या काफी लचीली अर ढीली सै। ईब रेखाओं नै खींच कै देखो। ये नहीं खींचरी क्योंकि रेखाओं पर चमड़ी नीचे की मांसपेशियों से मजबूती से जुड़ी हैं। क्यों? क्योंकि यदि आप हथेली से कुछ भी पकड़ना चाहते हैं तो आपको इसे मोड़ना होगा। मोड़ने से मांसपेशियां फूल जाती हैं और चमड़ी ढीली पड़ जाती है। मगर चमड़ी हर जगह ढीली होगी तो पापड़ की तरह फूल जायेगी अर आप कुछ भी नहीं पकड़ सकोगे। इनसान के विकास के समय ये गोड़ रेखायें बनी थीं। पंडित जी - तो हाथ पढ़ना मूर्खता है? धर्मबीर - मूर्खता नहीं तो क्या है? जरा सोचो मेरे भाई अर मनै बी बताइयो अक जितने हजारों लोग सुनामी मैं मरे उन सबकी एक जिसी आयु रेखा रही होगी के?

म्हारा नौजवान - मतलब युवक अर युवती

म्हारा नौजवान - मतलब युवक अर युवती
आमतौर पै जोश दिवावण आले भाषणां में युवा वर्ग ताहिं बड़े जोर-शोर तै कहया जावै सै अक यू समाज थामनै ए तो बदलना सै। आओ अर सामाजिक बदलाव के संघर्ष में कूद पड़ो। देखियो मेरे बीरा घणी तावल मतना करियो। बदलण तो दुनिया लागे रही है। समाज मैं बहोत तेज़ बदलाव आवण लागरे सैं। जिसनै देखै ओहे गुड़गामा कान्ही मुंह करकै भाज्या जावण लागरया सै। बेरा ना गुड़गामा मैं इसा के बदलाव होग्या। अपने जीवन साथी भी लोग आज कोट की ढाल बदलण लाग लिये। परंपरा के नाम पै सती प्रथा हटकै समाज पै छान्ती जावण लागरी सै। तो देखियो वादे बिना सोचे-समझे डांक मार ज्याओ अर फेर बेरा लागे अक ये तो समाज बदलाव की उल्टी गाड्डी में बैठ लिये। इस समाज बदलाव पै भी बहोत बात करण की ज़रूरत सै। इसपै अध्ययन, गंभीर बातचीत अर चिंतन मनन करण की ज़रूरत सै। खूब सोच-विचार करकै अपना रास्ता चुनियो कदे फेर बाद मैं जल्दबाजी मैं करे गये फैसले पै माथा पकड़ कै रोना पड़ै। देश की आजादी के दौर में बात दूसरी थी। उस वख्त सबका एक निशाना था अक अंग्रेज ताहवणा सै। तो सारे न्यारे-न्यारे विचारां के लोग एका बणाकै जुटगे ताहवण मैं।
आज हालात दूसरे सैं। असली बैरी पिछाण मैं ए कोन्या आंता। आज का असली अर सबतै बड्डा अर सबतै ठाड्डा बैरी सै साम्राज्यवाद का सरगना अमैरिका। फेर युवा वर्ग नै समस्याओं की गंभीरता के हिसाब तै अपणा स्वार्थी अर खुदगर्जी आला नज़रिया छोड कै समाज की व्यापक समस्याओं गेल्यां जुड़ना पड़ैगा। साथ मैं या बात जानना भी उतना ए ज़रूरी सै अक अपना जाथर कितना सै, अपनी क्षमता का के ब्यौंत सै, अपने रुझान किस ढाल के सैं अपनी के सीमा सै। इस सबका हिसाब ला लू कै बहोत समझ-बूझतै फैसला करना पड़ैगा अक आपां नै किस राह पै जाना सै। सार्थक सामाजिक बदलाव के काम मैं हमनै किस स्तर पै जुड़ना सै, किस क्षेत्र का चुनाव करना सै, अर किस संगठन मैं काम करना सै, किसका साथ देना सै, किसका साथ नहीं देना सै। इस बाबत खूब सोच विचार के फैसला लेना चाहिए। अध्ययन, चिंतन, बातचीत, सोच-समझ के फैसला लेवण के काम पै इतना जोर क्यूं दिया जावण लागरया सै? इसका कारण यो सै अक जो लोग बिना सोचे-समझे क्षणिक आवेश मैं बह सामाजिक बदलाव के क्षेत्र मैं आज्यां सैं वे आमतौर पै जल्दबाजी मैं गलत फैंसला करलें सैं अर कै कुछ गलत किस्म के लोगां की गेल्यां होलें सैं अर फेर बाद मैं अपने आसपास की विसंगतियों नै देखैं सैं तो पूरी ढालां समाज नै बेहतर बनावण के प्रयासां तै दूर हट ज्यावैं सैं। म्हारे हरियाणा में कोए गाम इसा नहीं पावैगा, जिसमैं यूथ क्लब नहीं बने। फेर दो-तीन साल तो सक्रिय रहे अर गाल साफ करी, वालीवाल का ग्राउंड बना लिया, इसे-इसे काम करे पर फेर बंद होगे अपने आप। दो बात कही जा सकैं सैं - एक तो इन कलबां मैं युवा लड़की शामिल नहीं करी किते बी अर दूसरा इसका अपना साफ परिप्रेक्ष्य नहीं था। आदर्शवाद घणी दूर कोनी चाल्या।
इन नौजवानां मैं निराशा बहोत गहरी पैदा होगी थी। कदे-कदे अर कितै-कितै तो खुद बी भटकाव के कसूते शिकार होगे। अफसोस की बात अक हरियाणा इसे आदर्शवादी युवावां की समाज सेवा तैं बहोत तावला वंचित होग्या। कितना आच्छा होन्ता जै ये नौजवान अर ये कलब उम्रभर समाज नै बेहतर बणावन के काम में लागै रैहन्ते। आज हरियाणा का समाज जटिल समस्यावां तै घिरया खड्या सै। बेरोज़गारी, छांट कै महिला भ्रूणहत्या, सामाजिक असुरक्षा, शिक्षा अर स्वास्थ्य क्षेत्र की समस्याएं मुंह बाये खड़ी सैं। इन समस्यावां का सामना करण की खातर हरियाणा नै इसे क्षणिक आवेश में आकरकै उछलकूद मचावण आले युवक-युवतियां की ज़रूरत नहीं सै बल्कि हरियाणा नै वे धीर गंभीर युवक-युवती चाहिए जो जीवनभर भरपूर मेहनत करकै सार्थक सामाजिक बदलाव के काम मैं लागे रहवैं। इसकी खातर हम कितना त्याग कर सकां सां, कितना बलिदान कर सकां सां यो किसे माणस की अपनी स्थिति, अपनी सीमावां तै तय होवैगा। हम एक साधारण गृहस्थ का जीवन जीन्ते होये भी अपने आसपास के समाज नै बेहतर बनावण के प्रयास मैं निरंतर लागे रह सकां सां। ज़रूरत सै अपनी समझ बनावण की, निरंतरता अर लगन तै काम करण की अर इस हिंसा अर नशे के पैकेज की मार तै बचण की।
युवक-युवतियां की सबते आच्छी बात या हो सै अक इन दिनां म्हारे शरीर की साथ-साथ म्हारे आदर्श भी जीवित हो सैं। जो आदर्श ऊंचा मान लिया, जो काम पवित्र मान लिया, उसकी खातर कुछ बी करने की खातर त्यार हो ज्यांगे। कसूती तड़प हो सै इस उम्र मैं। योहे कारण सै अक युवा वर्ग मैं अनुभव की कमी होते होए भी बार-बार सामाजिक बदलाव मैं उसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गई सै। म्हारे अपने देश भारत मैं भी युवा वर्ग की गौरवशाली भूमिका रही सै। देश की आजादी की लड़ाई मैं तो खैर युवा वर्ग की सराहनीय भूमिका रही थी, आज़ादी के बाद भी शोषण और अन्याय के खिलाफ अनेक सार्थक जनआंदोलनां मैं युवक-युवतियां की महत्वपूर्ण भूमिका रही सै। फेर आज निशाना साफ ना होवण करकै कई बै अपन्यां पै हमला होज्या सै। दूसरी ज़रूरी बात या सै अक टेलीविजन, सिनेमा, विज्ञापनां आदि के माध्यम तै युवा वर्ग पै एक इसा सुनियोजित सांस्कृतिक हमला हो रया सै जो उननै एक अजीब किस्म की बाहर तै आकर्षक लागण आली दुनिया के मोह जाल मैं जकड़ लेना चाहवै सै। युवा वर्ग के आदर्शों को जिस दिशा की तलाश सै उसका दारोमदार इस आधार पर सै अक म्हारे समाज मैं मौजूद दुख-दर्द के मुख्य कारण कुणसे-कुणसे सैं? इन मांतै कुछ कारण तो साफतौर पै अपने आसपास देखे जा सकैं सैं पर कुछ साहमी साफ-साफ कोन्या दीखते पर वे महत्वपूर्ण बहोत सैं। म्हारे समाज मैं दुख दरद का एक मुख्य कारण संपत्ति अर संपत्ति का असमान बंटवारा साफतौर पर दिखै सै। अतः इसे आंदोलन या काम जो गरीब अर कमजोर तबक्यां के आर्थिक अर सामाजिक अधिकारां के लिए संघर्षरत सैं वे सही दिशा के प्रयास सैं। फेर ताश खेलण तै कड़ै फुर्सत सै इतनी गहरी बात परखण की।
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इस खाज का के करां ?

सते फते नफे सविता कविता सरिता अर ताई भरपाई फेर कट्ठे होगे शनिचर नै। सते बोल्या - भाई दनोंदा के हैल्थ कैम्प मैं कूण-कूण गया था। नफे बोल्या - गया तो मैं भी था फेर वारी पहोंच्या इतनै प्रोग्राम मुख्य अतिथि का हो लिया था। सविता बोली मैं गई थी अर मनै मुख्य अतिथि की बात बी सुनी थी। ओ तो न्यों कहवै था अक म्हारे देश मैं 80 प्रतिशत इसी बीमारी सैं जिनकी रोकथाम करकै उनतै बच्या जा सकै सै। रोकथाम की खातर पांच सूत्र बताये थे उसनै। एक-पीण का साफ पाणी हो। दूसरा-खावण नै पौष्टिक भोजन हो। तीसरा-रहवण नै हवादार मकान हो। चौथा-शौचालय की ठीक सुविधा हो। पांचवां-स्वास्थ्य सुविधावां का विस्तार हो जिसकी खातर प्राथमिक सेवा का स्तर मजबूत हो। कविता बोली - गई तो मैं बी थी फेर उसकी वा बात समझ कोन्या आई अक इन पांच मां तै च्यार बात डाक्टरां के अर स्वास्थ्य विभाग के हाथ मैं कोन्या। बस पांचमी बात की जिम्मेदारी सै डाक्टरां की। इस पांचमी बात मैं उसनै न्यों बी बताया अक म्हारे हरियाणा की कुल आबादी 2 करोड़ 10 लाख के लगभग सै। इस मां तै एक करोड़ 49 लाख आबादी गामां मैं रहन्ती बताई उसनै। न्यों बूझया अक कितनी जनसंख्या पै एक सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) होना चाहिए? सारे एक दूसरे के मुंह कान्हीं देखण लागगे। बेरा ए कोन्या था किसे नै बी। फेर उसनै बताई अक एक लाख की आबादी पै एक सीएचसी होना चाहिए। तो म्हारे हरियाणा मैं 149 सीएचसी होनी चाहिए। फेर उसने बूझया आज हरियाणा मैं कितनी सीएचसी सैं? इसका बी किसे नै बेरा कोनी था। उसने बताई अक 66 के लगभग सीएचसी सै म्हारे हरियाणा मैं आज। फेर उसने सवाल करया अक इसमैं कौनसे कौनसे विशेषज्ञ डाक्टर होने चाहिए? फेर सांप सा सूंघग्या लोगां कै। उसनै बताया अक एक बालकां का डाक्टर, एक मैडीसन का डाक्टर, एक सर्जन अर एक लेडी डाक्टर विशेषज्ञ एक सीएचसी मैं जरूरी सैं। नफे बोल्या - हां दो-तीन दिन पहलम मनैं अखबार मैं पढ़ी थी अक सोहना की सीएचसी आदर्श सीएचसी घोषित करी सै म्हारे मुख्यमंत्री जी नै। कविता बोली - इन 66 मां तै बी 10-11 मैं ये च्यारों ढाल के डाक्टर मुश्किल तै बताये थे। वो तो न्यों बोल्या सिफारिसी चिट्ठियां तै म्हारा इलाज कोन्या बणै। हमने इन पीएचसी अर सीएचसी अस्पताल पै ध्यान देना पड़ैगा अर इनकी देखभाल करनी पड़ैगी जिब जाकै काम चालैगा। सविता बोली - उसनै न्यों बी बताई अक इन पांच बातां मां तै जिननै च्यार बात पूरी करनी थी उनकै तो इक्कीश हजार की माला घालैं लोग अर डाक्टरां नै इस विभाग मैं अपनी सेहत ठीक ना होवण के जिम्मेदार मानैं या बात पूरी सही कोन्या।
हां, एक बात और कही उसनै अक ये नये नये अस्पताल अपोलो, फोरटिस बरगै खुल्लण लागरे सै ये मरीजां नै कति निचौड़ कै बगादें सैं अर उस पीस्से तै डाक्टरां नै बी भारी तनखा देवैं सैं जिस करकै डाक्टर सरकारी अस्पताल छोड़-छोड़ कै इन प्राइवेट अस्पतालां मैं जावण लागरे सैं। उसने बताई अक हरियाणा के मैडीकल के प्रोफैसर नै तो मिलै 40 हजार के लगभग और दिल्ली के सरकारी अस्पताल मैं मिलैं 68 हजार अर प्राइवेट अपोलो बरगे मैं मिलैं एक लाख तै बी ऊपर तो सरकारी अस्पतालां मैं डाक्टर टोहे बी नहीं पावैंगे आवण आले बख्ता मैं। उसनै कह्या अक इस बात पै भी हमनै गौर देना पड़ैगा अक म्हारे सरकारी अस्पतालां के डाक्टरां की अर कर्मचारियां की हालत ठीक ठ्याक हो, उनकी सेहत बी ठीक ठ्याक हो जिसतै वे म्हारी सेहत का ठीक ठ्याक ख्याल राख सकैं। उसनै बताई अक इस कैम्प मैं आये डाक्टरां नै बताया सै अक ज्यादातर गामां मैं खाज की बीमारी, दमे की बीमारी, पेट मैं गैस की बीमारी अर बुखार अर बुखार पाछै जोड़ां मैं दर्द की बीमारी पाई जावैं सैं। इन बीमारियां का पक्का इलाज कोन्या अर घणखरे मरीज स्टीरायड की दवाई खावैं सैं जो ठीक नहीं लाम्बे दौर खातर। इन बीमारियां के कारण ढूंढण की बात कही थी उसनै।
उसनै दो बात बताई थीं अक एक तो कांग्रेसी घास के कारण खाज और दमे की बीमारी हो सकै सै अर दूसरा पेट की गैस की बीमारी पाणी मैं कीटनाशक दवाइयां की मात्रा फालतू होण करकै हो सकै सै। बुखार वायरल सै यो शरीर की बीमारियों से लड़ण की ताकत मैं कमी करकै होवे सै या ताकत पौष्टिक आहार तै बची रह सकै सै। नफे बोल्या - ये बात तो उसकी साच्ची सैं तीन साल हो लिए इस खाज नै मेरे नाक में दम कर राख्या सै। दवाई ल्यूं इतनै दबी रहवै सै पर दवाई छोड़ते की साथ फेर होज्या सै। अर अपने गाम मै तो बिरला ए घर बच रया होगा इस खाज की बीमारी तैं। सविता - ओ तो न्यों कहवै था अक या कांग्रेसी घास जड़तै खोनी पड़ैगी जै इस खाज तै छुटकारा पाणा सै तो। नफे बोल्या - एकले मेरे बस की बात कित सै यो तो पूरा गाम सोचैगा तो बात बण सकै सै किमै। कविता बोली - एकले गाम तै बी बात कोन्या बनती दीखती। पूरे गुहांड के गामां नै सोचना पड़ैगा। सते ईब ताहिं चुप था ओ बोल्या - एक जन पंचायत पूरे गुहांड की बुलावण की जरूरत सै जिसमै 36 जात शामिल हों अर कम तै कम आधी महिला हों अर उसमै विचार कराया जा इस खाज (एलर्जी) की बीमारी तै मुक्ति क्यूकर पाई जा।

‘खरीदी बहू’ हरियाणा की


सते, नफे, फत्ते, कविता, सविता, सरिता अर भरपाई शनिवार नै कट्ठे हौके बतलाये। सते बोल्या - चहणियां मैं जावण नै होरे सैं फेर ब्याह बिना ईब्बी ना सरता। नफे बोल्या - के बात सते आज बहुत गुस्से मैं दीखै सै। सते बोल्या - ओ नहीं सै म्हारी गाल मैं नसीब सिंह ओ पिचहतर साल का होर्या सै। ल्याया सै बंगाली बहू। सरिता बोली - वो तो सात हजार मैं खरीद कै ल्याया सै अर दो हजार वो नहीं सै गुगण सिंह कै रमेश उसनै यो ब्याह करवावण के सर्विस चार्ज लिये सैं। नफे बोल्या - उसकी उमर कितनी सै। कविता बोली - वा तो पन्दरा साल की बतावै थी। फेर उसकै म्हारी बोली तो कोन्या समझ मैं आन्ती। नफे बोल्या - यो किसा ब्याह। नसीब सिंह 75 साल का अर वा बहू 15 साल की। योतो कसूता बेमेल ब्याह सै जै इसनै ब्याह बी मानैं तो। नसीब सिंह नै इसा क्यूं कर्या। सते बोल्या - कहवै तो न्यूं था अक वंश चलावण की खातर एक छोरा तो होणा ए चाहिये।
नफे सिंह बोल्या - तो इसकी खातर खरीद कै लियाओ बहू। सविता बोली - इसे छोरे आली मानसिकता के कारण तो हरियाणा मैं लड़कियां की संख्या चिंताजनक रूप तै घटती जावण लागरी सै। फते बोल्या - सविता जिब इसमैं कौनसी चिंता की बात सै। ये थोड़ी होंगी तो इनकी तो समाज मैं कीमत बधैगी। लोग आंख्यां पै बिठाकै राखैंगे लुगाइयां नै। सविता बोली - याहे तो गलतफहमी सै फते। छोरियां की समाज मैं संख्या कम होवण करकै कीमत कोन्या बधै, इनपै हिंसा बधैगी। ये प्याज, टमाटर थोड़ा ए सैं जो 60 रुपये किलो होज्यांगे। कविता बोली - या बात तो मनै सविता की सही लागै सै। पाछै सी अखबार मैं पढ़या था, अक हैदराबाद के व्यापारी हरियाणा की मुर्रा भैंस एक लाख रुपये की खरीद कै लेगे। अर, हम पांच-पांच हजार मैं बहू उड़ीसा, बंगाल, आसाम और बिहार तै खरीद कै ल्यावां। यासै म्हारी कीमत तो। नफे बोल्या - कोए गाम नहीं बचर्या जित 150 अर 200 ताहिं की संख्या मैं लड़के ना हों जो ओवर ऐज ना हो लिए हों। तड़कै ए एड्डी ठाकै बाट देखनी शुरू करदें सैं सगाई आल्यां की। सविता बोली - नौकरी ना, गरीबी बधगी, उपर तै बिन ब्याहे, साथ में टीवी का नशा, सैक्स अर हिंसा का सोच्या समझया पैकेज। इसे करकै ये तरां-तरां के विकृत रास्ते अपनावैं सैं। इस करकै समाज मैं रेप, छेड़खानी, बदमाशी की घटना दिन पै दिन बधती जावण लागरी सैं।
सते बोल्या - एक खास बात और सै अक म्हारे गुहांड मैं जाटां की फालतू संख्या सै अपने गाम फालतू सैं। इनमैं खाते-पीते परिवारां आले बालकां की तो इब्बै ब्याह शादी क्यूकरै हो ज्यावैं सै। सविता बोली - हां गुजरां, यादवां अर रोडां मैं बी इसा ए हाल बताया। बाहर तैं महिलावां नै खरीद कै ल्यावैं सैं। पाछै सी 10-12 गामां का सर्वे करकै देख्या था इन ज्ञान विज्ञान आल्यां नै। इनमै 50 महिला थी जो दूसरे प्रदेशां तै खरीद कै ल्या राखी थीं इसमें रोहतक, भिवानी, जींद अर झझर के जिल्यां के गाम थे। बलियाना अर बहुअकबरपुर नै तो सारे गामां के रिकार्ड तोड़ राखे थे। सते बोल्या - फेर इननै ‘असली बहू’ का दरजा बी तो कोन्या देन्ते। उनकै म्हारी बोली समझ मैं आवै ना, म्हारे उनकी बोली समझण मैं दिक्कत आवै। आज के युग मैं किसे माणस तै उसकी भाषा-बोली खोस्सण तै माड़ा काम कोए दूसरा कोना हो सकदा। सविता बोली - उस सर्वेक्षण मैं तो और बी कई भयानक सच्चाई साहमी आई। ये महिला ‘दोयम दर्जे की पत्नी’ कै ‘ल्याई औड़ बहू’ कै ‘खरीदी औड़ बहू’ के हिसाब तै जानी जावैं सैं। कई जागां तो इननै प्रदेशां के नाम तै बुलावैंगे ज्यूकर ‘पारवी बहू’, ‘बिहारी बहू’, ‘बंगाली बहू’ आदि आदि। इसतै न्यारा इनका रहन सहन, तौर तरीके, खानपान सबै किमै तो बदल ज्यावैं सैं। कविता बोली - कमाल की बात सै अक पूरे समर्पण और मूल पहचान खोए पाछै बी ये महिला ‘अन्य’, ‘बाहरी’ अर कै ’खरीदी औड़’ बहू के रूप मैंए मानी जावैं सैं। सरिता बोली - इननै भयंकर एकान्त अर सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ै सै। पशुआं तै बी बदतर जिन्दगी जीवैं सैं ये। कई घरां मैं शुरू शुरू मैं बेल मारकै राखैंगे अक कदे या भाज ना जावै। सविता बोली - ‘गरीब की बहू सबकी जोरू’ आली बात इस तथाकथित सभ्य समाज मैं आज ‘बाहरी बहू घर मैं सबकी जोरू’ के रूप मैं बदलगी।
कई बर तो दो-दो तीन-तीन बर बेच दी जावैं सैं। सते बोल्या - या किसी विचित्र बात सै अक म्हारे गुहांड मैं अन्तर्जातीय ब्याह करण पै तो लड़के लड़कियां की हत्या करदी जावै अर इस ढाल की अंतर्जातीय खरीद फ़रोख्त की पूरी इजाजत सै। अर ये म्हारे नौजवान बी मुंह नहीं खोलते इसी बातां पै। नफे सिंह बोल्या - हरियाणा मैं महिलावां की खरीद फ़रोख्त का धन्धा पूरे जोरां पै चालया सै अर इसमैं बिचौलियां की चांदी होरी सै। वे मनमाने ढंग तै इस माहौल का फायदा ठारे सैं। सविता बोली - खरीद फ़रोख्त के इस घिनौने व्यापार मैं बाजार मतलब ‘मंडी’ अर पितृसता के सबतै पिछडे़ रूप रंग दोनूं एक होगे दीखैं सैं। जो ‘बाजार’ मैं पीस्सा खरच करैगा उसनै बदले मैं खरीद्या औड़ एक गुलाम मिलैगा जिसनै उन पीस्यां के एवज मैं सारी उमर गुलामी करनी सै। जै वा खरीदी औड़ी महिला अपनी गुलामी का विरोध करै तो वो दोबारा खरीदी अर बेची जा सकै सै। कविता बोली - एक और बात समझ मैं नहीं आन्ती अक हरियाणा मैं एक तरफ तो दहेज का व्यापार धड़ल्ले तै चाल रह्या अर बधता जावण लागर्या सै अर दूजे कान्ही महिलावां नै खरीद कै ल्यावण का रिवाज बधता जावण लागर्या सै। यो के रास्सा सै? हरियाणा के बुद्धिजीवी करैंगे कदे इस ढाल की बातां पै बिचार।

छोरी की मूर्छा का चक्कर


सते-फत्ते-नफे-कविता-सविता-सरिता, ताई भरपाई फेर कट्ठे होए शनिचर नै तो ईबकै कविता बोली - हम तीन जणे जयप्रकाश के धोरै गये थे। मेरे मामा की छोरी मैं ओपरे का रोग था। हमनै बताया अक म्हारी छोरी को लगातार चक्कर आते हैं। छह म्हिने तै बहोत परेशान है लड़की। पहले पूरी मोटी होती थी फेर ईब बहोत कमजोर होगी। 10वीं मैं पढ़ै सै। स्कूल जायें बी 15 दिन होगे। स्कूल मैं बी कई बर चक्कर आ जाया करते। कई मास्टर तो डरण लागगे अक कदे स्कूल मैं छोरी मर ना जावै। हमनै कई जगह अर कई स्याणां तै इलाज करवाया फेर कोए आराम नहीं हुया। पीस्से बी बहोत खर्च होगे फेर छोरी तो कमजोर होत्ती जावै सै। जयप्रकाश म्हारी गेल्यां आया। म्हारे मामा के गाम मैं उस छोरी के नानके सैं। नाना-नानी सैं जिनकी उम्र 70 के नेड़े-धोरै सै। जयप्रकाश नै छोरी के नाना तै बात करी तो उसने बताया - मेरै दो लड़कियां सैं लड़का कोए नहीं सै। मैं मेरी लड़की की लड़की को यहां अपने पास रखता हूं। पहले तो घर ठीक चल रहया था।
एक दिन जब लड़की सुबह उठी तो उसके बाल कटे मिले और चुन्नी का एक कोना कट्या मिल्या। ईसी घटना कई बर होली अर जिबे तै इस छोरी ने चक्कर आवैं सैं। मेरे हकीकियों ने कुछ करवा दिया लगता है। मेरै छोरा सै नहीं तो उनकी धन-धरती पै निगाह सै। मनै एक दिन कैह भी दिया अक या जमीन-जायदाद मेरी छोरियां की सै। थामनै फूट्टी कोड्डी बी कोन्या मिलै। तबसे वे मेरे बसे-बसाये घर मैं आग लावणा चाहवैं सैं। कई श्याणे आये उननै भी इन्है कान्नी इशारा करया सै। फेर इलाज नहीं हुआ। थाम उनका इलाज करद्यो म्हारी छोरी तो आपैए ठीक होज्यागी। मैं कुछ माणसां नै अर अपणे भाईचारे नै कट्ठा कर ल्यूं सूं। उन सबके बीच मैं थाम उनका नाम ले दियो, फेर हम देख ल्यांगे। जयप्रकाश ने कहया - मैं किसे का नाम नहीं ल्यंूगा। मनै आपका सारा घर देख लिया सै, उननै कुछ नहीं करवा राख्या। मैं एक बार लड़की से अकेले में बात करना चाहता हूं, उसी के बाद सही बात बता सकता हूं। नाना बोल्या - छोरी को तो मैं बुला ल्यूंगा, फेर म्हारा घर एकबै फेर देखल्यो। यू सारा काम मेरे भतीजों व बहुओं नै करवा राख्या सै। सारे स्याणे बी याहे बात कहवैं सैं।
जयप्रकाश बोल्या - इननै बी बाद मैं देख ल्यांगे, पहलम छोरी नै बुलवाओ। थोड़ी सी वार मैं लड़की आगी जो काफी कमजोर लग रही थी। जयप्रकाश नै उसको एकांत मैं बिठाया, उसका नाम बूझया, उसकी शिक्षा के बारे मैं बूझया। नाना-नानी का व्यवहार जाण्या। उसनै कहया सब ठीक-ठ्याक सै। सब मेरे तै प्यार करैं सैं। मास्टर जी बी ठीक सैं। फेर आड़ै मेरे मामा के लड़के ठीक कोनी। जयप्रकाश ने काफी देर बात करी अर कहया - तुम किसे बात तै डरती हो। वा बोली - नहीं। फेर बूझया - क्या कोए लड़का या लड़की आपका दोस्त सै? वा बोली - नहीं। मैं स्कूल तै आये पाछै किसे तै बात नहीं कर सकती। मेरे नाना व नानी किसी से बात नहीं करने देते। मेरा कोई दोस्त नहीं है। जयप्रकाश ने बाद मैं बूझया - क्या आपकी माहवारी शुरू हो चुकी है तो उसनै कहया अक मनै तो बेरा नहीं पर एक बीमारी सै जो छह म्हिने से है और पंद्रह दिन रहती है फिर ठीक हो जाती है। मेरे पेट में दर्द रहता है। जयप्रकाश नै बूझया - पेट दर्द के अलावा और क्या होता है? वा बोली - शर्म आवै से बतान्ती हाणी। वो बोल्या - बेटे, बीमारी बतावण मैं कैसी शर्म, बेहिचक बताओ। बीमारी नहीं बतावेगी तो इलाज क्यूकर होवैगा? छोरी रोवण लागगी अर रोवते-रोवते बोली - 15 दिन तक खून बहता रहता है और पेट मैं बहोत ज्यादा दरद होता है।
जयप्रकाश बोल्या - नाना-नानी ताहिं बताया कदे इस बारे मैं? वा बोली - नानी ताहिं बताया था। वा बोली अक अपने आप पेट दरद ठीक होज्यागा। कई बर कहया, फेर मनै कहना बंद कर दिया। जयप्रकाश नै लड़की को बाहर भेज दिया और नानी भीतर बुलाई। आत्ते ही बोली - गुरु जी किमै आया समझ मैं। जयप्रकाश बोला- गुरु जी तो कोन्या, फेर समझ मैं बहोत कीमै आग्या सै। एक बर तो थाम छोरी नै किसे बढ़िया डाक्टर तै दिखाओ। ठीक होज्यागी। बाकी मैं ठीक कर द्यूंगा। फेर वा बोली - म्हारी छोरी कैं डाक्टरां आली बीमारी कोन्या। घणीए वार समझाई, बीमारी के बारे बताया। जिब जाकै डाक्टर कै दिखावण नै राज्जी हुई। नाना को बुलाया अर उस ताहिं बी सारी बात समझाई। छोरी का डाक्टर नै इलाज करया, वा ठीक होगी। नाना-नानी जयप्रकाश को बताने आये अक छोरी ठीक होगी। चक्कर बंद होगे, आगला जाबता और कर द्यो। जयप्रकाश बोल्या - वो तो मनै कर दिया। ये किताब सै ये पढ़या करै वा। सब ठीक होज्यागा। सरिता बोली - सारी बातां का तनै क्यूकर बेरा लाग्या? कविता बोली - मैं जयप्रकाश धोरै टेलीफोन पै बूझती रहया करती इस सारे केस के बारे मैं। सरिता बोली - बहोत पहोंच्या औड़ स्याणा लाग्या। कविता बोली - कदे मिलवाऊंगी उसतै। सरिता बोली - म्हारै बी सै एक केस वो दिखावांगे उसपै।
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