रविवार, 28 मई 2017

हाजिर जवाबी हरियाणा की !

हाजिर जवाबी हरियाणा की !
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता, सरतो, भरतो अर भरपाई शनिवार की सांझ नै फेर कट्ठे होगे। संतोष नोडल प्रेरक भी आरी थी आज। सरोज प्रेरक माड़ी सी टैंस होरी थी। खैर सारे कट्ठे होगे तै चर्चा हुई अक आज चर्चा किस बात पै होवै? सत्ते बोल्या - इस डीजे पै काटकड़ उतररया सै इसपै चर्चा करल्यो। फत्ते बोल्या - ये आर्य समाजी सहशिक्षा का विरोध क्यों कररे सैं इसपै चर्चा होज्या। सविता बोली - भोपाल मैं उमर अर प्रियंका की शादी पै लोग सड़कां पै क्यूं आगे, इसपै चर्चा करल्यो। ताई भरपाई बोली - आज तो चर्चा होणी चाहिए म्हारे आपणे गाम अर आसपास के चुटकल्यां पै। सारे बोले - ताई भरपाई शुरू करैगी। ताई भरपाई नै सुणाणा शुरू करया - बोली मेरे चुटकुले का नाम सै ‘देखण आला आरया सै’ - एक बै एक भूभलनी और उसका घर आला दोनूं आपणा सामान बेचण खातिर एक गांव तै दूसरे गांव मैं जावैं थे। लुहारी आगे कै चढ़गी। लुहार पिछली खिड़की म्हां कै चढ़ग्या। कंटक्टर नै दो टिकट काट कै लुहार ताहिं पकड़ा दी। फेर आगे नै जाकै लुहारी ताहिं टिकट की कहण लाग्या। लुहारी नै बता दिया कि टिकट तो पाछै लुहार ने ले ली। फेर परिचालक मजाक करण का मारया कोण्या मान्या अर बोल्या टिकट तो तेरी काटूंगा। तै लुहारी हार कै बोली - ओ लुहार एक बै आगे नै लखाइये। लुहार बोल्या क्यांह तै, के बात सै? लुहारी बोली - तन्नै देखण आला आ रया सै। (देखण आले का मतलब सगाई आला होवे सै)। कंडक्टर बेचारा चुप होग्या अर बस की सवारी जोर-जोर तै हसण लाग्गी। सरिता बोली - हाजिर जवाबी का तोड़ कर दिया उस महिला नै। कविता बोली - ताई भरपाई नै बात भूभलियां तै शुरू कर दी तो एक बात याद आगी - भूभलियां की गेल्यां आमतौर पर गाम आले मजाक करते रहे हैं। बस मैं एक लुहारी बैठी थी अर उसके साथ कई बालक भी थे।
कंडक्टर आया और टिकट की कहने लगा। लुहारी बोली - एक टिकट दे दे। कंडक्टर बोल्या बस एक टिकट? अर या आधी जनैत गैल लेरी सै, इसकी टिकट कौन लेगा? जनेत मैं जाकै सारयां का जनैती रुपइया मांगोगे। लुहारी नै शांत भाव तै उत्तर दिया - भाई टिकट तो एक ही दे दे पर जै यो थारै जनेती आज्यां तै जनेती रुपइया मत दिये। सविता बोली बहोत बढ़िया, फेर ईब बात भूभलियां पर तै बदलो। उसनै सुणाणा शुरू कर दिया - हरियाणा मैं भात न्योतन की प्रथा सै। एक बै एक ताई भात न्योतन दिल्ली के बवाना गाम मैं जा थी। औचंदी बार्डर पै पुलिस नै भैली (पांच किलो गुड़) पकड़ ली अर थानेदार बोल्या - ताई यो गुड़ दिल्ली मैं नहीं जा सकदा। ताई बोली - भाई मेरी भाभी गर्म सुभा की है। जै गुड़ नहीं ले कै गई तो बेरा ना के के सुणावेगी। मन्नै यो गुड़ ले ज्याण दे। थानेदार की हथेली भी खजावै थी अक ताई किमै सेवा पाणी करदे तो जा लेण देंगे। ताई बहोत गिड़गिड़ाई फेर थानेदार नहीं मान्या। सोच-सोच कै ताई बोली - भाई बिना भेली तो मैं नहीं जां अर भेली तूं नहीं ले जाण दे तौ फेर न्यूं कर चार मार्च का फाग आले दिन का ब्याह सै या भेली तैहि राख अर उस दिन आ जाइये। कविता बोली - थानेदार का तो सही राह बांध दिया। एक बात मेरे बी याद आगी - एक आदमी गंजा था। उसकी पत्नी कानी थी पर वो बात-बात मैं उसपै तान्ने मारे जावै था। एक बर वो आदमी अखबार पढ़ै था। उसकी पत्नी बोली अखबार मैं के खबर आरी सै। वो बोल्या काहनोन्दे मैं आग लागगी। उसनै बी ओस्सान सा आग्या इतनी वार मैं अर वा बोली - फेर तै गंजूड़ के गंजूड़ जले होंगे।
नफे की बारी आगी। बोल्या - एक बै सरकार नै रूरल इंडस्ट्री लाण का प्रोग्राम शुरू करया था। भरतू गरीब किसान था। उसनै भी लोन ले कै एक पोल्ट्री फार्म खोल लिया। मेहनत करी चूजे ऊपर नै होगे तो लोन महकमे का अफसर चैकिंग पै आग्या। सब किमै देख दूख कै बोल्या - इन चूज्यां नै के खवाया करो। किसान बोल्या - काजू, किशमिश, अखरोट अर और बेरा ना के के। अफसर बोल्या - यो सब खवा कै तो चला लिया मुर्गी खाना। मैं जाकै इसनै बंद करण की सिफारिश करूंगा। भारतू गिड़गिड़ाया पर कोनी मान्या तो दो सौ रुपइये अफसर की गोज में घाल दिये अर बोल्या जी आगे तै ख्याल राखूंगा। दो म्हीने पाछै अफसर फेर पहोंचग्या। देख द्वाख कै बोल्या - इन चूज्यां नै के खवावै सै। भरतू बोल्या - के खवाना सै यो हे घासफूस खालें सै। अफसर बोल्या - इननै मारैगा। म्हारी बदनामी होगी। तेरा लोन वापस लेवण की सिफारिश करूंगा जाकै। भरतू नै फेर दो सौ रुपइये गोज में घाल दिये। अफसर बोल्या आगे तै ख्याल रखना। दो म्हीने बाद अफसर फिर पहोंच गया। मुआइना करने के बाद पूछा - इन चूजों को क्या खिलाते हो। भरतू बोल्या - जी मैं तो इनको कैश पेमैंट कर देता हूं इनका जो जी करै वो खालें। सारे बोले भरतू नै सही जवाब दिया। हरियाणवी जीवन मैं हाजिर जवाबी, साफगोई, व्यंग और मजाक बहोत गहरे तक पैठ बनाये हुए थे। फेर आज काइयांपन बहोत घणा आग्या। महिला विरोधी, दलित विरोधी, जात विरोधी चुटकुले बहुत मिलते हैं। इनसे तो छुटकारा पाकै ढंग के हंसी मजाक गायब होते जावण लागरे सैं वे ल्याणे होंगे। हरियाणा बोली कदे भाषा बणैगी इस बात पै कुछ नहीं कहया जा सकता। हां हिंदी मैं म्हारी बोली के खास शब्द शामिल करके हिंदुस्तानी भाषा का विकास करना बहोत घणा जरूरी सै। करै कौन? हमनै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै।

कहानी एक तोते की

कहानी एक तोते की
राजा का एक तोता था। बड़ा मूर्ख था। गाया तो करदा पर शास्त्र नहीं पढ्या करदा, उछल्या करदा, फुदक्या करदा, उड्या बी करदा। फेर उसनै इस बात का नहीं बेरा था अक कायदा कानून किस चिड़िया का नाम है। एक दिन राजा नै सोच्ची इसा तोता किस काम का? इसतै फायदा तो किमै सै नहीं फेर नुकसान जरूर सै। यो जंगल के सारे फल खा ज्या सै। उसके फल खावण तै मंडी मैं फलां का टोटा पड़ जावै सै। इस तोते ताहिं माड़ा मोटा शूहर सिखावण की जरूरत सै। अर शूहर जिब अवै जिब तोता पढ़ ज्या। राजा नै मंत्री बुलाया अर हुकम जारी कर दिया - इस तोते नै शिक्षा द्यो। शिक्षित करो। मंत्री ने तोते ताहिं शिक्षा देवण का काम राजा के भान्जे ताहिं सौंप दिया। भान्जे नै सैड़फैड़ दे सी पंडितां की एक बैठक बुलाई। इस बात पै विचार मन्थण कर्या गया अक तोते की अनपढ़ता का कारण के सै? सारे पंडितां नै खूब सोच-विचार करकै यो नतीजा काढ्या अक तोता अपना घोंसला साधारण सी खर पात तै बनावै सै। इसे घर मैं विद्या नहीं आती। इस करकै सबतै पहलम अर जरूरी बात या सै अक तोते का एक बढ़िया सा पिंजरा बनाया जावै।
पंडितां नै इस शानदार सोच अर इतने बढ़िया सुझाव की खातर दक्षिणा मिली। वे बहोत राज्जी होए अर खुशी खुशी अपने घरां चाल्ले गये। राजा के भान्जे नै सुनार बुला लिया। वो सोने का पिंजरा तैयार करने मैं जुटया। पिंजरा इतना अनोखा अर बढ़िया बन्या अक उसनै देखण देश-विदेश तै लोग आवण लागगे ज्यूकर चंद्रावल फिल्म देखण ताहिं ट्रैक्टरां मैं बैठ-बैठ कै हरियाणा के लोग सिनेमा हालां पै आया करदे। कोए कहन्ता - इस तोते के तो भागै न्यारे सैं। इसका नसीब बढ़िया सै। शिक्षा की तै अति हो गई तो कोए दूसरा बोलता - शिक्षा ना भी मिलै तो के सै सोने का इतना बढ़िया पिंजरा तो मिल ग्या। सुनार ताहिं थैलियां भर-भर कै इनाम दिया गया। वो तै इनाम पान्ते की साथ घर की राह पाकड़ग्या। उसनै बेरा था अक बेरा ना कद राजा का मूड बदल ज्या अर तेरा यू इनाम बी जावै। गुरु जी तोते नै पढ़ावण बैठगे। बैठते की साथ बोले अक तोते नै पढ़ावण खातर और ढाल की पोथियां की जरूरत पड़ैगी। राजा नै उसे टेम पोथी लिखण आले लाइन हाजिर कर लिये। फेर के था। पोथियां पै पोथी लिखी जावण लाग्गी। जिसनै देख्या वोहे बोल्या या तो इतनी विद्या तैयार कर दी अब इसनै तो धरने की जागां बी कोन्या बची। जिननै वे पोथी लिखी थी उन ताहिं इतने इनाम दिये गये अक वे खच्चरां पै लाद-लाद कै लेगे वे इनाम। इन पोथी लिखणियां के दिन बाहवड़ आये। इनकी जिंदगी मैं तंगी का नाम निशान कोन्या बच्या।
तोते का पिंजरा इतना दामी था अक उसकी देखरेख मैं राजा का भान्जा बहोत व्यस्त रहवण लाग्या। हर बख्त मरम्मत, छाड़ पोंछ अर पालिश ए होन्ती रैहन्ती। इन कामां की खातर लोग लगाये गये। अर उनके कामां की देखभाल करण की खातर और लोग काम पै लगाये गये। पूरा महकमा खड़या होग्या। सब मोटी-मोटी तनख्वाह ले कै अपनी जेब भरण लाग्गे। फेर इस संसार मैं फांच्चर ठोकां की भी कमी कड़ै सै। एक टोहो हजार पाज्यांगे। वे बोले पिंजरे की तो तरक्की होवण लागरी सै फेर तोते की खोज खबर लेण आला कोण सै? बात राजा के कानां ताहिं बी पहोंचगी। भान्जा बुलाया अर पूछया क्यों भान्जे साहब। ये के बात सुणण मैं आवै सै? भान्जा कुणसा कम था एकदम बोल्या महाराज अगर सच सुनना चाहो सो तों सुनार नै बुला ल्यो अर पंडितों नै बुला ल्यो। निन्दुकां कै हाथ कुछ नहीं लागता ज्यां करकै वे इसी बात करैं सैं। जवाब सुणकै राजा कै सारी बात समझ मैं आग्गी। अर उसनै झटपट भान्जे के गले मैं सोने का हार पहरा दिया।
कुछ दिन पाछै राजा का मन करया अक तोते की शिक्षा अपनी आंख्यां तै देखै। एक दिन पहोंचग्या शिक्षाशाला मैं। उनके पहोंचते की साथ डयोढी के धोरे शंख, ढोल, नगाड़े, मृदं बाज पड़े। पंडित गल पाड़ पाड़कै मंत्र जाप करण लाग्गे। मिस्त्री मजदूर सुनार जयजय कार करण लाग्गे। भान्जा बोल्या - देखल्यो महाराज कितनी बढ़िया शिक्षा चाल रही सै। महाराज प्रसन्न होगे आ उल्टे भागे। उड़ै झाड़ी मैं छिप्या निंदक बोल्या - महाराज थामनै तोता देख्या बी सै? राजा चौंक कै बोल्या - अरै हां तोता देखण तो मैं भूले गया। राजा तोते धोरै गया। बंदोबस्त देख कै बहोत राज्जी हुआ। तोता उस बंदोबस्त मैं दिखै ए कोनी था। राजा नै सोच्ची तोता देखण की के जरूरत सै। पिंजरे मैं दाना पानी तो नहीं था बस शिक्षा मतलब पोथियां के पन्ने फाड़ कै कलम तै तोते के मुंह मैं ठोंस राखे थे। तोते का गाना बंद होग्या। चिखण चिलावण की गुंजाइश कड़ै बचै थी। दिन पै दिन कमजोर होन्ता चल्या गया। लोगां नै सोच्या अक प्रगति आशाजनक सै। नाच गाना छोड़ कै तोता शिक्षा कै मंडरया सै। एकाध बर पंख फड़फड़ा दिया करता। कई बर चोंच तै पिंजरे की सलाख काट्टण की कोशिश करता। कौतवाल नै तोते के पंख बी कटवा दिये। शिक्षा पूरी होगी। भान्जा राजा पै गया बतावण। राजा नै बूझया ईबी कुदकै सैके? भान्जा बोल्या - नहीं। राजा बोल्या ईबी गावै सै के दाने खातर चिल्लावै सै? भान्जा बोल्या - ना कति नहीं राजा बोल्या - एक बै तोते नै ल्यां मैं देखूंगा। तोता बड़े ठाठ बाठ तै ल्याया गया। राजा ने तोते कै चुटकी मारी। तोते नै ना हां कही ना नां कही। ना चिख्या ना चिल्लाया। हां उसके पेट मैं पोथियां के सूके कागजां की आवाज जरूर गूंजै थी। तोता मर चुक्या था। आई किमै समझ मैं ?

साठ साल

साठ साल मैं के खोया, के पाया
यो पन्दरा अगस्त फेर आया
सते फते नफे सविता कविता सरिता और ताई भरपाई फेर शनिवार नै जन चेतना केंद्र मैं कट्ठे होगे अर बात चाल पड़ी पन्दरा अगस्त पै। सते बोल्या - हमनै 47 मैं आज़ादी पन्दरा अगस्त नै पाई थी जिसकी खातर भगत सिंह नै फांसी अर गांधी जी नै गोली खाई थी। ठारा सौ सतावण मैं आज़ादी की पहली जंग लड़ी लाखां लोगां नै कुर्बानी दी थी। किसान लड़े, कारीगर लड़े, बीर लड़ी, मर्द लड़े, राजे लड़े, रजवाड़े लड़े, लजवाणे के भूरा निंघाइयां लड़े। फते बोल्या - हरियाणा मैं भी तो बहोत से लोगां नै ज्यान की बाजी लाई थी। अपने खिडवाली गाम के ग्यारा लोग शहीद हुए। नफे बोल्या - के नाम थे उनके? सते बोल्या - इनके नाम थे बही शेख, लालू बालमीकी, तिरखा बालमिकी, मोहमा शेख, जुलफी मौची, सुनार रामबक्स, बेमा बालमिकी, इदुल मौची, मुफी औला पठान, मोहर नीलगर, सायर बालमिकी, अर सुंनाकी बालमिकी। खास बात तो या सै अक खिडवाली के कई मानसां धौरे बूझी इनके बारे मैं फेर किसे नै बेरा ए कोनी इनका। सविता बोली - म्हारे हरियाणा की यादाश्त कमजोर सै। इसे करके तो पूरे देश मैं 1857 राष्ट्रीय विद्रोह की 150वीं वर्षगांठ मनाई जावण लागरी सै अर हाम हाथ पै हाथ धरे बैठे सां। कविता बोली - और के मेवात मैं सदरुदीन किसान नै अपनी शहादत दी थी। ताई भरपाई बोली - 1857 अर 1947 के बीच मैं भी तो बहोत से लोगां नै कुर्बानी दी थी देश की आज़ादी की खातिर। हरियाणा के फौजी आजाद हिंद फौज मैं शामिल हुए। गांधी, नेहरू, भगत सिंह, अंबेडकर हर नै भी तो कुर्बानी दी।
फेर सवाल यू सै अक जिसी आजादी का सपना भगत सिंह हरनै देख्या था वा आजादी म्हारे पूरे भारत मैं अर म्हारे हरियाणा मैं आई अक नहीं? इस साठ साल की आजादी मैं के खोया के पाया? नफे बोल्या - और तो बेरा ना फेर हरियाणा नै तो आर्थिक मोरचे पै तरक्की के सारे रिकाट तोड़ दिये। एयरकन्डीशन्ड जीवन शैली पै पहोंचग्या हरियाणा। घर मैं, कार मैं, स्कूल मैं, दफ्तर मैं, बाजार मैं, सारै एयरकन्डीशनर छागे। साइनिंग हरियाणा सै म्हारा आज। कविता बीच में बोल पड़ी - नफे बस बहोत होली तेरे साइनिंग हरियाणा की। इसका असली रूप बहोत दूसरा सै - सफरिंग हरियाणा। आर्थिक जगत मैं जित इतनी तरक्की करी सै उड़ै ए समाजिक स्तर पै आज बी हरियाणा बहोत पाछै सै। साल 2006 का लिंग अनुपात एक हजार पै आठ सौ बीस सै। पढ़े लिख्यां मैं यो अनुपात एक हजार पै छह सौ सतरां का सै। दलितां की हालत का के जिकरा सै। महिलावां पै घरेलू अर बाहरी हिंसा बढ़ती आवै सै। नफे बोल्या - कविता तनै तो हमेशा चीजां मैं मीन-मेख काढ़ण की आदत सी होगी। ताई भरपाई बोली - मीन मेख का सवाल नहीं सै। जिस आजादी अर तरक्की का तनै जिकर करया सै वह तो दस प्रतिशत आबादी धौरे मुश्किल तै पहुंची सै। हरियाणा के 90 प्रतिशत नै जिनमैं दलित, महिला अर युवा लड़के-लड़की शामिल सैं, उननै तो मेहनत करकै हरियाणा बनाया सै फेर इस तरक्की का फल तो चाख कै बी कोनी देख लिया। हमनै आजादी के संघर्ष मैं जो जनतांत्रिक अधिकार संविधान मैं हासिल करे थे वे कड़ै पहोंचे सैं म्हारे परिवारां मैं? या पिछड़ी सोच, रूढ़िवाद अर अंधविश्वास की जड़ता अर इसके रुखालीये स्वंभू पंचायतें इनै कड़ेै बड़ण दिये नागरिक अधिकार म्हारे परिवारां मैं? इननै तो आजादी सै अंतरजातीय ब्याह करण आल्यां नै फांसी तोड़ण की, फतवे करकै तबाह करण की, इननै आजादी सै दुलिना कांड की, गोहाना कांड की, हरसौला कांड की।
इन तथाकथित पंचायतां नै आजादी सै आसण्डा कांड की, जौन्धी मैं पति-पत्नी नै बाहण-भाई बणावण की। नये बास मैं माणस मरवावण की। रविदास कहगे - ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न। सोचना चाहिए साठ साल की आजादी का हरियाणा मैं के मतलब सै?

कौन-सी परंपरा ?

कौन-सी परंपरा ?
या कहानी नहीं सै। या बनी बनाई बात नहीं सै। या असल मैं होए औड़ बात सै जो किसे बी प्रान्त हरियाणा, यूपी, बिहार, पंजाब मैं हो सकै सै। म्हारे गाम की बात हो सकै सै। थारे गाम की बात हो सकै सै। पड़ोस के गाम की बात हो सकै सै। या म्हारी गली की बात हो सकै सै। या थारी गली की बात हो सकै सै। या किसे बी गली की बात हो सकै सै। या म्हारे घर की बात हो सकै सै। या थारे घर की बात हो सकै सै। डटकै! घणी तावल करने की जरूरत नहीं सै। बातै इतनी गंभीर सै अक क्यूकर करी जा अर करी बी जा अक नहीं करी जा। तो बात या सै अक एक गरीब परिवार था। मां-बाप, एक बेटा दो बेटी। गाम मैं मजदूरी करकै, भैंस का दूध बेच कै अर छह बीघे धरती बाधे पै ले कै बहोत मुश्किल तै गुजारा करैं थे। छोरा ब्याहवण जोगा होग्या। फेर एक तो लड़की मिलना ए मुश्किल काम अर दूसरे ब्याह की खातर खर्चा पानी करने को पैसे नहीं। कई रिश्तेरियां की सिफारिश करकै छोरी पाई थी। कई जगां ब्याज पै 10,000 रुपइये लेवण गया फेर उसकी माड़ी माली हालत देख कै गाम मैं कोए भी तैयार नहीं हुया पीस्सा ब्याज पै देवण नै। एक बर तो ब्याह की तारीख बी आगे नै डिगावनी पड़ी भाई नै। मां न्यारी परेशान। बाबू न्यारा दुखी। करै तो के करै?
एक गाम के बड्डे पंचायती नै हां भरी ब्याज पै पीस्से देवण की। बहोत खुश हुया सुरता अक ईब दोबारा ब्याह की तारीख नहीं आगै सरकानी पड़ैगी। मगर चौधरी नै एक मामूली सी शर्त लगा दी ब्याज पै पीस्से देवण की। सुणकै सुरते के पायां तले की धरती खिसकगी। करै तो के करै? इस शर्त नै मानै तो मुश्किल अर ना मानै तो ब्याह कोन्या होवै। घर क्यां तै सलाह करण की बात कही सुरते नै। चौधरी बोल्या - इसी बातां की सलाह नहीं करया करते ये तो गुप-चुप हो जाया करैं। दो दिन की मोहलत ले कै आग्या सुरता चौधरी पै। मां नै बी बेटे पै पूछनी चाही तो इशारे से मैं बताई सुरते नै बात। मां किमै समझी किमै नहीं समझी। खैर सुरता 10,000 रुपइये ले आया ब्याज पै। ब्याह होग्या। बहू आगी। घूंघट के म्हां कै अर फोटू मैं उसनै अपना घर आला देख लिया था। परिवार उनका भी गरीब था। पहली रात नै जो हुया उसनै देख कै तो रमलो हैरान रैहगी अर उसकै बहोत घणा गुस्सा आया। सुरते की जागां वो चौधरी आग्या उस कमरे मैं जिसनै ब्याज पै पीस्सा दिया था। उस औरत ने बहाना बना कै उस कमरे तै बाहर लिकड़ कै पैंडा छुटवाया। उसकी सासू ने बेरा लाग्या तो वा उल्टी बहू नै समझावण लागी - ए बहू इसपै 10,000 रुपइये उधार लिये सैं। क्यों घर की इज्जत खिंडावै सै। बहू बोली - 10,000 तमनै लिये सैं एक रात का मेरा सौदा करकै अर फेर मनैए उल्टा न्यों कहवो सो अक क्यों म्हारी इज्जत खिंडावै सै।
इज्जत थामनै खिंडाई अपनी अर गैल मेरी बी। इज्जत पर तो हाथ गेरया उस बड्डे पंचायती नै जिसनै थारे तै ब्याज पै पीस्से दिये। खैर वा लड़की अगले दिन अपने पीहर चली गई और उसनै घर जा करकै सारी बात बता दी। छोरी के मां-बाप बहोत दुखी हुये। वे पांच-सात मौजिज आदमियां ने ले कै उस लड़की की ससुराल मैं पहोंचे। गाम के बुजुर्ग अर स्याणे माणस कट्ठे कर लिये। सारे लोगां का योहे था अक जो होगी उसपै माट्टी गेरो अर इनका घर बसण द्यो। जितने मुंह उतनी बात थी। फेर उस छोरी नै स्टैंड ले लिया अक वा उस घर मैं कोन्या रहवै। ईब तो दस हज़ार मैं एक रात का सौदा करया सै। कल को पता नहीं मेरे शरीर का कितने मैं सौदा कर लेंगे ये। सुरते के बाबू नै सुरते के ससुरे के पाहयां में अपनी पगड़ी टेक दी। वा लड़की बोली या पगड़ी जिब कित गई थी जिब मेरा सौदा करया था। कमाल की बात या थी अक सुरते के गाम की पूरे के पूरे की वा बहू इज्जत बनगी अर दूसरे कान्ही तै उसके अपने पीहर के गाम की बी वा इज्जत बनकै साहमी आई। अर दोनों गामां के लोग इज्जत बचावण मैं जुटगे।
लड़की नै करड़ा स्टैंड लिया तो इन सबके तेवर बदलगे अर जितनी अपील थी इन पंचातियां की वे धमकियां मैं बदलगी। वे उस लड़की नै बतावण लाग्गे अक जै तनै यो रिश्ता तोड़ दिया तो तेरी गेल्यां के बण सकै सै। जिसनै ब्याज पै पीस्से दिये सैं इसकी गाम गुहांड में बहोज इज्जत सै अर ऊपर ताहिं पहोंच सै। जड़ उस छोरी नै कह दिया अक मनै मरना मंजूर सै फेर इसे कसाइयां के गाम मैं मनै कोन्या रहना। आगे की आगै देखी जागी। खैर उस छोरी नै उसके माता-पिता बी नाता तोड़ कै अपना घरां उल्टे लेगे। फेर इस सारे वाके नै कई सवाल समाज कै साहमी ल्या दिये। पहली बात तो याहे सै अक म्हारा समाज कित जा लिया? म्हारे समाज नै (दोनूं गामां की पंचायतां नै) उस छोरी को ही समझाने पर जोर क्यों दिया? क्या उस लड़की का तथाकथित पति और उसका परिवार किसी कानून के तहत सजा का दोषी नहीं? और सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उस ब्याज पर पैसे देने वाले चौधरी की पहली रात उस लड़की के साथ बिताने की मांग को समाज ने किस ढंग से देखा? इस पूरी बात में उसे किसी ने नहीं धिक्कारा। किसी ने उसकी इस घिनौनी हरकत की भर्त्सना नहीं की। आखिर ऐसा क्यों? सोचना चाहिए। कुछ करना चाहिए? समाज का बिगाड़ तेजी तै होण लाग र्या सै।

वॉल मार्ट

घर भीतर बड़ग्या साम्राज्यवाद - वॉल मार्ट
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, ताई भरपाई शनिवार की शाम को ताई भरपाई की बैठक में आये। फत्ते बोल्या - काल अखबार मैं पढ़ी थी अक यू साम्राज्यवाद म्हारे घरां मैं बड़ लिया। ताई भरपाई बोली - ये स्वंभू पंचायत ही भतेरी थी हरियाणा मैं, यू साम्राज्यवाद और के बला आगी? कविता नै सत्ते की तरफ देख्या। सत्ते नै नफे की तरफ नजर घुमाई। नफे नै सरिता उकसानी चाही। सरिता नै सविता तै आंख मिलाई। फेर साम्राज्यवाद की परिभाषा तो किसे धोरै कोन्या पाई। नफे नै फेर एक बात बताई। बोल्या - नरसिंह अर प्यारे लाल दो भजनी हुए सैं हरियाणा मैं। एक बर चौ. छोटूराम के जन्मदिन पर भजन पेश कर रहे थे। उनके मुख से बोग्गस शब्द निकल गया। बोले - जानते हो इस बोग्गस शब्द की परिभाषा? फिर बोले - परिभाषा का तो मनै बी कोनी बेरा फेर मैं न्यों बता सकूं सूं अक बोग्गस कौण सै, फेर थाम बना लियो अपनी परिभाषा बोग्गस की। चौ. छोटूराम के परिवार मैं चौ. श्रीचन्द हुए उननै सारे लोग जानते हैं, वे स्पीकर भी बने हरियाणा विधानसभा के। उनके परिवार मैं फेर रिसाल हुया। देख्या होगा सबनै। ओ बोग्गस सै। ईब परिभाषा थाम बनाल्यो बोग्गस की। तो नरसिंह भजनी के हिसाब तै इस साम्राज्यवाद की परिभाषा का तो मनै बेरा ना फेर यू अमरीका साम्राज्यवाद सै। या के बला सै इसका थाम तोड़ पाड़ल्यो। फत्ते बोल्या - अखबार मैं लिख राख्या था अक मित्तल की भारती अर वॉलमार्ट नाम की बिदेशी कम्पनी मैं समझौता होग्या अक ये मिलकै भारत के खुदरा व्यापार मैं पीस्सा लावैंगे। सरिता बोली - यातो आच्छी ए बात सै। इसतै हमनै सस्ती, बढ़िया बिना मिलावट की चीज तो मिलैंगी। अर इन खातिर रोहतक बी कोनी जाना होगा। म्हारे बोहर गाम में, म्हारी गाल में हमनै सारी चीज मिल जावैंगी। फत्ते बोल्या - पूरी बात तामनै सुनी नहीं बीच मैं बोल पड़ी। तनै बेरा सै म्हारे गाम मैं ये किरयाणे की अर और छोटी-मोटी कितनी दुकान सैं? सरिता नै जवाब दिया - पक्का तो मनै बेरा ना फेर होंगी 20-30 दुकान तो। फत्ते बोल्या - म्हारला धर्मा का छोरा किरयाने की दुकान करर्या सै। ओ बतावै था अक म्हारे गाम में छोटी-मोटी सारी मिलाकै 100 तै ऊपर दुकान सैं।
इसका मतलब जै एक घर मैं 4 जणे बी सैं तो 400 लोगां का गुजारा होर्या सै इस खुदरा व्यापार के कारण। बेरा सै हरियाणा मैं कुल कितने गाम सैं? सारे एक दूसरे के मुंह नै देखण लागगे। फत्ते बोल्या - थोड़ा घणा अन्दाजा तो लाओ। चार हजार, पांच हजार, छह हजार? बसे अर बिना बसे कुल मिलाकै 6955 गाम बताये हरियाणा मैं। अर जै एक गाम मैं 50 किरयाने की अर और छोटी दुकान हों, और कम करल्यो 30 दुकान लाल्यो। तो 6955 गामां मैं कितनी दुकान होगी? दो लाख आठ हजार छह सौ पच्चीस होगी। इन दुकानां के पाछै इतने ए परिवार होगे। मतलब आठ लाख तै फालतू लोगां की रोटी रोजी का मामला जुड़र्या सै इस खुदरा व्यापार गेल्यां सीधम साध। और बी कई हिस्से बचगे जिनका हिसाब लागना बाकी सै। सरिता बोली - या भारती कम्पनी जो अपनी दुकान खोलैगी उसमैं रोजगार नहीं मिलैगा के? फत्ते बोल्या - दो दुकान एक काम मैं अर एक दुकान मैं दो माणस तो चार हुए बाकी बचगे 26, तो 26 का तो रोजगार गया। फत्ते बोल्या - पहलम तो सरकार इसी कम्पनियां नै होल सेल मैं व्यापार करने की इजाजत दिया करती। ईब खुदरा व्यापार मैं बी इजाजत दे दी? वॉल मार्ट इकलौता सबतै बड्डा खुदरा व्यापार का बादशाह सै जिसनै लेबर कानूनां की खूब धज्जियां उड़ाई सैं, यूनियन तोड़ी सैं, छोटे खुदरा व्यापारी पढ़ण बिठा दिये इसनै। अर मजदूरां का खूब खून चूस्या शाम दाम दण्ड भेद के गुर लागू करकै। भारत मैं बी यो म्हारे मैं तै कईयां नै तोड़ कै अपनी साथ मिला लेगा। टी वी के माध्यम तै यो अपनी बातां का प्रचार करैगा अर हम टूहल ज्यांगे उन बातां पै। सरिता बोली - इसका मतलब ये लोग तय करैंगे अक हम के खावांगे, के पीवांगे, के पहरांगे, के गावांगे, अर और बेरा ना के के। कविता बोली - इस हिसाब तै तो जै पूरे भारतवर्ष का हिसाब लावां तो ये तो करोड़ां करोड़ लोगां नै बेरोजगार करैंगे। कुछ तो करना चाहिये न्यों हाथ पै हाथ धरें के काम चालै सै? सुण्या सै 200 मिलियन डालर तै ये अपना खुदरा व्यापार शुरू करैंगे अर आवण आले बख्तां मैं 15 बिलियन डालर झोकैंगे इस धन्धे मैं।
सत्ते बोल्या - म्हारे खुदरा आले क्यूकर डटैंगे इनके साहमी? अर जो इतना पीस्सा लावैगा ओ इसतै दो तीन गुणा कमावै बीगा। समझल्यो म्हारी गोजां पै डाका सै यू। गेर रै पत्ता गेर। देखी जागी। ईब कौनसे तीजां बरगे कटरे सैं। हम न्यों ए ताश खेलते रहे तो नाश होणा लाजमी सै अर हम न्योंए ताश खेलते रहवांगे अर फेर कहवांगे - ओहले! हमनै के बेरा था न्यों बणज्यागी? ईब्बी सम्भाला लेल्यो। यो वॉल मार्ट चाहवै सै अक ये स्वंभू पंचायत हमनै न्यों ए जात गोत के सवालां पै लड़ाती रहवैं तो इनै म्हारे गल्यां मैं आर्थिक गुलामी का फन्दा घालण मैं आसानी रहवैगी। जात-पात के फन्द काट कै एक हो ज्याओ जै इस साम्राज्यवाद का मुकाबला करना सै।